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Monday 18 Jun 2018

'वडवानल’ नौसैनिकों के विद्रोह पर आधारित उपन्यास

 कम ऑन, ज्वाइन देयर,  गुरु की जाँच होने के बाद एक गोरे सैनिक ने पन्द्रह-बीस व्यक्तियों के गुट की ओर इशारा करते हुए कहा। गुरु को औरों के साथ बैरक में लाया गया। एक गोरे अधिकारी की देखरेख में छह-सात गोरे सैनिकों का झुण्ड लॉकर्स की तलाशी ले रहा था।

कम ऑन, हरी अप! ओपन योअर लाकर, आई वांट टू चेक इट, एक गोरे सैनिक ने उससे कहा।

गुरु ने उसे लॉकर दिखाया और चाभी निकालकर वह लॉकर खोलने के लिए आगे बढ़ा।

''चाभी मुझे दे और तू वहीं खड़ा रह। बीच-बीच में न अड़मड़ा।'' गोरा सैनिक उसे धमका  रहा था। ''और देख, सिर्फ पूछे हुए सवालों के ही जवाब दे। फालतू की बकबक करेगा तो    चीर के रख दूँगा ।''

गोरे ने गुरु का लॉकर खोला और भीतर का सामान बाहर फेंकने लगा।

''खान वाकई में है दूरदर्शी। मुहिम पर जाते समय उसने लॉकर साफ करने को कहा था।   पोस्टर्स, आपत्तिजनक कागज इक_ा करके जलाने को कहा था ।'' गुरु सोच रहा था।

''यदि लॉकर में गलती से कुछ रह जाता तो...''

मगर अब वह निडर  हो गया था। 'मिलता तो मिलता...क्या होगा? दो-चार महीनों की   कड़ी सजा। जानकारी हासिल करने के लिए यातना...ज्यादा से ज्यादा नौसेना से निकाल देंगे।   फाँसी तो नहीं ना देंगे? दी तो दी' गुरु के लॉकर की तलाशी समाप्त हुई। फर्श पर कपड़ों का ढेर पड़ा था। अन्य वस्तुएँ बिखरी पड़ी थीं। गोरे सैनिक ने लॉकर  का  कोना-कोना  छान  मारा,  वहाँ से निकला हुआ कागज का हर पुर्जा कब्जे में ले लिया और वह दूसरे लॉकर की ओर मुड़ा।

गुरु मन ही मन यह सोचकर खुश हो रहा था कि उसे डायरी लिखने की आदत नहीं है।

''साला आज का दिन ही मुसीबत भरा है। यह  अलमारी ठीक-ठाक करने के लिए कम से कम आधा घण्टा लग जाएगा, फिर उसके बाद डिवीजन, बारह से चार की ड्यूटी  यानी  नहाना-धोना वगैरहÓÓ अपने आप से बड़बड़ाते हुए वह लॉकर ठीक करने लगा।

''चाय ले।''दास चाय का मग उसके सामने लाया। गुरु तन और मन से पूरी तरह पस्त हो गया था। उसे वाकई में चाय की जरूरत थी। दास को धन्यवाद देते हुए उसने चाय का  मग हाथ में लिया ।

''दत्त पकड़ा गया ।'' दास बुदबुदाया ।

''क्या?'' गुरु चीखा। उसके हाथ की चाय छलक गई।

 ''चिल्ला मत। मुसीबत आ जाएगी ।''दास ने उसे डाँटा।

''कब पकड़ा गया? ''वास्तविकता को भाँपकर गुरु फुसफुसाया।''

''सुबह करीब तीन साढ़े तीन बजे ।''

''मदन   को मालूम है ?''

