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Thursday 05 Dec 2019

रेगिस्तान में नखलिस्तान

आगे आगे गैयाँ पीछे पीछे ग्वाल-बीच में मेरा मदन गोपाल/छोटी छोटी गैयाँ छोटे छोटे ग्वाल-छोटो सो मेरा मदन गोपाल/कारी कारी गैयाँ गोरे गोरे ग्वाल-श्याम वरन मेरा मदन गोपाल।‘

गा रहे थे एक वयोवृद्ध जन अपनी डफली बजा बजाकर।  गायन का स्वर लोक-स्वर से पगा हुआ था। वार्धक्य की पकी हुई आवाज़ गायन और विशेषकर भक्ति गीतों के लिए पूरी तरह मुफीद बैठती है और 'सूर गीतों’ की तरह यहां यह सांगीतिक माधुर्य दिख भी रहा था। गाने वाले की तन्मयता ने सुनने वालों को विभोर कर रखा था इसलिए श्रोता लयबद्ध ताली बजाने से अपने को रोक नहीं पा रहे थे और उनकी हथेलियाँ आपस में अनवरत ताल दे रहीं थीं। इन ताल और तालियों के बीच में मदन गोपाल की भूमिका में समझें दो साल की गोपिका नाच रही थी अपनी नन्ही पायल छमका छमका कर, उसके चारों ओर तालियों के स्वर बज रहे उसके दादी-दादा और मम्मी पापा के। यानी भक्ति के साथ आसक्ति बराबर चल रही थी।

गाने वाले ने गायन पूरा किया तब मैंने उन्हें दस का एक नोट दिया। उन्होंने बड़े रागी ढंग से मुझे मेरी सीट पर बिठा दिया 'अरे! ठहरिए महोदय अभी आप बैठिए तो।‘ और फिर उसने दूसरा भजन छेड़ दिया था, यह था सांईबाबा का और फिर वैसा ही मधुरमय और भक्तिमय वातावरण निर्मित कर लिया गया जिसका प्रभाव ट्रेन में बैठे परिजनों में झलकने लगा था। मैंने उन्हें एक गीत का दस देना चाहा था पर उसने दूसरा इसलिए सुना दिया था कि मैं दस की दर से उन्हें दो गीतों के गायन का बीस रूपए दे सकूं.. और ऐसा ही हुआ था। वृद्धजन के साथ एक किशोर था जो संभवत: उनका पोता रहा हो। वह अपने दादाजी की देखभाल के लिए साथ चल रहा था। वृद्धावस्था के बाद भी पेट पालन के लिए आय का स्रोत उसके दादाजी अब भी बने हुए थे। यह कला की एक दूसरी बानगी थी जो रोजगारोन्मुखी थी।

राजस्थान करीब आ रहा था। धंधे रोजगार में उस्तादी रखने वाले इस राज्य ने जीवन के हर पक्ष को रोजगारोन्मुख कर लिया है। चाहे लोककला हो या चोखी धाणी गांव। नट कला के जितने पेशेवर रूप यहां मिलेंगे वे अन्यत्र दुर्लभ हैं। जितनी यहां समृद्धि है उतनी गरीबी भी। इसलिए हर गली कूचे में भीख के लिए दौड़ते हुए लोग भी दिख जाते हैं.. और दस रुपये से कम पर क्या उतरेंगे। जहां छत्तीसगढ़ का मांगने वाला एक का सिक्का पाकर संतुष्ट भाव से आशीर्वाद दे बैठता है वहां राजस्थान में आशीर्वचन दस के सिक्के से कम में नहीं फूटते। इससे कम देने वाले को हाना ताना सुनने को मिलेंगे.. पधारो म्हारो देस।

ट्रेन में जब परिजनों बच्चों के साथ बैठो तो ट्रेन का कूपे एक छोटे से घर में तब्दील हो जाता है। घर जैसी एक चिरपरिचित अस्तव्यस्तता बोगी में पसर जाती है। जिसमें बिखरे हुए चादर, कम्बल, तकिए, नेपकिन होते हैं। पानी का डिब्बा और खाने पीने के बरतन। बीचोंबीच लगा आइना ड्रेसिंग टेबल सा अहसास कराता है। लाइट पंखों के बटनों के बीच स्विचबोर्ड में मोबाइल चार्जिंग के लिए लटक जाते हैं। स्त्री पुरुष खाते-बतियाते बैठे होते हैं बच्चों की धींगामस्ती के बीच। घर से दूर एक घर किसी चलित सिनेमाघर की तरह। बब्बन खां का एक मशहूर नाटक था 'अदरक के पंजेÓ जो सिनेमाघरों में टिकट पर दिखाया जाता था। ट्रेन की बोगी में कुछ उस नाटक के घर की तरह का घर दिखने लग जाता है और यात्री उस नाट्यघर के पात्र हो जाते हैं।

