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Thursday 19 Apr 2018

आधुनिक हिन्दी नाटक और लोकतत्व

लोकतत्त्व का अनेक रूपों में प्रयोग हुआ और नाटकों में इससे नया उल्लास एवं नया जीवन संचरित हुआ। लोकगीतों, लोकगाथाओं, लोककथाओं, लोकनाटकों एवं लोकसुभाषितों में जन-जीवन का दर्पण झलकता है, इसलिए वर्तमान समय में भी लोकतत्त्व के महत्त्व को कैसे नकारा जा सकता है, पारम्परिक संस्कार तो यहाँ की मिट्टी के कण-कण में विद्यमान हैं। ''यद्यपि नई सभ्यता और शिक्षा को चकाचौंध के कारण हमारी प्राचीन धारणाओं और विश्वासों में परिवर्तन होने लगा है, परन्तु लोकसंस्कृति सरिता आज भी अपनी अक्षुण्ण गति से प्रवाहित हो रही है। ग्रामीण स्त्रियाँ आज भी उसी प्रकार व्रत रखती हैं और अपनी अभिष्ट कामनाओं की सिद्धि के लिए देवताओं की पूजा करती हैं जिस प्रकार से प्राचीन काल में की जाती थी। पुरुष वर्ग भी अपनी धार्मिक भावनाओं और विधि-विधानों को संजोकर थाती के समान सुरक्षित रखे हुए हैं। यही कारण है कि भारतवर्ष में अनेक राजनीतिक उथल-पुथल हुए, अनेक क्रान्तियाँ हुई परन्तु हमारी धार्मिक विचारधारा में कुछ परिवर्तन नहीं हुआ। फलत: लोक साहित्य में जनता के धार्मिक जीवन का सजीव चित्र अंकित किया जाता है।''1

वर्तमान हिन्दी नाटकों की सर्वाधिक प्रयोगोन्मुख और संभावनापूर्ण दिशा अपनी पारंपरिक रूढिय़ों, विशेषकर लोकनाट्य परम्पराओं और उनके विभिन्न रूप की खोज है। पाश्चात्य नाट्य शैली एवं शिल्प के साथ ही विविध नाट्य रूपों की अस्थिरता एवं समस्त रंगमंचीय ताम-झााम से विरक्त होकर जब हिन्दी नाटकाकर अपनी नयी रंगमंचीय दृष्टि के साथ लोकजीवन के निकट आए, तो सबसे पहले उन्हें नाटक की संरचना के बाहरी आवरणों, पश्चिमी प्रभाव और यूरोपीय मानदण्डों के प्रभाव से मुक्त होना पड़ा। यही कारण है कि हिन्दी नाट्यलेखन में एक नई दिशा एवं नयी प्रवृत्ति की शरूआत हुई। इस नयी रचनात्मक प्रवृत्ति और रंगमंचीय संभावनाओं के साथ अनेक नाटककार सामने आए, जिनमें अपनी लोक परम्पराओं से जुडऩे का एहसास है, लोकगंध को महकाने की क्षमता है और लोकजीवन में लोकतत्त्वों की खोज का सार्थक प्रयास भी। यानी इन नाटककारों की नाट्यरचनाएँ लोकनाट्याश्रित हैं अथवा किसी न किसी रूप में उससे सम्बद्ध हैं। लोकनाट्य रूपों से विभिन्न प्रकार के प्रभाव ग्रहण कर आधुनिक हिन्दी नाटककारों ने अपनी नाटकों में नयी प्रयोगात्मक प्रवृत्ति का विकास किया है और नये नाट्य रूपों की संभावनाओं से साक्षात्कार कर लोकजीवन से जुडऩे का प्रयास भी किया है। गिरीश रस्तोगी के शब्दों में, ''हिन्दी के नए नाटक की सबसे अधिक संभावनापूर्ण दिशा है अपनी परंपराओं और लोकनाट्य रूपों की खोज। नए-नए प्रसंगों, पश्चिमी नाट्य रूपों और बौद्धिकता से ऊबकर जब हिन्दी रंगमंच ने जन-जीवन के निकट जाना चाहा तो अपने को बाहरी आवरणों और विदेशी मानदण्डों से मुक्त करना चाहा तो नाट्य लेखन में एक नवीन दिशा का आरम्भ हुआ। हिन्दी के पास संस्कृत और लेकमंच की लम्बी परम्पराओं का अथाह धन है।''2

