Monthly Magzine
Wednesday 15 Aug 2018

रघुवीर सहाय की काव्य-संवेदना

रघुवीर सहाय स्वाधीन भारत के उन महत्वपूर्ण रचनाकारों में से हैं जिनकी रचनाओं में स्वांत्र्योत्तर भारत के विविध रूप और समस्याएँ सम्पूर्णता से उद्घाटित हुई हैं। अपने रचना-कर्म के प्रति जितनी सजगता उनमें थी, उतनी स्वाधीन भारत के बहुत कम लेखकों में देखने को मिलती है। उनका ध्यान किसी घटना पर उतना नहीं रहता था जितना उसके प्रभाव से उत्पन्न मानवीय सम्बन्धों की विकलता एवं संवेदनाओं पर रहता था। उन्होंने कविता के माध्यम से सामान्य नागरिकों के मानवाधिकारों, समता, समानता और न्याय की लड़ाई की पक्षधरता की। उनकी कविताओं में राजनीतिक विसंगतियाँ, आम आदमी की पीड़ा, संघर्ष, विवशता, व्याकुलता अत्यन्त तीव्रता एवं तीक्ष्णता से उभरती है।

समय के लम्बे अंतराल के बावजूद उनकी प्रासंगिकता कम नहीं हुई क्योंकि अपनी रचनाओं में उन्होंने जिन मुद्दों को उठाया है, वे हमारे समय और समाज को आज भी आन्दोलित कर रहे हैं। उनकी कविताएँ गतिशील जीवन-यथार्थ से हमेशा संवाद बनाये रही हैं। सहाय की कविताएँ राजनीतिक संदर्भों से विशेष रूप से जुड़ी हैं। चूँकि आज का युग राजनीतिक जागरूकता तथा प्रतिबद्धता का युग है अत: कोई कवि राजनीति से अलग रह कर कैसे रह सकता है। रघुवीर सहाय किसी राजनीतिक दल के प्रचारक नहीं हैं और न किसी दल-विशेष के सिद्धातों का काव्यात्मक रूपान्तर करने की चेष्टा करते हैं। उनका झुकाव लोहिया के समाजवाद की तरफ  था किन्तु वे किसी दल या विचार से औपचारिक रूप से सम्बद्ध नहीं थे। वे उन सभी विचारों का आदर करते थे जिनके द्वारा जन-जीवन को बेहतर तथा सुखमय बनाया जा सके। निस्सन्देह रघुवीर सहाय ने अपनी रचनाओं में सामान्य जीवन और उसके विविध रूपों को प्रमाणिक ढंग से अभिव्यक्त किया है।

रघुवीर सहाय की प्रारंभिक रचनाएँ प्रेम, सौंदर्य और प्रकृति चित्रण से अधिक संबंधित है। कवि की प्रारंभिक दौर की कविताओं में प्रेम की सहज अभिव्यक्ति दिखाई देती है। कवि जीवन के यथार्थ को गहराई से महसूस करते हैं। उनकी डायरी से ली गई कविता में वे लिखते हैं-

       ''तुम सपनों में क्यों आती हो

       मन की  ज्वाला बुझा चुकी हो

       अंत राह का सुझा चुकी हो

       फिर क्यों मेरा हाथ पकड़कर उस दुर्गम पथ

       पर लौटाती हो

       तुम मेरे सपनों में क्यों आती हो?''

            'दूसरा सप्तक' में संकलित अधिकांश कविताओं में आशा एवं विश्वास का स्वर मुखर है। 'वसन्त', 'पहला पानी' एवं 'प्रभाती' इस दृष्टि से उल्लेखनीय कविताएँ है तथा आशा एवं विश्वास के साथ इन कविताओं में प्रकृति का मनोरम चित्र भी उपस्थित हुआ है। 'वसंत' में प्रकृति का सुंदर चित्रण करते हुए रघुवीर सहाय लिखते हैं-

       ''वन की रानी, हरियाली-सा भोला अंतर

       सरसों के फूलों-सी जिसकी खिली जवानी

       पकी फसल-सा गरुआ गदराया जिसका तन

       अपने प्रिय को आता देख लजाती जाती

       गरम गुलाबी शरमाहट-सा हल्का जाड़ा

       स्निग्ध गेहुँए गालों पर कानों तक चढ़ती

       लाली जैसा फैल रहा है।''

