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Monday 09 Dec 2019

पत्र

फरवरी 2018 का अंक मिला। प्रस्तावना के जरिए ओडिया साहित्य सृजन और सम्मान के बारे में बेहतर एवं विस्तार से जानकारी मिली। जो हम जैसे पाठकों के लिए बेहद आवश्यक है, आभार। धन्यवाद संपादक राधू मिश्रा जी को, जिनके सारस्वत प्रयासों से तपती रेत पर हरसिंगार जैसी कृति पाठकों के समक्ष आ सकी है। आपने तपती रेत पर हरसिंगार में संकलित कविताओं को उद्धृत कर के साहित्य पढऩे वालों की भूख ही जगा दी है। मैं अभी से उस संग्रह को पाने और पढऩे के प्रयास में लग गई हूं। शोध आलेख शेखर एक जीवनी पढ़कर इसे संपूर्णता में समझने का अवसर मिला। सुषमा मुनीन्द्र जी की कहानी इन्हीं राहों पर चलना है, यात्रा वृत्तांत शैली में प्रस्तुत है। यह पुरुषों के मन की परतें खोलती है, समय, सवाल, व्यवस्था और बंधे-बंधाए नियम-कानूनों को उकेरती रोचकता के साथ आगे बढ़ती है। डायलर टोन कहानी पर्दे पर चलती किसी फिल्म की तरह लगी। पात्र, संवाद, परिस्थितियां सभी सिनेमाई लगे, जो पाठक की जिज्ञासा बढ़ाते हैं। भूले-बिसरे शायर के तहत जहीर कुरेशी जी का प्रयास सार्थक, सराहनीय है। वक्त के पर्दों में छुप गए सितारों को उजाले में लाना साहित्य की सेवा करने जैसा है। ज़हीर साहब ने अपना साहित्यिक धर्म निभाया है। और हम जैसे पाठकों के ज़ेहन में जफ़र साहब की गज़़लें देर तकगुनगुनाने के लिए एक सुअवसर दिया है।

अनुपमा तिवाड़ी, अशोक सिंह, आभा दुबे की कविताएं बेहद अच्छी लगीं। समकालीन हिंदी काव्य में नमक, आलेख में नमक को बिंबित करती रचनाएं आस्वाद से भरपूर हैं। वहींये नमक दमन, शोषण, मान्यताएं इत्यादि को भी आइने के सामने ला रहा। संस्मरण से भीष्म साहनी जी की विनम्रता को और करीब से जानने का मौका मिला। शोध आलेख- मात्र देह नहींहै औरत, सामयिक, उल्लेखनीय, रेखांकित प्रश्नों-प्रतिप्रश्नों से युक्त है। पढ़कर बेहद अच्छा लगा। हिंदी फिल्मी गीतों का साहित्यिक सफर में उद्धृत गीतों की पंक्तियां, गीत और गीतकारों की अमरता का परिचायक है, जिन्हें पुन:-पुन: याद करना, गाना. गुनगुनाना ताउम्र चलता रहेगा। आपके उपसंहार को पढ़कर याद आ रहा है स्वयं को चर्चाओं को प्रमुखता दिलाने के लिए ऐसे बोल, ऐसी डायलागबाजियां हर क्षेत्र में अब आम होती जा रही हैं। न्यूज चैनलों, अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं के लिए विषय प्रदान करने के लिए ये वक्त जो न कराए कम है। बहुत बढिय़ा। उपसंहार हरेक अंक को विचारणीय बना देता है।

