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Thursday 13 Dec 2018

समकालीन शिक्षा : समस्या और समाधान

शिक्षा और संचार दो ऐसी चीजें हैं जिनसे मानस-निर्माण होता है। कोई भी सरकार हो वह इन दोनों साधनों का उपयोग अपने अनुकूल मानस-निर्माण के लिए करती है। सरकार किसका मानस-निर्माण करती है? जनसाधारण का, मानव-समाज का। इसलिए शिक्षा सरकार के द्वारा जनता के मनोनुकूलन का एक साधन है। यहाँ ज्ञान प्रदान करने के साथ-साथ शिक्षा की दो भूमिकाएँ सामने आती हैं। एक उसकी विचारधारात्मक उपयोगिता होती है और दूसरे वह वर्चस्व का साधन होती है। ये भूमिकाएँ ज्ञान से अधिक नियामक हैं इसीलिए सरकारें अपने राजनीतिक हितों के अनुरूप शिक्षा के ढाँचे में परिवर्तन करती हैं और उसे शिक्षा-सुधार का नाम देती हैं। वर्तमान शिक्षा की समस्याएँ इसी बिंदु से शुरू होती हैं। लेकिन यदि शिक्षा की भूमिका वर्चस्व और मनोनुकूलन तक सीमित हो तो लोग पढऩे क्यों जाएं? जो सरकार से नाराज़ हैं या उसके राजनीतिक-वैचारिक विरोधी हैं, वे अपने बच्चों को पढऩे क्यों भेजें? यदि जनता की नजऱ से देखें तो शिक्षा ज्ञान, हुनर या अवसर तथा सत्ता में भागीदारी पाने का साधन है।

इस प्रकार शिक्षा की प्रक्रिया में एक तरह का द्वंद्व होता है। जो शिक्षा पाता है वह अपने लिए शिक्षा का इस्तेमाल करना चाहता है और जो शिक्षा देता है (सरकार या निजी संस्थाएँ) वह अपने लिए शिक्षा का इस्तेमाल करना चाहता है। इसलिए शिक्षा वास्तव में ज्ञान का रणक्षेत्र है। जब कोई भी विषय रणक्षेत्र में बदल जाता है तब उसके अपने संकट होते हैं, अपनी समस्याएँ होती हैं। इस रणक्षेत्र में दोनों पक्षों के दो अलग-अलग उद्देश्य होते हैं। इससे एक बात और पता चलती है, सरकार चाहे जिस उद्देश्य से शिक्षा देती हो, उसका परिणाम हमेशा सरकार के मनोनुकूल नहीं होता। अगर सरकार के मनोनुकूल होता तो 1857 में जिस बड़े पैमाने पर कत्लेआम हुआ था और जिन बौद्धिक लोगों का कत्लेआम हुआ था वे अंग्रेजों के समर्थक नहीं थे। जो अँग्रेज़-विरोधी बुद्धिजीवी हिन्दुओं, मुसलमानों और अन्य समुदायों में थे उनका सामूहिक संहार कर दिया गया था, फिर अंग्रेजों ने अपनी शिक्षा लागू की जिसका उद्देश्य ही था दिमाग से गुलाम पैदा करना लेकिन उस शिक्षा से पढ़कर निकलनेवाले लोग एक समय के बाद अंग्रेजों के खिलाफ  संघर्ष करने के लिए आगे आये।

ज़ाहिर है, शिक्षा का उद्देश्य कुछ होता है, परिणाम हमेशा उस उद्देश्य के अनुकूल नहीं निकल पाता। आज की शिक्षा के बारे में भी हमें यह बात समझनी चाहिए। सरकार चाहे जिस उद्देश्य से शिक्षा-प्रसार करती है किन्तु शिक्षा का प्रसार होने पर हमेशा सरकार का उद्देश्य पूरा नहीं होता। इसलिए कोई भी क्रान्तिकारी विचार जो शिक्षा का हिस्सा होता है, उसका विरोध शुरू हो जाता है। अक्सर अपने को क्रन्तिकारी कहने वाले भी शिक्षा का विरोध करते हैं। नक्सली अपने प्रभाव क्षेत्र में स्कूल नहीं खुलने देते, खुले हुए स्कूलों को बंद करवाते हैं, अध्यापकों को मारकर भगा देते हैं। हालाँकि नक्सली नेता खुद पढ़े-लिखे होते हैं। शिक्षा के विरोध की यह नीति क्रन्तिकारी नीति नहीं है। शिक्षा के बिना न कोई अपना जीवन बदल सकता है, न समाज का जीवन बदल सकता है। यह दूसरी बात भी हमें ध्यान रखनी चाहिए कि शिक्षा बदलाव का महत्वपूर्ण साधन है।

