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Thursday 19 Apr 2018

'गोरा’ उपन्यास में व्यक्त राष्ट्र की अवधारणा

राष्ट्र  आधुनिकीकरण की प्रक्रिया से उपजी एक महत्वपूर्ण एवं विवादास्पद संकल्पनाओं में से एक है, जिसे 'पूँजीवाद' का समर्थन प्राप्त है। इस धारणा ने उत्कट निष्ठाओं के साथ-साथ गहरे विद्वेषों को भी प्रेरित किया है, इसने अत्याचारी शासन से मुक्ति दिलाने में मदद की तो इसके साथ विरोध कटुता एवं युद्धों का कारण भी रहा, इसने जनता को जोड़ा है, तो विभाजित भी किया है

राष्ट्र जनता का कोई आकस्मिक समूह नहीं है। लेकिन यह मानव समाज में पाये जाने वाले अन्य समूहों अथवा समुदायों से अलग है। यह परिवार से भी अलग है, परिवार तो प्रत्यक्ष संबंधों पर आधरित होता है। यह जनजातीय, जातीय एवं अन्य सगोत्राीय समूहों से भी अलग है, इन समूहों में विवाह और वंश परम्परा सदस्यों को आपस में जोड़ती है। राष्ट्र के सदस्यों के बीच का संबंध प्रत्यक्ष नहीं होता है। आमतौर पर एक राष्ट्र के लिए समान भाषा, धर्म तथा जातीयता को जोड़ा जाता है, किंतु ये सभी राष्ट्रों में समान रूप से मौजूद नहीं है।

इसीलिए बेनेडिक्ट एंडरसन राष्ट्र को 'काल्पनिक समुदाय' मानते हैं, वहीं पाल जेन्स 'अमूत्र्त समुदाय' कहते हैं। भारत में आधुनिक 'राष्ट्र' की अवधरणा बुनियादी तौर पर विदेशी आधिपत्य की चुनौती को जवाब देने के रूप में उदित हुई। इसी तथ्य को ए.आर.देसाई अपनी पुस्तक 'भारतीय राष्ट्रवाद की सामाजिक पृष्ठभूमि' में दर्ज करते हुए लिखते हैं- ''भारतीय राष्ट्रवाद के बारे में एक रोचक तथ्य यह है कि इसका आविर्भाव राजनीतिक पराध्ीनता के दिनों में हुआ।'' क्योंकि अपनी पहचान को बनाये रखने का सबसे कारगर तरीका राष्ट्रवाद होता है। और यह भारत जैसे भिन्न जातीय समूह, धर्म, सामाजिक व्यवस्था व राजनीतिक आचरण वाले समुदाय के लिए तो और जरूरी हो जाता है।

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तराद्र्ध में राष्ट्रीय राजनीतिक चेतना बहुत तेजी से विकसित हुई और भारत में एक संगठित राष्ट्रीय आंदोलन का सूत्रपात्र हुआ। दिसंबर 1885 में 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नींव पड़ी। किंतु इसके पूर्व भी अनके सभा, समितियों तथा संगठनों की स्थापना हो चुकी थी। 1836 में राजा राममोहन राय द्वारा 'बंगभाषा प्रकाशक सभा', 1866 में दादा भाई नौरोजी द्वारा लंदन में 'ईस्ट इण्डिया एसोसिएशन' का गठन, 1875 में शिशिर कुमार घोष द्वारा 'इण्डियन लीग', सुरेन्द्रनाथ बनर्जी तथा आनंद मोहन बोस जैसे युवा राष्ट्रवादियों द्वारा जुलाई 1876 में 'इंडियन एसोसिएशन' 1867 में महादेव गोविंद रानाडे द्वारा 'पूना सार्वजनिक सभा', 1885 में सैयद बदरूद्दीन तैयबजी, फिरोजशाह मेहता एवं के.टी. तैलंग के प्रयासों से 'बाम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन' आदि की स्थापना इसके सशक्त उदाहरण हैं।

