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Monday 09 Dec 2019

नहीं भूले वे दिन

 

साहित्य में, प्राचीन काल से ही रचनाकार अपने शहर का आत्मीय चित्रण करते रहे हैं। कालिदास हों या केशवदास। इनका अपने नगर के प्रति अनुराग उनके काव्य में झिलमिलाता है। तब से अब तक अपने भी, नगर को देखते-परखने के कई अंदाज किस्से, कहानियों, कविताओं, गीतों में प्रचलित रहे हैं। हिन्दी फिल्मों के गाने- 'जरा हट के, जरा बच के ये है बाम्बे मेरी जान' या 'ईंट की दुक्की पान का इक्का कहीं जोकर कहीं सभा है, सुनो जी, ये कलकत्ता है' आज भी मजा देते हैं। निकट अतीत यानी बीसवीं सदी के पूर्वाद्र्ध तक हमारे देश में शहरों के अपने चेहरे थे। उनकी अपनी बोली, बानी, यहां तक कि गालियां भी, खान-पान और पोशाकों की अपनी-अपनी अलग छटा थी। रजवाड़ों में इन विशेषताओं का रंग और भी गाढ़ा था। इतिहास के उतार-चढ़ाव में उनके रंग बदलते गए फिर भी वे अपनी अलग पहचान रखते थे। कला, नगर रचना, स्थापत्य ही नहीं लोगों के मिजाज और जीवन शैली। इतना ही नहीं बहुत छोटी-छोटी बातों की अपनी शान थी। छग के भटा, दमोह के पान, कटंगी के गुलाब जामुन, गाय-भैंस के लिए धमधा, सहसपुर का चारा, रतनपुर के तालाब और भी न जाने कितनी छोटी-छोटी चीजों की चमक वहां के निवासियों के मन में चमक पैदा करती थी। एक बात में समानता थी वह थी इत्मीनान भरी जिन्दगी। कमजोरियों और सामाजिक विडंबनाओं के बावजूद अपने शहर से आदमी का जुड़ाव।

इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूं है।

सीने में जलन आंख में तूफान सा क्यूं है।

यह आज की कैफियत है। यूं इस शेर में 'शहर' अपने अर्थ विस्तार में उपस्थित है लेकिन अपने अभिधेयार्थ में भी यह आम के जीवन का सत्य  है। शहर तो शहर, कस्बे और गांवों तक कौन परेशान नहीं है। मारा-मारी, भागदौड़, अजनबीपन, अकेलापन, हाहाकारी रूप में चारों ओर दिखलाई देती है। बिना चेहरे की भीड़ जिसका अपने शहर से कोई लगाव नहीं है। अमीरों की तिजोरी में जनता का सहज जीवन और कानूनबंद है और बाहर शहर बाजार में बदल गया है। आमजन की व्यस्तता ऐसी कि पड़ोसी तो छोडि़ए, अपने लिए तक समय नहीं है। तनाव और व्यवस्था के द्वारा दिए गए दुख दर्द के इलाज के लिए सरकारें, मूर्खता के शिखर पर बैठकर आनंद विभाग निर्मित कर रही हैं जहां कागजी आंकड़े खिलखिला रहे हैं। यह बैरोमीटर है प्रसन्नता के मापने का। यह सत्य है कि दुख दर्द, गरीबी, विषमता, पहले भी थी लेकिन नागरिक के पास अपना एक 'शहर' या 'देश' होता है जो उसके दिल के कोने में उसे अपनेपन का एहसास देता था। जो उसमें इत्मीनान भरी आश्वस्ति को जिन्दा रखता था।