शिक्षा-सुधार के तीन दौर-

अगर शिक्षा वर्चस्व का साधन है तो शिक्षा-प्रणाली को समाज-व्यवस्था के अनुकूल चलना चाहिए। अर्थात शिक्षा की प्रणाली, शैक्षणिक पाठ्यक्रम, शिक्षण-विधि सभी चीजों को समाज-व्यवस्था का अनुसरण करना चाहिए। सरकारें इसका प्रयत्न करती हैं, इसी उद्देश्य से शिक्षानीति लागू करती हैं, उसमें समय-समय पर परिवर्तन और सुधार करती हैं। आजादी के बाद शिक्षा में परिवर्तन सुधार के तीन दौर दिखाई पड़ते हैं। आज़ादी के तुरंत बाद जो शिक्षा शुरू हुई वह मोटे तौर पर अंग्रेजी शिक्षा का अनुसरण थी। साथ ही साथ आजादी के संघर्ष के समय अर्जित मूल्यों को भी उसमें समाविष्ट किया गया। उस शिक्षा में एक तरफ  वर्चस्व का प्रयत्न झलकता है, दूसरी तरफ  स्वाधीन भारत के नवनिर्माण की सामाजिक आवश्यकताएँ भी प्रतिबिंबित होती हैं। इस शिक्षा का आधार राधाकृष्णन का नजरिया है। सन 1964-65 में कोठारी कमीशन बना। कोठारी कमीशन ने शिक्षा नीति में जो परिवर्तन सुझाये वे हरित क्रांति की पृष्ठभूमि से जुड़ी सामाजिक आवश्यकताएँ थीं। जैसे, कृषि का बाज़ार पर निर्भर होना। समाज में जो परिवर्तन हो रहे थे, उन परिवर्तनों के साथ जो पैटर्न उभर रहे थे शिक्षा उन्हें व्यक्तकरने का साधन थी, और जो वर्ग निर्मित हो रहे थे उनकी इच्छा और ज़रूरत पूरी करने का साधन भी थी। तीसरा योग बना 1990 के आसपास, राजनीतिक घटनाचक्र की दृष्टि से देखें तो इंदिरा गाँधी की हत्या के फौरन बाद 1985 में नयी शिक्षा नीति आई और 1985 में ही शिक्षा मंत्रालय का नाम बदलकर मानव संसाधन विकास मंत्रालय कर दिया गया।

    इसका आशय क्या है? उद्योगों के लिए तीन प्रकार के संसाधनों की आवश्यकता होती है। आर्थिक संसाधन, प्राकृतिक संसाधन और मानव संसाधन। यह परिवर्तन विश्व अर्थव्यवस्था में आ रहे बदलावों का परिणाम था। इन परिवर्तनों का वर्तमान दुनिया पर बहुत दूरगामी असर हुआ। कुछ ही वर्षों में सोवियत संघ टूट गया और पूँजीवादी बाजारवाद के प्रभुत्व में अभूतपूर्व वृद्धि करते हुए भूमंडलीकरण का आगमन हुआ। भूमंडलीकरण के साथ निजीकरण और उदारीकरण आये। समाज में आने वाले इन परिवर्तनों की आवश्यकता पूरी करने के लिए नयी शिक्षा नीति आई और मंत्रालय का स्वरुप बदला गया। कहने को इसका ध्येय शिक्षा को रोजग़ार से जोडऩा था लेकिन मालिकों की आक्रामकता के युग में यह संभव नहीं था। वह उद्योगों के हित के अनुकूल मानव-संसाधन सुलभ करने का माध्यम बनाई गई। मनुष्य यदि संसाधन बन जाएगा तो उसका अंतिम लक्ष्य क्या होगा? यह संयोग की बात नहीं है कि 1990 में अटल बिहारी वाजपेयी की दक्षिणपंथी सरकार ने राजीव गाँधी की शिक्षा नीति को आगे बढ़ाते हुए एक समिति बनायी, बिड़ला-अम्बानी समिति। इस दो सदस्यीय समिति में थे उद्योगपति कुमारमंगलम बिड़ला और मुकेश अम्बानी। मुकेश अम्बानी उसके संयोजक भी थे।