वस्तुत: यह पूरा दौर राष्ट्र की बहसों का, उसे परिभाषित करने का दौर है। इसीलिए समस्त भारतीय भाषाओं के लेखकों ने इस प्रश्न से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से टकराहट मोल ली है। रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा 1909 में रचित 'गोरा' उपन्यास राष्ट्र के प्रश्नों से जूझती एक शीर्षस्थ कृति है। गोरा में व्यक्त राष्ट्र की धारणा को जानने-समझने से पूर्व रवीन्द्रनाथ टैगोर की 'राष्ट्र' सबंधी मान्यताओं से परिचित होना आवश्यक है।

रवीन्द्रनाथ टैगोर 'राष्ट्र के मूल तर्क के ही खिलाफ  हैं, वे कहते हैं-''मैं किसी एक राष्ट्र के विरूद्ध नहीं हूँ, बल्कि सभी राष्ट्रों के एक सामान्य विचार के विरूद्ध हूँ'' वे इसे 'मानवता के लिए कलंक' मानते हैं। उनका यह विरोध राष्ट्र जैसी अमूत्र्त सत्ता द्वारा मानवता की अवहेलना किये जाने के कारण है। टैगोर के अनुसार 'लोगों के राजनीतिक और धार्मिक संघ के अर्थ में, राष्ट्र एक ऐसा दृष्टिकोण है, जो सारे देशवासी किसी यांत्रिक उद्देश्य से संगठित होकर बनाते हैं। यह यांत्रिकता मनुष्य और समाज को स्वाभाविक अवस्था में नहीं रहने देती। यह शक्ति का अनुष्ठान करने लगती है और मानवीय आदर्श पीछे छूट जाते हैं।

टैगोर देश के स्वाधीनता आंदोलन में मौजूद संकीर्ण राष्ट्रवाद के कटु आलोचक थे। उन्हें भय था कि तथाकथित भारतीय परंपरा के पक्ष में पश्चिम की खारिजी का विचार यहीं तक सीमित रहने वाला नहीं है। यह अपने देश में मौजूद ईसाई, यहूदी, पारसी और इस्लाम समेत तमाम विदेशी प्रभावों के खिलाफ आसानी से आक्रामक हो सकता है। क्योंकि 'राष्ट्र संबंधी मत का सबसे गंभीर खतरा यही है कि यह व्यक्ति को अपनी निजी इच्छाओं को त्यागकर, अमूर्त राष्ट्रीय इच्छा को अपनाने के लिए बाध्य करता है और निर्वैयक्तिक उद्देश्यों के प्रति निष्ठावान बने रहने का आग्रह करता है।'

टैगोर के अनुसार मनुष्य को क्रूर और मशीनी बनाने के लिए 'राष्ट्र' जैसे विचार पैदा किये जाते हैं। 1932 में अपनी ईरान यात्रा के दौरान बगदाद रूकने पर जब टैगोर को ब्रिटिश वायुसेना द्वारा की जा रही बमबारी की सूचना मिलती है तो उसका वर्णन अपनी चिठ्ठी में वे इस प्रकार करते हैं- 'जिन मासूम लोगों की हत्या वह करने जा रहे है, उनका उसे तनिक भी अहसास नहीं होता। इसलिए बम गिराते समय उसके हाथ नहीं काँपते। उसकी आँखों के सामने वे चेहरे नहीं होते। इसलिए उसका अहसास भी कुंद हो जाता है। मनुष्य, प्रकृत्या पृथ्वी से जुड़ा है। उसकी अनुभूत वास्तविकता मिटते ही सम्बन्ध का वह आखिरी धगा भी टूट जाता है।'

इसीलिए वे सबको चेतावनी देते हुए कहते हैं ''राष्ट्रवाद एक क्रूर महामारी है, जो न केवल वर्तमान समय के मानवीय विश्व को प्रभावित कर रही है, बल्कि इसकी नैतिक ऊर्जा को भी लील रही है।''