दुर्ग से अजमेर जाने वाली यह ट्रेन मध्यप्रदेश के विराट हिस्से में चलती है पूरब से पश्चिम की ओर। अपने इस पुराने प्रदेश की इस रेलवे लाइन पर हम पहली बार चल रहे थे तो थोड़ी उत्सुकता थी ट्रेन की खिड़कियों से इस इलाके को देखने की। 1993 में प्रकाशित मेरे पहले व्यंग्य-संग्रह का नाम 'मेरा मध्यप्रदेशीय हदय’ था। छत्तीसगढ़ के पेंड्रारोड के बाद मध्यप्रदेश अनूपपुर से आरंभ हो जाता है। अनूपपुर जादुई यथार्थ के कथाकार उदयप्रकाश का कस्बा है जहां की स्मृतियों को वे यदा-कदा फेसबुक पर अपलोड करते रहते हैं। शहडोल, कटनी, दमोह, सागर रात में अनजाने निकल गए थे तब देखने को मिला अशोकनगर, गुना का क्षेत्र। गुना मध्यप्रदेश का अंतिम स्टेशन फिर राजस्थान का कोटा। ट्रेन में बैठे दो मुसाफिर बातें कर रहे थे कि 'मध्यप्रदेश में खेतीबाड़ी अच्छी है। छत्तीसगढ़ की सरकार वहां की खेतीबाड़ी में ध्यान नहीं दे रही है। एम.पी. गेहूं उत्पादन में पंजाब से आगे निकल रहा है और मालवा का गेहूं तो क्वालिटी में सबसे अच्छा है।‘हम दूर दूर तक जिन हरी-भरी फसलों को देख पा रहे थे वे सब गेहूं के खेत थे। विभाजन से पहले क्षेत्रफल में मध्यप्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य था पर छत्तीसगढ़ बन जाने के बाद राजस्थान बड़ा हो गया था.. और हम वहीं जा रहे थे।

गेहूं के खेतों को अगर छोड़ दें तो मध्यप्रदेश व राजस्थान दोनों पड़ोसी राज्यों में ये समानताएं हैं कि 'दोनों विशाल क्षेत्रफल में फैले पथरीले महलों, किलों, हवेलियों से भरे राजपूती सामंती राज्य रहे हैं। दोनों के आम-निवासियों में समरूपता है। सांवले रंगों से भरे चेचक दाग वाले चेहरे कुछ अधिक मिल जाते हैं। इन चेहरों में मुस्कानें कम हैं। संभवत: इन दोनों राज्यों में पथरीलेपन के कारण जीने की जद्दोजहद ज्यादा रही है। राजस्थान में भूरे रंगों और थूर की कंटीली झाडिय़ों वाली अरावली पहाड़ी है और मध्यप्रदेश में विंध्याचल। इस पर्वत शृंखला का पश्चिमी अंत गुजरात में तथा पूर्व में राजस्थान व मध्यप्रदेश की सीमाओं के नजदीक है। इसका उत्तर पश्चिम का इलाका रहने लायक नहीं है जो विन्ध्य व अरावली शृंखला के बीच आता है। ये पहाडिय़ां दक्षिण से आती हुई नर्म हवाओं को रोकती है इसलिए गर्म रहती हैं।

दोपहर हम कोटा पहुँच गए थे जिसे हम फल्ली तेलों की आपूर्ति के लिए जाना करते थे पर बाद में इस शहर को राजस्थान के मेधा-संपन्न शिक्षाविदों ने उच्चतर शिक्षा के लिए देश का सबसे बड़ा कोचिंग सेंटर बना डाला था.. तब देश के हर हिस्से के नौजवानों ने बड़े बड़े सपने संजोकर ऊँची शिक्षा के काबिल अपने को बनाने के लिए कोटा की ओर दौड़ लगाना शुरू कर दिया था। सपने पूरे नहीं हो पाने से कोचिंग सेंटर की छतों से ही कूद कर अत्महत्याएं भी होने लगीं। अपने हॉस्टल में फांसी लगाकर खुदकुशी करने लगे। इन महत्वाकांक्षी बच्चों के माता-पिता ने कोचिंग संस्थानों से गुहार लगाई कि 'भले ही पैसा ज्यादा ले लो, लेकिन बच्चों की पढ़ाई के साथ-साथ उनकी काउंसलिंग का भी ध्यान रखो।' कुछ सेन्टर विवादग्रस्त हो गए और उनकी विश्वसनीयता को लेकर सीबीआई जाँच की भी मांगें होने लगी थीं.. फिर कोटा की फ्रेंचाइजी दूसरे प्रदेशों में खुलने लग गई। इन कारणों से अब कोटा की रौनक कम हो रही है। यह स्टेशन को देखकर भी लग रहा था। जहां नौजवानों का हुजूम दिखना चाहिए वहां सन्नाटा था। दिन के ग्यारह बजे सन्नाटा इतना कि हमारी दो साल की पोती 'न्यासा’ इसके प्लेटफार्म में दौडऩे लग गई थीं। काफी पिलाने वाले ने बताया कि 'यहां इंजन बदली होती है इसलिए गाड़ी आधे घंटे खड़ी होगी।‘