     यह समिति उच्च शिक्षा में सुधार के लिए बनायीं गयी थी। इसकी रिपोर्ट आने के बाद थाईलैंड में विश्वबैंक का एक सम्मेलन हुआ। उस सम्मेलन में विकासशील और संक्रमणशील देशों के लिए शिक्षा के बारे में कुछ सुझाव दिए गए। उन सुझावों के अनुसार 1993 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और मानव संसाधन मंत्रालय ने बिड़ला-अम्बानी रिपोर्ट में कुछ परिवर्तन करते हुए निर्देश जारी किए। उनके विस्तार में जाने का अवसर नहीं है लेकिन इतना संकेत करना जरूरी है कि इस दौर में भूमंडलीकरण के नाम पर आगे बढ़ी हुई अर्थव्यवस्थाओं ने विकास की अपनी अवधारणाएँ आरोपित करनी शुरू कीं। उनकी आर्थिक शर्तें लागू की गयीं, उसी के साथ उनके निर्देश के अनुसार शिक्षा-व्यवस्था बदलने की कवायद भी शुरू हुई। यदि ध्यान दें तो 1991-92-93 में विश्वबैंक के कहने पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और मानव संसाधन मंत्रालय ने शिक्षा का स्वरुप बदलना शुरू किया।

     इस बदलाव के साथ शिक्षा के लिए उठाये जाने वाले कदमों का सारा दायित्व विश्वबैंक का हुआ। इसीलिए 1997 के सम्मेलन में भारत सरकार ने अपनी तरफ  से कोई दायित्व लेने से मना कर दिया और सारा दायित्व विश्वबैंक को सौंप दिया। इसके अनुसार कुछ लक्ष्य निर्धारित किये गए। एक, प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों के अनुरूप युवाओं को ढालना और इस तरह उन्हें मानव संसाधन बनाना। दूसरा, श्रमिकों की उत्पादन क्षमता बढ़ाना और उनकी आमदनी बढ़ाना ताकि भूमंडलीकरण सफल हो सके। आमदनी बढ़ाने का मतलब है उन्हें बेहतर उपभोक्ता बनाना। शिक्षा का उद्देश्य ही ज्ञान और चेतना प्रदान करने से हटकर मानव-संसाधन और उपभोक्ता बनाना हो गया, इसके साथ सम्बद्ध तीसरा लक्ष्य था लोगों को यह समझाना कि गरीबी का कारण जनसंख्या-वृद्धि है, न कि पूँजी और प्राकृतिक संसाधनों का असमान वितरण, दूसरे शब्दों में, गरीबी का कारण विषमता है, पूँजी का असमान वितरण है। यह बात लोग न मानें बल्कि यह मानें कि जनसंख्या ज्यादा है इसलिए गरीबी है। इसका केवल आर्थिक लक्ष्य नहीं, जैविक और विचारधारात्मक लक्ष्य भी है। चौथा लक्ष्य था महिलाओं के मानस का अनुकूलन करना। जब तक महिलाएँ इस विचारधारा को नहीं अपनातीं तब तक परिवार उपभोक्तावाद और भूमंडलीकरण से नहीं जुड़ेंगे। उक्त सम्मलेन में ये चार लक्ष्य निर्धारित किये गए।

संकट का स्वरूप

   अब कुछ बातें शिक्षा की समस्या और समाधान के बारे में। शिक्षा की जो समकालीन नीति तय हुई है उसी में उसकी समस्या भी है और उसके समाधान के संकेत भी। हम अपने शब्दों में कहें तो इन नीतियों पर चलने से समस्याएँ बढ़ रही हैं, बढ़ेंगी। इन नीतियों के विपरीत नीतियाँ अपनाई जाएं, तो समाधान होगा। यहाँ एक तथ्य का उल्लेख ज़़रूरी है। बिड़ला-अम्बानी रिपोर्ट का सारतत्व यह है कि प्राथमिक शिक्षा सरकार की जिम्मेदारी है और उसे सार्वभौम एवं मुफ्त होना चाहिए। यानी मुफ्त सार्वभौम प्राथमिक शिक्षा सरकार की जिम्मेदारी है। उच्च शिक्षा से सरकार को कोई काम नहीं होना चाहिए। इसे पूरी तरह निजी क्षेत्र की जि़म्मेदारी पर सौंप दिया जाना चाहिए। यह उसका सारतत्व है। इसका निहितार्थ क्या है? और इससे क्या चुनौतियाँ पैदा होती हैं?