टैगोर और गाँधी दोनों का मानना था कि भारत जैसे विविधतापूर्ण और बहुलतावादी समाज में परम्परागत पश्चिमी राष्ट्र का 'कॉन्सेप्ट' लागू नहीं हो सकता। सर जॉन स्ट्रेची ने भी लिखा था कि 'भारतवर्ष न कभी राष्ट्र था, और न है, और न उसमें यूरोपीय विचारों के अनुसार किसी प्रकार की भौगोलिक, राजनैतिक, सामाजिक अथवा धार्मिक एकता थी, न कोई भारतीय राष्ट्र और न कोई भारतीय ही था।''

गोरा न सिर्फ इन बहसों, वरन् तत्कालीन समय में चल रही सांस्कृतिक प्रक्रियाओं, घात-प्रतिघातों एवं मानवीय संभावनाओं की तलाश करने वाला उपन्यास है। इसमें हिन्दू पुनरूत्थानवाद, ब्रहम समाज आदि की धमक को महसूस किया जा सकता है। इसमें सृजित समाज तदयुगीन समाज का प्रतिनिधि है। पूरा भारतीय इतिहास ही जैसे रवीन्द्रनाथ ने 'गोरा' में प्रतीकित कर दिया है।

'गोरा' उपन्यास का मुख्य पात्र गोरा 'हिन्दू हितैषी सभा' का सभापति है। उसका मित्र विनयभूषण इस सभा का सेक्रेटरी है। गोरा कट्टर हिन्दू है, वह सिद्धान्त को मनुष्य से ऊपर मानता है, वह आनंदमयी से कहता है- 'जो नियम है उसे मानना ही होगा, उससे इधर-उधर किसी तरह नहीं हो सकता।'' वह छुआछूत को भी मानता है- 'छुआछूत के मामले में सुई की नोक भर हटने से भी अंत में कुछ बाकी नहीं रहेगा।''ऐसा वह इसलिए करता है क्योंकि उसे यकीन है कि उपनिवेशवाद द्वारा किये गये अपमान का प्रतिकार केवल एक ही तरीके से किया जा सकता है कि हर स्वदेशी चीज का कठोरता से पक्ष लिया जाय।

'स्वाधीनताविहीन होकर कौन जीना चाहेगा' और 'यह बीस कोटि जनता का घर है', जैसे गीत गाने वाला और अपने बड़े भाई महिम से 'पैट्रियट बड़े भैया' व 'हीरेन मुखर्जी सेकिंड' जैसी व्यंग्यपूर्ण उपाध् िप्राप्त करने वाला गोरा ''राह चलते कोई मौका देख कर किसी अंग्रेज से मार-पीट करके अपने को धन्य मानता है।'' गोरा की चिन्ता का विषय औपनिवेशिक शासन में पड़ा हुआ हिंदुस्तान है- ''यह जहाँ हम पढ़ते सुनते हैं, नौकरी की उम्मीदवारी लेकर घूमने फिरते हैं, दस से पाँच तक की भूत की बेगार की तरह जाने क्या करते रहते हैं, उसका कोई पता ठिकाना नहीं है। इस जादू के झूठे भारतवर्ष को ही हम सच मान बैठे हैं, इसलिए पच्चीस कोटि लोग झूठे मान को मान झूठे कर्म को कर्म समझ कर दिन रात पागलों से भटक रहे हैं। इस मरीचिका के भीतर से किसी भी कोशिश से क्या हम छुटकारा पा सकते हैं? इसीलिए हम रोज सूख सूख कर मरते जा रहे हैं। एक सच्चा भारतवर्ष है, परिपूर्ण भारतवर्ष उसी पर कायम हुए बिना हम लोग न बुद्धि से, न हृदय से सच्चा प्राणरस खींच सकेंगे। इसीलिए कहता हूँ और सब कुछ भूल कर खिताब की विद्या, किताब की माया, नोच खसोट के प्रलोभन-सबकी पुकार अनसुनी करके उसी बंदरगाह की ओर जहाज को ले जाना होगा, फिर डूब मरें तो मरें। यों ही मैं भारतवर्ष की सच्ची मूर्ति, पूर्ण मूर्ति को नहीं भूल सकता।''

