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Tuesday 19 Jun 2018

साहित्यिक भाषा बनाम फिल्मी भाषा और बाज़ार का दबाव

साहित्य अपने आरंभिक काल से ही वर्ग विशेष तक सीमित रहा है। अधिकतर साहित्यकारों ने हमेशा ही अपने को आम जन से श्रेष्ठ और अलग समझा है। यह उनके साहित्य में आदिकाल से आज तक भी देखा जा सकता है। संभवत: किसी भी काल में साहित्य और जनता की भाषा-बोली एक नहीं रही है। यह उनका समाज में स्वयं को अन्य से श्रेष्ठ दिखाने का बौद्धिक दंभ भी हो सकता है। जब आम जन प्राकृत में बातचीत करते थे, तब साहित्यकारों की भाषा पालि रही। इसी प्रकार अपभ्रंश के समय साहित्यकार अपनी रचनाओं में प्राकृत भाषा का इस्तेमाल करते थे। भक्ति काल में कुछ संतों ने जनता की बोली में कहने का प्रयास किया था। मगर अफसोस! आधुनिक काल के कुछ आलोचकों द्वारा उनकी भाषा को सधुक्कड़ी, पँचमेल खिचड़ी, कहकर नकारने का प्रयास किया गया। छायावादी युग में तो कुछ साहित्यकार अपनी रचनाओं में आम जन के दुखदर्द और उनके सरोकारों से एकदम अलग हो गए थे। आज भी कुछ ही रचनाकार आम जन की बोलीबानी में साहित्य रचने का साहस भरा चुनौतीपूर्ण कार्य करते हैं। अधिकतर साहित्यकारों की भाषा आज भी आमजन की भाषा से कोसों दूर है।  सिनेमा का निर्माण प्रारम्भ से ही आम जनता को ध्यान में केन्द्रित कर के किया गया था। अत: इसकी भाषा साहित्य की अपेक्षा आम जन के अधिक निकट ठहरती है। माध्यम की विशेषता के कारण सिनेमा साहित्य की अपेक्षा जन में अधिक लोकप्रिय भी रहा है। इसका एक महत्वपूर्ण कारण दृश्यों के कारण स्वयं को प्रस्तुत करना भी है। ऐसा कोई भी व्यक्ति जो साहित्य नहीं पढ़ सकता, वह भी सिनेमा देख सुन सकता है। इसमें अपने ही जैसे व्यक्तियों को चलते-फिरते देखकर वह न सिर्फ चमत्कृत होता है बल्कि बहुत कुछ सीखता भी है। भाव और अभिनय के साथ बोले गए शब्दों के अर्थ को वह समझने का प्रयास करता है।

       साहित्य में अधिकतर पात्रों की भाषा-बोली को लेखक अपनी ही भाषा में कहता है। कहानियों और उपन्यासों में यह पद्धति विशेष रूप से पाई जाती है। इनमें तो लेखक ही सभी पात्रों के रूप में अपनी बात अपनी ही भाषा में कहता है। कुछ विशेष लेखक ही पात्रों के परिवेश के अनुकूल भाषा का वर्णन करते हैं। नाटकों में इसका मुख्य रूप से ध्यान रखा जाता है। इसके बरक्स सिनेमा में पात्रों की भाषा उनके परिवेश के अनुकूल तय की जाती है। साहित्य में लेखक अपने परिवेश से संबंधित ध्वनि भाषा का प्रयोग लिपि विशेष में करता है। इसके उल्टे सिनेमा की भाषा कैमरे की भाषा होती है, जो चित्रात्मक होती है। सिनेमा की भाषा किसी भी देश की भाषायी बाध्यताओं से परे है। साहित्यिक कृति शब्दाश्रित होती है। वहीं फिल्म एक चाक्षुष माध्यम है जहां वस्तु का सीधे साक्षात होता है। जिस प्रकार साहित्य में भाषागत शब्दों की शक्तियों का प्रयोग कर अभिधा, लक्षणा और व्यंजना में अपनी बात कही जाती है, ठीक उसी प्रकार सिनेमा में भी नृत्य, गीत-संगीत, ध्वनि प्रभाव आदि के द्वारा अपने कथ्य को दर्शकों तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता है। फिल्मों की भी अपनी भावपरक भाषा होती है। नृत्य तो पूरी तरह से भावाभिनय पर ही आधारित होते हैं। संगीत का फिल्मों की भाषा में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान है। इसकी महत्ता को देखकर ही फिल्मों में संगीत निर्देशक का अलग स्थान रखा गया है। कोई भी संवाद और दृश्य इससे जुड़कर ही अपने सम्पूर्ण प्रभाव को दर्शकों पर छोड़ता है। संगीत के अभाव में संवाद और दृश्य उसी प्रकार निष्प्रभावी रहेंगे, जैसे तबले के अभाव में कत्थक नृत्य। फिल्मों में वातावरण ध्वनि का महत्व मुख्यत: मानसिक अभिनय को दिखाने के लिए किया जाता है। किसी पात्र की बेचैनी, वियोग, इंतजार या मानसिक द्वंद्व के दृश्यों को दिखाने के लिए इस ध्वनि का प्रयोग किया जाता है। दीक्षा फिल्म में श्रीकर्ण के मानसिक द्वंद्व और उलझन को नगाड़े की ध्वनि द्वारा प्रकट किया गया है। इसी प्रकार दामुल फिल्म में जब कोर्ट से मुकदमा हारकर लौटती हुई रजुली नाव पर बैठी थी तो उस समय जो संगीत बजता है, वह उसके दुख, थकान और संघर्षपूर्ण जीवन के सम्पूर्ण बिंब को प्रकट करता है। यह संगीत रजुली के आशाविहीन और दुखभरे जीवन की कटु दास्तां प्रकट करता हुआ प्रतीत होता है। सिनेमा की एक विशेष और सशक्त भाषा प्रकाश माध्यम है। अधिकतर भ्रष्टाचार में संलिप्त अवैध काम, राजनीतिक षड्यंत्र  या काली कमाई को अंधेरे प्रकाश में दिखाया जाता है। दामुल फिल्म में बच्चा ठाकुर अपनी जाति के लोगों के बीच पंचायत चुनाव के बारे में जब राजनीतिक षड्यंत्र  की बात करता है तथा पिस्तौल बनाने की जगह का फिल्मांकन इसी प्रकाश में किया गया है। इसी प्रकार अश्लीलता से युक्त मादक नृत्य दिखाने वाले डांस बारों में प्राय: नीले रंग का संयोजन किया जाता है। कभी-कभी रात के दृश्यों को दिखने के लिए भी नीले रंग का प्रयोग किया जाता है। संजय लीला भंसाली की रणबीर कपूर और सोनम कपूर अभिनीत फिल्म सांवारिया में रात के सारे दृश्यों को नीले प्रकाश में ही दिखाया गया है।