भारतीय रेलवे भी साहित्यकारों की तरह स्थानीयता के प्रति संवेदनशील होता है और उसकी इस समझ को रेलवे स्टेशनों के निर्माण व उनके रखरखाव में स्पष्ट चीन्हा जा सकता है। चूँकि राजस्थान किलों और महलों का राज्य है तो यहां उनकी झलक स्टेशन भवनों में भी देखी जा सकती है जो किलों महलों की अनुकृतियां जान पड़ती हैं। ऐसे ही एक स्टेशन में गाड़ी खड़ी हुई थी जो किसी महल परिसर की तरह साफ सुथरा व चमकदार दिख रहा था। अपनी नक्काशी के साथ स्टेशन भवन नोकदार शक्ल में खड़ा हुआ था। गरम पकौड़े बेचने वाले ने बताया कि 'यह सवाई माधोपुर स्टेशन है।' फिर उसने पूछा कि 'आप लोग कहाँ से आ रहे हैं?’ मैंने खड़ी ट्रेन के डिब्बे पर लिखे अपने शहर का नाम दिखाया 'दुर्ग' (दुर्ग-अजमेर एक्सप्रेस) 'हम जयपुर जा रहे हैं’ तब उसने कहा कि 'आप लोग यहां उतर जाइए सवाई माधोपुर में। यहां रणथंभौर का किला देखो भैया और इसका बाघ उद्यान। अरे इस सीजन में भारी भीड़ रहती है बिदेसी लोगों की यहां बाघ और किला देखने के लिए।‘ अपने शहर के प्रति उसके प्यार और प्रचार को मैंने सलाम किया। ट्रेन ने सीटी मार दी थी। मैंने डिब्बे में चढ़ते हुए सवाईमाधोपुर स्टेशन की उस नोकदार इमारत को देखा जो किसी महल के झरोखों सदृश मनभावन दिख रहा था। क्या ऐसा ही कुछ हवामहल होगा?

हम बेटे बहू और पोती के साथ जयपुर स्टेशन में उतर चुके थे। शाम के चार बज रहे थे। बेटी दामाद और नाती पुणे से आकर इस समूह में शामिल होने वाले थे। वे आज सुबह की पुणे जयपुर फ्लाईट से उतर चुके थे। मोबाइल पर उन्होंने सूचित किया कि होटल वाले अपनी कार से हमें पिकअप कर लेंगे। चौबीस घंटे की यात्रा के बाद हम जमकर अंगडाईयां लेने लगे थे।

गुलाबी नगरी जयपुर में स्वागत अपने ढंग का हुआ। जैसे ही होटल वाहन हमें बिठाकर स्टेशन स्थित चौराहे पर पहुंचा तो ट्रैफिक पुलिस ने हमें रोक दिया। ड्राईवर की बगल में मैं बैठा हुआ था। उसने खिड़की के पास आकर कहा कि 'आप सीटबेल्ट नहीं लगाए हैं। इसलिए सौ रुपये चालान पटाइए।‘ हमने पटा दिया और आगे बढ़ चले। हमारे छत्तीसगढ़ में सीटबेल्ट बांधने पर अब तक कोई कड़ाई नहीं बरती गई है इसलिए लगाने का अभ्यास नहीं हुआ है। यहां सबक मिल चुका था तो चार दिनों तक ध्यान रहा और जो भी ड्राइवर मिला वह बराबर टोकता रहा।

हम होटल से तैयार होकर सड़क पर आए। जयपुर इतना पेशेवर लेकिन सुविधाजनक हो चुका है कि मामूली रिक्शा वाला भी आपको हर किसम का वाहन मुहैया करवा देता है। ऐसा ही हुआ और एक पैडल रिक्शे वाले ने अपना मोबाइल निकालकर हमारे लिए इनोवा तय कर दिया था।

यह 'चोखी ढाणी’ का प्रवेश द्वार था। बेटी-दामाद और नाती यहां पहले पहुंचकर हमारा रास्ता देख रहे थे। अब हम सब साथ हो गए थे यानि छ: वयस्क और दो बच्चे, एक पोती दो साल की न्यासा और दूसरा नाती तीन साल का हृदान। एक का अर्थ सरोवर है और दूसरे का बड़े दिल वाला। तब लोग दिल छोटा क्यों करें,  सामने काउंटर पर टिकट दर देखा एक टिकट का सात सौ रूपए। सोचना क्या था अपना डेबिट कार्ड निकाला और सामने रखी स्वाइप-मशीन पर रगड़ दिया।