    यहाँ एक बात का जिक्र जरूरी है। वे एक तरफ  कह रहे हैं सार्वभौम शिक्षा हो, एकरूप शिक्षा हो। हम सब जो 40-45 के ऊपर हैं, अपने बचपन के अनुभव याद करें, हमारे प्राइमरी टीचर स्कूलों में हमें अपने ढंग से पढ़ाते थे। प्राथमिक शिक्षा में अध्यापक को यह छूट रहती थी कि जिस तरह के बच्चे हों उस तरह से वह अपना टीचिंग मेथड (शिक्षण विधि) अपनाकर उन्हें पढ़ाए और शिक्षा दे। हम नहीं समझते कि हमारी पीढ़ी आज के बच्चों से खराब तरह से विकसित हुई है। जहाँ तक सार्वभौम शिक्षा का सवाल है, यह लक्ष्य तो पूरा होता नहीं दिखाई देता। लेकिन एकरूप शिक्षा पैदा हो गयी है। राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसन्धान प्रशिक्षण परिषद् (एनसीईआरटी) ने नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क बनाया। बड़े अच्छे-अच्छे उद्देश्य रखे। व्यवहार में सारे देश में पाठ्यक्रम तय किये गए, पाठ्यक्रम किस तरह पढ़ाया जायेगा यह पद्धति तय कर दी गयी। पढऩे के बाद विद्यार्थी किस पाठ्यक्रम से कौन सी दक्षता प्राप्त करेगा यह निश्चित कर दिया गया। शिक्षण प्रक्रिया में नवीनीकरण की बात की जाती है लेकिन उस नवीनीकरण के लिए कोई गुंजाइश नहीं रही। न टीचर किस तरह पढ़ाए और क्या सीख दे इसकी गुंजाइश छोड़ी गयी, न विद्यार्थी अपने अनुभव से उसमें क्या नवीनता पैदा करे इसकी गुंजाइश छोड़ी गयी। इस तरह सार्वभौम शिक्षा के नामपर एकरूप शिक्षा लागू की गयी। क्या यह अलग से कहने की आवश्यकता है कि भूमंडलीकरण एकरूपता का समाज पैदा करता है और इस एकरूपता के नाम पर लोगों पर शासन करता है। वर्तमान शिक्षा इस एकरूपता के लक्ष्य को भली भाँति पूरा करती है।

संविधान में कहा गया था कि 1960 तक सार्वभौम शिक्षा प्राप्त कर ली जाए। फिर यह लक्ष्य आगे बढ़ाकर सन 2000 कर दिया गया। शिक्षा देना तो दूर सबको साक्षर भी नहीं बनाया जा सका। बाद में संयुक्त राष्ट्र संघ ने सारी दुनिया के लिए यह निर्णय किया कि 2015 तक सार्वभौम शिक्षा का लक्ष्य प्राप्त कर लिया जाय। वास्तव में यह निरक्षरता उन्मूलन का लक्ष्य था। अर्थात कोई निरक्षर न रहे। तब से 2018 आ गया, कोई कह सकता है कि हम उस लक्ष्य के आसपास कहाँ हैं? 2015 क्या 2025 तक भी यह लक्ष्य पूरा होगा, इसका भरोसा करना कठिन है। सवाल यह है कि लक्ष्य तो बड़े महान होते हैं लेकिन उन्हें पाने के रास्ते में जो बाधाएँ हैं वे कहाँ से आयीं? शिक्षा की समस्या क्या है? इसकी चर्चा थोड़े अलग परिप्रेक्ष्य से।

कहा जाता है कि जब तक महिलाएँ शिक्षित नहीं होंगी तब तक उपभोक्तावाद से, बाजारवाद से परिवार नहीं जुड़ेगा। यदि परिवार नहीं जुड़ेगा तो बाजारवाद सफल नहीं होगा। इसलिए महिलाओं की शिक्षा की एक तस्वीर देखना चाहिए। उसके पहले एक बात सार्वभौम शिक्षा के बारे में 2008-09 का सरकारी आँकड़ा है। अगर उस पर विश्वास किया जाय तो दस साल पहले जहाँ-जहाँ स्कूल जाने वाले बच्चे थे, लड़के-लड़कियाँ, उनकी तादात 105 प्रतिशत थी! मेरी समझ में नहीं आता कि 100 प्रतिशत का अर्थ है शत-प्रतिशत, ये 5 प्रतिशत फालतू कहाँ से आ गए स्कूल जाने के लिए? फिर भी सार्वभौम शिक्षा नहीं हुई, पूर्ण साक्षरता तक नहीं हुई! विडम्बना यह कि जिन आँकड़ों के अनुसार 105 प्रतिशत विद्यार्थी स्कूल जा रहे थे। उन्हीं आँकड़ों के अनुसार 75 प्रतिशत विद्यार्थी अभी शिक्षित नहीं हुए। इसी से पता चलता है कि सरकार आंकड़ेबाजी का खेल कैसे खेलती है।

