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Tuesday 22 May 2018

धर्म और विज्ञान के बहाने निम्नस्तरीय राजनीति

जब त्रिपुरा के मुख्यमंत्री विप्लव देव ने पौराणिक चरित्र संजय द्वारा धृतराष्ट्र को महाभारत युद्ध का आंखों देखा हाल सुनाने के प्रसंग का हवाला देकर प्राचीन काल से भारत में टेक्नोलॉजी, इंटरनेट और सैटेलाइट होने की बात कही तो यह महज इस तरह के बयानों की एक अगली कड़ी भर थी। इससे पहले भी वर्तमान सरकार के मंत्रियों का यह अतीत प्रेम अनेक रूपों में अभिव्यक्त हुआ है। 2014 में प्रधानमंत्री मोदी ने गणेश भगवान को हाथी का सिर लगाने वाले प्लास्टिक सर्जन की प्रशंसा में कसीदे पढ़े थे। सन 2014 में ही गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि हीजनबर्ग का प्रिंसिपल ऑफ अनसरटैनिटी वेदों से लिया गया है। अपने कथन के समर्थन में उन्होंने ऑस्ट्रियन अमेरिकन लेखक काप्रा की पुस्तक द ताओ ऑफ फिजिक्स(1975)का हवाला दिया। बाद में यह तथ्य सामने आया कि यह पुस्तक क्वांटम सिद्धांत और उपनिषदों की दार्शनिक समानताओं पर केंद्रित थी और इसमें ऐसा कोई भी दावा नहीं किया गया था।  जनवरी 2018 में केंद्रीय मंत्री एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी सत्यपाल सिंह ने कहा कि मनुष्यों के विकास संबंधी चाल्र्स डार्विन का सिद्धांत वैज्ञानिक रूप से गलत है। स्कूल और कॉलेज पाठ्यक्रम में इसे बदलने की आवश्यकता है। मनुष्य जब से पृथ्वी पर देखा गया है, हमेशा मनुष्य ही रहा है। यहां यह जानना रोचक है डार्विन का सिद्धांत ईसाई और इस्लाम धर्म के अनुयायियों को भी स्वीकार्य नहीं रहा है।

गुजरात के स्कूलों में 2016-17 में शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति के संस्थापक दीनानाथ बत्रा की लिखी पुस्तकों को आधार बनाकर पाठ्यविषयवस्तु में अनेक ऐसे परिवर्तन किए गए जिन्हें अंधविश्वासों को प्रश्रय देने वाला और काल्पनिक इतिहास पर आधारित माना जा सकता है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अधिवेशनों में पिछले तीन चार वर्ष में विज्ञान की खोजों और सिद्धांतों से अधिक भारत के मिथकीय इतिहास पर चर्चा होती रही है एवं इसे महिमामंडित किया जाता रहा है। 2015 की मुम्बई विज्ञान कांग्रेस में एक सेशन संस्कृत भाषा में प्राचीन विज्ञान पर केंद्रित था जिसमें श्री बोडस और श्री जाधव द्वारा प्राचीन भारतीय उड्डयन विज्ञान पर एक शोधपत्र प्रस्तुत किया जाना था। 2018 की विज्ञान कांग्रेस में विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री की हैसियत से डॉ हर्षवर्धन ने कहा कि स्टीफन हाकिंग के अनुसार आइंस्टीन के एक प्रसिद्ध समीकरण से कहीं बेहतर सिद्धांत वेदों में प्रतिपादित किए गए हैं। यद्यपि इस कथन को प्रमाणित न किया जा सका। हर्षवर्धन ने ट्वीट कर यह भी कहा कि हिन्दू धर्म के संस्कारों और रीति रिवाजों का गहन वैज्ञानिक आधार है तथा भारत की वर्तमान वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियां दरअसल गौरवमयी अतीत की खोजों की ही बदौलत प्राप्त हुई हैं। नोबल पुरस्कार विजेता वेंकटरमन रामकृष्णन ने भारतीय विज्ञान कांग्रेस को एक सर्कस की संज्ञा देते हुए कहा कि यह एक ऐसा संगठन है जहाँ विज्ञान की ही चर्चा नहीं होती है।