'राम राम सा’ की आवाज़ के साथ तूतरू-दफडा जैसे बाजे बज उठे। हमारा तिलक लगाकर आरती उतारकर स्वागत किया गया। परंपरागत राजस्थाणी परिधानों से सजी स्त्रियां हमारे सामने खड़ी थीं जिन्हें स्वागत के बदले में हमने शगुन के कुछ रूपए धरा दिए थे। हमारे सामने दस-बारह एकड़ की भूमि पर बसा एक राजस्थाणी गांव था जो लालटेन की मद्धिम पीली रौशनी बिखेर रहा था। गांव की चौपाल में ग्रामवासियों सा स्वांग धरे बैठे जन बोल बतिया रहे थे। पेड़ की छांह में मर्दनिया लोगों के सिर व बदन ठोंककर मालिश कर रहा था। जगह जगह बने मंचों पर घूमर नृत्य में लहंगा घुमातीं नर्तकियाँ थीं। जिनके साथ नाचने के शौकीन दर्शक भी नाच रहे थे। ऊंट, बैल और घोड़ा गाड़ी थी जिसमें बच्चे महिलाएं बैठकर गांव का चक्कर लगा रहे थे। किसी छोटी पहाड़ी पर माता के मंदिर के दर्शन के लिए लोग पंक्तिबद्ध होकर खड़े थे। कहीं कठपुतली नृत्य को देखकर बच्चे किलक रहे थे। किसी पेड़ के नीचे जादू वाला अपने करतब दिखा रहा था। महिलाएं चूड़ी पहनकर मेहंदी लगवा रही थीं.. और अंत में रंगोली बने एक सुन्दर सजे झोपड़े में राजस्थाणी थाली में घी से तरबतर माल परोसे जा रहे थे। पंगत में बैठे लोगों को पगड़ी पहनाकर बीस किस्म के व्यंजन खिलाए जा रहे थे। यह किसी सामंतों के समृद्ध गांव का एक नजारा था जो सात-सौ के टिकट में शामिल था। इस गांव में इतने सुन्दर झोपड़े कतारबद्ध बनाए गए हैं जहां पंचसितारा सुविधाएँ मौजूद हैं जिन्हें लोग होटल के कमरों की तरह आबंटित करवा कर रहते भी हैं। कहा जा सकता है कि यह अपने ढंग का एक 'मिनियेचेर’ है जिसमें अलग अलग गांव की कई खूबियां एक गांव बनाकर रख दी गई हैं। राजस्थान का यह चोखी ढाणी देश के दूसरे शहरों में भी खोला गया है। हर जगह भिन्नता है। हमने चार साल पहले पुणे में भी एक चोखी ढाणी देखी थी।

अजमेर ले जाने वाला ड्राइवर राधेमोहन कहता है कि 'साब इस बार महारानी जाएंगी यहां से। उसके सनकीपन से त्रस्त तो गई है जनता। मुठभेड़ में लोगों को मरवा देती है। वो रहेगी तो अपनी पार्टी को भी डुबाएगी। फिर तो सचिन भइया के नेतृत्व में उनकी पार्टी आ जाएगी।‘ ये बात हर रोज हमारी इनोवा के बदलते ड्राइवर कहते हैं। सूचना माध्यम इतने हो गए हैं कि अब गरीब आदमी भी राजनीति पर ताल ठोंककर बातें कर लेता है और मौका मिल जाने पर धुरंधरों को ठिकाने लगा देता है।

राजधानी और पर्यटन केन्द्र होने से जयपुर की चारों ओर जाने वाली हाईवे अच्छी बन पड़ी हैं। लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर अजमेर पुष्कर की दूरी दो घंटे में पूरी हो जाती हैं। पिछले दिनों हिन्दी व्यंग्य उपन्यास के महान लेखक मनोहरश्याम जोशी के साक्षात्कार पढ़ रहा था जिन्होंने अपने बचपन व जवानी के शहर अजमेर में बीते आपने संघर्षरत दिनों की घटनाओं का बेबाक चित्रण किया था।

बीस बरस पहले जब फतहपुर-सीकरी देखा था तब वहां गाइड ने सलीम चिश्ती की दरगाह के सामने बताया था कि 'भाईसाब सलीम चिश्ती के दादा-परदादा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह अजमेर में है जहां बेटा पाने की चाहत में शहंशाह अकबर ने नंगे पांव गरम रेगिस्तान पर यात्रा की थी तब जाकर उनकी मन्नत तो पूरी हो गई पर सलीम नाम से बेटा ऐसा जना जिसने बाप के खिलाफ ही जंग छेड़ दी थी।‘