बाजार का दबाव

फिल्म निर्माण प्रक्रिया साहित्य रचना की अपेक्षा कई गुणा अधिक खर्चीली और सामूहिक प्रक्रिया है। साहित्यकार जिस कहानी या उपन्यास को अकेले कहीं भी बैठकर कुछ दिनों या महीनों में लिख सकता है, उसी रचना पर फिल्म निर्माण के लिए निर्देशक को अधिक धन खर्च करना पड़ता है। लेखक एक जगह बैठकर ही कल्पना और यथार्थ के सम्मिश्रण से जिन दृश्यों का वर्णन रचना में करता है, उन्हीं दृश्यों के यथार्थ फिल्मांकन के लिए निर्देशक को उन जगहों पर जाकर शूटिंग करनी पड़ती है। साहित्यिक कृति को बाजार के अनुरूप बनाने की कड़ी में कभी वह यह भी भूल जाता है कि इस रचना के साथ कितने पाठकों की संवेदना जुड़ी हुई है। साहित्य और सिनेमा की पहुँच और उनके उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बाजार की दखलंदाजी को रेखांकित करती हुई हिंदी की प्रसिद्ध स्त्री लेखिका सुधा अरोड़ा कहती हैं-इसमें संदेह नहीं कि प्रिंट मीडिया और दृश्य मीडिया में से प्रिंट मीडिया की पहुँच एक सीमित शिक्षित वर्ग तक ही है जबकि दृश्य मीडिया सारी सीमाओं को लांघकर छोटे से छोटे गाँव कस्बे तक अपनी पहुँच बना चुका है। इस नाते बड़े परदे और छोटे परदे की जिम्मेदारियाँ बहुत बढ़ जाती हैं। पर फिल्म एक व्यावसायिक माध्यम है। दर्शकों का मनोरंजन और बॉक्स आफिस पर सफल होना, फिल्म अच्छा व्यवसाय कर पाए, यह इस माध्यम का पहला उद्देश्य है।

 एक लेखक के लिए साहित्य रचना स्वांत: सुखाय हो सकती है पर एक निर्माता-निर्देशक के लिए तो वह एक व्यवसाय ही है। उसे तो फिल्म में लगाया पैसा वृद्धि सहित वापस चाहिए। परंतु रचना की प्रसिद्धि को भुनाने के लिए निर्माता-निर्देशक रचना के फिल्म रूपांतरण के दौरान कुछ भी कर सकते हैं। यहाँ पर संजय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित देवदास के बारे में अपने विचार प्रकट करते हुए डॉ.सत्यदेव त्रिपाठी के विचार प्रासंगिक हैं-एक और महान रचनाकर शरत बाबू और लिजेंड बन गई उनकी अमर कृति देवदास के साथ संजय लीला भंसाली ने भी यही किया है। पूरा सीराजा ही बदल दिया है। अकूत धन कमाने की हविश ने चरित्र,परिवेश,कथा सब कुछ को ग्लैमर बनाने में बदल विकृत कर दिया है।