यह भूमिका आवश्यक लगी क्योंकि जब भोपाल निवासी जनाब श्याम मुंशी की किताब 'सि$र्फ नक्शे कदम रह गये' को हम पढ़ते हैं तो एकदम लगता है कि हमने कुछ अलग हटकर पढ़ा है। लेखक एक मित्र की तरह आपके कंधे पर हाथ रखकर पुराने शहर भोपाल की गलियों-रास्तों, बाजारों को घुमाता है। एक ऐसे शहर में जो अभी भी मौजूद होकर अब वही नहीं है। जहां कई रंग हैं और कई चेहरे जिन पर कोई मुखौटा नहीं है। जो खांटी चेहरे हैं। शहर क्या, कहिये कि एक मेला है। और अब आप वहां से बाहर निकलते हैं तो कुछ आश्चर्यचकित होकर उसी शहर को देखते हैं जिसकी शक्ल बदल गई है पर नाम वही है। फेस ऑफ जैसा कुछ हो गया है। वहां के बाशिन्दे विगत के नेपथ्य में चले गए जो कभी इस मंच पर जलवा आ$फरोज थे। जिनकी वजह से शहर में रौनक थी और खुश रहने के बहाने थे। श्याम मुंशी ने अपने एक आलेख का शीर्षक दिया है- 'इस रेल पेल में हम भोपाल को कहां ढूंढे।'

इतिहास में पुराने शहरों के किस्से आमतौर पर राजा-रानियों और बड़े लोगों के आसपास सैरगाह, महलों या उनमें चलने वाले षडयंत्रों, आदि के इर्द-गिर्द बुने जाते रहे हैं। इस प्रसंग में 'गुज़िश्ता लखनऊ' का नाम सहज ही याद आता है जो दिलचस्प तो है लेकिन वहां लखनऊ के आम आदमी के सुख-दुख केन्द्र में नहीं है। शहर भोपाल के चमकदार अतीत का पर्यवसाय नवाबों की ज़िंदगी  में होता है। 'दास्ताने भोपाल' का जिक्र भी होता है लेकिन सर्वाधिक रेखांकित की जाती है भोपाल की शाहजहां बेगम की दो किताबों का- 'एन एकाउंट ऑफ माई लाइफ' जो उनकी पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद है और 'ताजुल इकबाल।' भोपाल नवाब के खानदान के ही शहरयार खां जो पाकिस्तान में बस गये थे उन्होंने 'बेगम्स ऑफ भोपाल' शीर्षक से ग्रंथ की रचना की। ज़ाहिर है कि इसमें नवाब खानदान का इतिहास और उनके रहन-सहन, एक खास समय की राजनीति की झलक है। बेशक, इन किताबों में ऐतिहासिक घटनाओं की जानकारी है किन्तु यह राजसी वातावरण के आसपास घूमती हैं। यह इतिहास का पुराना नज़रिया  है जहां राजाओं-महाराजाओं की सूचियां और उनके क्रियाकलापों का वर्णन होता था। किसी भी शहर का यह अधूरा इतिहास ही कहा जाएगा। श्याम मुंशी भोपाल शहर की तीन शताब्दियों के काल प्रवाह में उन्हें भी स्थान देते हैं।  लेकिन इस मान्यता के साथ कि इन बड़े लोगों का अस्तित्व  आम जनता के दम पर था। वे लिखते हैं-

'हमारा भोपाल भी इस नाइंसाफी से बच नहीं सका है। महलों के बाहर भी जिंदगी थी। गली-कूचे थे, बाजार थे, छोटे-छोटे मकान थे, उनमें रहने वाले लोग थे। महलों के $िखदमतगार थे, मजदूर थे, किसान थे, शायर थे, अदीब थे, दानिश्वर थे तो पागल भी थे। गम-खुशी, हंसी- मज़ाक , छेड़छाड़, तू-तू-मैं-मैं, छोटे-मोटे लड़ाई झगड़े, दादागिरी, तो अदबी महफिलें भी। मगर जिन्दगी का अस्ल रंग हमेशा हाशिये पर रहा। उसे सही तवज्ज़ो नहीं मिली। मेरी कोशिश होगी कि मैं इस हाशिये को तोड़ूं क्येंकि मैं खुद भी तो एक आम आदमी ही हूं।'

