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Thursday 13 Dec 2018

समकालीन चिंताओं और चुनौतियों से अनुप्राणित जीवन-मंत्रों सी ‘गजलें

सृजन कर्म से जुड़े व्यक्ति के जीवन के उत्तराद्र्ध में एक ऐसा कालखंड भी आता है जब वह जो रचता और अभिव्यक्त करता है- वह मंत्र-सा प्रभाव करता जाता है, क्योंकि तब तक वह अपने जीवन में बहुत कुछ चिंतन मनन तो कर ही चुकता है, साथ ही उसके पास विविध विषयों से संबंधित ज्ञान और अनुभवों का बड़ा कोष भी संचित हो जाता है अर्थात चिंतन और भावाभिव्यक्ति के स्तर पर वह तब तक बहुत कुछ अर्जित कर काफी कुछ परिपक्वता तथा परिपूर्णता प्राप्त कर चुकता है। तब उसके मुख से उच्चरित हर शब्द उसकी नहीं, बल्कि लोक की संपदा बन जाता है। उसके लिए सर्जक को पृथक से कोई प्रयास अथवा कवायद नहीं करनी पड़ती।

यह पृष्ठ-विवेचन मैंने वरिष्ठ कवि, गीतकार और ग़ज़लकार चंद्रसेन विराट के तेरहवें गज़ल संग्रह 'इस जिंदगी की जय’ के संबंध में अपनी बात कहने के लिए आधार भूमि तैयार करने के उद्देश्य से किया है। मूलत: मराठी भाषी होते हुए भी हिन्दी और उर्दू में महारत हासिल करने वाले श्री विराट ने 13 गज़ल संग्रहों के अलावा 14 गीत संग्रह, 8 मुक्तक संग्रह और दो दोहा संग्रह भी रचे हैं। गीत और गज़ल के क्षेत्र में वे देश के अग्रणी रचनाकारों में शामिल किए जाते हैं। वे करीब छह दशक से जहां पत्र-पत्रिकाओं में लगातार छप रहे हैं वहीं कवि सम्मेलनों में भी अपना अच्छा मुकाम बना चके हैं। कविवर गोपालदास नीरज के उदयकाल से वे कवि सम्मेलनों के मंच पर रचना पाठ करते आ रहे हैं। 3 दिसंबर 1936 को इंदौर में जन्मे चन्द्रसेन विराट एक ऐसे शब्द साधक हैं जो जीवन यात्रा के 81 वर्ष पूर्ण कर लेने के बाद भी बिना रुके, बिना थके निरंतर सृजन-साधना कर रहे हैं। उनके 37  संग्रहों से उनकी यह निरंतरता स्वमेव प्रमाणित है

गज़ल संग्रह 'इस जिंदगी की जय’ अमन  प्रकाशन, कानपुर (उ.प्र.) ने प्रकाशित किया है। इसमें चन्द्रसेन विराट की बड़ी बहर-छोटी बहर की 90 ग़ज़लें शामिल हैं। संग्रह के नाम से स्वत: स्पष्ट है कि ग़ज़लें ज़िन्दगी के प्रति शिकवा-शिकायतों से आकंठ में डूबी नकारात्मकता की ग़ज़लें नहीं है, अपितु वे सकारात्मक भावों की पगडंडी पर दौड़ती, जिंदगी की जय-जयकार करती कृतज्ञ भाव से आप्लावित ग़ज़लें हैं, जिनमें जीवन-मंत्र की शक्ल में बड़ी-बड़ी प्रेरक बातें पिरोई गई हैं। संग्रह में कहीं भी न तो आत्मपीडऩ का स्वर है और न ही कोरी उपदेशबाजी। गज़़लों के शब्द और तेवर में कहींभी सायास कुछ बड़ी बात करने की इच्छा का आभास नहींहोता। उन्होंने अपनी ग़ज़लों में किसी को बख्शा नहीं है, फिर चाहे वह राजनीति हो या राजनेता हों। ग़ज़लों में साफगोई और कहन की गहराई तो गजब की है। वे इन ग़ज़लों में वर्तमान की जमीन पर खड़े होकर सुरक्षित भविष्य की चिंता करते हैं विराट जी चूंकि शैक्षणिक पृषठ भूमि यांत्रिकी की रही है। इस कारण उनकी ग़ज़लों भी कहन की पुख्ता जमीन पर खड़ी दिखाई देती हैं। कहीं-कहीं तो ऐसा अहसास होता है जैसे वे कलम से नश्तर का काम  ले रहे हैं। कबीराई तो संग्रह की ग़ज़लों में खूब मुखरित हुई है।