       फिल्म में कहानी की मूल संवेदना को उभारने के लिए यदि कोई परिवर्तन किया जाता है तो वह ग्राह्य हो सकता है। पर रचना के माध्यम से अधिकाधिक धन कमाने के लिए उसकी प्रसिद्धि को भुनाने के उद्देश्य से किया गया परिवर्तन स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। देवदास फिल्म में कथानक के साथ किए गए फेरबदल से सत्यदेव त्रिपाठी इतने खिन्न और दुखी हुए कि वे निर्देशक को नसीहतें देने से भी नहीं चूकते हैं- लेकिन आज को इस तरह बताना है, तो नई कहानी लिखवाओ। देवदास की छीछालेदर क्यों करते हो? लेकिन नहीं, उस रचना के नाम व जनमानस पर उसके प्रभाव का दोहन करना है। लोग उसी नाम से खिंचे आये। पैसा बनाने का मकसद पूरा हुआ। दुर्भाग्य है कि ऐसे धोखेबाजी से अपनी विरासतों को बचाने या ऐसा करने वालों को नसीहत देने का कोई कारगर प्रावधान हमारी व्यवस्था में नहीं है। जिस पारो-चन्द्रमुखी का कभी आमना-सामना नहीं हुआ, सिर्फ एक बार आते-जाते पालकी से नजर पड़ी थी, उन्हें मिलवा ही नहीं, सहेली बना दिया और दोनों से गाना गवा दिया। और फिल्म देखने की पूरी रात हमारी सर पे माधुरी और ऐश्वर्या का हथौड़ा चलता रहा, हाय मार डाला। और हम इस नंगे बाजार के सामने सर धुनते रहे।

       ऐसे रूपांतरणों पर जहां कि लालच में रचना के कथानक में ही फेरबदल कर दिया जाएए सत्यदेव त्रिपाठी जैसे सुधी पाठको और दर्शकों का आक्रोशित होना लाजिमी है। साहित्यिक कृतियों पर आधारित फिल्मों के रूपांतरण में बाजार के अतिरिक्त स्टारडम की दखलंदाजी विशेष रूप से होती है। यदि किसी कृति पर आधारित फिल्म में कोई प्रतिष्ठित नायक या नायिका काम करते हैं तो वे पटकथा लेखक पर दृश्य और संवाद को अपने व्यक्तित्व के अनुरूप गढऩे को मजबूर करते हैं। मुजफ्फर अली की जिस उमराव जान (1981) ने तब के सितारे नसीरुद्दीन शाह राज बब्बर और फारूक शेख के अभिनय से कई उपलब्धियों को प्राप्त कियाए वहीं जय प्रकाश दत्त की ऐश्वर्या राय, अभिषेक बच्चन और सुनील शे_ी जैसे सितारों की भीड़ वाली  उमराव जान (2006) बमुश्किल ही याद की जाती है।

 साहित्यिक फिल्मों के रूपांतरण पर बात करते हुए अजय ब्रहात्मज से पिंजर और मोहल्ला अस्सी जैसी साहित्यिक फिल्में देने वाले प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक चन्द्र प्रकाश द्विवेदी एक निर्देशक की मजबूरी बताते हुए कहते हैं- कुछ निर्देशक अपनी फिल्म को साहित्यिक स्तर पर ले जाना चाहते हैं। जिन्हें लगता है कि फिल्में भी सौन्दर्य की अनुभूति देती हैं। दक्षिण और बंगाल में ऐसी चेतना सक्रिय है और वहाँ के दर्शक उसे पसंद करते हैं। मेरा मानना है कि हर फिल्म का एक दर्शक होता है। फिल्म की लागत और उसके व्यवसाय का संतुलन तो रखना ही पड़ेगा। हरिश्चंद्राची फैक्ट्री के निर्देशक को कोई निर्माता नहीं मिल रहा था तो उसने अपना घर गिरवी रख दिया। वह अपनी फिल्म से अभिभूत था। अंत में उसे दर्शक, पुरस्कार, वितरक सब मिले।

 इस प्रकार हम देखते हैं कि माध्यम रूपांतरण की प्रक्रिया में बाज़ार का प्रभाव न केवल बाधा प्रकट करता है, बल्कि इसको बहुत स्तर तक अपने अनुसार चलाने को मजबूर करने का प्रयास भी करता है। इस परिस्थिति में एक साहित्य प्रेमी निर्देशक बाज़ार प्रेमी तथा धन लोलुप निर्माता के हाथ की कठपुतली मात्र रह जाता है। इस परिस्थिति में भी जो निर्माता साहित्यिक कृतियों पर पिल्म बनाने का प्रयास करता है, उसके जज्बे को सलाम करना चाहिए।