आगे बढऩे से पहले कुछ पंक्तियां श्याम मुंशी के विषय में। पीढिय़ों से भोपाल के निवासी श्याम मुंशी ने नवाब़ी के आखिरी दौर को बचपन में देखा होगा। इसके अलावा अपने बुजुर्गों से पुराने शहर के कितने ही किस्से सुने होंगे। आजादी का दौर, भोपाल रियासत का 1949 में भारत में विलय होना और उसके बाद के वर्षों में उस शहर भोपाल को भी उन्होंने देखा-जाना होगा जो तब्दील होकर एक बड़े शहर में बदल रहा था और धीरे-धीरे अपना चेहरा और मिजाज खोता जा रहा था। मज़ा यह है कि श्याम मुंशी की शख्सियत में अभी भी भोपाल झिलमिलाता है। उनकी बोली-बानी, पहनावे और तबियत में बर्रुकाट भोपाली की एक झलक है। उर्दू, हिन्दी और अंग्रेजी पर पकड़ है। संगीत और कलाओं में खासी पैठ है। इतना ही नहीं जनाब ने सबसे छोटी सारंगी का निर्माण भी किया है जो बा$कायदा बजाई भी जी सकती है। प्रसिद्ध सारंगी नवाज़ उस्ताद लतीफ खां के शागिर्द श्याम मुंशी की किताब का शीर्षक 'सिर्फ नक्शे कदम रह गये' पुराने भोपाल की संगीत परंपरा पर लिखे गए चार लेखों 'मूसी$की सिर्फ नक्शे कदम रह गये' से लिया गया है।

पुराने भोपाल को याद करते हुए श्याम मुंशी जो किताब रचते हैं उसमें उस्ताद लतीफ खां, दिलीप कुमार, आईएएस नरोन्हा, अशोक बाजपेयी जैसी हस्तियों को याद करते हैं तो नज्जा पहलवान, दादा खैरियत, शायर ढेड़स, सद्दा मियां को भी वे नहीं भूलते। गांधी की विरासत और मजदूर सभा (कम्युनिस्ट पार्टी) की गतिविधियों को समेटते हुए वह पतंगबाजी, कबूतरबाजी, पटियाबाजी तथा  ज़र्दा -पर्दा और गर्दा को शहर की रौनक के रूप में दर्ज करते हैं। उस गुम हो चुके शहर के इन रंगों के अलावा वह तहजीब के निर्माण में पारिवारिक परंपराओं के योगदान को इन शब्दों में रेखांकित करते हैं-

'कोई भी तहज़ीब को वुजूद में आती है वह किसी राजा-नवाब या किसी एक शख़्स का करिश्मा नहीं होती। तहजीबें बनती हैं लोगों से, अवाम से, उनमें सब शामिल होते हैं, राजा-नवाब, ओहदेदार, अदीब, फनकार, गरीब, मजदूर जिनका तआल्लुक अलग-अलग मज़हब और फ़िरको से होता है, मगर तहज़ीब एक होती है। तहज़ीब में ज़बान, लबो लहजा, लिबास, फनो-अदब तौर-तरीके शामिल रहते हैं।‘

किताब में 47 आलेख हैं जिन्हें आप चाहें तो 'स्मृति आख्यान’ कह सकते हैं। विश्वनाथ त्रिपाठी ने अपनी कृति 'नंगातलाई का गांव’ के लिए इसी पद का प्रयोग किया है। श्याम मुंशी ने बहुत शालीनता से अपने को छिपाकर रखते हुए, अपने पूर्वजों के विषय में 'अदब और तहज़ीब का दरिया’ शीर्षक आलेख में अपने पूर्वजों और परिवार के विषय में लिखा है। यदि किताब के समर्पण की ओर ध्यान न दिया जाए तो यह जानने में चूक हो सकती है कि तहज़ीब के दरिया में संतरण करने वाले मुंशी बनवारी लाल लेखक के पिता थे।

इस किताब को संस्मरण तो कहा नहीं जा सकता। इसे जन इतिहास कह सकते हैं जिसमें भोपाल के निवासियों की जीवन पद्धति का एक खाका है। यूं पूरी किताब दिलचस्प है लेकिन लेखक द्वारा अपने पुराने शहर को देखने के नजरिये से कुछ बिन्दु ध्यातव्य हैं। मुझे सर्वाधिक महत्वपूर्ण बिन्दु शहर भोपाल के नाम काम को लेकर की गई चर्चा है। उसकी धारणा है कि इतिहास के सत्य पर पर्दा डालकर एक विशेष प्रकार की सामंती और वर्णवादी दृष्टिकोण को जडऩे की प्रवृत्ति है। 'भूपाल’ से 'भोपाल’ और फिर उसे 'भोजपाल’ नाम देने की कोशिश। 'भूपाल’ पद आदिवासियों के इतिहास से उभरकर आया है। किताब के प्रथम आलेख का शीर्षक है 'भूपाल-ओ-भोपाल’। तंज  कसते हुए श्याम मुंशी ने टिप्पणी की है हम गुजिश्ता 'भूपाली’ से 'भोपाली’ हो गए। प्रथम आलेख या कहें किताब का प्रारंभ इन पंक्तियों से हुआ है-

