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Wednesday 21 Aug 2019

तीखे व्यंग्य के साथ वर्तमान की जटिलताओं का चित्रण

असगऱ वजाहत बहुमुखी प्रतिभा के रचनाकार है। उन्होंने गद्य की सभी विधाओं में अपनी लेखनी चलायी तथा उत्कृष्ट रचनाएँ दी है। मूल रूप से वे एक कहानीकार हैं उनकी कहानियाँ संवाद शैली में रचित परम्परागत ढाँचे से अलग है। वजाहत का मानना है कि ''समय के अनुसार कहानी की परिभाषाएँ छोटी पड़ती जाती है। जैसे-जैसे समय बीतता है वैसे-वैसे रचना से अपेक्षाएँ बढ़ती जाती है और अन्तत: रचना परिभाषा से बाहर निकल जाती है।'' सद्य प्रकाशित कहानी संग्रह 'भीड़तंत्र' की कहानियाँ भी उनके इसी द्वंद्व की शिकार है। इस संकलन में तीस कहानियाँ संकलित है। ये कहानियाँ सन् 2015 से 2017 के मध्य लिखी हुई है। सन् 2014 के बाद देश की परिस्थितियों में बहुत तेजी से बदलाव आना शुरू हो गया था। बदलाव क्या ? वह सब जो देश में पिछले 50 साल से धीरे-धीरे हो रहा था अचानक गति पकड़ लेता है। कुछ मूलभूत सवाल उठ खड़े होते हैं जो हमारे देश और समाज के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं। वो सारे सवाल ही कहानियों की शक्ल में वजाहत ने हमारे सामने उठाये हैं।

'भीड़तंत्र' में संकलित कहानियाँ हमारे आज का आईना है। हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को मजबूत कर रहे हैं या ढहा रहा हैं? घृणा व हिंसा की जो परछाइयाँ आजकल हमारे समाज में मुखर हो गयी हैं, उनको कहानियों में संकेत के रूप में उभारने का प्रयास किया गया है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में सीधे-सादे लोग अपार कष्ट झेल रहे हैं। सत्ता किसी भी कीमत पर सत्ता में बने रहना चाहती है। सत्ता के सामने मानवीय मूल्यों के लिए कोई जगह नहीं है। हमारे यहाँ लोकतंत्र की स्थापना जिस उद्देश्य को लेकर की गयी, वह उद्देश्य नदारद हो गया है। लोकतंत्र, भीड़तंत्र में बदलता जा रहा है। स्थिति यहांँ तक पहुंच गई कि आज न्याय भी भीड़ ही कर रही है। भीड़ को कानून हाथ में लेने में कोई हिचक नहीं है। कानून का निर्माण हमारे यहां वो लोग कर रहे हैं जिनको कानून तोडऩे का ज्यादा अनुभव है। संग्रह की प्रतिनिधि कहानी भीड़तंत्र में लेखक ने इस चिन्ता को व्यंग्य के माध्यम से व्यक्त किया है, ''जब सी भीड़ अदालत बनी है तब से कानून अंधा नहीं रह गया। अब कानून चारों तरफ देखकर फैसला करता है। कानून नाम पूछता है, जाति पूछता है, धर्म पूछता है, संप्रदाय पूछता है और भी कुछ छोटे-मोटे सवाल करता है। लेकिन फैसला तुरंत कर देता है। क्योंकि वह जानता है कि फैसला जल्दी न किया गया तो न हो पाएगा।''  (पृ.126) लोकतंत्र में ऐसी स्थिति आने का मतलब है कि नागरिको ंका व्यवस्था से विश्वीस उठ गया हैं उनको राजनेताओं, पुलिस और न्याय व्यवस्था पर भरोसा नहीं रहा। दूसरी और कुछ राजनेता अपने लाभ के लिए ऐसा करवाते है। वे खुलेआम ऐसे लोगों को संरक्षण प्रदान करते है। भीड़ लोकतंत्र मे ताण्डव मचा रही है, कोई उन्हें रोकने वाला नहीं है। राजस्थान, दिल्ली व हरियाणा में ऐसी घटनाएँ हुई जहांँ पर भीड़ के सामने पुलिस भी लाचार नजऱ आयी। ये सब कुछ राजनीतिक संरक्षण में हो रहा है। मंत्री उस क्षेत्र के वोटर की संख्या देखकर पुलिस को कार्यवाही का आदेश देते है। अगर उनके वोटर ही ज्यादा है तो पुलिस को कार्यवाही का आदेश ही नहीं  दिया जाता। हमारा लोकतंत्र किस प्रकार आँकड़ों का खेल बन गया है, और हाईकमान आँकड़ा हासिल करने के लिए कैसे-कैसे हथकण्डे अपनाते हैं, इस पूरी घटना को 'लोकतंत्र का मंत्र' कहानी में उकेरा गया है। जनप्रतिनिधियों की बाड़ेबंदी की जाती है। इस बाड़ेबंदी के दौरान उन्हें फाईव स्टार होटल की सुविधाएं प्रदान की जाती है। उनकी दूसरी एक बड़ी प्राकृतिक आवश्यकता (सेक्स) की पूति के लिए विदेशों से अप्सराएं मंगवाई जाती है। इस प्रकार की घटनाएं कमोबेश हर राज्य में हो रही है। जिन्होंने हमारे देश के लिए लोकतंत्र का स्वप्न देखा देश को आजाद करवाने हेतु अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया उन्हें इस प्रकार की स्थितियों की कल्पना लेशमात्र भी नहीं रही होगी अन्यथा वो आजादी की लड़ाई लड़ते ही नहीं। जनप्रतिनिधियों को इतनी सारी सुविधाएं जिसे हम कह सकते है कि धरती पर उपलब्ध सर्वोत्तम संसाधन का सुख देने पर भी हाईकमान को इन पर भरोसा नहीं होता। यहां वजाहत कल्पना का सहारा लेते है। हाईकमान एक चमत्कारी बाबा की मदद से सभी जनप्रतिनिधियों को कुत्ता बनवा देते है, वोटिंग के दिन पुन: इन्हें इन्सान बना लेंगे। यहां कुत्ता बनना उनके गुणों का प्रतीक है। वे जनता द्वारा चुने जाने के पश्चात् इतने घटिया हो गए कि उनमें इन्सान लायक गुण बचे ही नहीं। ''हाईकमान ने कहा कि ठीक है आप कुत्ता बना दीजिए। बाबा ने मंत्र पढ़ा और सभी जनप्रतिनिधि कुत्ता बन गये। लेकिन पत्रकार कुत्ता नहीं बने। हाईकमान ने बाबा से पूछा कि मंत्र का प्रभाव पत्रकारों पर क्यों नहीं पड़ा तो बाबा ने कहा, ''मंत्र आदमी को कुत्ता बनाता है, कुत्ते को कुत्ता नहीं बनाता।'' (पृ.111) मीडिया लोकतंत्र का एक स्तम्भ है लेकिन वह भी भ्रष्ट हो गया तभी वजाहत को चमत्कारी बाबा के माध्यम से कहलाना पड़ा कि, ''मंत्र आदमी को कुत्ता बनाता है कुत्ते को कुत्ता नहीं।'' हमारे लोकतंत्र का यह दुर्भाग्य है कि जनप्रतिनिधि कुत्ते के कुत्ते ही रह गए।