            रघुवीर सहाय की पहचान मूलत: एक राजनीतिक कवि के रूप में है। लोकतंत्र में भ्रष्टाचार आम समस्या है। आदमी का बीमार होना अथवा निरोग रहना भ्रष्ट राजनेताओं को खुश करने या नाराज करने पर निर्भर है। नेताओं की करामात निन्दनीय है। मन्त्री मुसद्दीलाल ने 'नेहरु-युगÓ के औजारों में पेंचभरी चूडिय़ों का इजाफा किया है। खैराती अस्पताल का डॉक्टर कहता है-

       ''दर्द, खैराती अस्पताल में डाक्टर ने कहा-

       वह मेरा काम नहीं

       वह मुसद्दी का है

       वह भेजता है मुझे लिखकर इसे अच्छा करो

       जो तुम बीमार हो तुमने उसे खुश नहीं किया होगा

       अब तुम बीमार हो तो खुश करो

       कुछ करो।''

            साठोत्तरी दौर के हिन्दी साहित्य में मोहभंग की जो अनुगूंज सुनायी देती है, उस अनुगूंज में रघुवीर सहाय की आवाज भी शामिल थी। उनकी उस समय की कविताओं को देखकर किसी को यह लग सकता है कि वे लोकतंत्र-विरोधी थे। मगर सच्चाई यह है कि वे लोकतंत्र के मूल्यों के भ्रष्टीकरण से आहत थे। वे शासकों के उन कारनामों से दु:खी हो रहे थे जिनसे अन्याय और नाबराबरी को ही बढ़ावा मिलता था। शोषक वर्गों की नुमाइंदगी करने वाले राजनेता किसी रचनाकार को भी अभिव्यक्तिकी स्वतंत्रता नहीं देना चाहते थे। राजसत्ता की यह प्रवृत्ति इमरजेन्सी में एक सच्चाई बनकर सामने आ गयी जब कविता पर भी सेंसरशिप लागू हो गयी थी। 'फिल्म के बाद चीख'कविता में रघुवीर सहाय ने शोषक वर्गों द्वारा साहित्य 'रेजीमेंटेशनÓ के बारे में चुटकी लेते हुए लिखा है-

''संसद एक मंदिर है जहाँ किसी को द्रोही कहा नहीं जा सकता

       दूधपिये मुंहपोंछे आ बैठे जीवनदानी गोंद

       दानी सदस्य तोंद सम्मुख धर

       बोले कविता में देश प्रेम लाना हरियाना प्रेम लाना

       आइसक्रीम लाना है।''

            रघुवीर सहाय ने अपने समय और समाज को काफी गहराई में उतर कर देखा था। उन्होंने लिखा है- ''समाज की समझ का मतलब है, समाज में मनुष्य और मनुष्य के बीच जितने गैर इंसानी रिश्ते हैं उनकी समझ, कहाँ से वे पैदा होते हैं, इसकी समझ और उनकी जड़ों तक पहुँच इतिहास की समझ।ÓÓ वे यह भी मानते थे कि- ''अगर इंसान और इंसान के बीच एक गैर-बराबरी का रिश्ता है और उस रिश्ते को कोई आदमी मानता है कि ऐसे ही रहना चाहिए, तो वह कोई रचना नहीं कर सकता।ÓÓ उन्होंने आजादी के बाद के भारतीय समाज में ना-बराबरी के सामंती मूल्य को बहुत ही सूक्ष्मता से पहचाना था क्योंकि ना-बराबरी की चेतना बने रहने से लोकतंत्र या जनवाद विकसित नहीं हो सकता, बल्कि अधिनायकवाद के पनपने के लिए जमीन तैयार होती है। 'आत्महत्या के विरुद्धÓ संकलन में एक कविता 'अधिनायकÓ इसी ओर संकेत करती है-

       ''राष्ट्रगीत में भला कौन वह

       भारत भाग्य विधाता है

       फटा सुथन्ना पहने जिसका

       गुन हरचरना गाता है

       कौन-कौन है वह जनगण मन

       अधिनायक वह महाबली

       डरा हुआ मन बेमन जिसका

       बाजा रोज बजाता है।''

