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Thursday 18 Oct 2018

टू-दो के अर्थ अनगिनत

सत्यजित राय भारत के ऐसे फिल्म निर्देशक हैं जिन्होंने भारत को विश्व के फिल्म मानचित्र पर प्रमुखता से अंकित कर दिया है। हालाँकि उन्होंने अधिकाँश फिल्में अपनी मातृभाषा बांग्ला में बनाई। बाद में वृहतर दर्शकों की खोज में उन्होंने हिन्दी में भी फिल्में बनाई। उनकी अधिकतर फिल्में साहित्य पर आधारित हैं। विभूतिभूषण बंधोपाध्याय, रवींद्रनाथ टैगोर, प्रेमचंद के अलावा उन्होंने खुद के रचे साहित्य को भी फिल्मों में ढाला। वे बचपन से फिल्मों के दीवाने थे, घर में उन्हें साहित्यिक वातावरण मिला था। उन्होंने कुछ साल कविगुरु टैगोर के शांतिनिकेतन में भी शिक्षा ग्रहण की थी। इन कुछ सालों ने उनके व्यक्तित्व निर्माण और जीवन दर्शन को बहुत गहरे अर्थों में प्रभावित किया था, जिसे वे स्वयं स्वीकार करते हैं।

सत्यजित राय की पहली फिल्म पाथेर पांचाल विश्व भर के फिल्म समीक्षकों द्वारा सराही गई। यह उनकी फिल्म त्रयी, पाथेर पांचाली, अपराजिता तथा अपूर संसार का पहला भाग है। कहानी विभूतिभूषण बंधोपाध्याय की है। रवींद्रनाथ टैगोर के नष्ट नीड़ पर राय ने चारुलता बनाई। टैगोर के घरे-बाहरे पर इसी नाम से फिल्म बनाई और टैगोर की ही कहानी पर उन्होंने तीन कन्या बनाई। इसी तरह प्रेमचंद की कहानी पर राय ने शतरंज के  खिलाड़ी बनाई और खूब आलोचना भी झेली। आलोचना तो घरे-बाहरे को ले कर भी खूब हुई।

सत्यजित राय ने जलसाघर, महानगर, अरण्य दिन रात्रि, प्रतिद्वन्द्वी, जन अरण्य, फेलुदा, शृंखला, आगंतुक आदि बहुत सारी फिल्में बनाई। उनके नाम को समाहित किए बिना फिल्म इतिहास पूरा नहीं हो सकता है। दुनिया के महान फिल्म निर्देशकों में उनका नाम शुमार होता है। उन्होंने श्वेत-श्याम और रंगीन दोनों तरह की फिल्में बनाई। इन सारी फिल्मों पर भारी पड़ती है उनकी एक फिल्म जिसकी चर्चा शायद ही कभी होती है। यह मूक फिल्म टू उन्होंने सवाक फिल्मों के जमाने में बनाई और दिखा दिया कि फिल्म विधा साहित्य से भिन्न एक स्वतंत्र विधा है। साहित्य अथवा नाटक जो बात बड़े-बड़े और लंबे-लंबे संवादों में कहता है वही बात बल्कि उसके कई गुणा अधिक प्रभावशाली बात सिनेमा बिना बोले कह देता है। यह चाक्षुष माध्यम है इसे शब्दों या संवादों की आवश्यकता नहीं है। सत्यजित राय सिनेमा को उतनी ही अच्छी तरह से जानते-पहचानते थे जितनी अच्छी तरह किसान खेती को जानता-समझता है या मौसम को पहचानता है। सिनेमा विधा पर उनकी मजबूत पकड़ थी। वे उसकी खूबियों-खामियों से बखूबी परिचित थे।