हम इस अजमेर वाले ख्वाजा की दरगाह के सामने सिर पर रूमाल बांधकर खड़े थे जिसने बेटा चाहे जैसा जना हो पर साम्प्रदायिक सदभाव को ऐसा जन्मा कि देश के सभी सम्प्रदाय के मुसीबतजदा लोग यहां मन्नतें मांगने आ ही जाते हैं। किसी गाथा के विश्वास-अंधविश्वास से कहीं ज्यादा उसकी अनेकता में एकता ला देने की ताकत को हम सर-आँखों पर ले सकते हैं। इस दरगाह को दुनियाभर में सांप्रदायिक सौहाद्र्र का सबसे बड़ा मरकज माना जाता है और वाकई ख्वाजा साहब को चाहने वालों में मुस्लिमों के अतिरिक्त अन्य धर्मों के मानने वालों का भी इस मुकाम पर अकीदा (विश्वास और श्रद्धा) है तो गैर मुस्लिम को भी कमेटी में होना ही चाहिए। ऐसी सदभावपूर्ण मांगें भी यदाकदा मुसलमान भाइयों की ओर से उठती रही है। दरगाह के भीतर इस महान सूफी संत मोइनुद्दीन चिश्ती की मजार पर मत्था टेकने वालों में गजब की होड़ है।

गुरु नानकदेव भी ख्वाजा के दर आए थे। अंग्रेजों की मुखालफत का आंदोलन चलाते हुए मजार शरीफ पर मत्था टेकने के बाद गांधीजी ने दरगाह परिसर में ही अकबरी मस्जिद में आमसभा को संबोधित किया था। प्रधानमंत्री नेहरू पत्नी कमला और संत विनोबा को साथ लेकर यहां आए थे। पोता पाने पर इंदिरा जी भी यहां चलीं आई थीं। देश के इस सबसे बड़े मान्यताप्राप्त दरगाह की दूरी पार्किंग स्थल से फकत एक किलोमीटर पर है गजालत भरी ऐसी संकरी गली है जहां चार चक्के नहीं बमुश्किल ऑटोरिक्शा ही जा सकते है।

हम दरगाह के मुख्य द्वार से जैसे ही बाहर होते हैं तो सामने मिठाइयों और मांसाहार की खूब दुकानें हैं। मैं रंग बिरंगी चक्राकार मिठाई को देखकर पूछता  हूं 'यह कौन सी मिठाई है।‘ जवाब मिलता है 'सोहन हलवा’। मैं चौंक पड़ता हूं। जब हम अपनी स्कूल की पाठ्यपुस्तकों में कोई पाठ पढ़ा करते थे कि 'सोहन को सोहन हलवा अच्छा लगता है.. यह सुनकर सोहन के मामा हँसने लगे ह..ह..ह..ह..’ मक्का, बादाम और घी-शक्कर से बनी यह मिठाई हलवा जैसी कतई नहीं दिखती। यह ठोस और चक्राकार है। हमने इसके कई प्रकार खरीद लिए थे घर आकर अपने मित्रों-रिश्तेदारों को बताकर खिलाकर चौंकाने के लिए कि 'देखो यह है सोहन हलवा।‘

भीतर दरगाह की गहमागहमी और बाहर सोहन हलवा के बहकावे ने दरगाह के आगे हमें अढ़ाई दिन का झोपड़ा देखना भुला दिया। कहते हैं कुतुबुद्दीन ऐबक की बनवाई इस मस्जिद में भारतीय शैली में अलंकृत स्तंभों का प्रयोग किया गया है जिनके ऊपर छत ढा दी गई है। मस्जिद के हर कोने में चक्राकार एवं बांसुरी के आकार की मीनारें बनी हैं। यहाँ चलने वाले ढाई दिन के उर्स के कारण इसका ये नाम पड़ा। पुष्कर जाते समय हमें याद आया कि हम इस दुर्लभ स्थान को देखना भूल बैठे। हम पृथ्वीराज चौहान के इस राज्य में फैले छोर विहीन झील 'आना सागर’ को देखते हुए पुष्कर पहुँच गए थे।

दोपहर के तीन बज  चुके थे तो भूख तो सबको जोरों से लगी थी. एक गुमठी में सुस्ताते हैं तो गुमठी वाला पूछता है थाली लगाऊं मका बाजरा की रोटियां, तीन चार किस्म की मिलान से बनी दाल। आलूचना या छोले, बेसन का गट्टा, दालबाटी चूरमा से सजी रंगबिरंगी थालियाँ। चावल खाने में स्थानीय जनों की कोई रूचि नहीं इसलिए सैलानियों को मिलता है ठंडा भात। इस थाली से हरी सब्जी नदारद है। हम गरम दालभात और कई किस्मों की हरी सब्जियां खाने वाले छतीसगढिय़ों के लिए यह राजस्थानी भोजन एकरसता लाने वाला भोजन बन गया था। फिर भी भोजन कराने की भारतीय परम्परा को राजस्थान अपनी थाली में आज भी संजोए हुए है यह उल्लेखनीय है.. और इस थाली भोजन को सस्ता रखे हुए है। अमूमन सौ से दो सौ रूपयों के बीच यहां सुस्वादु भोजन की राजस्थानी थालियाँ हर कहीं उपलब्ध हैं।

हमारे सामने ऊंट गाड़ी आ खड़ी हुई थी। बैल की जगह इतने ऊँचे ऊंट को गाड़ी में जुते देखकर बड़ा अचरज हुआ। गाड़ीवान बोल पड़ता है 'चलिए भैया हम आपको पुष्कर का मरुस्थल घुमा देते हैं फिर आकर आप देखना पुष्कर झील और करना ब्रम्हाजी के दर्शन। देश में यही एक जगह है जहां ब्रम्हाजी का मंदिर है।‘

'क्या भाड़ा लोगे!’

