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Saturday 20 Oct 2018

उम्मीदों और आकर्षण का नाम मध्य हिमालय

प्रकृति ने मध्य हिमालय को अपनी बेपनाह खूबसूरती से नवाजा है। इसका दीदार करने के लिये दुनियाभर के सैलानी, लेखक, चिंतक और पर्यावरणविद् सदियों से आते रहे हैं। यह मध्य हिमालय का आकर्षण ही है कि काका कालेलकर, गांधी, राहुल सांकृत्यायन, बाबा नार्गाजुन, रस्किन बॉड जैसे मनीषियों ने इसकी खूबसूरती में रहकर यहां गहन अध्ययन किया है।

उत्तराखण्ड राज्य का आधे से अधिक (लगभग 56.21 फीसदी) हिस्सा मध्य हिमालय में आता है जहां पर्यटक स्थलों की भरमार है। राज्य के इस हिस्से में सर्दी के मौसम में बर्फ  पड़ती है वहीं गर्मियों में कम तापमान व खूबसूरत प्राकृतिक नजारों की वजह से पर्यटक खिंचे चले आते हैं। राज्य के मसूरी, नैनीताल, रानीखेत, भीमताल, कौसानी जैसे विश्व प्रसिद्ध पर्यटक स्थल इसी क्षेत्र में आते हैं।

भौगोलिक रूप से इस क्षेत्र का विस्तार देखा जाए तो यह क्षेत्र बृहत हिमालय और शिवालिक पर्वत श्रृंखला के मध्य की पट्टी में स्थित है। जिसकी ऊंचाई लगभग 1200 से 4500 मीटर तक मानी जाती है। यह क्षेत्र उत्तराखण्ड राज्य के 9 जिलों में पूर्व से पश्चिम की ओर फैला है। इस क्षेत्र में उत्तरकाशी, चमोली, पौड़ी, रूद्रप्रयाग पिथौरागढ जनपदों में तीखी ढ़ाल वाले पहाड़ हैं वहीं अल्मोड़ा, बागेश्वर, चम्पावत जनपदों में कम तीखी ढ़ाल वाले पहाड़ हैं। खूब वर्षा और ठंड होने के चलते शीतोष्ण कटिबंधीय सदाबहार कोणधारी घने वन पाये जाते हैं। इन वनों में बांज, खरसों, देवदार, बुरांश, मेहल, चीड़ आदि वृक्ष बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं। इस क्षेत्र में छोटे-छोटे घास के मैदान भी पाए जाते हैं जिन्हें बुग्याल एवं पयांर कहते हैं। सघन वनों के चलते यह क्षेत्र विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षियों की शरणस्थली बना है। ग्लेशियर क्षेत्र न होने के बावजूद मध्य हिमालय से सरयू, पश्चिमी रामगंगा आदि सदानीरा नदियों के साथ ही इस क्षेत्र में नैनीताल, भीमताल, जैसे कई ताल पाये स्थित हैं।

भूगर्भ वैज्ञानिक बताते हैं कि मध्य हिमालयी क्षेत्र का निर्माण वलित एवं कायांतरित चट्टानों से हुआ है। इस क्षेत्र में तांबा, ग्रेफाइट, जिप्सम, एवं मैग्नेसाइड आदि खनिज मिलते है।  बरसात के मौसम में यहां मानसूनी वर्षा काफी होती है। इसके चलते पहाड़ों में भूस्खलन होना आम बात है। बादल फटने की घटनाओं से हर साल जानमाल का नुकसान होता है। विगत एक दशक में ही यहां केदारनाथ जैसी बड़ी प्राकृतिक आपदाएं हुई हैं जिनमें यहां के स्थानीय लोगों के साथ ही देश विदेश के सैकड़ों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। इन सबके बावजूद मानव का प्रकृति के साथ जीने और जुड़े रहने का जज्बा ही है कि वो इसका साक्षात्कार करने में पीछे नहीं हटता।

उत्तराखण्ड में सबसे ज्यादा बसावटें इसी क्षेत्र में हैं। छोटे-छोटे पहाड़ी कस्बे यहां के शिल्प और संस्कृति के प्रतीक हैं। धीरे-धीरे अब कस्बों और गांवों में आधुनिक निर्माण शैली का प्रसार हो रहा है। लेकिन अभी भी पहाड़ी शैली पर बने मकानों की अधिकता है। सड़कों के जाल बिछ जाने के कारण देश-दुनिया से पर्यटकों का आना बढ़ा है। गांवों में खेती और पशुपालन मुख्य व्यवसाय है। पर्यटक स्थलों की अधिकता के चलते इस क्षेत्र के युवाओं का रूझान इस व्यवसाय की ओर बढ़ रहा है।

उत्तराखण्ड के मध्य हिमालय की गोद में बसा एक सुन्दर गांव है बार्सू। यह दयारा बुग्याल की तलहटी पर स्वारी गाड के किनारेपर है। करीब 110 परिवार और 450 की आबादी वाला गांव है। उत्तरकाशी जनपद मुख्यालय से 38 किलोमीटर दूर है बांज, देवदार, बुरांश के जंगलों के बीच होते हुए बार्सू पहुंचना होता है। 1981 मीटर की ऊंचाई पर बसे बार्सू गांव पहाड़ के उन गांवों में से एक है जहां पलायन से गांव खाली नहीं हुए बल्कि लोगों ने गांव में रहकर ही आजीविका के परम्परागत साधन खेती और पशुपालन के साथ ही पर्यटन, बागवानी आदि में शुरूआत की है।

बार्सू गांव के ठीक सामने स्वांरी गाड बहती है। गांव के ठीक दूसरी तरफ छोटा गदेरा है जिससे बरसात में काफी पानी आता है। इसका उपयोग खेती की सिंचाई के लिये किया जाता है।