इस मूक फिल्म में उन्होंने दो वर्गों, दो समाजों को मात्र दस मिनट में खोल कर रख दिया है। इस छोटी सी फिल्म के निहितार्थ बहुत गूढ़ और विस्तृत हैं। उन्होंने दिखा दिया है कैसे कम से कम पात्रों, सीमित बजट बिना संवादों और कम समय में एक उत्कृष्ट फिल्म बनाई जा सकती है। चूँकि राय विश्व में सम्मानित फिल्मकार थे अत: जब यूएस पब्लिक टेलिविजन को एस्सो वल्र्ड थियेटर के बैनर तले फिल्म बनाने की योजना सूझी तो उन्होंने सत्यजित राय से भारत से शॉर्ट फिल्म की त्रयी बनाने को कहा। इस योजना के तहत बात थी कि राय बंगाल की पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म इंग्लिश में बनाएँगे। उन्हें यह बात बहुत नहीं जँची सो उन्होंने भाषा के बिना ही फिल्म बनाई। भाषा जोडऩे और तोडऩे दोनों का काम करती है। भाषा की अपनी सीमा होती है जबकि फिल्म विजुअल माध्यम होने के कारण वृहद अपील रखता है। बांग्ला में फिल्म बनाने का अर्थ था उसके सबटाइटिल्स देने होते और अनुवाद की अपनी सीमा होती है। कितना भी अच्छा अनुवाद हो उसमें मूल की खुशबू खो जाती है, खासकर जब दो  दो भिन्न संस्कृति की बात हो।

तो सत्यजित राय ने यूएस पब्लिक टेलिविजन के लिए मूक फिल्म टू बनाई। इस योजना के तहत उन्होंने पंडित रविशंकर तथा बंबई के एक बैले ट्रुप (जो कलकत्ता आया हुआ है) पर दो अन्य फिल्में भी बनाई। राय मूक सिनेमा के प्रशंसक थे और इस तरह टू मूक फिल्म बना कर उन्होंने इस सिनेमा को अपनी श्रद्धांजलि दी है। खुद उनके अनुसार यह दस मिनट की फिल्म खासी पंच है। मात्र दो पात्र वह भी दो बच्चों को ले कर उन्होंने यह लघु फिल्म बनाई। दोनों ही बच्चे निपट अकेले हैं, उनके खिलौने के अलावा उनका कोई और संगी-साथी नहीं है। उनके यही खिलौने उनकी पहचान और शक्ति हैं। उन्हें अपने खिलौनों पर खूब भरोसा और गर्व है। ये दोनों बच्चे दो भिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं। दो भिन्न वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक बालक धनी घर का है। उसका बड़ा कई कमरों का घर ऊपरी मंजिल पर है, घर में तमाम सुख-सुविधाएँ उपलब्ध हैं, चाभी से चलने वाले तरह-तरह के खिलौने हैं। खाने-पीने की ढेर सारी चीजें हैं। नहीं है, तो कोई संगी-साथी, जीवित प्राणी, कोई बोलने-बतियानेवाला। अकेला तो गली का गरीब बच्चा भी है। लेकिन उसका जीवन भरा-पूरा है। उसके पास खुला मैदान है, वह कमरे में बंद नहीं है। वह मजे में बाँसुरी बजाता रहता है। यही बाँसुरी की धुन अमीर बच्चे को आकर्षित करती है, जिससे खिंचा वह खिड़की तक चला आता है और अपने घर के पिछवाड़े, एक झोंपड़ी के पिछवाड़े एक लड़के को बाँसुरी बजाते हुए देखता है। शुरु में दोनों की नजरें मिलती हैं तो एक हल्की सी स्मित उनके चेहरे पर आती है। लगता है एक दोस्ती पनपेगी। मगर पनपती है दोस्ती के स्थान पर स्पद्र्धा।