वर्तमान समय में नाटककारों ने लोकतत्त्व को नये अर्थ में अपना कर एवं नवीन दृष्टि से परखकर लोक साहित्य एवं आधुनिक साहित्य को भी एक नवीन दृष्टि प्रदान की है। पौराणिक कथाओं, लोक कथाओं, मिथक एवं इतिहास के चरित्रों को नये अर्थ दिये जा रहे हैं। नए परिवेश, द्वन्द्व, संघर्ष, तनाव, समस्याओं को नाटककार अपने लोकजीवन में ढूँढने का प्रयास कर रहे हैं।

मणि मधुकर समसामयिक नाटककारों में प्रयोगशील और संभावनापूर्ण नाटककार हैं। लोकतत्त्व को आधार बनाकर 'ख्याल' जैसे नाट्य रूप और शिल्प का आधुनिक जीवन की विसंगतियों को उभारने के लिए मणि मधुकर ने जैसा प्रयोग कर दिखाया है, उसमें में सबसे अलग दिखाई देते हैं। मणि मधुकर को जन-सामान्य का नाटककार कहा जा सकता है। नाटक और रंगमंच दोनों के स्तर पर अपनी धरती की गन्ध और पारम्परिक नाट्य रूपों को नये सन्दर्भ में आधुनिक चेतना के साथ देखने-समझने और प्रयोग में लाने की रचनात्मक कोशिश मणि मधुकर से शुरू हुई इसलिए ''हिन्दी नाट्यलेखन की दिशा बदलने में और हिन्दी रंगमंच को बदले हुए रूप से अधिक विकसित, कल्पनाशील, व्यापक और उन्मुक्त बनाने में, उसे 'नयेपन' और लोक-जीवन, लोकरूपों की गन्ध और लय देने में मणि मधुकर का नाटककार और निर्देशक दोनों रूप ही महत्त्वपूर्ण हैं।3

मणि मधुकर ने अपनी नाट्यरचनाओं में उन्मुक्त वातावरण, लोक-परम्पराओं, लोक-जीवन की सहजता, सरसता तथा लोकनाट्य रूपों से सम्बद्ध नाटक दिए। उन्होंने लोकनाट्य रूपों की सहजता, लचीलापन, संगीतात्मकता को अपने नाटकों में सम्मिलित कर हिन्दी नाट्य जगत के सम्मुख अपनी विशेष पहचान रखी।

''रसगन्धर्व'' बोलचाल की भाषा में लिखा गया नाटक है, जिसमें साहित्यिक भाषा एवं लोकभाषा का प्रभावपूर्ण मिश्रित प्रयोग किया गया है। इस सम्बन्ध में श्री जयदेव तनेजा ने लिखा है कि ''रसगन्धर्व की बाजारू-गंवारू यानि नंगी तथा बेहूदी-गंदी क्रियाएँ, मुद्राएँ और उसके ठीक बाद लेखक के संवाद में छायावादी, सुसंस्कृत एवं कृत्रिम काव्यात्मक भाषा का प्रयोग नाटककार की प्रखर रंग-दृष्टि का प्रत्यक्ष प्रमाण है। गीतों में लोकभाषा के शब्दों की भरमार मणि मधुकर की नाट्य-भाषा के एक ओर आम भाषा की ओर संकेत करती है।4 ''रसगन्धर्व'' लोक प्रचलित कथा को लेकर लिखा गया नाटक है।