21वीं सदी के इस भौतिकवादी दौर में साफ-साफ दिखाई दे रहा है कि लोग अपनी आत्मा को मारकर और अपने ईमान को बेचकर आकूत धन-संपदा तो इकट्ठी कर लेते हैं, लेकिन ऐसे लोग सोते-जागते लूट-खसोट और आयकर के छापों से भयाक्रांत रहते हैं। यह संचित धन उनके लिए मुसीबत का कारण बन जाता है। ग़ज़लकार ने इस सच को बयान करते हुए ठीक ही तो कहा है- ''उसने जमीर मार के, ईमान बेचकर/धन तो बहुत कमाया मगर डर बना रहा।‘’ आजकल बढ़ती हुई संवेदनहीनता पर चोट करते हुए विराट जी ने कहा है- 'संवेदनविहीन अभावुक और निष्करुण/इस युग में वह सुखी है जो पत्थर बना रहा।‘प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने का प्रतिफल कैसा मिलता है, संग्रह के एक शेर में इसी की ओर संकेत है- ''प्रकृति थी शांत, सुन्दर भी, बहुत शोषण सहा उसने/कुपित होकर जरा बिफरी, कहर बरपा गई देखो।‘’ देश के कर्णधारों को लेकर कभी-कभी जन-मन में एक बड़ा संशय जन्म लेता रहता है कि न जाने हमारे देश का भविष्य क्या होगा। इस संशय को विराट जी ने यूं अभिव्यक्ति दी है- ''नाव जाने किस किनारे लगे अब/दिग्भ्रमित नाविक, निर्देशन कर रहे हैं।‘’ जैसा कि मैंने पूर्व में उल्लेख किया है, इस गज़ल संग्रह में जीवन-मंत्र भी हैं। एक मंत्र देखिए- ''बीते पे रो न इतना, हो आज का अनादर/ जी वर्तमान  पूरा, सपने भी देख कल के।‘’ ऐसा ही एक मंत्र और है- ''तुम ही करते हो इरादे जब-जब/क्रांतियां होती हैं तब-तब।‘’

