Monthly Magzine
Wednesday 19 Dec 2018

दुष्यंत की परंपरा के उल्लेखनीय गज़लकार : विनोद तिवारी

लगभग सत्तर वर्ष की आयु में इस संसार को अलविदा (प्रयाण तिथि - 23 फरवरी, 2011) कहने वाले विनोद तिवारी दुष्यंतोत्तर उन शीर्ष हिन्दी गज़लकारों में थे, जिन्होंने निष्ठा एवं प्रतिबद्धता-पूर्वक गज़ल के 'मिशन’ को आगे बढ़ाया। दुष्यंत और अदम गोंडवी की भाँति ही, विनोद तिवारी को भी व्यवस्था-विरोध के प्रवक्ता गज़लकार के रूप में अखिल भारतीय ख्याति मिली।

भोपाल शहर में उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि विनोद तिवारी जितने हिन्दी वालों के चहेते थे, उतने ही उर्दू वाले उन्हें चाहते थे।

विनोद तिवारी अनेक प्रकार की संकीर्णताओं से पूरी तरह से मुक्त थे। शहर में सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ चलने वाले हर अभियान में वे सदैव आगे की पंक्ति में पाए जाते थे। मित्रों-परिजनों के बीच वे इतने लोकतांत्रिक थे कि विचारों की अभिव्यक्ति में कभी कोई लिहाज़ नहीं करते थे। किन्तु, उस मतभेद को मनभेद न बनने देना विनोद तिवारी की दूसरी बड़ी विशेषता थी।

जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूँ कि अपने शेरों में व्यवस्था-विरोध को एक व्यापक फलक पर उकेरने वाले गज़लकार के रूप में विनोद तिवारी निर्विवाद थे। विनोद तिवारी जानते थे कि सत्ता बदल जाने से व्यवस्था नहीं बदलती। उनके लिए नारों से बहुत आगे की परिणति थी। उपालम्भ की शैली में कहा गया उनका एक ऐसा ही शेर-

 

आँधियों का ज़ोर, तिनकों का वहम,

कह  रहे  हैं  हम करेंगे इंक़िलाब

विनोद तिवारी धर्म की आड़ में चल रही $िफरकापरस्ती को खूब समझते थे। उन्हें पता था कि लोगों को उकसाने, लड़वाने, मरवाने वाले मज़हब के पास गरीब का पेट भरने जैसा न कोई प्रयत्न है, न ही प्रबंध। इसीलिए उन्हें अलग-अलग गज़लों के दो शेरों में कहना पड़ा-

यहाँ  सारे  के  सारे  आग भड़काने में माहिर हैं,

किसी को भी यहाँ शोले बुझाना क्यों नहीं आता?

ऐसी भड़की आग कि सब कुछ स्वाहा होता चला गया,

फेंक  गया कोई छप्पर पर जलती तीली मज़हब की।

 

विनोद तिवारी हमारे इतिहास नायकों के नाम पर किए जाने वाले सत्ता के षड्यंत्रों को भलीभाँति समझते थे। इसीलिए उन्होंने हमारे जनसेवकों की ऐसी बतरस के निष्कर्ष कुछ इस प्रकार निकाले-

 

हम लोगों को कथा सुना कर झाँसी वाली रानी की,

जनसेवक  कहलाने वाले, करते हैं झाँसों की बात!

 

विनोद तिवारी के यहाँ बात को प्रस्तुत करने का ढंग अतिरेकी बिल्कुल नहीं है। अपने शेरों में वे बहुत विश्वसनीय तरीके से हाशिए के अंतिम आदमी के साथ खड़े दिखते हैं। इसीलिए अगर उनके किसी शेर में $गरीब अपना कोई बयान देता है, तो वो सच्चा लगता है। जैसे-

 

बाबू जी, कोरट में हमने हलफ उठा कर सच बोला,

पर बिन पैसे कानूनों का, देता वहाँ हवाला कौन?

 

विनोद तिवारी के शेरों में काव्य-रूढियों (जैसे , नदी-नाले, पेड़-पौधे, बादल, धूप, मौसम, चाँदनी रात, सूरज, चाँद-सितारे आदि) का अर्थ काफी हद तक बदला हुआ होता है। प्रयोग की रूढिय़ों को अर्थों की गतिशीलता तोड़ देती है। अपने एक शेर में पाँच सितारा (फाइव स्टार) संस्कृति का वो इस चतुराई से जि़क्र करते हैं कि चाँदनी रात भी डरावनी लगने लगती है। संबद्ध शेर-

 

सितारे हो गए हैं होटलों के साथ बावस्ता,

सुना है खूब महँगी हो गईं हैं चाँदनी रातें।

 

इसी प्रकार, नदी जैसी सुपरिचित काव्य-रूढि़ का प्रयोग करते हुए, वे जिस शिद्दत से अपने वर्ग-शत्रु से आर-पार की लड़ाई करने का आह्वान करते हैं, वह शेर को अविस्मरणीय बना देता है। संबद्ध शेर-

 

मैं धारा चीर कर जिस दिन भी परली पार पहुँचूँगा,

तभी दुश्मन से 'रन’ होगा, नदी के उस किनारे पर!

मैं विनोद जी के विषय में जितना कुछ जानता हूँ, उसके अनुसार वे मूलत: माक्र्सवादी थे। आर्य-समाज आँदोलन से विकसित हो कर जो साम्यवाद की ओर आए, विनोद उनमें से थे। हालाँकि किसी पार्टी के वे कभी सदस्य नहीं रहे, लेकिन, अपनी जनवादी पहचान को और माक्र्सवादी विचार पद्धति को उन्होंने कभी छिपाया नहीं।