मैं लड़कियों की शिक्षा का उल्लेख कर रहा था। 2011 की जनगणना के अनुसार प्राथमिक शिक्षा में 69.2 प्रतिशत लड़के दाखिल होते हैं और 65.5 प्रतिशत लड़कियाँ, दाखिला लेने वाले लड़के-लड़कियों में लगभग पाँच प्रतिशत का अंतर है। लड़के पाँच प्रतिशत ज्यादा दाखिला लेते हैं, लड़कियाँ पाँच प्रतिशत कम दाखिला लेती हैं। ऐसा क्यों होता है? यह सोचने की बात है। इसके बाद एक चीज होती है ड्रॉप-आउट। यानी दाखिला लेने के बाद पढ़ाई पूरी होने से पहले स्कूल छोड़ देना। इसमें उल्टा अनुपात है- 30.45 प्रतिशत लड़के ड्रॉप आउट होते हैं और 27.25 प्रतिशत यानी सवा सत्ताइस प्रतिशत लड़कियाँ। लड़कियाँ दाखिला कम लेती हैं, बीच में स्कूल भी कम छोड़ती हैं। लड़के दाखिला ज्यादा लेते हैं, स्कूल भी बीच में ज्यादा छोड़ते हैं। यह केवल प्राथमिक शिक्षा का आँकड़ा है। माध्यमिक शिक्षा में 65.6 प्रतिशत लड़के दाखिला लेते हैं, 64 प्रतिशत लड़कियाँ। यहाँ भी दाखिले में लड़कियों की संख्या कम है लेकिन बीच में पढ़ाई छोडऩे वाली (ड्रॉप-आउट) लड़कियों की संख्या ज्यादा है। 40.2 प्रतिशत लड़के ड्रॉप-आउट होते हैं और 44.69 प्रतिशत या 45 प्रतिशत लड़कियां। यह भी बहुत सांकेतिक है। उच्चशिक्षा में स्थिति और दिलचस्प है। यहाँ 56.8 प्रतिशत लड़के दाखिला लेते हैं और 55.6 प्रतिशत लड़कियाँ लेती हैं। लड़कियाँ उच्चशिक्षा में भी कम दाखिला लेती हैं। हर स्तर पर देखें, दाखिला लेने वाली लड़कियाँ कम हैं। लेकिन उच्चशिक्षा में ड्रॉप-आउट का अनुपात बदल जाता है- 53.38 प्रतिशत लड़के बीच में शिक्षा छोड़ते हैं, 51.97 प्रतिशत (लगभग 52 प्रतिशत) लड़कियाँ। यहाँ लड़कियाँ कम ड्रॉप-आउट होती हैं। माध्यमिक स्तर के अलावा लड़कियों का ड्रॉप-आउट प्रतिशत कम है।

इस बात पर थोड़ा विचार करना चाहिए। पहली बात तो यह है कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्राथमिक स्तर पर ही स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या लगभग 66.67 प्रतिशत है। 70 प्रतिशत लड़कों की और 65 प्रतिशत लड़कियों की। यानी एक तिहाई बच्चे ऐसे हैं जो स्कूल का मुँह नहीं देखते। यह चिंता की बात है। सरकार कहती है कि 105 प्रतिशत बच्चे दाखिला ले रहे हैं। पर जनगणना भी सरकार करती है और जनगणना कहती है, 33.34 प्रतिशत बच्चे दाखिला ही नहीं ले पाते। शिक्षा के संकट का सबसे बड़ा लक्षण यह है। दूसरी बात यह कि लड़कियाँ अनेक कारणों से शिक्षा में ज्यादा नहीं जा पातीं। एक तो वे पराया धन होती हैं, दूसरे संपत्ति पर उनका अधिकार नहीं होता। अब कानूनी अधिकार हो गया है फिर भी व्यवहार में स्थिति बहुत नहीं बदली है। पुरुषसत्ता या पितृसत्ता समाज में हावी है, शिक्षा पर उसका असर दिखता है। तीसरा कारण यह कि लड़का जितना पढ़ा-लिखा होगा, दहेज उतना ज्यादा मिलेगा। लड़की ज्यादा पढ़ी होगी तो शादी करना मुश्किल होगा और शादी ही लड़की की अंतिम मंजिल है। इसलिए लड़की का कम पढऩा अच्छा है और लड़के का ज्यादा पढऩा। ये सारे सामाजिक नियम हैं, सामाजिक मान्यताएँ हैं जिनसे हमारी शिक्षा के संकट का सम्बन्ध है।     