धनी बच्चा बाँसुरी को पछाडऩे के लिए अपनी खिलौना ट्रम्पेट उठा लाता है और खिड़की में खड़ा हो कर जोर-जोर से उसे बजाता है। दोनों में अपने खिलौने दिखाने की प्रतिस्पद्र्धा चलती है। ट्रम्पेट की आवाज में बाँसुरी की धुन दबने से मायूस हो गरीब लड़का अपनी झोपड़ी में जाता है और हाथ से बना मुखौटा पहन अपना तीर-धनुष ले कर आता है। धनी लड़का क्यों पीछे रहता, उसके पास तरह-तरह के मास्क हैं। वह अलग-अलग मुखौटे लगा कर अपनी टॉयगन ला कर खिड़की से गरीब बालक को दिखाते हुए चलाता है। एक बार फिर गरीब बालक पराजित होता है मगर हार नहीं मानता है। धनी लड़का अपने खिलौनों के पास लौटता है, कई खिलौनों को चाभी घुमा कर चलाता है। फ्रिज से सेब निकाल कर खाना शुरु करता है। वह फर्श पर बैठ कर अनमना सा खिलौनों को चलाता है, तभी खिड़की से उसे आकाश में उड़ती हुई एक पतंग दीखती है। वह फिर खिड़की पर आता है। इस बार वह देखता है, अरे! गरीब बच्चा तो मजे में पतंग उड़ा रहा है। पूरा मैदान और सारा आकाश उसका है। घर में बंद लड़का पहले अपनी गुलेल ले कर पतंग नष्ट करना चाहता है, मगर उसे लगता है यह काफी नहीं है। वह चिडिय़ा मारने वाली अपनी बंदूक ले आता है और उसमें छर्रे भर कर खिड़की से पतंग पर निशाना साधता है और पतंग को मार गिराता है। पतंग घास में घिसटती है। गरीब लड़का मंजे में लटकी अपने टूटी-फूटी पतंग घसीटता हुआ परदे के पार चला जाता है। 

ऐसा नहीं है कि पतंग नष्ट करके, अपनी सफलता पर धनी लड़का बहुत संतुष्ट है, या बहुत खुश है। वह तो विचारमग्न है। इसी चिंतनशील मुद्रा में वह एक-एक करके अपने सारे खिलौनों में चाभी भर देता है और बैठ कर सोचने लगता है। उसका ध्यान अब खिलौनों की ओर नहीं है। खिलौने हरकत में हैं और रोबोट चलता हुआ एक-एक कर अन्य खिलौनों को गिराता चलता है और अंत में स्वयं भी गिर पड़ता है। और इसी समय सत्यजित राय अपनी समस्त सकारात्मकता के साथ उपस्थित होते हैं। दर्शक को बाँसुरी की धुन फिर से सुनाई पड़ती है और फिल्म समाप्त होती है। शोर पर संगीत की विजय होती है। दिखाया नहीं गया है लेकिन सांकेतिक है, गरीब बच्चा फीनिक्स की तरह उठ खड़ा होता है। वह अपने आस-पास की घास की तरह है, जिसे रौंद कर नष्ट नहीं किया जा सकता है। वह घास की तरह फिर-फिर उठ खड़ा होता है। उसके अभाव में भी भाव है जबकि धनी बच्चे के पास संवेदनहीनता है, असंतुष्टि है। बिना कुछ बोले मात्र संगीत और शोर के माध्यम से फिल्म बहुत कुछ कह जाती है। फिल्म में ध्वनि है, तो बीच-बीच में मौन भी है। ये मौन भी मानीखेज हैं। जब गरीब बच्चा टूटी-फूटी पतंग लिए जा रहा है तो मात्र पतंग की खरखराहट की ध्वनि सुनाई देती है।

किसी ने कहा है कि सत्यजित राय ने यह फिल्म वियतनाम युद्ध के विरोध में बनाई है। पता नहीं। लेकिन मेरे मन में एक दूसरा प्रश्न है, राय ने यह फिल्म दो बच्चों को ले कर बनाई जो आज की बनी फिल्म स्लमडॉग मिलिनेरियम पर भारी पड़ती है। उन्होंने धनी घर के बच्चे को हृष्ट-पुष्ट दिखाया है, उसके कपड़े, उसकी चाल सब उसकी वर्गीय स्थिति के अनुकूल है। फिल्म के क्रेडिट में उसका नाम है। उसका नाम रवि किरण है। मगर गरीब बच्चा कौन है, कहीं पता नहीं चलता है, उसके लिए मात्र स्ट्रीट चाइल्ड, गली का बच्चा लिखा है। क्या उस बालक का कोई नाम न रहा होगा। क्या उसका भी नाम नहीं दिया जाना चाहिए था, नाम न दे कर उसकी अस्मिता के साथ अन्याय हुआ है। क्या यह भी एक प्रकार का वर्गीय भेदभाव नहीं है? मेरे मन में निर्देशक सत्यजित राय के लिए बहुत सम्मान है। लेकिन मैं खुद को यह कहने से रोक नहीं पा रही हूं, क्या गरीब बच्चे का नाम न देना निर्देशक के नजरिए को प्रस्तुत नहीं करता है? क्या उसकी अभिनय क्षमता कहीं से कमतर है? मुझे विश्वास है और मैं यह मान कर चल रही हूँ कि उसे उसके अभिनय का उचित पारिश्रमिक दिया गया होगा। बच्चा प्रतिभावान है इसमें कोई शक नहीं है, क्या पता आगे चल कर वह क्या बना होगा। यदि फिल्म में उसका नाम, उसकी पहचान होती तो उसके जीवन में अवश्य फरक पड़ता। तब वह क्या बनता, क्या पता।

