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Friday 21 Sep 2018

सयाने हो गए हैं बच्चे

सयाने हो गए हैं बच्चे

 स्कूल जाने के पहले दिनों से ही

वे हो गए हैं सतर्क

सीख गए हैं दुनियादारी का सबसे जरूरी सबक

कि इस दुनिया में कहीं भी कुछ भी

कोई भी भरोसे के काबिल नहीं

न खिलौना

न चॉकलेट

न आदमी

अपने ही पैर के गंधाते जूते में भी

छिपा हो सकता है साँप

किसी भी समय घट सकता है फरेब

 

चाहे कितना ही जाना-पहचाना हो रास्ता

घर मुहल्ला गलियाँ स्कूल पार्क

किसी भी हँसते चेहरे के पीछे से

झपटकर बाहर निकल सकता है लकड़बग्घा

दबोच सकता है टेटुआ

पलक झपकते कर सकता है काम तमाम

 

यह दुनिया जिसमें रोज ही ढह रहा है कुछ न कुछ

यह समय जिसमें रोज ही डूब रहा है मौसम

जरूरी है कि नींद में जाने से पहले

कर लेना चाहिए नींद से वापस लौटने का पक्का इंतजाम

यहाँ न घास का मैदान सुरक्षित है

न पंछियों से सूना धुँआता आसमान

अब जरा सी चूक

जरा सी नादानी

छोटा से छोटा कोई बचपना भी

डाल सकता है सांसत में जान

बचपन के अपने शुरूआती दिनों से ही

बचपना करने से

बेहद कतराने लगे हैं बच्चे

 

आजकल हर घड़ी

रहते हैं चौकस चौकन्ने

सचमुच, बहुत सयाने हो गए हैं बच्चे!

 ---

      वे

वहाँ बहुत-बहुत रौशनी थी

वहाँ बहुत-बहुत अंधेरा था

 

वहाँ सब कुछ इतना अच्छा-अच्छा था

कि कुछ भी अच्छा नहीं लगता था

वहाँ सब कुछ इतना भला-भला था

कि कुछ भी भला नहीं लगता था

 

वहाँ सभी खूब सटकर बैठे थे

पर वे दोस्त नहीं थे

वे दुश्मन भी नहीं थे

लेकिन एक दूसरे से बहुत कटकर बैठे थे

 

वहाँ चीज़ें ही चीजें़ थीं

बहुत महंगी बहुत नाजुक बहुत खूबसूरत

कि उन्हें देखने में डर लगता था कहीं मैली न हो जाए

लेकिन जो दुरूस्त थीं अपने नियत ठिकानों पर

केवल लोग थे जिनका कोई ठिकाना नहीं था

लेकिन वे लापता लोग नहीं थे

न ही गुमशुदा

न ही बेघर बार

उन्होंने जानबूझकर

कहीं गिरा दिया था अपने घर का पता

अपने माता-पिता का नाम

अपना डेट ऑफ  बर्थ

उनके पास निज का कोई भूगोल नहीं था

न ही कोई अपना इतिहास

 

उनके पास कोई चेहरा नहीं था

कोई निश्चित अवयव

कोई ठोस आकृति नहीं थी

वैसा कुछ भी नहीं था जिसे पहचाना जा सके

जाना जा सके

छुआ जा सके कि जिसके बारे में

कुछ कहा और सुना जा सके

वे टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं और मैले रंगों की लीपापोती थे

उनके कान नाक आँख मुँह पेट पीठ...

सब एक दूसरे में गड्डमड्ड गड्डमड्ड हो रहे थे

 

कहने को उनके सभी अंग-प्रत्यंग थे

लेकिन असल में कुछ भी नहीं था उनके पास

जिसे कुल मिलाकर कहा जा सके चेहरा

न आदमी का

न जानवर का

 

वहाँ बहुत-बहुत रौशनी थी

वहाँ बहुत-बहुत अँधेरा था

वहाँ सभी एक दूसरे की कूबर पर सवार थे

और समय की दहलीज से बाहर खड़े होकर

किसी अदृश्य दुश्मन पर भौंक रहे थे

और किसी अदृश्य मालिक के लिए

अपनी दुम

लगातार हिला रहे थे