समाधान की दिशा

दूसरे शब्दों में, हमारा आर्थिक और सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण इस संकट की पृष्ठभूमि में है। यहाँ एक बात रेखांकित करने की है। इस वस्तुस्थिति में कोई धार्मिक विभेद नहीं है। हिन्दुओं के घर में भी वही बात है, मुसलमानों के घर में भी, सिखों के घर में भी वही बात है। जिन प्रदेशों में लड़कियाँ ज्यादा पढ़ती हैं, वे हैं केरल, मेघालय, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम। ध्यान दें कि इन जगहों पर पितृसत्तात्मकता कम है केरल में तो मातृसत्तात्मक समाज है, इससे स्पष्ट है कि जहाँ समाज में पुरुष का वर्चस्व कम है वहाँ शिक्षा में लड़कियों की हिस्सेदारी ज्यादा है। इसलिए शिक्षा की समस्याओं के समाधान के लिए दो काम होने चाहिए। सरकार की नीतियों की आलोचना करना, उनमें सुधार और परिवर्तन के लिए संघर्ष करना, साथ ही आत्मविश्लेषण करना, समाज में सुधार और परिवर्तन के लिए संघर्ष करना। मैं इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त करना चाहता हूँ कि राजनीतिक और सांप्रदायिक तौर पर प्रचार कुछ होता हो लेकिन आज सभी धर्मों में सुधार की प्रक्रिया जारी है। कट्टरपन के खिलाफ  सभी धर्मों में भीतरी लड़ाई बहुत तेज हो रही है। इसीलिए कट्टरपंथी तत्व भी बहुत मुखर और आक्रामक हैं। कट्टरपन और रूढि़वाद से यह लड़ाई जितना आगे बढ़ेगी, शिक्षा पर उसका असर उतना दिखाई पड़ेगा।

    अंत में एक बात यह कि आधुनिक भारतीय शिक्षा पर कोई बातचीत गाँधीजी के उल्लेख के बिना पूरी नहीं हो सकती। संसार के सबसे बड़े साम्राज्य के खिलाफ संघर्ष करते हुए उन्होंने विभिन्न समस्याओं पर बहुत व्यावहारिक और गंभीर तरीके से सोचा था, शिक्षा उनमें एक थी। हम लोग गाँधीजी को अहिंसा, हृदय-परिवर्तन जैसे दो-चार सूत्रों में सीमित कर देते हैं। दरअसल गाँधीजी वह नहीं थे। याद करें, गाँधीजी जिन बातों के लिए जीवन भर लड़े और जिन बातों पर उन्होंने समझौता नहीं किया, उनमें महिलाओं की शिक्षा एक प्रमुख बात थी। वे कहते थे, समाज में विषमता है, परिवार में भी विषमता है, परिवार में समानता लाओ। समाज में समानता लाने के लिए यह जरूरी है। उसी तरह साम्प्रदायिकता का प्रश्न है। सारे नेताओं ने साम्प्रदायिकता के सवाल पर कभी न कभी ढुलमुलपन दिखाया। गाँधीजी ने कभी ढुलमुलपन नहीं दिखाया। इसी तरह मातृभाषा में शिक्षा का सवाल है। गाँधीजी मातृभाषा में शिक्षा को अनिवार्य मानते थे, हिंदी के प्रश्न पर वे हिंदी-उर्दू का भेद स्वीकार नहीं करते थे। हिंदी को राजभाषा और राष्ट्रभाषा बनाने का वे डटकर समर्थन करते थे। नेहरूजी इस नीति से सहमत नहीं थे। उसी तरह शिक्षा के बारे में उनका दृष्टिकोण बहुत व्यावहारिक था।