पूरे उपन्यास में राष्ट्र के निर्माण में धर्म की भूमिका पर सर्वाधिक बहस है। क्योंकि किसी राष्ट्र में किसी विशेष धर्म के प्रति पक्षपातपूर्ण आग्रह फासीवादी रूप ले लेता है। उपन्यास के हर चरित्र किसी न किसी दृष्टिकोण के प्रतीक हैं। गोरा एक तरफ उत्साही हिन्दू नवयुवक है, तो वहीं दूसरी तरफ  आनंदमयी अपने अनुभव से ब्राह्मण परिवार से नाता रखने के बावजूद इस निष्कर्ष पर पहुँचती हैं- 'छोटे शिशु को छाती से लगाकर ही समझ में आता है कि दुनिया में जात लेकर कोई नहीं जन्मता''आनंदमयी इंसानियत के आगे धर्म, जाति और सम्प्रदाय को कोई महत्व नहीं देती। वह अपनी बात को सिर्फ  आस्था एवं विश्वास के सहारे ही नहीं वरन् तर्क से साबित करती हैं।

कृष्णदयाल बाबू अवसरवादी चरित्र हैं। पश्चिम में गोरों के साथ रहते हुए वे मांस-मदिरा सभी कुछ खाते पीते रहे। उन दिनों देश के पुजारी-पुरोहित, वैष्णव संन्यासी या इसी श्रेणी के लोगों से उलझकर उनका अपमान करने को भी वह पौरूष समझते थे। अब ऐसी कोई बात ही नहीं होगी, जिसे वह मानने को तैयार न हों। आनंदमयी के शब्दों में आजकल उनपर 'हिन्दूपन'' सवार है।

परेश बाबू ब्रह्म समाज द्वारा प्रसारित प्रगतिशील मूल्यों को अपने परिवार में लागू करते हैं, इंसानी विश्वास के प्रति झुकाव ज्यादा है, किंतु समाज का ध्यान आने पर कई बार द्वंद्व हावी। हरानचंद्र नाग अथवा हरान बाबू, गोरा के विरोधी चरित्र हैं, किंतु कथनी-करनी में लंबा फासला, हरान बाबू पर अंग्रेजियत हावी है- 'हमारे इतने कुसंस्कार एवं कुप्रथाएँ हैं कि हम अंग्रेजों से मिलने के योग्य ही नहीं हैं।

विनय और सुचरिता के क्रमश: दो प्रश्न क्या तुम्हारे निकट खूब स्पष्ट हैं?

1.गोरा तुमसे एक बात पूछता हूँ? भारतवर्ष धर्म के साथ देश का क्या संबंध है? इस उपन्यास में व्यक्त राष्ट्र की अवधारणा पर रोशनी डालते हैं।

गोरा इन दोनों ही प्रश्नों से जूझता है। गोरा पहले प्रश्न का जवाब आत्मलीन संन्यासी की भाँति देता है- ''जहाज का कप्तान जब समुद्र पार कर रहा हो, तब जैसे खाते-पीते, सोते जागते, सागर-पार के बंदरगाह पर उसका ध्यान रहता है, वैसे ही मैं भारतवर्ष का ध्यान रखता हूँ।'' गोरा पूरे उपन्यास में भारतवर्ष को खोजने की कोशिश करता है। गोरा के त्रिवेणी स्नान करने जाने का संकल्प का कारण यह था कि वहाँ अनेक तीर्थयात्री इक_ा होंगे, जिससे वह वास्तविक भारतवर्ष को समझ पाएगा। गोरा 'साधारण जनता के साथ घुल-मिलकर अपने को देश की एक बहुत बड़ी धारा में बहा देना और देश के हृदय की धड़कन को अपने हृदय में अनुभव करना चाहता है।