''मदन ने ही मुझे बताया। फालतू में भावनावश होकर लोगों का ध्यान अपनी ओर न खींचो। जहाँ तक संभव हो, हम इक_ा नहीं होंगे। दो दिन पूरी हलचल बन्द। बोस पर नजर रखना। यदि कोई सन्देहास्पद बात नजर आए तो सब को सावधान करना। मदन ने ही तुझे कहलवाया है ।''

दत्त उस रात्रि ड्यूटी पर गया तो बड़े बेचैन मन से।

'कल कमाण्डर इन चीफ आ रहा है और  मैंने कुछ भी नहीं किया। औरों की बातों में  आकर मैं भी डर गया। चिपका देता कुछ और पोस्टर्स, रंग देता डायस तो क्या बिगड़ता? ज्यादा से ज्यादा क्या होता...पकड़ लेते..Ó खुद की भीरुता उसके मन को कुतर रही थी।

बारह  बजे तक वह जाग ही रहा था।

'अभी भी देर नहीं हुई है । कम से कम पाँच घण्टे बाकी हैं । अब जो होना है, सो हो जाए। पोस्टर्स तो चिपकाऊँगा ही। फुर्सत मिलते ही बाहर निकलूँगा और दो-चार पोस्टर्स चिपका दूँगा । ''उसने मन ही  मन   निश्चय   किया,   'अच्छा हुआ कि कल शाम को खाने के बाद करौंदे की जाली में छिपाये हुए पोस्टर्स ले आया।Ó

ड्यूटी पर जाते समय उसने पेट पर पोस्टर्स छिपा लिये।

दत्त अपनी  वॉच  का  एक  सीनियर  लीडिंग  टेलिग्राफिस्ट था।  आज  तक  के उसके व्यवहार से किसी को शक भी नहीं हुआ था कि वह क्रान्तिकारी सैनिकों में से एक हो सकता है। इसी का फायदा उठाने का निश्चय किया दत्त ने।

रात के डेढ़ बजे थे। ड्यूटी पर तैनात अनेक सैनिक ऊँघ रहे थे। ट्रैफिक वैसे था ही नहीं। चारों  ओर  खामोशी  थी।  दत्त  ने  मौके  का  फायदा  उठाने  का निश्चय  किया। हालाँकि  किंग ने यह आदेश दिया था कि   रात में कोई  भी सैनिक बैरक से बाहर नहीं निकलेगा, परन्तु   कम्युनिकेशन सेन्टर के सैनिकों की आवश्यकता होने  पर  बाहर जाने  के  लिए  विशेष  'पास'  दिये  जाते थे। इनमें से एक 'पास' ड्यूटी  पर  आते  ही  दत्त  ने ले लिया था। उसने  एक  लिफाफा लेकर उसे सीलबन्द किया  और उस पर 'टॉप सीक्रेट' का ठप्पा लगाया। इसे जेब में रखा। यदि  किसी ने टोका तो ये दोनों चीजें उसे बचाने के लिए पर्याप्त थीं।

जैसे  ही  मौका  मिलता,  दत्त बाहर निकल जाता। अँधेरे  स्थान  पर  दो-चार पोस्टर्स चिपकाकर वापस आ जाता। उसका ये  पन्द्रह-बीस मिनटों के लिए बाहर जाना किसी को खटकता भी नहीं।

उसका चिपकाया हुआ हर पोस्टर सैनिकों को बगावत करने पर उकसाने वाला था। एक पोस्टर पर लिखा था- ब्रदर दिस इज़ द टाइम यू मस्ट हेट, एंड दिस इज़ द टाइम यू मस्ट लव। रिकग्नाइज़ योअर एनेमी, एंट हेट हिम। लव योअर मदर, द लैंड यू आर बौर्न।

दूसरे  पोस्टर  में  लिखा  था- ''दोस्तो, उठो, अंग्रेजों को और अंग्रेजी हुकूमत को हिन्दुस्तान से भगाने का यही वक्त है। नेताजी के सपने को  साकार करने का समय आ गया है। उठो। अंग्रेजों के विरुद्ध खड़े  रहो।

हम पर किये जा  रहे अन्याय को हम कितने दिनों तक सहन करेंगे? क्या हम नपुंसक हैं?