    गाँधीजी काम की शिक्षा और ज्ञान की शिक्षा में अंतर नहीं करते थे। इसलिए वे यह नहीं मानते थे कि शिक्षा कुछ विशेषज्ञों का क्षेत्र है और वह विशेषाधिकारियों का अधिकार है। विशेषज्ञ और विशेषाधिकार तभी होते हैं जब शेष के अधिकार नहीं होते। गाँधीजी इस भेदभावपूर्ण शिक्षा का विरोध करते थे। वे कर्म की शिक्षा और अक्षर की शिक्षा को जोड़कर देखते थे। वे कहते थे कि श्रम और शिक्षा साथ चलेगी। बढ़ई का लड़का अपने घर में ही लकड़ी का काम सीखेगा और इस प्रकार वह अपने हुनर में माहिर होगा। इसका उदहारण निराला के चतुरी चमार ने पेश किया जिसने अपने लड़के को निराला के पास भेजा कि मैं अपना हुनर सिखा दूँगा, तुम इसे अपनी शिक्षा दे दो! कोठारी कमीशन ने इस दिशा में एक प्रयोग किया। उसने सामाजिक दृष्टि से उपयोगी उत्पादक शिक्षा को पाठ्यक्रम के साथ जोड़ा। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इस उपयोगी शिक्षा के अंक बच्चे के मुख्य परिणाम से अलग रहते थे। जब सारे अंक जुड़ जाते थे, रिजल्ट तैयार हो जाता था, उसके बाद इसके अंक लगते थे। इसलिए रिजल्ट पर उसका कोई असर नहीं पड़ता था।

यह अमेरिका से लिया गया विचार था। गाँधीजी का विचार ऐसा नहीं था। गाँधीजी के हिसाब से बच्चा बीएड करे, यह जरूरी नहीं है शिक्षा के लिए, जो बढ़ई अपने बच्चे को अपना काम सिखायेगा, वह शिक्षक भी होगा और कारीगर भी। इस तरह श्रम और शिक्षा का अलगाव दूर होगा। श्रम और शिक्षा का अलगाव विशेषाधिकारी समाज की पहचान है। शिक्षा अगर काम से जुड़ेगी तो श्रमिक भी शिक्षित हो जायेगा। अगर काम (श्रम) से शिक्षा अलग होगी तो समाज के शिक्षित वर्ग का विशेषाधिकार सुरक्षित रहेगा। जो शिक्षित होगा वह शासन करेगा और जो श्रम करेगा वह शासित होगा। अक्षरज्ञान श्रेष्ठ होगा, उत्पादक ज्ञान हीन होगा। इससे समाज की विषमता दृढ़ होती है। विषमता के संस्कार बद्धमूल होते हैं। गाँधीजी की शिक्षानीति इस विषमता पर, विषमता के संस्कार पर चोट करनेवाली थी। उनके विचारों के आलोक में एक सच्ची जनतान्त्रिक और क्रान्तिकारी शिक्षानीति की बुनियाद रखी जा सकती है।

यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि इस पर गाँधीवादी सत्ता ने यानी गाँधीवादी राजनीति से उत्पन्न होनेवाली सत्ता ने कभी ध्यान नहीं दिया। इस बात की स्पष्ट आलोचना होनी चाहिए कि 1947 से 1977 तक काँग्रेस ने, 1977 से 1981 तक जनता पार्टी ने, दुबारा काँग्रेस, एनडीए, यूपीए और अब पुन: एनडीए ने गाँधीजी की शिक्षानीति को कभी स्वीकार नहीं किया। बल्कि वे सभी इसकी उलटी दिशा में चले। उलटी दिशा में चलने का जो परिणाम हुआ उसका केवल संकेत काफी है। विस्तृत विश्लेषण अपने में एक स्वतन्त्र विषय है। प्राइमरी स्तर की या स्कूल स्तर की शिक्षा पर गौर करें, कितनी तरह की शिक्षा एक साथ चल रही है। सरकारी शिक्षा, निजी शिक्षा, सर्वशिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, दून स्कूल की शिक्षा, प्रतिभा विद्यालय, मिशनरी शिक्षा, केन्द्रीय विद्यालय, सैनिक विद्यालय, कस्तूरबा विद्यालय, नवोदय विद्यालय, वायुसेना विद्यालय, दर्जनों प्रकार की प्रणाली एक साथ चल रही है जिसे एकरूपता देने का प्रयास एनसीईआरटी करती है लेकिन सबकी अपनी विशेषता बनी रहती है। 