गोरा भारतवर्ष को महसूस करने के लिए ही देहात में जाता है। पढ़े-लिखे भद्र समाज और कलकत्ता के बाहर हमारा देश कैसा है, यह गोरा ने पहले-पहल देखा। वे गाँव अस्त-व्यस्त, संकीर्ण, दुर्बल, अपने मंगल के संबंध में अज्ञ और उदासीन थे। वह मुसलमान गाँव में भी जाता है। उस गाँव में एकमात्र हिन्दू बूढ़ा नाई , जो अपनी पत्नी के साथ मिलकर एक मुसलमान लड़के को पाल-पोस रहा था, ने गोरा को धार्मिक चौहद्दियों से निकलने का रास्ता सुझाया- ''ठाकुर हम लोग कहते हैं हरि, वे लोग कहते हैं अल्लाह, दोनों में कोई अंतर नहीं है।'' इसी समय अन्न-जल की तलाश में गोरा की अत्याचारी माध्व चटर्जी से भेंट होती है।

वह नापित और माधव चटर्जी के विषय में तुलनात्मक रूप से सोचता है और धर्म के बाह्याचार, दिखावे एवं शोषणवादी चरित्र की निंदा करता है- ''पवित्रता को बाहर की चीज़ बनाकर भारतवर्ष में हम कितना भयंकर अधर्म कर रहे हैं! जो आदमी जानबूझकर फसाद खड़ा करके उन मुसलमानों पर जुल्म कर रहा है, उसके घर में मेरी जाति बनी रहेगी और जो उस जुल्म को सहता हुआ मुसलमान के बच्चे की रक्षा कर रहा है और समाज की निन्दा सहने को तैयार है, उसके घर में मेरी जाति चली जाएगी?''

गोरा एक बार फिर देहात भ्रमण पर निकला, वह वहाँ घूमता रहता एवं कुम्हार, तेली-केवट आदि के मुहल्लों में भी आतिथ्य स्वीकार करता। यहाँ उसने देखा कि समाज के बंधन पढ़े-लिखे भद्र समाज से कहीं अधिक कड़े हैं। हर घर के खान-पान, उठने-बैठने और हर काम-काज पर समाज की अपलक आँखे मानों दिन-रात निगरानी रखती थीं। गोरा ने देखा 'यह समाज मनुष्य को जरूरत पडऩे पर सहायता नहीं देता था, विपत्ति आने पर सहारा नहीं देता था, केवल दण्ड देकर उसे नीचा दिखाकर विपन्न ही करता था। गोरा ने इन गाँवों मे दहेज प्रथा, विधवा विवाह का निषेध, बाल विवाह जैसी अनेक कुरीतियों को देखा, और भारतवर्ष की वास्तविक परेशानियों को समझा। यहाँ उसे राष्ट्र नामक ढोल की आवाज नकली लगने लगती है। गौरतलब है कि गोरा भारतवर्ष में शहरी-देहाती, शिक्षित-अशिक्षित, सवर्ण-अवर्ण सबको देखता है, इसलिए उसकी राष्ट्र की यह तस्वीर ज्यादा प्रामाणिक लगती है।

अब धर्म के साथ देश के संबंध पर बात करते हैं। ध्यान देने योग्य है कि 'राष्ट्रीयता' को धर्म के साथ जोडऩे के विचार का रवीन्द्रनाथ ने सबसे अधिक रचनात्मक विरोध किया है। गोरा भी ईश्वर को किसी विशेष खाँचे में बाँधकर नहीं देखता- ''दूसरे देशों में ईश्वर को कम या अधिक मात्रा में किसी एक विशेष में देखने की चेष्टा होती है अवश्य किन्तु भारतवर्ष उसी को एकमात्र और चरम नहीं कहता।'' आगे चलकर विनय भी धर्म के बारे में अपनी राय जाहिर करते हुए कहता है कि 'धर्म मनुष्य की व्यक्तिगत साधना की चीज है, उसे किसी समाज के साथ बाँधना उचित नहीं है।''