            'आत्महत्या के विरुद्ध' की रचनाओं में रघुवीर सहाय की रचनात्मक संवेदना पूँजीवादी जनतंत्र की आड़ में किये जा रहे शोषण, दमन और अन्याय के खिलाफ  विद्रोह करती है। उस दौर के ज्यादातर बुद्धिजीवी एक तरह के संशयवाद (सिनिसिज्म) के शिकार हो गये थे जो साठोत्तरी कविता में हमें दिखायी देता है। उस समय कवियों को लग रहा था कि 'जब सब कुछ ऊल ही जलूल है, तो सोचना फिजूल है।' इसलिए उस दौर में व्यवस्था के प्रति कवियों का आलोचनात्मक रूख तेज हो गया था। रघुवीर सहाय यह महसूस करते हैं कि पूंजीवादी जनतंत्र में भी मनुष्य और मनुष्य के बीच असमानता और सामाजिक अन्याय का बोलबाला है, इस व्यवस्था में भी गरीब को रोटी नसीब नहीं हो रही है। 'नेता क्षमा करे' कविता में उन्होंने लिखा है-

''मैं तुम्हें रोटी नहीं दे सकता न उसके साथ खाने के लिए गम

       न मिटा सकता हूँ ईश्वर के विषय में तुम्हारा भ्रम

       लोगों में श्रेष्ठ लोगों मुझे माफ  करो

       मैं तुम्हारे साथ आ नहीं सकता।''

            इसी प्रकार 'अपने आप और बेकार' में वाचक अपने को देश के लोगों के बीच रखता है। यही उसका जनवादी मूल्य है कि वह अपने को उनके बराबर रखता है, लोगों में श्रेष्ठ लोगों के साथ नहीं। इन 'श्रेष्ठ लोगोंÓ ने देश की जो दुर्गति की है, उसके प्रति रघुवीर सहाय की कविताओं में व्यंग्य की करारी चोट मिलती है। 'नयी हंसीÓ कविता में इन 'श्रेष्ठ लोगोंÓ के नेतृत्व पर जो करारा व्यंग्य किया है, वह देखने लायक है-

       ''राष्ट्र को महासंघ का यह संदेश है-

       जब मिलो तिवारी से-हँसो-क्योंकि तुम भी तिवारी हो

       जब मिलो शर्मा से-हँसो-क्योंकि वह भी तिवारी है

       जब मिलो मुसद्दी से

       खिसियाओ

       जातपाँत से परे

       रिश्ता अटूट है

       राष्ट्रीय झेंप का।''

            रघुवीर सहाय का राजनीतिक व्यंग्य कविता में ऐसा घुला-मिला रहता है कि यदि बहुत सजगता से न पढ़ा जाए तो वह पाठक की पकड़ से छूट जाता है। राजनीति की चाल-ढाल तथा उसकी विकृत निष्पत्तियों के साथ ही मीडिया के तौर-तरीके एवं सामान्य जनता के अत्याचार सहने तथा व्यर्थ के तरीकों से अपने दुख-दर्द को विस्मृत किये रहने पर तीखा व्यंग्य किया गया है। किसी सामान्य व्यक्ति की हत्या की नोटिस न राजनेता लेता है और न मीडिया। यदि राजनीति का कोई मसला हो तो कत्ल का मसला जोर पकड़ ले, अन्यथा उसकी हत्या को उसकी बदचलनी का परिणाम मान लिया जाता है। खुशीराम जैसे नागरिक की मनोदशा है-

       ''दिन रात साँस लेता है, ट्रांजिस्टर लिये हुए खुशनसीब

       खुशीराम, फुरसत में अन्याय सहने में मस्त।''

            रघुवीर सहाय ने मध्यवर्गीय समाज को यह अहसास दिलाया कि अकेले-अकेले रहकर हर कोई अधिनायकवादी ताकतों के हाथों मारा जायेगा। अधिनायकवादी ताकतों के खिलाफ  अगर संगठित नहीं होंगे तो हर 'रामदास की हत्या होगी।'अकेले व्यक्ति की हत्या का मर्मभेदी चित्र खींचकर एक तरह से रघुवीर सहाय ने सबको अगाह किया है-

       ''खड़ा हुआ वह बीच सड़क पर

       दोनों हाथ पेट पर रखकर

       सधे कदम रख करके आये

       लोग सिमट कर आँख गड़ाये

       लगे देखने उसको जिसकी तय था हत्या होगी।''