समाज सेवा एक ऐसा अनुष्ठान है, जो नि:स्वार्थभाव से ही ठीक-ठीक सम्पन्न किया जा सकता है। सत्ता के आंगन में खेलने वालों से ऐसे अनुष्ठान की अपेक्षा नहीं की जा सकती। इसी सच को संग्रह के एक शेर में ग़ज़लकार ने यूं ढाला है- ''सामाजिक सेवक हो, दिल में खोट न कुछ/क्यों सत्ता का पल्लू थामा, छोड़ो भी।‘’ राजनीति के भीतर बैठी खोट पर तीखा प्रहार करने वाली  एक गज़ल का एक शेर कितना मौजूं है- ''भोग सत्ता का, नाम सेवा का/अंतत: लक्ष्य नोट ही क्या।‘’ जीवन का यह अनुभव है कि कुछ लोगों को पुराने पुण्यों अथवा किसी अन्य कारण से बहुत कुछ मिल जाता है। होना तो यह चाहिए कि ऐसे व्यक्तियों को खुले हाथ से परोपकार करना चाहिए, किन्तु व्यवहार में ऐसा होता नहीं है। वे धन-संपदा पर कुंडली मारकर बैठ जाते हैं। इस सच को विराट जी ने अपने एक शेर में यूं व्यक्त किया है- ''मांगें बिना मिली है तो मांगे बिना न दे/दाता का कर रहा है तू अपमान तो नहीं।‘’ शोषण को मदिरापान से भी अधिक पतित बताने वाला $ग•ाल का यह अंश दृष्टव्य है- ''पीते हैं खून शोषितों का लोग शौक से /उससे अधिक पतित ये सुरापान तो नहीं।‘’ आजकल आधुनिक और आधुनिकता की परिभाषाएं खूब हो रही हंै। विराट जी की सहज-सरल परिभाषा का भी जवाब नहीं- ''चले संग समय के वही आधुनिक है / न चल आगे-आगे  न चल पीछे-पीछे।‘’ 'पीछे-पीछे’ गज़ल में एक और मंत्र- ''अगर आज को दे तू सम्मान पूरा / चला आएगा तेरे कल पीछे-पीछे।‘’ साहित्य ही है जो समाज को आदर्श सपने दिखाता है और उनको साकार करने की प्रेरणा और शक्ति का संचार भी करता है। संग्रह के ग़ज़लकार ने ऐसा ही एक आदर्श सपना देखा है, जो हमारे प्रजातंत्र का मूल उद्देश्य भी है। ग़ज़लकार कहता है- ''मेरा ख्वाब है देखूं चलते वतन में / कुटी आगे आगे, महल पीछे-पीछे।‘’ कुटी और महल के बिम्ब के माध्यम से रचनाकार ने बहुत बड़ी कह डाली है। अमीरी के घमंड ने देश में विषमता की ऊंची-ऊंची दीवारें खींच दी है। लोग विस्फारित नेत्रों से यह तमाशा दख रहे हैं। स्थितियां जटिल से जटिलतर होती जा रही हंै। धैर्य जवाब देने की कगार पर पहुंच रहा है। विराट जी ने ''है खूब परेशान, क्या करें’’ $ग•ाल में इसी स्थिति को शब्द दिये हैं- पाने के लिए पूर्ण साधना करना परम आवश्यक है। अधूरी साधना में से कभी सिद्धि प्राप्त नहीं होती। विराट जी ने यही मंत्र तो दिया है, अपने इस शेर में- ''अधूरी साधना से साध्य मिलता ही नहीं अब तो / लगन उन्माद से गुजर जाए तो अच्छा है।‘’’ सरकार द्वारा पकाए गए आंकड़े देश के गरीबों को किस तरह छल रहे हैं, उसकी ओर ग़ज़लकार ने यूं संकेत किया है- ''कोई गरीब ही न रहा देश में कहीं / जादूगरी विचित्र सभी सांख्यिकी की है।‘’

अवसरवादिता देश के लोगों के चरित्र में विष की तरह घुलती जा रही है। इससे देश का बड़ा नुकसान हो रहा है। रचनाकार को यह स्वार्थ लीला बहुत पीड़ा पहुंचा रही है। वह कह उठता है ''होनी थी जिनको है नहीं तब फिक्र हमको भी क्यों / होती हो तो देश क्षय, इसकी जय, उसकी जय।‘’ आज के हालात को ध्यान में रखकर विराट जी ने 'कंठ मिला तो गाता रह’ गज़ल में जागरुक लोगों का आव्हान करते हुए कहा है- (1) शोषण, जुल्मों के घर की / ईंटों को खिसकाता रहा। (2) दुष्ट सियासत जो गाये / तू विपरीत बजाता रह, तथा (3) सत्ता के तहखानों तक / एक सुरंग बनाता रह। ... ये वे तीन सूत्र हैं जो शोषण और जुल्म के खिलाफ प्रतिकार की मशाल प्रज्जवलित कर सकते हैं। विराट जी ने बेटियों के साथ होते आ रहे अन्याय पर बहुत ही तीखा प्रहार करते हुए कहा है- ''तुमने बेटी को बेटे से कमतर समझा/झेलती आई है अन्याय सरासर बेटी’’ और ''कौन उपलब्धि जो बेटी ने नहीं पाई है / क्या है जो जो न कराती है मयस्सर बेटी।‘’ समय की पाबंदी के महत्व को चंद शब्दों में समझाने वाले शेर की जितनी प्रशंसा की जाए कम है ग़ज़लकार ने कहा है- ''समय है तो सब सार्थक/समय के बाद क्या करना।‘’ किसी साध्य अर्थात लक्ष्य को लेकर निराश के क्षणों में आत्मघाती फैसला लेने वालों से कहा है- ''दी है जान जिसने भी वो ही जान ले सकता/हाथ में क्यों विधाता का विधान लेता है।‘’ और ''दिया जिसने वही लेगा, तुझे अधिकार ही क्या है/ कि यह जीवन स्वयं का भी स्वयं द्वारा लिया जाये।‘’