चुनावों के मौसम में राजनेताओं द्वारा दलित के घर भोजन करने की होड़ मच जाती है। समाचार पत्रों में बड़ी-बड़ी खबरें छपती हंै। इस पर कहानीकार ने 'दलित के द्वारे' कहानी के माध्यम से व्यंग्य कसा है। देश की आजादी के 70 सालों बाद भी वह दलित ही क्यों रह गया इस पर किसी का ध्यान नहीं है। नेताजी एक करोड़ की कार में उसके घर जाकर उसके साथ खाना खाकर फोटो खिंचवा रहे हंै और मीडिया भी नेताजी के पीछे-पीछे भाग रहा है। वहाँ से नेताजी के जाने के बाद दलित के क्या हाल हैं उस पर मीडिया भी मौन है। सवाल यह है कि दलित के घर खाना खाने से उसके हालात बदल जाएंगे क्या? आजादी मिलने के बाद हम ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं बना पाये जिससे कि दलित देश की मुख्य धारा में आ जाये। देश के धार्मिक स्थलों पर जो एक अजीब तरह की प्रतियोगिता शुरू हुई है उसको 'आवाज का जादू' कहानी हमारे सामने लाती है। ''कॉम्पीटीशन बढ़ता चला गया। मंदिरवालों ने अमेरिका से इंजीनियर बुलाये और मंदिर पर एक बहुत बड़ा लाउडस्पीकर लगाया। मस्जिद वाले रूस से इंजीनियर लाये और लाउडस्पीकरों की आवाजे बढ़ती गयी और इतनी बढ़ गयी.......... सब सुनने वालों के कान फट गये। भजन गाने वालों और अजान देने वालों के कान भी फट गये।'' (पृ.68) इस कॉम्पीटिशन में धर्म का वास्तविक मर्म है वो कहीं खो गया है। उसकी तरफ किसी का भी ध्यान नहीं है, न ही उसकी जरूरत किसी को महसूस हो रही है। क्योंकि सबके कान फट चुके हैं।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में सहायता राशि देने की परम्परा ने पीडि़त परिवार को संबल प्रदान करने की जगह एक व्यवसाय का रूप ले लिया है। इसका चित्र ''भगदड़ में मौत'' कहानी के माध्यम से खींचा गया है। इंसान की जान की कीमत सहायता राशि के सामने कुछ भी नहीं रह गयी है, ''जिसके परिवार से कोई भगदड़ में नहीं मरा है वे अपने घर के बड़े-बूढ़ो को गालियां देने लगे कि वे कितने नीच और विधर्मी हो गए है कि 'दर्शन' करने भी नहीं जा सके।'' (पृ.13) हमारी व्यवस्था में सहायता राशि जाति व धर्म के आधार पर तय होती है, मृत देह की कीमत भी उसकी जाति या धर्म के आधार पर तय होने लगी यह लोकतंत्र के साथ भद्दा मजाक है। हद तो तब हो जाती है जब सहायता राशि उन्हीं को दी जाती है जो उन्हीं के श्रद्धालु अर्थात् वोटर है। स्थिति यहांँ तक पहुंँच गयी कि हर व्यक्ति देश को लूट लेना चाहता है। चाहे वह जनप्रतिनिधि है, चाहे नौकरशाह, चाहे व्यवसायी, चाहे दबंग हो। वजाहत लिखते है, ''एक औरत की लाश के साथ बड़ा अजीब हुआ कई लोग आये और कहने लगे कि यह हमारी माताजी की लाश है। हमें सहायता राशि दी जाये। अगले दिन कुछ और लोग आ गये और यही कहने लगे। फिर हर रोज लोग आने लगे और यहीं दावा करने लगे कि यह औरत उनकी माँ है। धीरे-धीरे यह संख्या हजारों, लाखों, करोड़ों तक पहुँच गयी। आर्थिक मदद देने वाले परेशान हो गए कि एक औरत करोड़ों लोगों की माँ कैसे हो सकती है। (पृ.22) यह औरत हमारा देश है जिसे सभी अपने-अपने हित में नोच रहे है। जितना लाभ ले सकते हैं लेने की कोशिश कर रहे हैं।