खेला पोलमपुर - वस्तु एवं शिल्प की दृष्टि से लोकधर्मी नाट्य-परम्परा से प्रभावित एवं लोकनाट्य परम्परा को एक नया रूप देते हुए मणि मधुकर का नाटक 'खेला पोलमपुर' सामने आता है। ''यह नाटक लोकधर्मी कथा-शिल्प और सुरंध्यानी ख्याल से समन्वित विधान के कारण अनूठा प्रयोग बन गया है।''5 इस नाटक में भी लोकनाट्य की रूढिय़ों, कथा-गायन के रस और लोक कथाओं का संयोजन कर वर्तमान समाज और राजनीति की विसंगतियों पर चोट करने की चेष्ठा की गई है।

शंकर शेष आधुनिक हिन्दी नाट्य दृष्टि के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उन्होंने नाटकों का केवल सृजन ही नहीं किया बल्कि नाटकों को हर तरह से प्रतिष्ठित करने का प्रयास भी किया। नाट्यलेखन, निर्देशन तथा मंचन आदि सभी क्षेत्रों में उनका योगदान रहा है। नाटकार के रूप में शंकर शेष ने हिन्दी साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण स्थान बनाया है। उन्होंने अब तक जो नाटक लिखे हैं उन्हीं से उनके उच्चस्तरीय नाट्य कौशल का प्रमाण मिलता है। मंचीय विधान के प्रति अतिरिक्त सतर्कता न दिखाकर वे नाटकों की संरचना में ही नाट्य-गुण उत्पन्न करने में दक्ष हैं। बहुत सादगी से नाट्य वातावरण बनाकर वे अपनी कला को उच्च स्तर पर प्रतिष्ठित करते हैं।

डॉ. शंकर शेष का नाट्य शिल्प जहाँ तक परम्परागत भारतीय नाट्य शिल्प के साथ अनुस्यूत हैं, वहाँ उन्होंने आधुनिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर उसे सर्वथा नया स्वरूप, नया आयाम और नया रंग भी प्रदान कर दिया है। उनका नाट्य-शिल्प आधुनिक रंगबोधों से संयत एवं आप्लावित है।''6 शंकर शेष के नाटकों में लोकतत्त्वों का प्रयोग निम्नलिखित रूपों में हुआ है -

पोस्टर - नाटककार शंकर शेष का महाराष्ट्र कीर्तन शैली का आधार ग्रहण करने की कोशिश है - पोस्टर अर्थात पोस्टर महाराष्ट्र की कीर्तन शैली में लिखा गया लोकनाट्य है। नाटककार ने महाराष्ट्र की कीर्तन शैली में आदिम जाति के लोगों पर, जमींदारों तथा वन के अधिकारी द्वारा होने वाले अत्याचार का चित्रण किया है। इस नाटक में पटेल कभी धर्म, कभी अर्थ, कभी अपने स्वामित्व को ढाल बना अपनी शोषक वृत्ति को बनाये रख मजदूरों की अस्मिता को लील रहा है। नाटक में कीर्तनकार एक जमींदार पटेल द्वारा मजदूरों पर किये गये अत्याचार की कथा सुनाता है। नाटककार ने कीर्तनकार के माध्यम से महाभारत के पहले दिन की कथा सुनाई है। नाटककार स्पष्ट करता है कि हमें सदैव अन्याय, अत्याचार का विरोध करना चाहिए। यदि हम अन्याय, अत्याचार का विरोध नहीं करते तो हम पर होने वाले अन्याय, अत्याचार बढ़ते ही जाते हैं।