'अ_ारह सौ पचास में पूरी गाड़ी आपकी, बढिय़ा शान से डेढ़ घंटा घूम आएंगे। बंजारों के गांव दिखा देंगे और मरुस्थल में गुलाब बाग। वहां मीठा गुलकंद आपको दिला देंगे।‘ छींट रंग वाले कपड़ों से सुन्दर शामियाना तनी हुई ऊंट गाड़ी थी। छ: वयस्क और दो बच्चे सबसे सब समा गए एक गाड़ी में और ऊंट को कोई फर्क नहीं पड़ा वह रेगिस्तान के चढ़ाव को दौड़ते हुए चढ़ जाता था और समतल जमीन पर तो और भी तेज दौड़ लगा देता था। सचमुच मरुस्थल का जहाज है। आखिर पानी में चलने वाले जहाज भी तो बीस किलोमीटर घंटे की गति से चल पाते हैं उतनी गति तो इस मरुस्थल के जहाज ऊंट गाड़ी में थी। इस गाड़ी को कभी फिल्म 'गाइड’ में देखा था जिसमें देव आनंद और वहीदा लेटे हुए हैं गाते हैं 'आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है।‘

पुष्कर जहां एक तरफ झील है और दूसरी ओर मरुस्थल। गाड़ी वाहन में बोलचाल की वही जादूगरी है जो गाड़ीवानों में होती है। उनके पास लोकजीवन की अनेक गाथाएँ होती हैं। किसी सोपओपेरा की तरह एक के बाद एक खुलती जाती हैं और गाड़ी में बैठे जनों के कान में ऐसी गाथाओं के मधुर रस टपकते जाते है और वे यंत्रचालित से केवल हुंकारू देते रहते हैं। ऊंट गाड़ी एक ठियाँ में रूकती है जो बंजारों के गांव के निकट है। बंजारनें यात्री महिलाओं को आतिथ्य भाव से घेर लेती हैं। उनके साथ एक पुरुष लोकगायक है जिसके हाथ में चिकारा है। वे सबको अधिकारपूर्वक मनभावन राजस्थानी पोशाक पहना देती हैं जहां सलमा-सितारा जड़ी रंग-बिरंगी घाघरा पोलखा हैं। सिर पर ओढनी, नाक में नथनियां हैं जिसकी एक लड़ी माथे की बिंदिया से उतरती है। हाथों में धातु के घड़े हैं। कलाइयों में चूडिय़ाँ हैं। सबको सजा तैयार कर एक पंक्ति में उन्हें खड़े कर देती हैं और वे कोई मंगल गीत गाती हैं। जहां चिकारा की मीठी धुन इस रेगिस्तानी फिजा में घुल मिल जाती है।

लोग ऊंट की पीठ पर सवार होकर फोटो उतरवाते हैं। एक किशोर मेरे हाथ में एक बन्दूक पकड़वाकर फोटो खींचता है। सामने सुन्दर राजस्थानी पोशाक में सजी हुई पत्नी है और मैं उस तरफ निशाना साधते हुए गा उठता हूं 'जऱा नजऱों से कह दो जी.. निशाना चूक न जाए..।

रास्ते में वे गांव पड़ते हैं जहां के बड़े बूढ़े बच्चे-महिलाएं सब अपने-अपने हुनर के हिसाब से पर्यटन स्थलों में अपना प्रदर्शन करते हैं। यहां शहरों और गाँवो में आर्थिक असमानता की बड़ी खाई दिखाई देती है। शहर सब समृद्ध और चमाचम दिखते हैं। बढ़ते पर्यटन उद्योग के सारे सुअवसर इन शहरवासियों के पास हैं। जिला मुख्यालय से थोड़ा बाहर निकलो तो एकदम भुक्कड़ और बेजान गाँव दिखाई देते हैं। बंजर, पथरीले और कंटीले - उत्पादन शून्य। उत्पादन और आमदनी के अभाव में अल्पपोषण के शिकार जन, उनके कान्तिहीन चेहरे और आसपास आए घुमन्तु वाहनों को देख कर दौड़ते भीख मांगते हुए बच्चे। अब ये गरीब तमाशे और नटविद्या में पारंगत भला क्यों न हों क्योंकि पेट की आग जो न करवाए वो थोड़ा है। बाहर दर्शक तालियाँ पीट रहे हैं पर भीतर आग धधक रही है। राजस्थान की यह मेरी दूसरी यात्रा थी। पहली बार महाराणाप्रताप का मेवाड़ था और अभी हम अंतिम हिंदू राजा पृथ्वीराज चौहान के राज्य में घूम रहे हैं, कल हम सवाई राजा मानसिंह के आमेर में होंगे। सही कहा गया है कि 'इतिहास राजाओं सामंतों की शौर्यगाथा होते हैं। उनकी प्रजा का इतिहास धूमिल हो जाता है। आखिर जन जन की पीड़ा का इतिहास कौन लिखेगा?