गोरा में धर्म की संकीर्णता का विरोध है, यहाँ धार्मिक विविधता का सम्मान हैं, जो कि राष्ट्र की प्रचलित परिकल्पना के विरूद्ध है। इसीलिए गोरा सुचरिता से कहता है कि 'आप केवल अपने ही दल के नियमों को सभी पर लागू करना चाहती हैं? आँखे बंद करके सोच लेना चाहती हैं कि मनुष्यों के बीच कोई वैचित्र्य नहीं हैं, कि सभी ने केवल ब्रह्म समाज की बही में नाम लिखाने के लिए ही संसार में जन्म लिया है? ...दूसरी जातियों की विशेषताएँ भी विश्व हित के लिए मूल्यवान हैं..।' किसी एक धर्म की महत्ता स्वीकार कर हम भारतवर्ष को एक-सा सपाट समतल बना देंगे, जो कि उसकी स्वाभविक अवस्था के ठीक विपरीत होगा। गोरा में धर्म दो मनुष्यों के विवाह में बाधक नहीं बनता है, क्योंकि परेश बाबू जैसे लोग इस स्तर तक सोचने में सक्षम हैं-  'तुम लोगों के मिलन में बाधा देने का कोई धर्मसंगत कारण नहीं है।'

गोरा में व्यक्त राष्ट्र धर्म की बजाय प्रेम की प्रधानता पर आधारित है। ललिता और विनय प्रेम के क्षणों में, अपनी बाहरी पहचान को भूल जाते हैं, क्योंकि वे किसी कृत्रिम बंध्न द्वारा नहीं बँधे हैं, बल्कि प्रेम की स्वाभाविक धारा में बह कर मिले हैं, इसीलिए दोनों की बातचीत का सार है- 'वे हिन्दू हैं या ब्राह्मण, इस सवाल को वे भूल गए, उनके मन में निष्कंप दीपशिखा-सी यही बात जलने लगी कि वे दोनों मानव आत्माएँ है।''          

इस उपन्यास में मनुष्यता के आगे सब कुछ बौना नजर आता है। यह मनुष्यता के धरातल पर ही देश को परिभाषित करता है, न कि धर्म या सम्प्रदाय के संकीर्ण धरातल पर। इसमें इसी के लिए संप्रदाय का विरोध है। परेश बाबू कहते हैं कि ''संप्रदाय ऐसी चीज़ है कि लोगों को यह जो सबसे सीधी बात है कि इंसान इंसान है, यही भुला देता है।''

गोरा में चित्रित राष्ट्र में स्त्री की दावेदारी भी है। यह उपन्यास इस प्रश्न पर भी विचार करता है कि स्त्रियों की इस राष्ट्र में क्या जगह हैं? और उनकी यह जगह उनको किस पहचान के कारण दी जा रही है?

विनय गोरा से कहता है कि 'हमारे स्वदेश प्रेम में एक बहुत बड़ा अधूरापन है। हमलोग भारतवर्ष को आधा ही करके देखते हैं।'          गोरा- 'वह कैसे?'

विनय- ''हम भारतवर्ष को केवल पुरूषों का देश मानकर देखते हैं, स्त्रियों को बिलकुल देखते ही नहीं।''

विनय आगे समझाता है कि हमारा भारतवर्ष तमाम छोटे-बड़े भेद के कारण ही कमजोर हुआ है। स्त्रियों को जनाना मानकर उन्हें ओछी नजरों से देखकर हमने अभी तक अपने ही राष्ट्र का नुकसान किया है, क्योंकि गोरा के शब्दों में- ''जैसे दिन और रात, समय के ये दो भाग हैं, वैसे ही पुरूष और नारी समाज के दो अंश हैं।''