अरे! मायावी सरोवर - 'अरे! मायावी सरोवर' शंकर शेष का एक प्रयोगशील नाटक है। अपने अन्य नाटकों से भिन्न, प्रस्तुत नाटक में नाटककार ने वस्तु और नाट्य-शिल्प दोनों स्तर पर प्रयोग किया है। परम्परागत नाट्य-रचना से अलग कुछ नवीनता को लेकर नये नाटक के प्रभाव में यह नाटक एक विशेष रचना बन गया है। अरे! मायावी सरोवर' का परिवेश और कथानक तो पौराणिक है लेकिन विसंगत नाटक के रूप में रचते हुए नाटककार इसमें विशेष सफलता प्राप्त नहीं कर सका है और इस प्रयास में नाटक के मूल कथानक से भी नाटककार का ध्यान हट गया है। नाटक में राजा-रानी की पुरानी कथा द्वारा नाटककार के नौटंकी की लोकनाट्य शैली में पुरुष जीवन के अधूरेपन और नारी के वैविध्यपूर्ण जीवन को उद्घाटित किया है।

रक्तबीज - रक्तबीज का प्रसंग पुराणों में आया है जिसके आधार पर नाटककार ने केवल अपने नाटक का नाम भर रखा है। रक्तबीज नामक राक्षस कभी नहीं मरता है क्योंकि उसे वरदान प्राप्त था कि यदि उसकी हत्या होती है तो उसके रक्त की बूँदों से हजारों रक्तबीजों का जन्म होगा। नाटककार ने रक्तबीज की इस कथा के संकेत द्वारा दो घटना-स्थितियों को सामने रखकर मानवीय शोषण को नाटक के रूप में प्रस्तुत किया है।

सर्वेश्वरजी ने अनेक नाट्य प्रस्तुतियों के लम्बे समय तक धैर्यवान प्रेक्षक बनकर यह अनुभव ज्ञान प्राप्त कर लिया था कि हिन्दी नाटक के सर्वाधिक सृजनात्मक संभावना को लोकनाट्य शैली के सार्थक प्रयोग से ही सामने लाया जा सकता है। नए नाटककार को अपनी नाट्य-परंपराओं, रंग-पद्धतियों, प्रविधियों के साथ पूरे मन से जुडऩा चाहिए। पश्चिमी रंग-परम्पराओं में प्रयोग तो हो सकते हैं लेकिन उन प्रयोगों में लोकमन का जुड़ाव रचना नहीं हो सकता। नाटक अपनी भूमि पर ही पनपता है, उसकी पूरी चेतना शक्ति सक्रिय रहती है। सर्वेश्वरजी ने इस दृष्टि से अपने नाटकों को पश्चिमी प्रयोगचक्र में नहीं पडऩे दिया। खूब सोच-समझकर उन्होंने भारतीय रंगमंच की नोकनाट्य शैली वाली जड़ों से अपना नाता जोड़ा। यह नाता उन्हें रामलीला, कृष्णलीला, स्वांग-प्रहसन, नौटंकी की लोकरंग-परम्परा से मिला था। यह संस्कार इतना प्रबल था कि पश्चिमी रंगमंच की स्थितियों के विरूद्ध विद्रोह करके उन्होंने लोकनाट्य शैली में अपने नाटकों का सृजन किया। प्रमुख बात यह है कि सर्वेश्वर के पास हिन्दी प्रदेशों की लोकरंग-परम्परा का नाट्य स्वभाव है। उनके नाटकों में लोकशैली आम-आदमी के दु:ख-दर्द को उजागर करती है।

बकरी - जब हिन्दी नाटक विशेष प्रकार की बौद्धिकता तक सीमित होकर रह गया था, तब उससे मुक्ति, प्रस्तुति का खुलापन-लचीलापन, आम-आदमी का मुहावरा और अपनी जमीन के पारम्परिक नाट्यरूपों को लेकर 'बकरीÓ नाटक सामने आया। इस नाटक ने न केवल सर्वेश्वरजी के लेखकीय व्यक्तित्व में वैविध्य और जनचेतना से जुड़े प्रयोग और इस अर्थ में नई कल्पनाशीलता एवं सृजनात्मकता को प्रतिष्ठित किया वरन् हिन्दी-नाटक को नये मूल्य, नये नाटकीय प्रयोग और जन-जीवन की सहजता भी दी। 'बकरी' को अपने रूपबन्ध में नया, सार्थक एवं समकालीन परिस्थिति का नाटक कहना चाहिए।