ये सारे उदाहरण यह दर्शाते हैं कि पौराणिक और मिथकीय इतिहास को (जिसमें कल्पना और काव्यतत्व का प्राधान्य है) किस प्रकार आधुनिक विज्ञान के उद्गम के रूप में प्रतिष्ठित करने की चेष्टा हो रही है। यह आधुनिक विज्ञान की असाधारण उपलब्धि ही कही जाएगी कि उसने कवियों की कल्पना को यथार्थ में बदल दिया और आम मनुष्य को उन देवताओं और मिथकीय पुरुषों के समकक्ष ला खड़ा किया जिनकी क्षमताओं को अलौकिक मानकर इनके कार्यकलापों को चमत्कार की संज्ञा दी जाती थी। धार्मिक साधना पद्धतियों का अनुसरण कर जो शक्तियां इक्का दुक्का साधकों को उपलब्ध होती थीं वैसी ही शक्तियां हर मनुष्य को चाहे वह धनी हो या निर्धन बिना भेदभाव के विज्ञान ने उपलब्ध करा दीं। रेडियो, टेलीविजन, मोबाइल, इंटरनेट, वायुयान, विद्युत, अंग प्रत्यारोपण आदि कितने ही विज्ञान के उपहार हैं जिन्होंने आम आदमी की जिंदगी को बेहतर बनाया है। यदि हम पौराणिक कथाओं की काल्पनिकता को विज्ञान का उद्गम मानें तो यह हास्यास्पद तो है ही, चिंतनीय भी है।

इस प्रकार की विचारधारा आत्मगौरव से अधिक आत्म प्रवंचना की ओर ले जाएगी। ऐसा नहीं है कि हमारे पास गौरव करने योग्य कुछ भी नहीं है। गणित और खगोलिकी में हमारे पास बौधायन, आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य और महावीराचार्य हैं। विज्ञान में हमारे पास कणाद, वराहमिहिर और नागार्जुन हैं। चिकित्सा में हमारे पास चरक और सुश्रुत हैं, आयुर्वेद जैसी चिकित्सा पद्धति है, वैकल्पिक जीवन शैली का ज्ञान देते पतंजलि और उनका पातंजल योग सूत्र है। किन्तु आज के जीवन में इनकी उपयोगिता सिद्ध किए बिना इनकी सर्वश्रेष्ठता का कोई भी दावा स्वीकारणीय नहीं होगा। दुर्भाग्य से हम प्राचीन सिद्धांतों को आधुनिकता की कसौटी पर कसने के बजाए विज्ञान को धार्मिक पहचान से जोड़ कर विवादों को जन्म दे रहे हैं। वैज्ञानिक अविष्कारों को धर्म के साथ संयुक्त कर उन्हें व्याख्यायित करने का प्रयास नया नहीं है और पहले भी ईसाई मतावलम्बी बाइबिल के आधार पर और इस्लाम के अनुयायी कुरान के आधार पर इनकी व्याख्या करने का प्रयास कर चुके हैं। भारत में विज्ञान के इतिहास को वेदों तक सीमित कर हम बौद्ध वैज्ञानिकों की उपेक्षा तो कर ही रहे हैं बल्कि अरब देशों  की उस वैज्ञानिक ज्ञान की धरोहर को भी हाशिए पर डाल रहे हैं जो 8 वीं से 11वीं सदी के मध्य विकसित हुई और जो भारतीय, चीनी और यूनानी ज्ञान का समन्वय थी तथा जिसने बारहवीं शताब्दी में यूरोप में प्रवेश कर वैज्ञानिक-औद्योगिक क्रांति की आधार भूमि प्रदान की। वेद, कुरान और बाइबिल के आधार पर विज्ञान के सिद्धांतों और अविष्कारों की व्याख्या के प्रयासों में कुछ बातें साझा रही हैं -ये हास्यास्पद हैं, कुतर्क पूर्ण हैं, वैमनस्य उत्पन्न करने वाली हैं और विज्ञान के विकास में बाधक हैं।

