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Wednesday 20 Nov 2019

खण्डहरी के बीच कविता

लगभग आधी शती पूर्व बिना लाग-लपेट के मुक्तिबोध ने लिखा था- जाम गए, जाम हुए फंस गए

अपने ही कीचड़ में धंस गए

अंधेरे से दीया जलाने का माद्दा। यह दीगर है कि व्यवस्था बरदारों ने उन्हें व्यवस्थित नहीं होने दिया। कितने आचार्य वृंद पदारुढ़ हुए और सेवानिवृत्त हुए... खो गए। रचनात्मकता न मरती है न मारी जा सकती है। जितना दबाने की कोशिशें उतनी ही धारदार बनकर सामने आती है। डॉ. रामप्रकाश के सद्य: प्रकाशित कविता संकलन 'सड़क पर सांड' की एक कविता है- 'खंडहर', इस पर जाने के पूर्व यह जानना आवश्यक है कि उनकी कविताओं में समय का भयानक रौद्र रूप है तो उसी में सृजन के सूत्र। सृजन विराट नहीं लघु करता है और इसी लघु से विराट की विराटता, नहीं तो खंडहर या भग्नावशेष :'

भित्ति चित्र ही नहीं

मूर्तियां भी नहीं टिकती बहुत दिनों तक

वे भी चाहती हैं आदमी

अपने रखरखाव के लिए (सड़क पर सांड, पृ. 132) तुलना किसी की किसी से क्यों कर? हां ऐसा जरूर लगता है कि घर-घर में कुकुर की तरह कवियों में अरसे बाद ऐसी कविताएं सामने हैं जो विशाल अर्थविस्तार की दरकार चाहती हैं। श्रमसाध्य, पुनश्च-पुनश्च अध्ययन की मांग करती। समाज में घटित सब उत्तम तो नहीं। जिन उपलब्धियों की मुनादी पीटी जा रही है वे सुरीली नहीं कनफोड़ है। कहा जा रहा है कि सरल दिनों के लिए कड़े निर्णय जरूरी हैं। मजे की बात यह कि विशाल जनसमूह लफ्फाजी को मुंहबाएं सुन रहा है। करतल ध्वनि, और न करें तो व्यवस्था के विरोधी। उदस्तता के तबक में पैक्ड लार टपकाऊ अपचपूर्ण लजीज पकवान पकाती व्यवस्था।

राष्ट्र के रसोई घर में / कर्णधार रसोइये

गांधी कालीन कड़ाही में / दुर्भावनाओं का तेल डालकर

बदनीयती से करछुल से / स्वार्थ की हल्दी

लालच की मिर्च / सत्ता का गरम मसाला डालकर

बनाना चाहते उपलब्धियों के व्यंजन

गर्म कड़ाही की आंच में

मसाला जलने से आने लगी चिराइंद (पृ. 96)

'विषरस भरा कनक घट जैसे।' सेवा को प्रोफेशन बना लेने वाले राजनय बौद्धिक दर्शन की केंचुली पहने। प्रत्येक रचनाकार की अपनी विश्वदृष्टि होती है जिसके सहारे वह संसार को देखता, परखता और अनुभवों को अपनी रचना में परिभाषित करता है। वर्तमान शती में व्यक्ति और राज्य के रिश्ते इतने प्रभावी बन गए हैं कि उनके जाने बिना व्यक्ति की पहचान संभव नहीं हो सकती। जाहिर है रचनाकार को राजनीतिक ब्यौरों से उलझना पड़ेगा। राजनीति में कोई फकीर बनने नहीं आता। शक्ति सियासत का आधार और जातियां इसे चलाने के कलपुर्जे। कवि हार मान ले तो उसकी लेखकीय क्षमता ही प्रश्नांकित। ऐंठू, गब्बराओं को चेताती कविता 'सीढ़ी' की पंक्तियां :

मुस्तैद रहती है सीढ़ी रातो-दिन

कि जिनको भी चढ़ाया है उसने

मौका पडऩे पर उन्हें उतारा जा सके

जमीन पर सकुशल (पृ. 124)

यह मान लेना कि सिंहासन स्थायी है! ऐसा होता तो वर्तमान सिंहासन आरुढ़ के लिए यह नसीब ही नहीं होता। समाज की परत दर परत रहस्यात्मकता का पटाक्षेप करती चलती है। भारतीय सामाजिक ढांचे में अनेक दर्शनों, सिद्धांतों का निचोड़ है। यहां अपनी डपली अपनी तान नहीं चलती। प्रजा को ही शासक मानने वाली व्यवस्था में राजा-प्रजा के बीच भयावह गैप। जिम्मेदारियों से पल्ला झाडऩे वाले सबसे बड़ी पंचायत में खेल खेलते हैं। संसद एक गपशप की दुकान है- यह कभी लेनिन ने कहा था कि अब कविता बयां करती है कि इसमें गिद्ध बैठते हैं- नोचने खाने पर अपना चातुर्य चलाते हैं :

कुछ बरस पहले तक / आकाश में मंडराते हुए

दिख जाया करते थे गिद्ध

बात यह है कि उस समय तक

नहीं पहुंच पाती थी / उनकी दृष्टि / संसद तक

(पृ. 65)