साम्प्रदायिक सदभाव का सबसे बड़ा मुस्लिम केन्द्र अजमेर है जहां सारी दुनिया से मानता के लिए मजार में मत्त्था टेकने आते रहे हैं पर गोरे देशों के रहवासियों की भीड़ पुष्कर में आध्यात्मिकता खोजती है। ये विदेशी पिछले कुछ दशकों की बढ़ी आतंकवादी गतिविधियों से डरे हैं और दूरी बनाए हुए हैं। स्थानीय गाइड कहता है 'अजमेर में विदेशी अब लगभग दिखाई नहीं देते हैं पर पुष्कर में ये लोग महीनों डेरा डाले रहते हैं। इसलिए पुष्कर में होटल, रिसोर्ट और धर्मशालाएं दिनोंदिन खुलती जा रही हैं। पण्डों की लूट यहां खुलकर है अजमेर में मुल्लाओं की थोड़ी दबी हुई है।‘

हम गलियारों से होकर पुष्कर कुण्ड की ओर लगभग एक किलोमीटर चलते हैं। बड़ा भव्य और मनोहारी दृश्य हमारे सामने आ खड़ा होता है पुष्कर कुण्ड और उसके चारों ओर की बनी विराट घाट का। सफेद पत्थरों के घाट पर पड़ रही बिजली सफेद रोशनीयुक्त है। यह एक ऐसा चमकदार दृश्य जन्मता है जो किसी प्लास्टिक कोटेड चित्र की तरह जान पड़ता है। कुछ एक संरचनाओं का फिल्मांकन चित्रांकन की दृष्टि से मुनासिब स्थान माना जाता है जैसे फतेहपुर सीकरी, मांडू, या पुणे का आगाखां महल। हम इन स्थानों को जहां से भी कैमरे में उतारते हैं इनके चित्र जानदार आते हैं।

संकरी गली से वापस हुए हम ब्रम्हा मंदिर के दर्शन करते हैं फिर मंदिर से बाहर निकलकर गरमागरम मालपुए खाते हैं। अजमेर का सोहन हलवा तो पुष्कर का मालपुआ प्रसिद्ध है।

हम कहीं भी जाते हैं तो सुबह निकलते हैं और रात तक जयपुर आ ही जाते हैं अपने होटल कृष्णा पैलेस में। रात का खाना मेस में होता है तो सुबह का नाश्ता होटल की छत पर लगा दिया जाता है। ठंड की नर्म धूप में। दो साल की पोती न्यासा और तीन साल का नाती हृदान दोनों होटल की छतों सीढियों में चढ़ते उतरते रहते हैं जैसे घर में कुर्सी टेबल पर ये काम करते रहते हैं। होटल के मालिक अग्रवाल जी हैं जो परिवार के साथ होटल में ही रहते हैं। वे बड़े घरेलू किसम के इन्सान लगते हैं हमें कहीं भी आते जाते देखते हैं तो नमस्कार करते हैं और जरूरी जानकारी हमें देते हैं। अग्रवाल जी के कारण हम लोगों को भी यह होटल घर जैसा लगता है। जैसे होटलों के बहु-प्रचारित स्वर होते हैं कि 'घर से दूर एक घर।‘