            मध्यवर्ग के बुद्धिजीवी प्राय: पक्षधरता से कतराते हैं कि वे सुरक्षित हैं। रघुवीर सहाय इस कविता के माध्यम से यह संकेत देते हैं कि पक्ष न लेने से ही रामदास की हत्या होती है और इस हत्या के मूकदर्शक बने मध्यवर्ग की निष्क्रियता के कारण ही अधिनायकवाद आम आदमी का दमन और शोषण कर पाता है। इस कविता में जो चित्र रामदास का खींचा गया है, वह मध्यवर्ग का भी हो सकता है। वह भी 'बीच सड़क परÓ खड़ा है, न इधर है और न उधर। वह भी अपने 'पेट' की रक्षा में सबसे अधिक जुटा हुआ है, 'दोनों हाथ पेट पर रख कर।' इस कविता की यह व्यंजनाशक्ति है कि रामदास यानी साधारण जन और मध्यवर्ग दोनों की नियति एक है, यदि मारे जायें तो दोनों ही मारे जायेंगे और मुक्ति हासिल करेंगे तो दोनों ही करेंगे। यदि एक दूसरे के मारे जाने को तमाशाई की तरह देखते रहेंगे तो दोनों की हत्या होगी। रघुवीर सहाय इस कविता के माध्यम से बहुत बड़ा ऐतिहासिक सच कह जाते हैं।

       कवि रघुवीर सहाय अपना कथ्य राजनीतिक सन्दर्भों तक ही सीमित नहीं रखते। वे अनेक छोटे-छोटे विषयों पर नयी अनुभूति और नये प्रभाव की कविताएँ रचते हैं। रोजमर्रा की जीवनानुभूतियाँ जो सबकी चिर परिचित हैं, जिन्हें हम प्रतिदिन देखते, परखते और बाँटते हैं वही सहाय की कविता की प्रेरणा बन जाती है। 'जल भरे बरतन, ज्वार, वसन्त, पानी, धूप, वृक्ष, रूमाल, गुलाब, फिल्म, अकाल, दर्द, टेलीविजन, कैन्सर आदि ऐसे अनगिनत विषय है, जिन पर कविताएँ लिखी गयी हैं। 'कविता' शीर्षक से भी रघुवीर सहाय कविता लिखते हैं। अपनी सामान्य दैनिक इस्तेमाल की वस्तुओं से एक आत्यंतिक निकटता कवि महसूस करता है जिसका उदाहरण 'रुमाल' कविता है। ''कवि को अपने छूटे हुए रुमाल की याद आती है, जिससे उन्होंने 'अपना जूताÓ, नाक, पसीना और कलम की निब पोंछी थी।'' इस प्रकार अनेक छोटे-छोटे विषयों एवं रोजमर्रा की जीवनानुभूतियों के प्रति कवि की सजगता एवं संवेदना के सम्बन्ध में रामस्वरूप चतुर्वेदी का कथन उल्लेखनीय है- ''मामूली शब्द और मामूली अनुभव में एक नयी शक्ति सक्रिय कर देना नयी कविता की पहचान बनी है, तो इसका श्रेय रघुवीर सहाय को दिया जा सकता है।''

कवियों के लिए नारी शताब्दियों से विशेष आकर्षण का केन्द्र रही है। उसके आंगिक तथा भाव-सौंदर्य को पुराने कवियों ने बड़ी तल्लीनता से अंकित किया है। आधुनिक युग में नारी को मात्र श्रृंगार का आलम्बन न मानकर उसके व्यक्तित्व के विविध रूपों, उसके संघर्ष और समस्याओं पर दृष्टि केन्द्रित की गयी। रघुवीर सहाय ने भी नारी पर अनेक कविताएँ लिखी हैं, नारी, चढ़ती स्त्री, खबती औरत, एक लड़की, औरत की जिन्दगी आदि एक दर्जन से अधिक कविताएँ नारी से सम्बन्धित है। स्त्री के दु:ख-दर्द को समझने की चेष्टा इनकी कविताओं में है। नारी-पुरुष की समानता को व्यक्त करने वाली निम्नलिखित पंक्तियाँ द्रष्टव्य हंै-

       ''बंधु हम दोनों थके हैं,

       और थकते ही रहे तो साथ चलते भी रहेंगे

       वह नहीं है साथ जिसमें तुम थको तो हम तुम्हें

       लादे फिरें

       और हम थकें तो दम तुम्हारा फूल जाय हाय।''

            रघुवीर सहाय औरत की बेबसी, सहनशीलता, पारम्परिकता के प्रति लगाव आदि का सूक्ष्म और व्यंजक चित्र अंकित करते हैं। नारी स्वभाव का एक सहज चित्र देखिए-

       ''नारी बिचारी है

       पुरुष की मारी है

       तन से क्षुधित है

       मन से मुदित है

       लपककर झपककर

       अंत में चित्त है।''