अब गरीबी हटाओ - 'अब गरीबी हटाओ' नाटक को सर्वेश्वरजी ने एक व्यापक दृष्टिकोण से लिखा है, और यह एक राजनीतिक नाटक है, लोक के लिए लिखे गये इस नाटक में झूठी जुमलेबाजी नहीं है। वास्तव में यह नाटक सदियों से व्यापक अपमान और शोषण की चट्टान के नीचे पिसते हुए साधरण-जन की पीड़ा के चरम क्षणों का बहुत प्रामाणिक मूर्तिकरण है। डॉ. पालीवाल का यह सम्पूर्ण नाटक मानवीय तकलीफ की चट्टानों से टकराता है। यह नाटक इस सच्चाई को उघाड़कर रख देता है कि 'शहरी आधुनिक रंगमंचÓ लोक-चेतना से कितना विच्छिन्न और दूर है। हमारा रंगमंच जब तक एक व्यापक समाज की पीड़ाओं-संघर्षों, विसंगतियों या विडम्बनाओं को संवाद प्रस्तुति और प्रस्तुतिकरण की नई पद्धतियों की खोज में प्रवृत्त नहीं करता, तब तक वह अधूरा है। इस नाटक में रंगमंच की अनेक संभावनाएँ हैं। लोकलय और लोकशैली के साथ व्यंग्य की कसक ने नाटक में प्राण डालने का कार्य किया है।

गोविन्द चातक के समस्त नाटकों में लोक-साहित्य देखने को मिलता है। जिसमें लोक-संस्कृति, लोक-जीवन सब कुछ देखने को मिलता है। इनके नाटकों में लोक के साथ-साथ समाज का भी चित्रण दिखाया गया है जिसमें सभी वर्ग के लोगों का चित्रण पूर्णरूपेण हुआ है। प्रेम, त्याग, विसंगति, करुणा, आपसी द्वन्द्व तथा टकराव, घुटन, संत्रास, विछोह, नैतिकता, समर्पण आदि रूप देखने को मिलते हैं। गोविन्द चातक के नाटक में मानवीय संवेदनाएँ तथा प्रेम का त्रासद स्वरूप पूर्ण रूप से उभर कर आया है। वस्तुत: चातक के नाटक लोक का साक्षात् दर्पण है जिसमें आज का स्परूप स्पष्ट नजर आता है। उनके नाटकों में लोकतत्वों का विस्तृत अध्ययन निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है-

काला मुँह - 'काला मुँह' पर्वतीय पृष्ठभूमि पर रचित एवं सामाजिक समस्याओं जैसे - जाता-पात का बाह्य आडम्बर, अन्धविश्वास व रूढिय़ाँ तथा ढकोसले जैसे समस्याओं पर आधारित नाटक है। गोविन्द चातक ने इस नाटक में लोकभाषा का प्रयोग करके नाटक में तीव्रता एवं रोचकता को बनाये रखा है। इसी का वर्णन कुछ बिन्दुओं के माध्यम से व्यक्त किया गया है -

रेंजर - हट छोड़! यह बिल्ली तो पंजे भी मारती है।

केशी - छोड़ जंगली लकड़बग्घे, कुत्ते, कमीने चोर!