ललिता, सुचरिता, लावण्या जैसी युवा स्त्री पात्र, स्त्री संभावनाओं के प्रतीक हैं। ये तर्क करती हैं, देश-दुनिया पर बहस करती हैं, प्रेम करती हैं, युवा लड़कों से बात करती हैं एवं समाज के बारे में सोचती हैं, तथा अपनी तरफ से उसके विकास में कुछ योगदान देना चाहती हैं। इन्हें भी पूरा विश्वास है कि स्त्रियों की उन्नति में ही राष्ट्र की स्वतंत्रता की राह में अड़ंगा डालने का प्रयास करती हैं। वे लड़कियों का छोटी उम्र में विवाह कर देना एवं उन्हेें घर से बाहर न निकलने देने को ही सच्चा मार्ग समझती हैं। हरिमोहनी लड़कियों द्वारा स्कूल खोलने की घटना पर सर पीट लेती हैं और कहती हैं कि 'बेटी हर मामले में तुमलोग ख्रिस्तानों की तरह हो जाओगी तो कैसे चलेगा? अच्छे घर की लड़कियाँ जाकर स्कूल में पढ़ाएँगी, यह तो आज तक कभी नहीं सुना।''किंतु इन युवा लड़कियों के पास हर तरह के अन्याय के प्रतिकार का उपाय है। ''ललिता के तर्क से हरिमोहनी ही नहीं उसके जैसी तमाम स्त्रिायों एवं पुरूषों की सोच को चुनौती मिलती है। वह कहती है कि ''लड़की होकर जन्म लिया है, इसीलिए क्या जीवन-भर मन मारकर घर में पड़ी-पड़ी कुढ़ती रहेंगी? दुनिया के किसी काम न आएँगी?''

इस उपन्यास में किसी राष्ट्र के लिए स्त्री की अनिवार्यता को स्पष्ट किया गया है। इसमें चित्रित स्त्री एक ऐसी स्त्री है जो शिक्षित है, नौकरी करना चाहती है, अपने पसंद की शादी करना चाहती है। वह राष्ट्र के अंदर अपने को इन रूपों में देखना चाहती है, न कि रूढिग़त अर्थों में। पुरूष वर्ग भी स्त्रियों की महत्ता से वाकिफ हो गया है- ''जब तक भारतवर्ष की नारी उसकी अनुभव गोचर नहीं हुई थी, तब तक उसकी भारतवर्ष की उपलब्धि कितनी अधूरी थी।

गोरा उपन्यास में व्यक्त राष्ट्र कमजोर वर्गो, निचली जातियों छुआछूत से त्रस्त व्यक्तियों को भी अपने अंदर ससम्मान शामिल करता है। जिस लद्दमनिया के हाथ से पानी पीने को गोरा अपने हिन्दूपन की चरम अवस्था में इनकार कर देता है, वही उपन्यास के अंत में जब अपनी खुद की असलियत से रूबरू होता है, एवं भारतवर्ष की खोज के दौरान प्राप्त अनुभवों से इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि मानवता ही शाश्वत संबंध है, तो अपनी माँ आनंदमयी से कहता है कि ''तुम्हारी जात नहीं है, तुम ऊंच-नीच का विचार नहीं करती, घृणा नहीं करती तुम केवल कल्याण की प्रतिमा हो। तुम मेरा भारतवर्ष हो! माँ-अब अपनी लद्दमनिया को बुलाओ - उसे कहो मुझे पानी पिला दे।''

दरअसल गोरा में व्यक्त 'राष्ट्र',  'सहमतिमूलक राष्ट्र'के करीब है। रवीन्द्रनाथ टैगोर के लिए भी भारत की परंपरा 'नस्लों के आपसी समायोजन' के लिए सक्रिय रहती है और 'नस्लों के बीच वास्तविक अंतर को स्वीकार करते हुए एकता का आधर तलाश करती है।' जिस तरह उपन्यास में ललिता कहती है कि 'सब चीजों को रस्सी से जबरदस्ती बाँध देना जंगललीपन है' उसी प्रकार रवीन्द्रनाथ का भी मानना है कि विभेदों का स्वीकार करने के जरिये एकता से ही वह समाधान हो सकता था जिसकी पेशकश भारत द्वारा दुनिया के सामने की जानी चाहिए। एक-दूसरे पर श्रेष्ठता हासिल करने वाली युक्तियों का सफाया जरूरी है।

