Monthly Magzine
Wednesday 19 Sep 2018

'अखबार के दफ्तर में मिली नौकरी ऐ दोस्त सारी हमारी लेखनी बरबाद हो गई’

लेकिन यह शेर पत्रकार शैलेन्द्र शांत पर लागू नहीं होता। शैलेन्द्र करीब तीस वर्षों की अपनी खबरनवीसी जिंदगी से सेवानिवृत्त होकर साहित्य सृजन में लग गए हैं। कहानी, उपन्यास डायरी के साथ अपनी प्रिय विधा कविता में लगातार सक्रियता बनाए हुए हैं। भरोसे की बात और अन्य कविताएं, उनका पांचवां कविता संग्रह है। जनसत्ता (कोलकाता संस्करण के प्रभारी) के संपादन भार से मुक्त होकर शैलेन्द्र ने जिस रफ्तार से साहित्य में पकड़ बनाने की कोशिश की है प्राय: लोग सेवामुक्त होकर नहीं कर पाते हैं। अपने अनुभव और कल्पना को वे निरंतर स्याही में तब्दील करने में लगे हुए हैं। कोई मान नहीं; कोई बड़बोलापन नहीं, किसी प्रकार का अहंकार नहीं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि रचनात्मकता ही किसी लेखक की पहचान है।

'भरोसे की बात और अन्य कविताएं’ में छोटी-बड़ी करीब 85 कविताएं हैं। शैलेन्द्र की कविताएं बहुत सहज और सरल हैं। कवि के व्यक्तित्व के अनुरूप ही कविताओं में अहंकार और बड़बोलापन नहीं है, जबकि प्राय: आज की गद्यरूप में ढली कविताएं दुर्बोधता की शिकार हैं। शुक्र है कि शैलेन्द्र की कविताएं एक नई काव्यधारा की आस जगाती हैं।

वरिष्ठ कवि-आलोचक विजेन्द्र ने अपनी भूमिका में ठीक ही लिखा है कि- 'शैलेन्द्र मुख्य धारा के कवि हैं... कविता के अभिप्राय से ज्यादा •ारूरी है कि हम पाठक पर उसके असर पर ध्यान दें। कविता का कथ्य और रुह चाहे कितने ही सुन्दर और अर्थवान क्यों न हो, यदि उसका प्रभाव पाठक या समाज पर अच्छा नहीं पड़ता तो वह श्रेष्ठ कविता नहीं है।‘

सच है, शैलेन्द्र के यहां कविता पाठक की समझ से बाहर नहीं होती। वे अपने विस्तृत अनुभव संसार को बहुत ही सूक्ष्म दृष्टि से कम से कम शब्दों में प्रस्तुत कर पाठक तक पहुंचाते हैं। इस संग्रह में बहुत कम ऐसी कविताएं हैं जो पृष्ठ लांघकर दूसरे पृष्ठ पर गई हैं। प्राय: उनकी छोटी कविताएं बहुत ही सुगम और सुबोध हैं। तीन चार पंक्तियों की कविताएं बहुत सुपाठ्य और समझ के करीब हैं। दो-तीन शब्दों की ये छ: पंक्तियों वाली 'तटस्थ’ कविता की गंभीरता देखी जा सकती है- 'पूछता है कोई/चुपके से/तटस्थ कौन है/मुस्कराता है कोई/मन ही मन/साध लेता मौन है।‘ इसी तरह अब झूठ एक उपलब्धि है, यह उस वक्त की कहानी है, ज़िन्दगी जरूरी काम, आमंत्रण, खुदगर्ज, दाना-पानी आदि कविताएं है, जो समय के दु:ख-विषाद, खुशी, गम, नफरत, चतुराई को बड़ी बेबाकी से व्यक्त करती हैं।

हां 'शिलांग की राह में’ की छोटी-छोटी छ: कविताएं भी पहाड़ की रौनक, हरियाली, ऊंचाई, बादल, पानी वनस्पतियां- पेड़-पौधों की छटा को दिखलाती हैं, तो 'आमंत्रण’ कविता अपनी छोटी काया में एक बड़ा संदेश देती है कि देश में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो समाज में अपनी हैसियत बनाए रखने के लिए मंचों से तो बड़े सामाजिक वक्तव्य देते हैं लेकिन अपने ही घर के नौकरों के साथ अमानवीय व्यवहार करते हैं। महिला की आजादी की बात करने वाले लोग अपने ही घर की बहू-बेटियों या घरेलू काम करने वाली महरी के साथ दुव्र्यहार करते हैं।

इस तरह की बहुत सी कविताएं हैं, 'भरोसे की बात और अन्य कविताएं में’। बोधि प्रकाशन के जन संस्करण के तहत प्रकाशित शैलेन्द्र शांत की कविताएं जरूर आपको अंदर से शांत करेंगी, क्योंकि देश, समाज में फैली अराजकता, बिखराव, विखंडन, नफरत को शब्दों के कैनवास पर सीधे सहज लहजे में उकेरने की चेष्टा की है कवि ने। विशेष बात यह है कि अधिक मूल्य वाली पुस्तकों के इस प्रकाशन बाजार में अट्ठासी पृष्ठों वाली पुस्तक की कीमत मात्र 120 रुपए है, जिसे पाठक आसानी से खरीदकर पढ़ सकते हैं।