इन विविध प्रकार की संस्थाओं में पाठ्यक्रम आदि के मामले में एकरूपता चाहे थोड़ी बहुत आ गयी हो। शिक्षा में समानता बहुत दूर का सपना है। प्रतिभा विद्यालय और नगर पालिका विद्यालय में ही इतना फासला है कि निजी और सरकारी स्कूलों की बात दूर रही। इस तरह गाँधीजी के सपने के अनुरूप सब बच्चों को एक जैसी शिक्षा देने के बजाय समांतरता की प्रणाली विकसित हुई। प्राथमिक स्तर से ही शिक्षा के इतने खंड हो गए, बच्चे इतनी तरह से पढ़कर निकलते हैं कि उनके बीच कोई सामंजस्य नहीं हो सकता। यह असामंजस्य समाज में अपना गुल खिलाता है। उच्चशिक्षा में भी कितनी तरह के निजी संसथान खुलने लगे हैं! पहले से चलनेवाले संस्थानों को स्वायत्तता के नाम पर निजी जैसा स्वरूप दिया जा रहा है। अपने साधन उत्पन्न करो, अपने मन की शिक्षा दो। जो जितना पैसा खर्च कर सकता है, उतनी उम्दा शिक्षा ले सकता है! इससे विषमता और विशेषाधिकार की प्रणाली और सुदृढ़ होगी। इसी के लिए वह लागू की जा रही है। इसे अग्रसर करने के लिए शिक्षा के बजट में लगातार कटौती की जा रही है, यह सार्वभौम परिघटना है। अमरीका में 1990-91 से और ब्रिटेन में उसी के आसपास से शिक्षा के बजट में भारी कटौती शुरू की गयी। अमरीका के 47 राज्यों में शिक्षा के बजट में कटौती की गयी तो उसके खिलाफ  सब जगह जोरदार विरोध हुआ। यही हाल ब्रिटेन में है, उसी के अनुसरण पर 1992 में तत्कालीन शिक्षामंत्री वस्तुत: मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह ने एक साक्षात्कार में कहा कि लोग ज्यादा हैं, साधन कम हैं, सरकार सबको उच्चशिक्षा कैसे दे? यह कथन 1935 में लार्ड मैकाले द्वारा दिए गए वक्तव्य से जरा भी अलग नहीं है जिसमें उसने कहा था, आबादी ज्यादा है, संसाधन कम हैं, सरकार का काम सबको शिक्षा देना नहीं है इसलिए वह केवल चुने हुए लोगों को शिक्षा देना चाहती है। आश्चर्य यह है कि ये लोग गाँधीजी की अगुवाई में अंग्रेजों से लड़कर आये थे। लेकिन गाँधीजी की जगह मैकाले की शिक्षानीति अपना रहे थे। भूमंडलीकरण के दौर में हम देखते हैं कि नवसाम्राज्यवादी नीतियों के उभार के साथ पुराने साम्राज्यवाद के आदर्शों को शिक्षा के लिए पुनर्जीवित किया जाने लगा है।

    परिणामस्वरूप विश्वविद्यालयों का निजीकरण किया जाने लगा है। जिसे आप लोग स्ववित्तपोषित कहते हैं, उस तरह के पाठ्यक्रम विश्वविद्यालयों में चलने लगे हैं। निजी विश्वविद्यालय अलग चालू हो रहे हैं। गुणवान शिक्षा के लिए विदेशी विश्वविद्यालय भी भारत में अपनी शाखाएँ खोलने को आतुर हंै। जिन्हें मान्यता भी मिलने लगी है। जिस तरह स्कूली शिक्षा निजी विद्यालयों के लिए शिक्षा की दूकान बन गयी है। उसी तरह उच्चशिक्षा में भी ये दूकानें तेजी से फैल रही हैं। लगभग सभी प्रदेशों की विधानसभाओं ने निजी विश्वविद्यालयों के लिए कानून पारित कर दिए हैं। संसद तो नयी नीति का जनक ही है। मैकाले के वंशज कैमरून साहब ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री की हैसियत से 2010 में यह भविषयवाणी की थी कि इक्कीसवीं शताब्दी में सबसे ज्यादा विकासमान व्यापार शिक्षा है, चौंकिए मत, उनके लिए शिक्षा व्यापार ही है और सरकार पूरी तरह व्यापारियों के हाथ में शिक्षा सौंपने पर आमादा है। यह काफी सांकेतिक है कि जिस बिड़ला-अम्बानी समिति की रिपोर्ट पर काम चल रहा है, उसके दोनों विशेषज्ञ देश के सबसे बड़े व्यापारी हैं, शिक्षाशास्त्री नहीं। यह तस्वीर साफ हो तो समाधान का रास्ता भी साफ होगा जिसका प्राथमिक सूत्र गाँधीजी के यहाँ मौजूद है।