'गोरा' उपन्यास में व्यक्त राष्ट्र 'समावेशी' है, इसमें स्वीकार की अकूत क्षमता है। गोरा, उपन्यास के अंतिम पृष्ठों में यह स्वीकार करता है कि 'मेरे भीतर हिन्दू, मुसलमान, ख्रिस्तान किसी समाज के प्रति कोई विरोध नहीं है। आज इस भारतवर्ष में सबकी जात मेरी जात है, सबका अन्न मेरा अन्न है।'' वह परेश बाबू से कहता है कि मैं अब बाहरी बंधनों से स्वतंत्र हूँ। और आपके पास मुक्ति मंत्र है ; यह राष्ट्र की संकीर्णता से भी मुक्ति है, आप मुझे अपना शिष्य बना लीजिए। आप आज मुझे उसी देवता का मंत्र दीजिए, जो हिन्दू मुसलमान, ख्रिस्तान-ब्रह्म सबका है, जिसके मंदिर का द्वार किसी जाति, किसी व्यक्ति के लिए कभी बंद नहीं होता - जो केवल हिंदू का देवता नहीं है, बल्कि सारे भारतवर्ष का देवता है।

गोरा का राष्ट्रवाद, संकीर्ण राष्ट्रवाद से मुक्ति दिलाने का प्रयास है। क्योंकि राष्ट्र का विचार बुरा नहीं है, उसकी अंधभक्ति कट्टरता, असहिष्णुता, श्रेष्ठता की भावना बुरी है। गाँधी जी का भी यही मानना था कि 'राष्ट्रवाद में कोई बुराई नहीं है, बुराई तो उस संकुचितता, स्वार्थवृत्ति और बहिष्कार वृत्ति में है, जो मौजूदा राष्ट्रों के मानस में जहर की तरह मिली हुई है।''

गोरा में व्यक्त राष्ट्र तथाकथित राष्ट्र के ढाँचे से अलग है, इतना अलग कि राष्ट्र कहने में ही मुश्किल होती है। इसमें पश्चिमी राष्ट्र का स्वीकार नहीं है क्योंकि रवीन्द्रनाथ टैगोर का मानना था कि 'राष्ट्रवाद हमारी अंतिम मंजिल नहीं हो सकता। मेरी शरणस्थली तो मानवता है, मैं हीरों की कीमत पर शीशा नहीं खरीदूँगा और जब तक मैं जीवित हूँ, देशभक्ति को मानवता पर कदापि विजयी नहीं होने दूँगा।'' टैगोर राष्ट्रवाद की बजाय बहुलतावाद के ज्यादा नजदीक थे। क्योंकि वे विभिन्न संस्कृतियों एवं समुदायों के अस्तित्व को बचाये रखना चाहते थे। यही बचाने का प्रयास गोरा में भी है। टैगोर वैचित्र्य को मानव समाज खासकर भारतवर्ष का अनिवार्य गुण मानते थे। उनके अनुसार 'विकास का अर्थ है ऐक्य के बीच पार्थक्य की वृद्धि। बीच में वैचित्र्य नहीं होता। कली में सारी पंखुडिय़ाँ एक होकर रहती हैं, जब उनमें भेद निर्माण होता है तभी फूल विकसित होता है।'

इस प्रकार गोरा में व्यक्त राष्ट्र भारत जैसे बहुलतावादी समाज को एक साथ लाने का प्रयास है, जिसका पैमाना सिर्फ  मानवता है। यहाँ मनुष्य को भेदोपभेद से परे जाकर सर्वोपरि देखने का उत्कट लालसा है जो वर्तमान संकटकालीन समय में और भी जरूरी एवं प्रासंगिक है।