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Friday 21 Sep 2018

ग़ज़ल

        ( 1 )

आँचल   तेरा   धानी  सा

दिल  है  मेरा   पानी  सा

 

मुश्किल तो है  पहला प्यार

मिलना  इक  आसानी सा

 

इस अनजान नगर में कौन

अपनी   बोली  बानी  सा

 

नौ दस साल की लड़की है

लहज़ा  दादी  नानी   सा

 

तन की भीड़ों में  इक मन

रखना  है   मनमानी  सा

 

ख़ुद को  हमने  छोड़ दिया

बचपन  की   शैतानी  सा

 

जीवन तुम बिन भी जीवन

पर  कितना  बेमानी  सा

 

जन्मों  का  रिश्ता  है अब

दो  दिन की  मेहमानी सा

 

छूकर  देख  न चाहत  को

पानी   होगा   पानी   सा

 

सूखे  पेड़  पर  इक  पंछी

बैठा   ज्ञानी   ध्यानी  सा

 

झाँस  लगेगी  उसकी  कुछ

सच  तो  कच्ची  घानी सा

भूला  भी  है  याद भी  वो

नींद में  सुनी  कहानी  सा

 

दुख की  बस्ती  में जब तब 

आता  सुख  सैलानी  सा

 

लब पर लब रख कर 'अनिमेष'

दे  जाता  कुछ  मानी  सा         

 

 

         ( 2 )         

पानी   बरस  रहा  है

मन को  परस  रहा है

 

कौन  तार  सब  मेरे

बिन परसे कस रहा है

 

फूला  फला  है  कोई

कोई   हरस  रहा  है

 

इक पल  साथ तुम्हारा

बरसों  बरस   रहा  है

 

टूटे  हुए  इस  दिल में

तू जस का तस रहा है

 

प्यार   और  पानी  पर

कब किसका बस रहा है

 

होंठ   लगे   होंठों  से

घुल  अमृत रस  रहा है

 

गीला  सोंधा  सा  मन

कैसे   रहस  रहा   है

 

रात   जगा  था  सूरज

अब तक  अलस रहा है

 

प्यास   बुझेगी   सबकी

तू  क्यों  तरस  रहा  है

 

रस  अनहद  बतरस का

फिर क्यों बहस  रहा  है

 

सबमें  बाँट कर सब कुछ

'अनिमेष'   हँस  रहा  है

                ( 3 )

चले   आइये   अब   चले  आइये

बहुत  बढ़  गये   फ़ासले   आइये

 

बहुत  हाथ  हाथों  में  आये  गये

कभी   हमसे  मिलने  गले  आइये

 

लबों से जो लब मिल न पाये तो क्या

दुआ  दिल  की  फूले फले  आइये

 

नहीं   दोस्ती   दुश्मनी  ही   सही

कसक कोई  क्यूँ कर  पले  आइये

 

हों  रस्ते  खफ़़ा  और  रुत बेवफ़ा

क़दम दर  क़दम  पर  छले  आइये

 

जिधर दौर दुनिया का रुख़ आज है

ये दिल कल कोई ले न ले  आइये

 

बहुत  मुश्किलें  हैं  ये  माना  मगर

हैं  अपने  भी  तो  हौसले  आइये

 

अभी  रोशनी  रोशनी  हर  तरफ़

हो  जब  शाम  सूरज  ढले  आइये

 

जो निकले तो सूरज भी निकला न था

दिया  सांझ  का  अब  जले  आइये

 

मिले  जोत से जोत  कुछ इस तरह

ये  लौ  और  ऊँची  जले  आइये

 

सँजो कर  रखी  कब से सौग़्ाात जो

कोई  और  ही  ले  न  ले  आइये

 

शबे  वस्ल  की   राह   तकते  हुए

ये   अरमां   हुए   सांवले   आइये

 

जहाँ मिल के बिछड़ा था बचपन कभी

उसी   बूढ़े   पीपल   तले   आइये

 

कहीं   जायेंगे   पर  कहाँ  पायेंगे

मुहब्बत   के   ये   मरहले   आइये

 

अभी  इक  सफऱ से  है आना हुआ

बुलाते  हैं   फिर   आबले   आइये

 

कहाँ  भूलता   प्यार  पहला   कभी

न  साँस  आखिऱी भी  ढले  आइये

 

ये दुनिया शरीफ़ों की 'अनिमेष' कब

भले   जाइये   पर   भले   आइये