रेंजर - बड़ी तीखी मिर्च है। यह ऐसे नहीं मानेगी।7

बाँसुरी बजती रही - 'बाँसुरी बजती रही' नाटक में गोविन्द चातक ने भारतीय लोक-मान्यताओं को स्थान दिया है यह नाटक गुजरात की लोककथा शेणी-बीजानन्द के प्रेम पर आधारित है। इस नाटक में ग्रामीण जीवन की झलक पूर्ण रूप में विद्यमान है। यथा -

''शेणी - ......... हमारी कन्या फूल जैसी सोहनी,

तुम्हारा बन्ना कौवे जैसे काला ...............।

बीजानन्द- हमारा बन्ना विष्णु स्वरूप, तुम्हारी बन्नी डोकरी बन्दरिया.............।

शेणी - क्या कहा बंदरिया? तू बंदर, तू होगा काला भालू

......... तू घाट पर का नंगा मसान, तू सड़ा आलू,

तू .................।''8

इस प्रकार कहा जा सकता है कि गोविन्द चातक के नाटक मूलत: लोकजीवन तक पहुँचने की इच्छा से सृजित है। उन्होंने 'अपने नाटकों में भी लोककथा या लोकशैली अथवा लोकमंचीय तत्त्वों के विनियोग की प्रवृत्ति के रूप में लोक का सन्दर्भ ग्रहण कर रचना का एक आदर्श भी उपस्थित किया।''9

समकालीन रंगमंच में लोक को पुनप्र्रतिष्ठित करने वाले रंगकर्मी हबीब तनवीर का जिन्दगी के मंच से अचानक नेपथ्य में चले जाना दुनिया भर में फैले उनके हजार-हजार प्रशंसकों के लिए उदासी और गम का सबब है। रंगमंच में अपने आगाज से लेकर अन्त तक तनवीर उन सांस्कृतिक मूल्यों व रंगों को बचाने में लगे रहे जिनसे हिन्दोस्तान की मुकम्मल तस्वीर बनती है। उर्दू शायर नज़ीर अकबराबादी के जीवन पर बना उनका नाटक 'आगरा बाज़ार' हो या फिर शूद्रक के संस्कृत नाटक 'मृच्छकटिकम' पर आधारित 'मिट्टी की गाड़ी' आदि नाटकों द्वारा हबीब तनवीर लोक से जुडऩा चाहते थे। लोक परम्पराओं में तनवीर का गहरा यकीन था। उनके नाटकों में हमें जो ऊर्जा दिखाई देती है वह दरअसल लोक में ही अर्जित है। वे सही मायनों में एक लोकधर्मी आधुनिक नाटककार थे।

हबीब तनवीर ने अपने सभी नाटकों में लोक की अभिव्यक्ति को दर्शकों तक पहुँचाने के साथ ही समाज की समस्याओं को भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित किया है। इस सन्दर्भ में स्वयं महावीर अग्रवाल के अनुसार - ''हबीब तनवीर के नाटक एक ओर लोक रंजक और लोकहितकारी तो होते ही है, तो दूसरी ओर उनमें दर्शकों को अभिभूत करने की क्षमता भी होती है। अपनी नाटकों में वे समाज, राजनीति, धर्म, इतिहास, संस्कृति के अंतर्विरोध खोलकर दिखाते हैं।''10

वर्तमान हिन्दी नाट्य साहित्य के विकास में मुद्राराक्षस का विशेष स्थान है। उन्होंने अनेक नाटक लिखकर नाट्यकला के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया है। मुद्राराक्षस का नाटक 'आला अफसर' रूपांतर होकर भी वस्तुत: नौटंकी है जो नौटंकी शैली एवं शिल्प में लिखा गया है तथा जिसकी कथा कई स्तरों पर सामान्य लोगों से जुड़कर नौकरशाही की बखिया उधेड़ता है।''11