मंजुला उपाध्याय मंजुल, पूर्णिया, बिहार।

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अक्षरपर्व का फरवरी अंक अंर्त-बाह्यï दोनों स्तरों पर परमश्लाघ्य है। अंकस्थ संपूर्ण सामग्री अत्यंत महत्वपूर्ण व मूल्यवान है। श्री शीतेन्द्र चौधरी ने अपने आलेख में विभिन्न कोणों से जीव सृष्टि एवं जगजीवन के मूल में वैज्ञानिक नजरिए को प्रतिष्ठापित किया है। आपका निष्कर्ष चिंतनीय है-समस्त प्रकार के विचार, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान का विकास मनुष्य के विकास के साथ ही हुआ है। मनुष्य ही इन सबका रचयिता है। भूले-बिसरे शायर स्तंभ के अंतर्गत भाई जहीर कुरेशी ने इस बार मप्र के जफ़र नसीमी जैसी आला शख्सियत और उनकी लाजवाब शाइरी से पाठकों को परिचित कराया है। उन्हें दिली मुबारकबाद। कालिदास के सात हजार (प्रभाकर चौबे) वर्तमान उन तथोक्त साहित्य बाबाओं पर जमकर कशाघात करता है, जो अपने नाम और यश का उपयोग सामाजिक दोहन के लिए करते हैं। तीनों समीक्षाएं पर्याप्त संतुलित और स्तरीय हैं। प्रस्तावना और उपसंहार भी महत्वपूर्ण एवं मननीय है।

मार्च अंक के नयनाभिराम आवरण चित्र के लिए बंशीलाल परमार को हार्दिक साधुवाद। ललित जी ने प्रस्तावना में एक नितांत नवीन मुद्दे पर बड़ी ही ज्ञानवद्र्धक सामग्री प्रस्तुत की है। साहित्यिक क्षेत्र में जाने-अनजाने होने वाली तस्करी-चौरकर्म पर आपने व्यापक चिंतन-मनन प्रस्तुत किया है। जीवनलाल वर्मा बनाम नागार्जुन के हवाले से आपने देश-विदेश में हो रही हिंदीतर भाषाओं की तस्करी को भी बेनकाब किया है। आज के डिजीटल युग में इस अनपेक्षित विद्रूपता से बचने के लिए इस दिशा में देश के प्रबुद्धजनों को सतर्कतापूर्वक सोचना होगा, सक्रिया होना होगा। उपसंहार में सर्वमित्राजी ने न्यू इंडिया की त्रासदी में 2013 और 2018 की दो दुर्घटनाओं के हवाले से बेहद अफसोस के साथ बताया है कि बिहार में गरीब बच्चों की जान की कीमत बीते 5 सालों में दोगुनी हो गई है। किंतु फिर भी हमारा संवेदनहीन प्रशासन खामोश है। प्रस्तुत अंक में कविताएं, गज़़लों पर हावी हैं। विजय पर्व (प्रभा मुजूमदार), खुशबू (देवेन्द्र आर्य), तिलचट्टे (निर्मल गुप्त) और ताले (राजेन्द्र उपाध्याय) इस अंक की प्रभावी कविताएं हैं। चंद्रसेन विराट के मुक्तक भी परमश्लाघ्य हैं। साक्षात्कार के तहत गंगा प्रसाद विमल से भूपेन्द्र हरदेनिया की बातचीत भी सहज, सुबोध एवं विचारोत्तेजक है।       

       भगवानदास जैन, अहमदाबाद।

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फरवरी अंक कई अर्थों में बेहतर लगा। इसमें प्रकाशित प्रस्तावना के अंतर्गत भुवनेश्वर साहित्य समाज का विवरण, आशुतोष तिवारी, विजय गुप्त, निक्की कुमारी, ज्ञानेन्द्र प्रताप सिंह, तथा नितिन सेठी के आलेख और सुषमा मुनीन्द्र की कहानी तथा अशोक सिंह की कविताएं खास तौर पर पसंद आईं। राहुल राजेश का यात्रा संस्मरण अच्छा लगा। उपसंहार भी सुजाता गिडला के विचारों के बरक्स अच्छा लगा। आशा है अगला अंक और बेहतर निकलेगा।

रामनिहाल गुंजन, आरा।