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Wednesday 15 Aug 2018

अमरकान्त की कहानी 'हत्यारे’ का समाजशास्त्रीय मूल्यांकन

अमरकान्त हिन्दी साहित्य के उन विशिष्ट रचनाकारों में आते हैं जो प्रेमचंद के बाद के साहित्यिक पीढ़ी से जुड़ी है। यहाँ तक की कुछ आलोचक अमरकान्त की कहानी कला को प्रेमचंद के आगे की कड़ी के रूप में देखते हैं और उन्हें प्रेमचंद का वारिस घोषित करते हैं।

यहाँ अमरकान्त की कहानी 'हत्यारे' का समाजशास्त्रीय मूल्यांकन करने की जरुरत इसलिए महसूस की गयी क्योंकि अपने प्रकाशन काल से लेकर अबतक के समाज के बहुत सारे आयामों को यह कहानी समेटे हुई है।

'हत्यारे' कहानी सन् 1962 ई- में प्रकाशित हुई। यह समय नेहरू युग के अवसान और उससे मोहभंग का संधिकाल है। साहित्य में यह समय नयी कहानी और कहानी के संधिकाल का भी समय है।

इस कहानी के समाजशास्त्रीय पद्धति से विश्लेषण करना मेरे लिए इस कारण उपयुक्त मालूम पड़ा क्योंकि यह कहानी जिस प्रकार विभिन्न मुद्दों और विषयों को यह अपने में समेटे हैं - उसमें यह पद्धति सहायक है। क्योंकि इससे हम रचना से समाज और समाज से रचना में सीधे बेरोक-टोक आवाजाही करते हैं। इस प्रकार यह दृष्टि कहानी के पाठक को एक बहुआयामी दृष्टिकोण मुहैया कराती है।

एक तरफ यह पद्धति विश्लेषण के लिए विषयों का टोटा खत्म कर देती है। तो इसके अंधाधुंध चलन और पुनरावृत्ति ने कई बार साहित्य को समाजशास्त्रीय व्याख्या तक सीमित कर दिया और साहित्य का मूल स्वरूप उपेक्षित रहा। इसलिए इस पद्धति को अपनाते हुए चेतन रूप से इस बिन्दु को हमेशा ध्यान में रखने का प्रयास किया गया है कि अन्तत: मूल्यांकन के केन्द्र में एक साहित्यिक कृति ही है।

'हत्यारे' कहानी दो दिग्भ्रमित नौजवानों की कहानी है। जो अपने भाषा के माध्यम से बहुत सारे तत्कालीन आदर्शों की धज्जी उड़ाते हैं और अंतत: शराब के नशे में वेश्यालय जाते हैं और बिना पैसा दिए भागने लगते हैं और बीच आये एक युवक की बड़ी आसानी से हत्या कर देते हैं। बस इतना ही है कहानी का मूल मंतव्य। परन्तु विश्लेषण करने पर कहानी अपने भीतर कई तत्कालीन आदर्शों और उनसे मोहभंग की वास्तविक स्थिति को सामने लाती है।

वस्तुत: यह कहानी उस काल के गर्भ में पली हुयी है जब दुष्यन्त कुमार का सपना था - 'कहाँ तो तय था चिराग हर एक घर के लिए' परन्तु वास्तविकता यह रही 'कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिएÓ। यह स्थिति हमें तब देखने को मिलती है जब लेखक एक गरीब महिला के घर का वर्णन करते हुए लिखता है - 'इस बीच बरामदे के ताक पर रखी ढिबरी की रोशनी किसी बीमार की फीकी मुस्कराहट की तरह टिमटिमाती रही।Ó1 इसी सपने के टूटने से समाज में जो विकृति पैदा हुई यह कहानी उसी विकृति को बेबाकी से प्रस्तुत करती है। तथाकथित सभ्य समाज के बदले हुए दोगले रूप का बड़े ही सामान्य ढंग से वर्णन है यहाँ जहाँ - संवेदनहीनता, अवसाद ग्रस्तता, दुस्साहस और वे सभी तत्त्व हैं जो मानव संस्कृति के 'हत्यारे' की भूमिका में हैं और इसी वातावरण की पैदाइश हैं 'हत्यारे' कहानी के ये दो युवक जिसमें एक 'गोरा' है और दूसरा 'साँवला'।