'आला अफसर' नाटक में संगीतमय संवाद, लोकगीत तथा दोहा, चौबोला, ठुमरी, झिंझोटी, रसिया, कव्वाली आदि छंदों का प्रयोग इसके नौटंकी-रूप के अनुकूल है। शिल्प की दृष्टि से यह नाटक 'योअर्स फेथफुली', 'मरजीवा', 'तेन्दुआ' और 'तिलचिट्टा' की अपेक्षा जनसामान्य के मध्य अधिक लोकप्रिय रहा है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि इसमें उक्त नाटकों की प्रतीकगत दुरूहता और सेक्स के प्रति अनावश्यक आकर्षण नहीं है। विचारदृष्टि और भाव-बोध के सहज संप्रेषण के कारण यही अधिक सफल नाटक माना जा सकता है।

मृणाल पाण्डे महिला नाटककारों में सर्वश्रेष्ठ हैं जिन्होंने अनेक नाटकों की रचना की। 'जो राम रचि राखाÓ एक राजस्थानी लोककथा पर आधारित नाटक है, जिसमें अर्थ और व्यंग्य की एक साथ कई-कई परतें खोली गई हैं। नाटक में दिखाया गया है कि अपने रूमानी एवं अव्यावहारिक विचारों के कारण अभिजात्यवर्गीय लोक क्रान्ति लाने में कभी सफल नहीं हो सकते। कथ्य की नवीन भंगिमा के बावजूद नाटक के वस्तु-विधान की संरचना पारंपरिक ही है जिसमें लोक से जुडऩे का प्रयास भी है।

असगर वजाहत का नाटक 'वीरगति' बहुकोणीय व बहुअर्थी नाटक है। इस नाटक में सत्ताधारी वर्ग के चरित्र के साथ ही उनके सारे षडय़ंत्रों और युवा वर्ग के नपुंसक आक्रोश को खोलकर प्रस्तुत किया गया है। नाटक की कथा का आधार राजस्थानी लोककथा है, जिसमें पारंपरिक रंगशैली और शिल्प के साथ ही लोकनाट्य नौटंकी का भी थोड़ा बहुत अंश है। अत: सामान्य कथानक के बावजूद यह नाटक लोककथा पर आश्रित होने के कारण अधिक सफल है।

   निष्कर्ष स्वरूप कहा जा सकता है कि वर्तमान हिन्दी नाटकों में आए रचनात्मक परिवर्तनों के कारण, हिन्दी की दम तोड़ती सारी लोकनाट्य परम्पराएँ पुन: हिन्दी नाटक और रंगमंच पर प्रतिष्ठा पाने लगी है, क्योंकि आधुनिक हिन्दी नाटककारों के सामने शैली, शिल्प एवं कथागत प्रयोगों के रूप में दूसरा कोई विकल्प शेष नहीं था। इससे नोकनाट्य की परम्पराएँ पुन: जीवित हुई।

 

सन्दर्भ

 

1.डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय, लोकसाहित्य की भूमिका

2.     डॉ. बी. वाय. वानयारे, समकालीन नाट्य साहित्य और एब्सर्ड नाटक, पृ. - 156

3.  गिरीश रस्तोगी, समकालीन हिन्दी नाटककार, पृ. - 173

4.     डॉ. विनय भारती, समकालीन हिन्दी नाटक और रंगमंच, पृ. - 30

5.     शैलजा भारद्वाज, स्वत्तंत्र्योत्तर हिन्दी नाटक साहित्य में लोकतत्त्व, पृ. - 172

6.     डॉ. मिथिलेश गुप्ता, समकालीन हिन्दी नाटक रंगमंच के परिप्रेक्ष्य में, पृ. - 204

7.     गोविन्द चातक, सम्पूर्ण रंगनाटक: बाँसुरी बजती रही, पृ. - 99

8.     गोविन्द चातक, सम्पूर्ण रंगनाटक: बाँसुरी बजती रही, पृ. - 153

9.     लवकुमार लवलीन, गोविन्द चातक के नाटक और नाट्यकला, पृ. 10

10.    सीमा ओझा, सं. आजकल, पृ. - 46

11.     लवकुमार लवलीन, समकालीन हिन्दी नाटक सृष्टि और दृष्टि, पृ. - 112