कवि की जीवटता पर आगे बात करेंगे परंतु यहां कहे बिना नहीं रहा जाता कि भोला जनमानस इन गिद्धों तक अपनी फरियाद लगाता है कि हम तो आपकी बहसें सुनने को विवश हैं, जरा वक्त निकालकर हमारे मन की पीर भी सुन लीजिए। किसान की दशा बद से बदतर। 'होरी का गोदान कब तक पंडित दातादीन कराएंगे?' बुंदेलखंड, विदर्भ में यह आज भी जिंदा है। पूरे साल मर-खपकर जब बाजार से घर लौता है तो मुनाफा एक रुपिया। न किसान भगवान सुखी न मध्यवर्गीय चौपाया। आंकड़े चालू आहे- विकास दर में भारी इजाफा! तुम जनरल पब्लिक इन बातों को नहीं समझ सकते।  विवेच्य काव्य संग्रह में विशेष उल्लेखनीय है कवि का घिसे-पिटे चर्चा-मंचों से नये प्रसंगों की ओर बढऩा और नई बहसों की शुरूआत करना। 'सच तो यही है' कविता में रचनाकार व्यवस्था के इतर कलम के पहरुओं पर लेखनी चलाता है। मंगलग्रहीय शती में टाइम मैनेजमेंट और इवेन्ट मैनेजमेंट के पुरोधा नीचे क्यों देखे? और देखने का समय कहां? सो इलाहाबाद के पथ पर पत्थर काटती मजदूरनी नजर क्यों आए? आंकड़ों ने अकाल ही मिटा दिया तो फिर बाबा नागार्जुन और मुक्तिबोध अंधेरे में खो ही जाएंगे। कवि को मेघा के बरसे और माता के परसे भोजन की उत्कृष्ट प्रतीक्षा है। मंगल ग्रहीय शती में ग्रह ही गायब है। बेटियां पराये घर की और बेटे परायों की तरह। वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या चिंता का सबब पैदा करती है। 'संस्कृति से विच्छिन्न', 'कितनी खुशी होती है', 'गांव की ओर' और 'बबलू के पप्पा', लाशों के मुरमुटों में अपना स्वर्णिम अतीत समेट लेने की प्रेरणा भरते हैं। अराजक बाजारवाद स्वार्थ की तीखी मिर्च लगाकर रिश्तों में कड़वाहट भर रहा है;

समय के चूल्हे में / करीने से लगाई गई संस्कारों की लकडिय़ां

भावना की तीलियों से जलाई गई

परिवार रूपी कड़ाही में

पक रहे हैं रिश्तों के व्यंजन / ध्यान रहे

लगने न पाये / स्वार्थ की तीखी मिर्च का तड़का

(पृ. 120)

कड़ाही, चूल्हा और तमाम घरेलू चीजों के प्रतीक रामप्रकाश के यहां  बराबर दिखते हैं। संसद, घर-गांव के अलावा नये-नए मुद्दों पर रोटियां सेंकने वाले कवि के निशाने पर हैं। कठमुल्लों की नाना दुकानें हैं, जिसको जैसा मॉल चाहिए उपलब्ध है।

उसके लिए राम-रहीम में भेद नहीं। सबका पालनहार एक। परंतु शातिर ठेकेदार इसे एक होने नहीं देते :

सभी धर्मों के आराध्य / नहीं करते आपसे में बात

नहीं रहते हैं साथ-साथ / नहीं बतियाते एक साथ

सभी आराध्य चाहते भी होंगे / पर साथ रहने वाला मानव

नहीं चाहता कि / सभी आराध्य रहें एक साथ

(पृ. 72)

गद्य हो चुकी कविता में लयात्मकता की ध्वनि / कवि का उपजीव्य खंडहर है। भाषा संपदा में तद्भव-तत्सम, देशज और अवधी की गंगा-जमुनी तहजीब है तो बैसवारी ठाठ की ठसक। हो सकता है जूझने में रचनाकार अकेला हो, मगर निपनिया नहीं क्यों कि शब्द शक्ति का मान है कवि को और इसी से जीवटता भरने की अकड़़ :

सत्य कबीरा की यह बीना / बरसे कम्बल भीगे पानी

संसद भी भाषा अब खोटी / चिपकी सत्ता रोटी-बोटी

खुद का वेतन खुद का भत्ता / खूब समेटो अपनी सत्ता

टूट गई धूमिल की घानी / बचा न तेल रहा न पानी

(पृ. 149)

खंडहरों में कविता कल्पना पर विश्वास तो करती है परंतु चमत्कारिता से रोकती भी है। होने को वही सूचकांक, बाजार चिंताएं, प्रकृति, घर-बार, अम्मा-बप्पा, खंडहरी यात्राएं हैं परंतु रिश्तों की गरमाहट, कोयल की कूक, कलम की ताकत अपराजित जीवटता और सृजन-स्रोतों का व्यापक अर्थ/गब्बरायी व्यवस्था के प्रति क्रांति, जलते-दहकते कुंदों में नहीं, धीमी, धीमी लौ-लय में। 

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