'देश के ऊपर बना पुल' कहानी में ये पुल जो देश के ऊपर है वह आस्था का पुल है। इस देश में हम आस्था के नाम पर कुछ भी कर सकते हैं। लोकतंत्र में हमने आस्था को सुविधा बना दिया हैं जिस नदी को पवित्र माना जाता है उसी में हम सारा कूड़ा बहा रहे है। 'शिक्षा के नुकसान' कहानी में वजाहत कहते हैं कि शिक्षित व्यक्ति सवाल करता है, समाज में समानता चाहता है। सुकरात भी विद्वान थे, वे प्रश्न करते थे। व्यवस्था पर सवाल उठाते थे। इसलिए उन्हें बहुमत ने जहर का प्याला पीने की सजा दी। हमने जो व्यवस्था स्थापित की है वो कहने को लोकतांत्रिक है लेकिन आम हिन्दुस्तानी को सवाल करने की आजादी नहीं  है। सत्ता नहीं चाहती कोई उस पर सवाल उठाये। हम लोकतंत्र में लोगों को साक्षर ही रहने देना चाहते उन्हें शिक्षित नहीं होने देना चाहते। यह षडय़ंत्र आजादी के समय से अभी तक जारी है। 'देशहित' कहानी में बताया गया है कि आज हिन्दुस्तान में देशहित का मतलब एक पार्टी विशेष को वोट देना रह गया हैं आज देशभक्तों से कोई सवाल नहीं कर सकते। अगर अपने सवाल किया तो आप देशद्रोही हो। वजाहत लिखते है कि, ''देशप्रेमी ने एक दलित से पूछा।' ''तुम देश से प्रेम करते हो?'' (पृ.85)

दलित ने कहा, ''मैं तुम्हें मंदिर के अन्दर आकर इस सवाल का जवाब दे सकता हूँ।'' देशप्रेमी ने कहा, ''मुझे उत्तर मिल गया है। तुम देश से प्रेम नहीं करते हो।' ऐसा विद्रूप पैदा करनी की शक्ति वजाहत की कलम में ही है। लोगों के दिमाग में घृणा के भाव कितने प्रबल है कि वे मरने के बाद भगवान से कह रहे हैं कि ''हम चाहते हैं कि हमें आदमी को मारने से पहले उसका धर्म पता चल जाये। आपसे विनती है कि कुछ ऐसा कर दें।'' (पृ.91) समाज में घृणा का ऐसा माहौल सत्ता ने ही बनाया क्योंकि उन्हें कुछ भी करके सत्ता चाहिए।

यह कहानियाँ हमें यह संकेत करती है कि जब भी कोई विचार सत्ता में आ जाता है तब उसका मूल चरित्र बदल जाता है। सत्ता हमेशा सत्ता में ही रहना चाहती है। वह सीधे व सरल लोगों में प्रतिशोधन व घृणा की भावना भर देती है। वजाहत की इन कहानियों में यथार्थ की छवियाँ मिलती है। कहानियाँ पढ़कर लगता है कि ये लघु कथाएँ है, लेकिन ये इनकी कहानी कहने की शैली है।

कहानी संग्रह - भीड़तंत्र

लेखक- असगर वज़ाहत

प्रकाशक- राजपाल एंड संस।