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Monday 09 Dec 2019

जनता का साहित्य

प्रेमचंद की लोकप्रियता और प्रभाव का एक कारण यह भी था कि वह साहित्य की भाषा को जनसाधारण की भाषा के नजदीक ले आए थे। जनवादी-प्रगतिशील साहित्य का भी शायद यही उद्देश्य है कि साहित्य अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे, दर्शक जी भी उसी परंपरा के लेखक हैं। उनकी कहानियां बौद्धिक आतंक से लगभग मुक्त हैं, इसीलिए उन्हें पढ़ते समय पाठक अपने ऊपर किसी प्रकार का दबाव महसूस नहीं करता। दर्शक प्रगतिशील एवं प्रतिबद्ध साहित्यकार हैं यद्यपि संगठन की गतिविधियों, बहसों या जलसे-जुलूसों में इनकी भागीदारी उतनी नहीं रही फिर भी उस सोच को उन्होंने अपनी कहानियों में  बड़े मनोयोग एवं ईमानदारी से उकेरा है। वर्षों से वे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य हैं, किन्तु पार्टी की आंदोलनात्मक गतिविधियों में उनकी भागीदारी उतनी नहीं रही, पर पार्टी की सोच-समझक के वह हमेशा कायल रहे हैं जिसका प्रमाण उनकी रचनाओं में मिलता है। लगभग चार दशकों से दर्शकजी रचनारत हैं। उनके छ: कहानी संग्रह तथा एक उपन्यास 'संघर्षों के बीच' तथा 'काम के मोती' शीर्षक से उनकी आत्मकथा भी प्रकाशित हो चुके हैं। उन्हें प्राप्त अनेक सम्मान एवं पुरस्कार उनकी रचनात्मक गुणवत्ता के साक्षी हैं। इस बीच हिन्दी कहानी को लेकर जो आंदोलन समय-समय पर होते रहे हैं उन्होंने दर्शकजी को कभी प्रभावित नहीं किया इसलिए उनकी कहानियां में भाषागत एवं शिल्पगत चमत्कार नहीं के बराबर है।

कहानियों में एकरसता या विषय के दोहराव का दोष इसलिए भी कहानीकार पर नहीं लगता क्योंकि वह अर्जित अनुभवों में किसी प्रकार की वायवी कल्पना की सहारा नहीं लेते। जैसे देखा, सुना, समझा उसे कहानी में यथावत उकेर दिया। उनकी कहानियों का प्रतिनिधि पात्र पाठकों तक रचना के सरोकारों और उद्देश्यों को स्पष्ट कर देता है और यह प्रतिनिधि पात्र प्राय: लेखक का प्रतिरूप ही होता है। वह साम्प्रदायिकता विरोधी हो, स्त्री अथवा दलितों के दमन-शोषण से संबंधित हो। अशिक्षा अथवा अंधविश्वास के बारे में हो, दर्शकजी ने प्राय: हर कहानी में इन सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध आक्रोश व्यक्त किया है।

वैश्वीकरण के जमाने में विश्व साहित्य एक स्थान पर सुलभ हो गया है, यह स्वाभाविक भी है कि साहित्य के पंडितों का ध्यान तुलनात्क पद्धति की ओर आकृष्ट हो, किन्तु भारत जैसे विकासशील देश में यह प्रभाव या प्रसार हर जगह देखने में नहीं आता। यहां 'रोज कुआं खोद-रोज पानी पी' की श्रेणी के लोग भी हैं, बावजूद विज्ञापनों के प्रसार और उपभोक्ता संस्कृति तथा बाजार के दबावों के अपनी आदिम गति से चलने वाले लोग आज भी है, जहां एक ओर गगनचुम्बी माल हैं वहीं ढिबी की रोशनी में चलने वाली गुमटियां भी हैं जो हर रोज आटा-चावल-चीनी-चायपत्ती खरीदने वालों को अधिक रास आती हैं, इसी संदर्भ में दर्शकजी की कहानियां अपनी तरह से अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए हैं।  'फक्कड़ मास्टर' आज भी किसी गांव की किसी टूटी-फूटी पाठशाला में किन्हीं अभावग्रस्त छात्रों को स्नेह सहानुभूति का संबल देकर जिंदगी के रास्तों पर पुख्ता कदम रखने में सहायक होंगे। 'पंछी बाबा' को आप किसी महानगर की पॉश कॉलोनी में ढूंढने की कोशिश करेंगे तो निराश होंगे। दर्शकजी की कहानियां जिस समय और जिस परिवेश में रची गई उन्हें उसी परिवेश में देखने, पढऩे, समझने में अधिक सहायता मिलेगी। साम्प्रदायिकता विरोधी कहानियों का परिवेश भी आज के आतंकवाद से कहीं मेल नहीं खाता, साम्प्रदायिकता का रूप-स्वरूप एवं दायरा इन कहानियों के दायरे से बिलकुल अलग है, इसलिए दोनों की तुलना या तर्क की कोई गुंजाइश नहीं। तात्कालिक समय में यह भले ही अंग्रेजों की लगाई हुई आग हो पर आज उसका परिदृश्य सर्वथा बदल चुका है। अब यह क्षेत्रीय, देशीय सहायता न होकर अंतरराष्ट्रीय समस्या हो गई है। इसलिए इस परिदृश्य से अलग इन कहानियों की प्रासंगिकता ढूंढनी होगी।