गांव की दोमट मिट्टी आलू, धान, गेहूं की फसल के लिये काफी उपजाऊ होती है। बार्सू के आलू की स्थानीय बाजार में काफी मांग है। अब गांव के लोग धीरे-धीरे सेब के बगीचों को भी तैयार कर रहे हैं। तकनीकी का प्रसार भी इस गांव में दिखने लगा है। कुछ किसानों ने पॉलीहाउस बनाकर बेमौसमी सब्जियों को उगाना शुरू किया है। इस तरह की सब्जियों की स्थानीय बाजारों में काफी मांग होती है। पहले गांव में फसलों को रखने के लिये देवदार की लकड़ी के कोठार बने होते थे। जो घर के पास ही, सुंदर घर की तरह लगते हैं अब धीरे-धीरे इन कोठारों का अस्तित्व भी खत्म होते जा रहा है।

गांव में ज्यादातर मकान लकड़ी और पत्थर के बने हैं। छत ढालदार हैं। छत को लकड़ी और पत्थर की स्लेट जिसे पठाल कहा जाता है, से बनाया जाता है। मिट्टी-पत्थर की दीवारें सर्दी और गर्मी दोनों में आराम देती हैं क्योंकि बहुत सर्दी पडऩे पर भी इनके अंदर इसका प्रभाव ज्यादा नहीं पड़ता और गर्मी में भी कुछ ऐसा ही होता है। गांव में महिला और पुरूष खेती किसानी के साथ-साथ, पशुओं को पालते हैं। मुख्य व्यवसाय के रूप में आज भी कृषि ही है। हालांकि धीरे धीरे अब लोग सेना, शिक्षा व अन्य सरकारी नौकरियों में जाने लगे हैं। रोजगार की तलाश में मैदान की ओर जाने का क्रम यहां भी स्पष्ट दिखता है। गांव के युवा उच्च शिक्षा और रोजगार के लिये जाते हैं।

बार्सू से द्यारा बुग्याल जाने वाले पर्यटकों का बेस कैम्प बार्सू में ही है। जहां उत्तराखण्ड सरकार का गेस्ट हाउस के साथ ही स्थानीय लोगों के होटल हैं। गांव के ही युवा पर्यटकों के साथ गाइड का काम करते हैं। धीरे-धीरे खेती किसानी के साथ ही पर्यटन गांव की आर्थिकी का महत्वपूर्ण जरिया बनने लग गया हैं।

बार्सू से बरनाला और द्यारा बुग्याल, बार्सू फॉल, बार्सू मंदिर दर्शनीय स्थल होने के चलते साल भर पर्यटकों का आना-जाना बना रहता है। सर्दियों में जनवरी में काफी बर्फ  गिरती है। बर्फ  जितनी ज्यादा गिरती है स्थानीय लोग उतने ही खुश होते हैं। एक तरफ बर्फ को खेती के लिये अच्छा माना जाता है वहीं दूसरी ओर बरनाला और द्यारा में आइस स्कीइंग जोरों पर रहती है। सरकार हर साल यहां आइस स्कीइंग के प्रशिक्षण कैम्प लगाती है जिसमें स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षित कर उन्हें रोजगार से जोडऩे की कोशिश की जाती है।

बुग्याल सिर्फ मनुष्यों के लिये ही नहीं बल्कि पशुओं के लिये भी महत्वपूर्ण है। यहां की छोटी-छोटी मखमली घास भेड़, बकरियों व गाय-भैंस के लिए बहुत पौष्टिक होती है। गांव के पशु इन चारागाहों का भरपूर उपयोग करते हैं। गर्मियां बढऩे के साथ-साथ गांव के लोग द्यारा बुग्याल में छानी (अस्थाई छप्पर) बनाकर पशुओं के साथ रहते हैं। सर्दियां होते ही पशुओं को लेकर गांव वापस लौट जाते हैं।

जंगल हमेशा हरा भरा (सदाबहार) रहता है। बांज, बुरांश, तेलिंग, मेहल आदि पेड़ों के  घने जंगल जंगली जानवरों के लिये बहुत मुफीद होते हंै। जंगल में मुख्य रूप से हिरन, बारहसिंगा, सियार, बंदर, लंगूर और इनके शिकार करने के लिये गुलदार होता है। भालू और सुअर किसानों के सबसे बड़े दुश्मन बने हैं। ये रात-अधरात आकर फसलों को नष्ट कर देते हैं। ग्रामीण प्रकृति और जंगली जानवरों से बचते बचाते खेती-किसानी करते हैं।

इस क्षेत्र में स्थानीय त्यौहार मक्खन-दूध की होली, काफी उत्साह से मनाया जाता है। यह त्यौहार पशुओं की समृद्धता का प्रतीक भी है। सभी ग्रामीण दयारा में एकत्र होकर दूध-और मक्खन की होली खेलते हैं। अब इस होली को स्थानीय लोगों के द्वारा एक बड़े आयोजन के रूप में मनाना शुरू हो गया है। इसके जरिए बार्सू को अन्तराष्ट्रीय पहचान देने की बात यहां के पर्यटन व्यवसायी एवं उत्साही युवा कर रहे हैं।

समय के साथ साथ मध्य हिमालय के गांवों में भी बदलाव आ रहा है। घरों के निर्माण में धीरे-धीरे पठाल के बजाय सीमेंट का उपयोग होने लगा है। जिससे भले ही आधुनिकता का बोध हो रहा हो परन्तु यहां के पर्यावरण के लिहाज से यह बहुत उपयोगी नहीं लगता। लेकिन बदलाव की बयार इतनी तेज है कि उसमें बार्सू ही नहीं पहाड़ के सभी गांव इस बदलाव की तरफ बढ़ रहे हैं।