हत्यारों की गैर जिम्मेदारी और मूल्यांधता इस तर्कहीन और असंगत समाज की परिणति है। 'हत्यारे' के युवकों की स्थिति ऐसी है मानो गैर जिम्मेदारी का उन्हें नशा है। जिस समाज में श्रम और फल में इतना असमान वितरण और असंगत सम्बन्ध हो वहाँ सभी क्षेत्रों में अनुचित सम्बन्ध स्थापित हो जाना स्वाभाविक है। हत्यारे क्रूर नहीं है। सुसंगत समाज में वे क्या हो सकते हैं और असंगत समाज में वे क्या हो गए है। इस प्रभाव का आघात पाठक के मन पर जरूर पड़ता है समाज के विषैलेपन ने उन्हें विषैला बना दिया है। उनके विषैलेपन की अपेक्षा अधिक घातक उस सामाजिक विषमता का संताप कहीं ज्यादा उभरता है जिसने इन युवकों को उतना घृणित, कायर और दयनीय बना रखा है जितना कि ये सुन्दर और बलिष्ठ है। अन्त में भागते वक्त जिस रोशनी ने इनके ताकतवर और सुन्दर शरीर से कायरता और घृणित स्वरूप को उभार दिया है। वस्तुत: उस रोशनी की जरूरत हमें ऐसे हत्यारों को पहचानने के लिए है।

यही कारण है कि लम्बे समय के बाद भी इस कहानी के नौजवान युवकों के नायकत्व और खलनायकत्व को लेकर विवाद है, क्योंकि कहानी के केन्द्र में सिर्फ यही दो युवक हैं। इनकी उपस्थिति नायक जैसी है जो अपने कृत्यों द्वारा खलनायकत्व को प्राप्त करते है। फिलहाल इतना तो स्पष्ट है कि सामाजिक असंगति और उसके दुमुँहेपन की उत्पत्ति है ये युवक।

इस असंगति का ही परिणाम है कि यहाँ सबकुछ असंगत है - जिसमें प्रमुख है इनकी भाषा की असंगतता। हत्यारे कहानी में प्रयुक्त विभिन्न शब्द केवल अपने परम्परागत अर्थों में ही प्रस्तुत नहीं हुए है। बल्कि शब्दों का सात्विक अर्थ यहाँ खो गया है और इसी कारण इसके अर्थ किसी शब्दकोष में नहीं बल्कि उन सन्दर्भों से खुलता है जिनमें ये प्रयोग हुए हैं। कुछ द्रष्टव्य पंक्ति निम्नवत् जब युवक वेश्यालय के लिए जाते हैं। तो कहते हैं - 'आज कुछ रचनात्मक कार्य होने चाहिए और साँवले का परिचय कराते हुए गोरा कहता है आज तुम्हारे सेवा में विश्व के महान नेता को लाया हूँ। ये अखिल विश्व लोफर संघ के अध्यक्ष है।'2

उल्लेखनीय है कि यहाँ 'सेवा' शब्द का अर्थ बिल्कुल बदल गया है। इसी प्रकार 'विश्व के महान नेता' प्रयोग शब्दों के वास्तविक अर्थ के महत्त्व को समाप्त करता प्रतीत होता है तथा कहानी में व्यंग्य का निर्माण करता है। इसी प्रकार संस्कृत शब्द 'संघ' यहाँ बहुत हल्के ढंग से निर्थरक रूप में प्रयुक्त हुआ है। विशेष प्रभाव और नया अर्थ देने के लिए शब्दों के अर्थ और प्रयोग बिल्कुल बदल गए हैं।

इतना ही नहीं नेहरू युग के आदर्शों यथा विश्वशान्ति, सत्य-अहिंसा, रचनात्मक कार्य, नैतिक स्तर, महान कार्यकर्ता, मौलिकता, बुद्धिमानी, कर्मठता, सामाजिक और आर्थिक क्रान्ति आदि सभी शब्दों का प्रयोग ये युवक अपने हिसाब से करते हैं जहाँ ये शब्द अपने उदात्तता को खोकर निकृष्टता के सूचक हो जाते हैं।

एक कार्यक्रम में मार्तण्ड प्रगल्भ ने बोलते हुए इस बात का जिक्र किया कि ध्यान दें जो नेहरूवियन आदर्शवाद था उसकी खोल के भीतर से जो फासिज्म पैदा हो रहा है, यूथ के बीच में वह उसी आदर्श की भाषा में ही पैदा हो रहा है। फासिज्म की विशेषता यही है वह आती है हमारी ही भाषा में। सामाजिक-आर्थिक क्रान्ति की भाषा में ही - लेकिन यह रूपवाद है। उसकी वस्तु फासिज्म है। आदर्श के उस रूपवाद का यथार्थ फासीवाद है और इसी फांसीवादी 'टेन्डेन्सी' की कहानी है - 'हत्यारे'।