सर्जक कला का हो या साहित्य का वह समकालीन समस्याओं का गंभीरता के साथ संज्ञान लेता है और अपने सृजन के माध्यम से यथोचित स्वर देता था। आजकल भ्रूण हत्या एक बड़ी समस्या बनी हुई है। कानून और जनसमस्या के बाद भी वह थमने का नाम नहीं ले रही। हर साल लाखों बेटियां कोख में ही मार दी जाती हैं। ग़ज़लकार दुखी मन से कहता है- ''कोख ही मे ंजो मार दे बेटी/ऐसे मां-बाप मत कसाई दे।‘’ जागरण कुछ मिला है, उसमें संतोष करके सुखी बने रहने का सूत्र देते हुए विराट जी ने ''आंसू सी, गम खाया कर गज़ल में कहा है- ''सबको सब कुछ कब मिलता / यह दिल को समझाया कर।‘’ आजकल व्यक्तिगत स्वार्थों की वेदी पर कानूनों की बलि दी जा रही है। यर्थात गवाह और सबूत रहते हुए भी सरकारी कारिंदों की तरफ से कमजोर दलीलों और जांच के कारण बरी हो जाते हैं। कवि मन को यह 'पाप कर्म’ बहुत पीडि़त कर रहा है। वह आहत मन से कह उठता है- ''साबित हुआ है जुर्म बरी हो गया मुल्जिम / कुछ दंड न क्षमादान म मिला स्वदेश के करोड़ो के खर्च पर शिक्षित युवाओं के विदेशों की ओर पलायन पर गहरी चिंता प्रकटकरते हुए रचनाकार को आखिर कहना पड़ा है- ''विदेशों से लाये अमीरी कमाकर / गये मां-चिता पर गुजर आते-आते।‘’ $ग•ालकार ने शांतिपूर्णसुखी जीवन के लिए एक और मंत्र दिया है- ''सुबह जागो प्रभु का स्मरण करते करते / करो ईश-वंदन शयन करते-करते।‘’ देश में किसानों की जो दुर्दशा आज है, रचनाकार ने शेर की दो पंक्तियों मे उसका सटीक चित्रण कर दिया है- ''सात दशकों में न बदला भाग्य उसका / प्रेमचंद का पात्र गोबर बोलता है।‘’ कवि मन की यह चिंता भी आंखों से ओझल कैसे की जा सकती है- ''बची नस्ल है जो सही आदमी की / कहीं गुम न जाए, विरल होते-होते।‘’

$ग•ालकार चन्द्रसेन विराट के अंतस में बहुत उद्वेलन और छटपटाहट है। वह आज के अप्रिय और असहनीय हालात से अतिकी सीमा तक आहत है।वह प्रतिकार और प्रतिरोध की शक्ति का आव्हान करते हुए संग्रह की एक गज़ल में बरबस कह उठता है- ''कब तक सहन करोगे, उठ्ठो करो बगावत / हर जुल्म की कलाई को मोडऩा पड़ेगा।‘’ और ''उसके छुरे के पहले तुम बघनखा घुसेड़ों/अफजल को हे शिवाजी! अब मारना पड़ेगा।‘’ गज़ल लसंग्रह की अंतिम गज़ल में 'ढाई अक्षर’ शब्द के मर्म को समझने का आव्हान करते हुए चन्द्रसेन विराट का ग़ज़लकार देश के प्रबुद्धजनों और सही आदमियों से आग्रह करना है कि वे हालात को अपने नियंत्रण से बाहर न होने दें, जतन से सम्हाल लें।