प्रोफेसर इरफान हबीब ने विज्ञान के इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता बताते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की है- जो यूरोप-केंद्रित इतिहास है, जिसे अंग्रेजों तथा अन्य यूरोपीय भाषाओं के विद्वानों ने औपनिवेशिक दौर या उसके बाद में लिखा, उस इतिहास में यूरोपीय और अमेरिकी सभ्यताओं के अलावा जितनी भी सभ्यताएं दुनियाभर में हैं, उनके योगदान को हाशिये पर रखा गया। उन्हें कोई विशेष महत्व नहीं दिया गया। यूरोप-केंद्रित आधुनिक विज्ञान के इतिहास को विखंडित (डिकंस्ट्रक्ट) कर देखा जाना चाहिए। उसमें यह भी देखा जाना है कि आधुनिक विज्ञान सिर्फ इंग्लैंड या यूरोप का उत्पाद नहीं है, बल्कि वह सामूहिक प्रयासों का परिणाम है। उसमें योगदान के मामले में हर सभ्यता और संस्कृति ने अपनी एक उत्कृष्ट भूमिका निभायी है। विभिन्न सभ्यताओं ने विभिन्न शताब्दियों में ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अपनी समझ का विस्तार किया और उसे साझा किया।

इरफान हबीब विज्ञान इतिहासकार शैफर को उद्धृत करते हैं- यह कथा बहुत प्रचलित है कि आधुनिक विज्ञान पश्चिमी यूरोप से सारी दुनिया में प्रचलित हुआ, जिसकी शुरुआत करीब 500 साल पहले न्यूटन, कोपरनिकस और गैलीलियो, फिर डार्विन, आइंस्टीन आदि के साथ हुई थी। लेकिन, विज्ञान के वैश्वीकरण के बारे में यह कथन पूरी तरह से बेमानी है। यह सदियों से होती रही पूर्व और पश्चिम के बीच ज्ञान विनिमय की उल्लेखनीय प्रक्रिया को नजरअंदाज करता है।

 वर्तमान सरकार चाहे तो शोध और अन्वेषण के द्वारा विज्ञान के इतिहास के पुनर्लेखन द्वारा औपनिवेशिक वैज्ञानिक इतिहास को संशोधित कर वैश्विक स्वरूप दे सकती है।

इरफान हबीब ने यह रेखांकित किया है कि विज्ञान का कोई धर्म नहीं होता, इसीलिए इस्लामिक साइंस और वैदिक साइंस जैसे विभाजन बेमानी और खतरनाक हैं। धर्म दैवी है और यह आस्था पर आधारित है जबकि विज्ञान संदेह और अनुसंधान की बुनियाद पर टिका है। आज जो वैज्ञानिक सत्य और तथ्य हैं, वे कल अस्वीकार भी किये जा सकते हैं तथा विज्ञान की यह सर्वसम्मत प्रक्रिया है। ऐसा धर्म के साथ नहीं होता।

दरअसल धर्म यह देखकर आनंदित होता रहता है कि किस प्रकार विज्ञान उसकी दार्शनिक प्रस्थापनाओं को स्वीकार करता जा रहा है। सत्यान्वेषण में लगे विज्ञान में यह उदारता है कि जब क्वांटम सिद्धांत दर्शाता है कि मूलभूत कण दोहरा व्यवहार करते हैं और हीजनबर्ग अनिश्चितता का सिद्धांत प्रतिपादित करते हैं या हाल ही में जब गॉड पार्टिकल की खोज होती है तो वह अपनी सीमाओं को खुले मन और मुक्त कंठ से स्वीकारता है। वह धर्म की दार्शनिक प्रस्थापनाओं के प्रति आदर भी व्यक्त करता है। धार्मिक सत्यानुभूति व्यक्ति विशेष तक सीमित होती है और अहस्तांतरणीय होने की सीमा तक निजी होती है। विज्ञान इस सत्यानुभूति को सार्वजनिक कर देता है। वह ज्ञान का लोकतंत्रीकरण कर देता है। कई बार ऐसा भी लगता है कि धर्म अपनी सर्वोच्चता के अहंकार में डूबा अपने स्थान पर स्थिर और निष्क्रिय खड़ा है और विज्ञान उसके क्षेत्र पर आधिपत्य जमाता हुआ धीरे धीरे धर्म के निकट पंहुच रहा है।