'हत्यारे' कहानी के पात्र अनेक बड़े-बड़े शब्दों के प्रयोग द्वारा समााजिक क्रान्ति लाना चाहते हैं। हम देखते हैं कि शब्दों के अर्थों की इसी विकृति को लक्षित करते हुए विजयमोहन सिंह ने लिखा है कि 'उनकी (हत्यारों की) भाषा आजादी के बाद के मुहावरों और नारों की भाषा है - यहाँ वही भाषा है जो हर चौराहे तथा मंच से वायुमण्डल में फैलायी जा रही थी और अचानक ये भाषा अपराधियों और हत्यारों की भाषा हो जाती है। कहानी के चरित्रों को दरकिनार कर दें तब भी व्यापक अर्थ में यह एक हत्यारिणी भाषा सिद्ध होती है जो अपने खोखलेपन के कारण केवल इस्तेमाल के लिए बचती है।'3

विजयमोहन सिंह जी के मंतव्य को तब आप चरितार्थ होते हुए आसानी से देख सकते हैं जब आज संसद से लेकर सड़क तक आधुनिक मुहावरे लोकतंत्र, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता की बहस में लगे हुए लोग अपने जीवन में इन तत्त्वों से बहुत दूर है। यही वे हत्यारे हैं जो हर युग के अनुसार स्वयं को ढाल लेते हैं। यही कारण है कि अमरकान्त लिखते हैं कि युवक भागते हुए कभी दायें कभी बायें हो रहे थे और दरियाई घोड़े की तरह भागे जा रहे थे। ये दाएं-बांये होना इनके अवसरवादी होने का सूचक है जो जरूरत के अनुसार स्वयं का बाना बदल लेते हैं। भेष के साथ भाषा भी बदल लेना इनकी फितरत है और इन्हीं की शिनाख्त करती है अमरकान्त की कहानी - 'हत्यारे'।

जिसे बाद में धूमिल पहचान कर कहते हैं -

हत्यारा! हत्यारा! हत्यारा!

तुम चाहे जिसे चुनो      

पर इसे नहीं।

इसे बदलो।

वस्तुत: अपने मूल चरित्र पर बड़े-बड़े लबादे ओढ़ कर तथाकथित आर्थिक और सामाजिक क्रान्ति करने वाला पूरा एक वर्ग हत्यारा है। जो अपने को महान कहता है और महानता के भद्दे आवरण के भीतर बलात्कार और हत्या किया करता है - जिसके शोषण के केन्द्र में आज भी कोई सम्पन्न एवं प्रभुतावादी वर्ग नहीं बल्कि झोपड़पट्टी में अपनी दयनीय दशा को अपनी नियति मान चुका सर्वहारा वर्ग ही है।

कहानी का अन्त करते हुए लेखक लिखता है कि - 'फिर वे न मालूम अंधेरे में किधर खो गए।'4 बहुत संभव है कि यही नवयुवक अपने अनुकूल व्यवस्था से उर्वरक लेकर ही मुक्तिबोध के यहाँ 'अंधेरे में' डोमाजी उस्ताद बनकर उभर रहे हैं।   

कहानी को पढऩे से युवकों की भाषा ही मुख्य आकर्षण पैदा करती है आज इस कहानी के लिखे पाँच दशक बीत गये हैं। आज इस तरह के हिंग्लिश भाषा का प्रयोग आम हो गया है परन्तु 70 के दशक के युवकों से ऐसी भाषा अगर बुलवायी गयी है तो शायद ये युवक अभिजात्य वर्ग के रहे हो। फिर कुछ आलोचकों ने ये संभावना व्यक्त की है कि 'गोरा' अभिजात्य संस्कृति का प्रतीक है। जबकि साँवला उसका 'चेला' है जो तथाकथित निम्न जाति का मालूम पड़ता है। क्योंकि गोरा हमेशा प्रभावी दिखता है। एक बार गोरा कहता भी है - 'तुमको सेक्रेटिएट का भंगी बनाऊंगा।' इसके अतिरिक्त साँवला अभी सीख रहा है- शराब पीना, औरत के पास अभी गया नहीं है। इस प्रकार हम देखते हैं कि अभिजात्य संस्कृति ने अपने प्रभाव क्षेत्र को अनभिजात्य संस्कृति तक फैलाया है और अनभिजात्यों ने इस साजिश को समझा नहीं बल्कि स्वागत किया है।