''क्या हमारा स्वाभिमान मर चुका है?''

''चलो, उठो! अंग्रेजी हुकूमत को नेस्तनाबूद कर दो ।जय हिन्द!

''सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा!''

रात के तीन बजे तक दत्त ने आठ-दस पोस्टर्स चिपका दिये थे। मगर   उसकी प्यास अभी बुझी नहीं थी।

घड़ी ने तीन  के  घण्टे  बजाये। कुर्सी पर बैठकर ऊँघ रहा दत्त चौंककर  उठ गया।

'और एक घण्टा है मेर पास। एक पन्द्रह-बीस मिनट का चक्कर,  चार-पाँच पोस्टर्स तो आराम से चिपक जाएँगे,'  वह अपने आप  से बुदबुदाया  और निश्चयपूर्वक उठ  गया। ठण्डे  पानी  से  चेहरा  मल-मलकर  धोया,  गोंद की बोतल ली। बोतल हल्की  लग रही थी। बोतल खाली हो गई   थी।   चिढ़कर उसने बोतल डस्टबिन में फेंक दी।

''फिर कित्थे चले, भाई ?'' ग्यान सिंह ने चिड़चिड़ाते दत्त से पूछा।

''क्रिप्टो ऑफिस जाकर आता हूँ,'' कैप उठाते हुए दत्त ने जवाब दिया।

''आज बड़े घूम रहे हो। क्या बात है?''

ग्यान का यह नाक घुसाना अच्छा नहीं लगा दत्त को। उसकी ओर ध्यान न देते हुए वह  क्रिप्टो ऑफिस गया। चुपचाप गोंद की बोतल उठाई।

आई नीड इट, लीडिंग टेल, मेसेज डीक्रिप्ट करते हुए भट्टी ने कहा।  

डोंट वरी यार; आई विल ब्रिंग इट बैक सून, दत्त बाहर निकला।

जहाँ जहाँ सम्भव हो रहा था,  वहाँ वह पोस्टर्स चिपकाता जा रहा था।  'अब यह आखिरी पोस्टर चिपकाया कि बस...।'' हर पोस्टर चिपकाते हुए वह अपने आप से यही कह रहा था। मगर काम का अन्त हो ही नहीं    रहा था।

''हर चिपकाया हुआ पोस्टर अंग्रेजी हुकूमत पर एक घाव  है,  चिपका और एक  पोस्टर,  मार  एक  और  घाव!''  पोस्टर  चिपकाने  के  बाद  वह  स्वयं से कहता।

दूर कहीं जूतों की आवाज आई। दत्त सतर्क हो गया। उसके  कान  खड़े हो गए। आवाज से लग रहा था कि एक से ज्यादा व्यक्ति हैं। आवाज निकट आ रही थी ।

'शायद ऑफिसर ऑफ दि डे की परेड होगी,   यह आखिरी पोस्टर...।''

जल्दी-जल्दी  वह पोस्टर चिपकाने लगा। जूतों की आवाज और  नजदीक आई ।

''अब छुप जाना चाहिए। वरना...''

उसने बचे हुए चार पोस्टर्स सिंग्लेट में छिपा लिये। बोतल  उठाई और    सामने वाली मेहँदी की चार फुट ऊँची बाँगड़ की ओर छलाँग लगा दी। वह बाँगड़ तो पार कर गया मगर हाथ की काँच की बोतल फिसल गई और खट से टकराई।

उस नीरव खामोशी में बोतल गिरने की आवाज ध्यान आकर्षित  करने  के  लिए पर्याप्त थी।  सब लेफ्टिनेंट  और  उसके  साथ  के  क्वार्टर  मास्टर एवं दो पहरेदार आवाज की दिशा में दौड़े। बैटरियों के  प्रकाशपुंज  शिकार को ढूँढ रहे थे। दत्त को  भागकर छुप जाने का मौका ही नहीं मिला ।

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