धर्म में भी विज्ञान सम्मत होने की आकांक्षा बढ़ी है। यही कारण है कि धर्म और विज्ञान के समन्वय के प्रयास भी बढ़े हैं। समन्वय के इन प्रयासों में ऐसा नहीं है कि धर्म ने विज्ञान की तर्क पद्धति को अपनाया है। धर्म समर्थकों ने इस बात की चेष्टा अधिक की है कि वे धर्म को मनुष्य के भौतिक जीवन को संवारने वाला भी सिद्ध कर सकें। इस प्रयास में वे धर्म के दार्शनिक पक्ष को उपेक्षित करते और कर्मकांड पक्ष को विज्ञान सम्मत बताने की कोशिश करते नजर आते हैं। कर्मकांड विशुद्ध धार्मिक नहीं होते। इन पर स्थानीय पर्यावरण और संस्कृति की छाप भी होती है। इसी कारण इनमें से अनेक अनुभवजन्य मान्यताओं पर आधारित होते हैं और कुछ का वैज्ञानिक आधार भी दर्शाया जा सकता है। इस सफलता का श्रेय अकेले धर्म को देना ठीक नहीं है।

जिस प्रकार दार्शनिक और धर्म गुरु अपने सिद्धांत को सर्वोत्कृष्ट और अपने सत्य को अंतिम समझने की गलती करते पाए जाते हैं उसी प्रकार वैज्ञानिक भी परिपूर्णता के भ्रम के शिकार हो जाते हैं और अहंकार उन पर हावी हो जाता है। महान व्यक्तियों की इस मनोदशा के कारण अप्रिय विवाद उत्पन्न हुए हैं। यह विवाद आंतरिक भी रहे हैं और अंतर अनुशासनात्मक भी किन्तु इन विवादों को सत्यान्वेषण के मार्ग से वैयक्तिक अहंकारजन्य विचलन के रूप में देखा जाना चाहिए न कि धर्म और विज्ञान की असहिष्णुता के रूप में इनकी व्याख्या की जानी चाहिए। सच्चा सत्यान्वेषी हमेशा अज्ञानता के बोध से ग्रसित होता है और इसीलिए विनम्र और सहिष्णु भी होता है।

धर्म और विज्ञान के संबंधों पर बहुत व्यापक विमर्श हुआ है। कहा जाता है कि वैज्ञानिक सिद्धांतों और अविष्कारों का सकारात्मक लोककल्याणकारी उपयोग करने के लिए सक्षमता धार्मिक और नैतिक मार्गदर्शन से ही प्राप्त होती है। यह भी कहा जाता है कि बिना आस्था के धर्म और विज्ञान कार्य नहीं कर सकते। अनेक वैज्ञानिक ईश्वर पर आस्था नहीं रखते किन्तु अपने सिद्धांत पर तो आस्था रखते हैं और इस बात पर भी कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है। यह भी रेखांकित किया गया है कि धर्म जिन विशेषताओं को ईश्वर के साथ संयुक्त करता है विज्ञान उन्हीं को प्रकृति के साथ। अंतर केवल शब्दों का है। अनेकानेक शोधों में यह भी बताया गया है अनेक शीर्ष वैज्ञानिक ईश्वर के अस्तित्व को मानने वाले और धार्मिक रहे हैं, इस प्रकार वैज्ञानिक अन्वेषण और धार्मिक आस्था में कोई विरोधाभास नहीं है। चिंतकों का एक समूह यह मानता है कि अध्यात्म (स्पिरिचुअलिटी)और आधुनिक विज्ञान संगत होते जा रहे हैं। जबकि संस्थागत धर्म(इंस्टिट्यूशनल रिलिजन) और उसके कर्मकांड विज्ञान द्वारा खारिज किए जा रहे हैं।

धर्म और विज्ञान के बीच सेतु बनाने की जैसी कोशिशें सरकार कर रही है उनसे न धर्म का हित होगा न विज्ञान का बल्कि मूढ़ता और जड़ता का प्रसार ही होगा। यदि यह राजनीतिक लाभ पाने के लिए उठाया गया कदम है तो यह कहना पड़ेगा अब राजनीति अपने निम्नतम स्तर पर पहुंच गई है जब अज्ञानता के अंधकार का प्रसार कर अपनी स्वार्थ सिद्धि की निंदनीय कोशिशें की जा रही हैं।