मेरी दृष्टि में हत्यारे कहानी के नवयुवक पढ़े-लिखे वे नौजवान है। जिनकी दमित इच्छाएँ उनकी भाषा के माध्यम से बाहर आती है। वे उस भाषा का प्रयोग करते हैं जो तत्कालीन समय के राजनेताओं और व्यवस्था संचालकों की भाषा थी। ये युवक व्यवस्था के हाशिए पर रहने के कारण अवसाद ग्रस्तता के शिकार है और बड़बोलेपन के कारण इनकी भाषा और व्यवहार में व्यापक असंगति है। इस दृष्टि से इस कहानी को 'विसंगति बोध की कहानीÓ कह सकते हैं। कहानी में झोपड़पट्टी में रहने वाली स्त्री एक तरफ जहाँ अपने हिस्से का अधिकार और सम्मान पाने से वंचित कर दी गयी है। वहीं दूसरी तरफ उसके साथ सेक्स करने के पश्चात् ये नवयुवक भाग जाते हैं। यहाँ दोहरी हत्या होती है उसकी एक तो लोकतंत्र और व्यवस्था के रखवालों के द्वारा, दूसरे इस व्यवस्था द्वारा पैदा किए गए अमानुषिक मानसिकता वाले नरपशुओं द्वारा।

कहानी में नेहरू कैबिनेट पर नेहरू का अविश्वास, प्रो- दीक्षित द्वारा छात्रों के शोषण के साथ तत्कालीन समय के शीतयुद्ध जैसे गम्भीर मुद्दों पर भी बहस है लेकिन भाषा ऐसी है कि प्रथम दृष्ट्या तो पाठक के ओठ पर मुस्कान तैर जाए। लेकिन तुरन्त ही मन सोचने पर भी विवश हो जाए। यहाँ इस कहानी को पढ़ते हुए एक प्रश्न मन में अवश्य आता है कि अमरकान्त ने गोरे और साँवले के माध्यम से पूरे समाज के नौजवानों के मानसिकता को उद्घाटित करने का प्रयास तो किया है। जिसमें अभिजात्य और अनभिजात्य दोनों वर्गों को चुना है। परन्तु क्या यह नहीं खटकता कि पूरे कहानी में कोई युवा अपने नागरिकता और सामाजिकता को लेकर, अपने कर्तव्य और जिम्मेदारी को लेकर सचेत नहीं है। क्या उस दौर की पूरी युवा पीढ़ी दिग्भ्रमित है और यदि ऐसा है तो आजादी के लड़ाई में युवा कहाँ से आये थे या फिर आजादी के बाद जे-पी- आन्दोलन में शामिल युवाओं की चेतना कहाँ से आयी या फिर बाद में यदि आज के युवाओं के संदर्भ में देखें तो- अन्ना आंदोलन, दामिनी आंदोलन के दौरान युवाओं के गुस्से उनके चेतन होने के प्रमाण है जो अमरकान्त के कहानी में अनुपस्थित है। हाँ यह बात स्वीकार की जानी चाहिए कि एक वर्ग के रूप में शोषणकारी तत्त्वों ने उभार लिया है और उसमें शोषणकारी मानसिकता के विभिन्न वर्गों के लोग चाहे वह गोरा हो या साँवला साथ-साथ है- जो तब से आज तक समाज के एक वर्ग की हत्या में लिप्त है और इनके द्वारा की गयी हत्या कोई चीख पुकार नहीं पैदा करती क्योंकि यह हत्या किसी व्यक्ति की नहीं बल्कि यह हत्या है हमारे मूल्यों की, सम्पूर्ण मानवीय विवेक, निर्णय क्षमता और जीवन मूल्यों की। और इन्हें पैदा करने वाली शरण देने वाली व्यवस्था ही वास्तविक हत्यारी और खलनायक है। जिसने बहुत बड़ा हत्यारों का समूह खड़ा कर लिया है जिसे उद्घाटित करती हुई धूमिल की एक कविता है - 'हत्यारे एक दम सामने नहीं आते'।  

ऐसा लगता है कि यह कहानी और कविता दोनों एक दूसरे के पूरक है। जिसने हत्यारों के इस रूप को पहचाना है -

हत्यारे एक दम, सामने नहीं आते

वह पुराना तरीका है आदमी को मारने का अब एक समूह का शिकार करना है----

हत्यारे एक दम सामने नहीं आते

उनके पास है कई-कई चेहरे

कितने ही अनुचर और बोलियाँ

एक से एक आधुनिक और निरापद तरीके

ज्यादातर वे हथियार की जगह

तुम्हें विचार से मारते हैं

वे तुम्हारे भीतर एक दुभाषिया पैदा कर देते हैं 

 

सन्दर्भ ग्रन्थ

1-     अमरकांत एक मूल्यांकन, सम्पादक - रविन्द्र कालिया, सामयिक बुक्स, प्रथम संस्करण - 2012, पृष्ठ 84

2-     वही, पृष्ठ 83

3-     अमरकांत के कहानियों के प्रमुख चरित्र, आभा शर्मा, संजय प्रकाशन, प्रथम संस्करण - 2006, पृष्ठ 185

4-     अमरकांत एक मूल्यांकन, सम्पादक - रविन्द्र कालिया, सामयिक बुक्स, प्रथम संस्करण - 2012, पृष्ठ 83