            रघुवीर सहाय के समय की नारी और आज की नारी में बड़ा अन्तर आ गया है। अब वह अपनी व्यथा जानती है, उससे उबरने के लिए स्वयं प्रयत्नशील भी है लेकिन 1960 के समय की अधिकांश कविताओं में तत्कालीन नारी ऐसी है जिसे अपनी व्यथा नहीं मालूम। ''अभी तक खड़ी स्त्री'' में कवि कुछ ऐसा ही अनुभव व्यक्त करता है। स्त्री के चेहरे पर उसका विद्रोह रहता है लेकिन इसे कम औरतें जानती हैं-

       ''जब वह घुटने मोड़कर

       करवट लेती हो

       तब देखोगे कि तुम

       देख रहे हो कि

       उस पर अन्याय होंगे ही

       पर उसका चेहरा उसका विद्रोह है

       यह कितनी कम औरतें जान पाती हंै।''

            रघुवीर सहाय का काव्य-शिल्प और भाषा दोनों ही परम्परा से अलग और विशिष्ट है। आज की जटिल जीवन-प्रणाली, विसंगतियाँ और विडम्बनाओं की अभिव्यक्तिपारम्परिक काव्यभाषा, बिम्बों, प्रतीकों तथा उपमानों के द्वारा सम्भव नहीं है। इस पर नयी कविता में पर्याप्त बहस भी हुई। चूंकि हर कवि का अनुभव विशिष्ट एवं मौलिक होता है अत: उसे अंकित करने के लिए उसे नयी भाषा की तलाश करनी पड़ती है। रघुवीर सहाय के समसामयिक कवियों ने अपने स्वभाव तथा मिजाज के अनुसार भाषा को सिरजा है। रघुवीर सहाय में भाषा और संवेदना का सहज अद्वैत है। इनकी भाषा शब्दार्थों की अव्यवस्थित संगति के द्वारा सामाजिक, राजनीतिक एवं मानवीय स्थितियों की विसंगति को व्यंजित करती है। ''एक विचार में अनेक विचारों को गूँथ देना, फिर भाषा के असंगत संयोग या वाक्यों के बेतुक प्रवाह में भी कोई मौलिक सोच समाहित करना रघुवीर सहाय की भाषा की एक विशेषता है।'' रघुवीर सहाय बोलचाल की भाषा में भी गहरी अर्थव्यंजना करने में समर्थ हैं। मुहावरों में अर्थ का नवीन विधान इनकी भाषा में परिलक्षित होता है। लोक शब्दों में संज्ञा ही नहीं बल्कि क्रिया के भी प्रयोग ब्रजभाषा या अवधी की परम्परा का हल्का अहसास देते हैं। तत्सम, तद्भव और देशज शब्दों के विन्यास का भाषिक सौन्दर्य द्रष्टव्य है। व्यंग्य का हल्का पुट इनकी भाषा को चुटीला बना देता है-

       ''वह चेहरा जो जिया या मरा व्याकुल जिसके लिये हिया

       उसके लिए समाचारों के बाद समय ही नहीं दिया

       तब से मैंने समझ लिया है आकाशवाणी में बनठन

       बैठे हैं जो खबरों वाले वे सब हैं जन के दुश्मन।''

            निष्कर्षत: रघुवीर सहाय स्वातंत्र्योत्तर भारत के महत्वपूर्ण कवि हैं जो मानवतावादी मूल्यों जैसे समता स्वतंत्रता और बन्धुत्व के प्रति पूरी तरह से समर्पित हैं। यथास्थितिवाद उनकी कविताओं का आधार नहीं है बल्कि रघुवीर सहाय अपनी कविताओं में नये परिवर्तन को आधार बनाते हैं। यही कारण है कि वे कहीं सरकार द्वारा बनाये गये नियमों को जिसमें जनता की भलाई है उससे खुश होकर आशावाद, आस्था एवं रोमानियत का वर्णन करते हैं तो कहीं जनविरोधी कानून तथा विसंगतियों से क्षुब्ध भी हुए हैं। परिणामस्वरूप उनकी रचनाओं में मनुष्य की यंत्रणा, बेबसी, संत्रास आदि का उल्लेख भी हुआ है। सुरेश शर्मा के अनुसार- ''वे अपनी कविताओं के विषय समाज में मनुष्य की बदलती जीवन-स्थितियों में तलाशते हैं। समाज व्यवस्था के बीच साधारण मनुष्य अरक्षित और असहाय होकर भी किस हद तक जीने का संघर्ष कर रहा है यह उनकी अधिकांश कविताओं का कथ्य है।