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Wednesday 14 Nov 2018

इंतज़ार का पेड़

इंतज़ार का पेड़ 

कि उसी के झंडे का रंग गहरा है !

दूर से देख रहा एक आदमी बौखलाए लोगों को

जिनकी बौखलाहट में गुलाम हो जाने की इच्छाएं प्रबल हैं

जैसे एक जंग है उनके बीच

गुलामियत में अव्वल आने की!

यह समय झंडा उठाने वालों का समय है अपने ईश्वर के लिए

जो दूर बैठा देख रहा सबको

और लगा रहा ठहाके

गुलामियत की दौड़ लगाते लोगों की नादानियों पर

जमीर मर चुका उनका

वे जीते जी जिंदा लाश भर हैं

लग रहा जिन्हें

सबसे ज्यादा फीका होते हुए भी

उन्हीं के झंडे का रंग गहरा है

जैसे उनके झंडे में

दुनिया के सारे रंग उनके ईश्वर ने भर दिए हैं !

 

तुम्हारी हँसी एक डर पैदा करती है

 

तुम हँसते हो जब भी

एक डर फिर से जन्मता है घरों में

शायद फिर कोई विदा होगा दुनिया से

तुम्हारी हँसी ने ही घरों में

पैदा की हैं ऐसी धारणाएं !

तुम हँसते हो

तो हत्यारे जाग उठते हैं

मानो तुम्हारी यह हँसी

उनके लिए काम पर निकलने का आदेश है !

तुम्हारी हँसी उभरती है

अट्टहास करती हुई जब भी

मुरझाने लगते हैं खिले हुए फूल !

तुम दिखाना चाहते हो जबकि

दुनिया को खुश करने के लिए तुम हँस रहे हो

तुम दिखाना चाहते हो जबकि

अपनी हँसी से

लोगों का दुख हर लेने की इच्छाएँ

तुम्हारे भीतर हिलोरें मारने लगी हैं !

पर एक सवाल रह जाता हमेशा

जिसे पूछने से लोग डरते आ रहे

कि हर बार तुम्हारे पीछे

दिखाने और होने में एक अंतराल क्यों जन्मने लगता है?

हँसना छोड़ अपने रस्ते तुम क्यों नहीं चले जाते

क्यों नहीं शामिल हो जाते उसी टोली में

जहां कि तुम्हें होना चाहिए

पर तुम हो कि उनसे अलग दिखना चाहते हो

दिखने-दिखाने में उलझ जाती हैं कई बार चीजें

तुम्हारी हँसी भी उलझेगी इसी तरह

और बिगाड़ देगी तुम्हारे चेहरे की रौनक

फिर एक सन्नाटा भर बचेगा वहां

जो इतिहास में दर्ज हो तुम्हें डराएगा

फिर तुम्हारी यह हँसी ही तुम्हें याद आएगी

और एक दिन अपनी ही हँसी से

तुम डरने लगोगे देखना !

 

जगह नहीं बची प्रेम के लिए

कुछ जगहों को

भीतर का लालच कुतर गया

कुछ को कुतर गई घृणा!

कुछ जगहें पहुँच से बाहर ही रहीं जीवन में

बस पांव भर जमीन ही बची

खड़े होने को यहां !

फिर भी कहते हो तुमने प्रेम पर कोई कहानी नहीं लिखी!

जो किया नहीं

उसे लिखता भी कैसे?

जगह ही कहाँ बची उसके लिए

सारी जगहों को तो

भीतर के चूहों ने ही कुतर लिया !

 

दिनचर्या

सुबह उठकर चाय सुड़कने

अखबार पढऩे

सिगरेट फूंकने

और आस पड़ोस में अपनी बदजुबानी परोसने के सिवा

और क्या बचा रह गया

जो दिनचर्या का हिस्सा होकर भी

स्मृतियों में जिंदा रहने लायक जगह बना सका अपने लिए !

दिनचर्या में जहां लोग रोज जन्मते हैं

और दिन ढलने के साथ

मर जाते हैं रोज

उन्हें रातों में मरी हुई चीजें डराती होंगी बहुत

किसी मजबूर आदमी से ऑफिस में ऐंठकर ली हुई रिश्वत के साथ

जब उस गरीब का मजबूरी से सना हुआ चेहरा उभरता होगा

तब डरकर नींद से जागते होंगे मरे हुए लोग

और घंटों सोचते होंगे

अरे छोड़ो भी यार पाप पुण्य की बातें

सुबह तो फिर जिंदा हो उठना है अपनी दिनचर्या में

और इस तरह अपने डर को भगाते हुए

फिर किसी मजबूर आदमी का गिरेबान पकडऩे की तैयारी में

जिंदा हो उठते होंगे अपनी दिनचर्या में वे !

आदमी की दिनचर्या

अपने किए हुए अपराध से बच निकलने

और पुन: पुन: अपराध करने का

एक अभ्यास की तरह हो गयी है इन दिनों

जन्म लेने और मर जाने के दरमियान

फासला महज दिनचर्या का ही है अगर

तो जरा ठहरकर सोचिये

कहीं आप भी तो उन मरे हुए लोगों की जमात में शामिल नहीं हैं !