दर्शक आदर्शोन्मुख यथार्थ को चित्रित करने में विश्वास करते हैं किन्तु समय की गति बड़ी तीव्र है वह इस दौड़ में साथ नहीं निभा पाते। जीवन मूल्य बड़ी तेजी से बदल रहे हैं। शिक्षा को लेकर उनका विश्वास बना हुआ है कि शिक्षित मनुष्य भलेमानस एवं आदर्श नागरिक होते हैं, उनसे कोई भूलचूक या अपराध संभव नहीं हो सकता। वह लिखते हैं- ''जहां इल्म की रौशनी है वहां जागृति अवश्य आएगी।'' इसी शीर्षक की कहानी की बनावट और बुनावट भी कुछ इसी तरह की है, कि पाठक के मन अनायास कई सवाल घिर आते हैं। आज डॉक्टर, इंजीनियर और ऐसे ही उच्च शैक्षिक डिग्रियों वाले आतंकवाद के पैरोकार हैं। पुस्तक में इस विषय से संबंधित 'मोहिसना', 'अनोखी सजा' शीर्षक की मासूम कहानियों को इस संदर्भ से काट कर देखें तो उनमें आसानी से पैठ सकेंगे। इस सबके बावजूद शिक्षा के महत्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। एक स्त्री को शिक्षित करने का अर्थ पूरे परिवार को शिक्षित करना होता। इस उक्ति को आप झुठला नहीं सकते। इस संदर्भ में ये कहानियां देखें तो इन्हें सार्थक ही पाएंगे।

वास्तविक साहित्य हमेशा जनचेतना का अंश रही है। वह चेतना भी विकास कर पाने में सहायक ही नहीं पूरी तरह सक्षम भी हैं। इसी जनचेतना से सामाजिक चेतना का निर्माण होता है। तात्कालिक यथार्थ लेखक के मन में निरंतर घुमड़ते रहते हैं, प्रत्येक सच्चा लेखक अपनी रचना की सामग्री के लिए संपूर्ण दृष्टि से उस सारे तथ्यों की पड़ताल करता चलता है, जो सामाजिक जीवन से गहरे जुड़े होते है। साहित्य की कोई भी विधा कला की एक विशेष ऊंचाई पर पहुंचकर सफल हो सकती है, किन्तु श्रेष्ठ वह तभी होगी जब वह समय की आवाज बनती है और समय द्वारा खड़े किए तमाम प्रश्नों से दो-दो हाथ करने की उसमें अकुलाहट होती है। दर्शकजी भी इसके कोई अपवाद नहीं है।

''मेरी चुनी हुई कहानियां'' से पूर्व ''मेरी श्रेष्ठ कहानियां'', ''मेरी साम्प्रदायिकता विरोधी कहानियां'' संकलन भी प्रकाशित हो चुके हैं। जाहिर है उस प्रकार कहानियों को दोहराव हुआ होगा। प्रस्तुत संकलन में 42 कहानियां हैं किन्तु यह चुनाव किसने किया और किस आधार पर किया इस बात का कोई संकेत इस पुस्तक में नहीं मिलता। रचना का कालक्रम भी नहीं दिया या जिससे तात्कालिक परिवेश के आधार पर रचनाओं को देखा-परखा जा सके या उसके क्रमिक विकास को रेखांकित किया जा सके। प्रेमचंद की अनेक कहानियां पाठक आज भी पढ़ते हैं तो उनमें उन्हें समय की आवाज सुनाई देती है किन्तु प्रेमचंद के समकालीन साहित्यकारों के नाम तक आज पाठकों को स्मरण नहीं है। रचना कैसे समय की चौहद्दियों को तोड़कर आगे निकल जाती है, यह रचना के कथ्य एवं कला-कौशल पर निर्भर करता है। अनुभव अक्ल स्मृति के सहारे सशक्त रचना नहीं लिखी जा सकती, यथार्थ की जहां पुनर्रचना की जाती है वहीं भाषा शिल्प के नए द्वार खुलते हैं, दर्शक जी की कहानियों, खूबियों-खामियों को इसी आधार पर देखा-परखा जा सकता है।