आइए एक बार फिर से फिल्म की ओर लौटते हैं। बच्चे वर्गीय भेदभाव से परिचित नहीं होते हैं हालाँकि उनकी स्थिति जल्द ही उन्हें यह सिखा देती है। वर्गानुकूल व्यवहार हमारे जीन्स में आता है। इसी अचेतन वर्गीय अहंकार के चलते देवदास पारो को छड़ी से मार कर सदा-सदा के लिए माथे पर दाग दे देता है। क्या धनी घर का लड़का अपने अकेलेपन और ऊब के कारण गरीब की खुशी नहीं देख सकता है, इसलिए वह उसकी खुशी को नष्ट करना चाहता है। टू में एक खूबसूरत दोस्ती होते-होते रह जाती है। इसमें शक नहीं कि दोनों बच्चे इस ब्रीफ एन्काउंटर को जिंदगी भर नहीं भूल पाएँगे। हो सकता है कि बड़ा हो कर धनी लड़का एक अच्छा आदमी बन जाए परंतु क्या गरीब लड़का अमीरों के प्रति अच्छी सोच रख पाएगा? क्या कभी वह अपनी भावनाओं पर लगी चोट से उबर पाएगा? क्या धनी बच्चा साम्राज्यवादी नीति का प्रतीक है जिसका काम मात्र शोषण-दमन है। सत्ता के मद में चूर।

सत्यजित राय की इस श्रेष्ठ फिल्म की एडीटिंग दुलाल दत्ता ने की है, कला निर्देशन बंसी चंद्रगुप्त का है। साउंड डिजाइनिंग सुजित सरकार की है और कैमरा सोमेंदु रॉय ने संभाला है जब कि स्क्रीनप्ले, निर्देशन और संगीत स्वयं सत्यजित राय ने तैयार किया है। सेट डिजाइनिंग बहुत सोच समझ कर हुई है। धनी लड़के का घर ऊपरी मंजिल पर है जहाँ की खिड़की से वह गरीबी और गरीब लड़के का पूरा दृश्य देख सकता है। घर के भीतर आराम के सब साधन उपलब्ध हैं। गरीबी का सेट बनाने की जरूरत नहीं पड़ी है, वह भारत और बंगाल में सर्वत्र बिखरी पड़ी है। फिल्म में आवाज का खास महत्व है। दो तरह की आवाज का प्रयोग हुआ है। एक मन को सकून देने वाली आवाज है, सकारात्मक ध्वनि है। दूसरी आक्रमक, ध्वंसात्मक आवाज है, सदा कुछ न कुछ नष्ट करती हुई। यह दीगर है कि वह जीतती नहीं है।1965 में बनी इस फिल्म को अकादमी फिल्म आर्काइव ने राय की 19 फिल्मों के साथ 2006 में रिस्टोर किया। मूल स्क्रिप्ट को सत्यजित राय के बेटे संदीप राय ने ओरिजनल इंग्लिश फिल्म स्क्रिप्ट्स नामक किताब में संकलित किया है। आज यह फिल्म अकादमी के यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध है। मारीसेटन की लिखी सत्यजित राय की जीवनी पोट्रेट ऑफ ए डॉयरेक्टर, सत्यजित राय में भी इस फिल्म का उल्लेख है। 2008 में जा कर कलकत्ता के दर्शकों के लिए इसका सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ। छोटे से शीर्षक टू में अनगिनत संभावनाएँ संजोए हुई इस मानीखेज फिल्म को अवश्य देखा जाना चाहिए।