हम शहर से पन्द्रह किलोमीटर दूर अरावली की पहाड़ी पर बसे आमेर के किले पर पहुँच जाते हैं। हमारी बस के पास एक प्रौढ़ उम्र के इन्सान ने कार का दरवाजा बाहर से खोला और अपना परिचय दिया 'सर..मैं दबंग देशवाली हूं... यहां आपका गाइड हूं.. आइये पहले टिकट कटा लेते हैं किले की खास जगहों को देखने में एक घंटे से ऊपर लगेंगे।Ó अपने नाम के अनुकूल प्रौढ़ उम्र में भी गजब की चुस्ती थी उसमें। दबंग देशवाली। यह बिलकुल नया नाम था हमारे लिए। किस कौम का है यह भी अनुमान नहीं हो सका। पर उसने जैसे मन की बात सुन ली हो 'देशवाली- हम लोग राजपूत जातियों से परिवर्तित माने जाते हैं सर.. देशवाली का अर्थ होता हे देश के रक्षक। हम लोगों का धर्म परिवर्तन मोहम्मद गोरी के समय हुआ था ऐसा माना जाता है। हमारे लोग गो मांस नहीं खाते हैं।‘ उसने बताया भी था कि 'राजस्थान में मुसलमानों की ऐसी कई शाखाएं हैं जिनके पूर्वज हिंदू हैं और वे हिंदुओं की किस किस जाति से परिवर्तित हुए हैं।‘ बहरहाल दबंग देशवाली को मुगलों के इतिहास का जितना ज्ञान था उतना ही सवाई राजाओं का। उसने दूर इशारा किया कि 'वो देखिए.. जोधाबाई का महल..जहां उनका जन्म हुआ था।‘ हम सबने देखा दूर एक छतरी लगी हुई हवेली को और कहा 'अरे ये तो बहुत छोटी इमारत है।‘ दबंग देशवाली ने तपाक से कहा कि 'सवाई राजा बड़े सामान्य लोग थे। मुगलों से जुडऩे के बाद ही वे समृद्ध हुए थे।‘ गाइड हमें दीवाने खास की उस जगह में ले गया था जिसके बारे में उसका कहना था कि 'मुगले-आजम’ फिल्म में मधुबाला पर 'प्यार किया तो डरना क्या’ जो गीत फिल्माया गया है वह यही दीवाने खास है जिसकी मीनाकारी में नायिका के असंख्य चित्र झिलमिला उठते हैं।‘वहां गाइड ने मेरी और पत्नी चंद्रा की फोटो उतारी उसमें कैमरा उसने हमारी ओर नहीं किया बल्कि हम कहीं और खड़े थे और उसने किसी दूसरे हिस्से में दिखा रहे हमारे प्रतिबिम्ब को फोकस किया था।‘ यह एक जादुई दृश्य था दिलीपकुमार और मधुबाला की तरह।

अरावली की पहाड़ी पर बारह किलोमीटर तक फैले पसरे इस किले को हम देखते हैं जो अपनी विशालता में चित्तौगढ़ के बाद दूसरे क्रम का किला है। लाल बलुआ पत्थर एवं संगमरमर से निर्मित यह आकर्षक एवं भव्य दुर्ग पहाड़ी के चार स्तरों पर बना हुआ है, जिसमें से प्रत्येक में विशाल प्रांगण हैं। इसे राजा मानसिंह प्रथम ने बनवाया है जो अकबर के प्रधान सेनापति थे। मुगलों के साथ राजपूताना संपर्क और संघर्ष, उनकी साझेदारी, उनका कला-संस्कृति के प्रति आदान-प्रदान जानने के लिए यहां आया जा सकता है। यह जयपुर का सबसे प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल है। यहाँ के जयगढ़ और नाहरगढ़ किले से बड़ा है ही यह हवामहल और राजमहल से भी संरचना में कई गुना बड़ा और गाथा में इतिहासपरक है।

हम किले के अंदर घुसकर एक स्थान पर आ गए थे। कुछ गाइड मनोविनोद के साथ किस्सा सुनाते हैं। दबंग देशवाली कहते हैं 'यह बारादरी है जिसमें चारों ओर बारह दर या दरवाज़े हैं। रानियाँ बारादरी में बैठकर खुली हवा का आनंद लेतीं थीं। इस वंश में एक राजा जयसिंह हुए उनकी बारह रानियाँ थीं। इससे फायदा यह था कि यदि कभी किसी एक रानी का मुंह फूल जाता तब राजा को शेष ग्यारह रानियों का सपोर्ट मिल जाता था।‘ जयपुर शहर गुलाबी नगरी नाम से प्रसिद्द है पर यहां महलों व इमारतों का मूल रंग नारंगी है। संभव हो कि गुलाब व गुलाबी को सौंदर्य का प्रतीक माना जाता है इसलिए लोकस्वर में नारंगी को ही गुलाबी कहा जाता रहा होगा। पाकिस्तान सीमा से पूरब की ओर आठ सौ किलोमीटर थार का मरुस्थल पार कर लेने के बाद पुष्कर, जयपुर का हरा भरा पानीदार क्षेत्र आता है। झीलों जलाशयों ने इसकी सभ्यता को ऊंचाई दी और इसे समृद्ध किया है।

आमेर से लौटते समय झील के बीचोंबीच स्थित जलमहल सूर्यास्त में अपनी अलग छटा बिखेर रहा था। जैसे ही बाहर का मद्धिम उजाला अस्त हुआ जलमहल के भीतर प्रकाश का प्रस्फुटन हुआ तब वह रात में चलने वाले किसी बड़े जहाज की मानिंद लगने लगा था। निरंतर देखने से यह चलायमान प्रतीत होता और जैसे हम सब इस पर सवार हों और हमें मिल गया हो कहीं रेगिस्तान में नखलिस्तान।