'भोपाल, गोंडवाना में गोंड राज का हिस्सा रहा है। गोंडवाना पर सन् 359 से सन् 1781 तक 63 गोंड राजाओं ने हुकूमत की। इन्हीं गोंड राजाओं में सन् 650 के आसपास 10वां राजा भूपाल शाह हुआ, जिसने तकरीबन दस बरस हुकूमत की। इसी भूपाल शाह के नाम पर गोंडो ने अपनी एक बस्ती का नाम भूपाल रखा, जिसे हम भोपाल कहते हैं। भोपाल का असल नाम भूपाल ही था, इसके सुबूतों का मैं भी गवाह रहा हूं।‘

लेखक दो सुबूतों को इस रूप में पेश करता है। 1. लेखक ने अपने बचपन में यानी लेख लिखने के लगभग 55-60 बरस पहले अपने बुजुर्गों के मुंह से शहर का नाम भोपाल नहीं बल्कि 'भूपाल’ ही सुना था। 2. पहले रेलवे स्टेशन का नाम भोपाल नहीं बल्कि 'भूपाल’ ही था। इतना ही नहीं रेलवे टिकट भी 'भूपाल' नाम से जारी होता था।  भूपाल से भोपाल बने शहर को अतीतजीवी सामंती युग के मोहग्रस्त लोगों ने 'भोजपाल’ नाम देने की साजिश भी की जो सफल नहीं हो सकी।

सामंती युग की कुलीनता के पोषक उच्च भ्रू-मानसिकता के विरुद्ध श्याममुंशी कुछ ऐसी सूचनाएं भी देते हैं जो भोपालवासियों और बाहर के लोगों को भी आश्चर्यचकित कर देती है। एक तो यह कि भोपाल के बड़े ताल को झील समझना गलत है। वे भोपाल को ताल-तलैयों का शहर मानते हैं। वे लिखते हैं- 'भोपाल का बड़ा तालाब भोपाल वालों को गोंडों का ही दिया हुआ नायाब तोहफा है। इसका राजा भोज से कोई ताल्लुक नहीं है।‘ उनकी सूचना के अनुसार 'राजा भोज द्वारा बनाया गया तालाब इससे काफी फासले पर भोजपुर के पास और मंडी दीप के चारों तरफ फैला था, जिसे होशंगशाह ने तुड़वा दिया था।‘ भोपाल के संबंध में एक दिलचस्प कहावत लंबे अरसे से प्रचार में रही है-

तालों में भोपाल ताल और सब तलैये

रानी तो कमलापति और सब गधैये

कमलापति अठारहवीं सदी के गोंड राजा निज़ाम शाह की रानी थी। इसके अलावा एक और छोटा बांध कालिया गोंड का बनवाया था। उसके कुछ स्रोत कालिया गोंड ने ढूंढे थे। इस जनश्रुति पर एक कविता प्रसिद्ध कवि राजेश जोशी ने लिखी है। दरअसल लेखक उस विचित्र सी सवर्णवादी हिन्दू मानसिकता की ओर संकेत करता  है जो सवर्ण राजाओं का जयगान करती है। वनवासी-आदिवासी प्रधानों, मुखियाओं और राजाओं के सुकर्मों का श्रेय सवर्ण राजाओं को देने की आदी रही है। आदिवासी भूपाल के बरक्स या राजा भोज के महत्व का यह स्वीकार है। हम अपने समकाल को देखें तो यही न•ाारा दिखलाई दे रहा है। सामंती शौर्य की दक्षिणपंथी-अतीतजीवी हास्यास्पद नौटंकी हमारे सामने है। इतिहास के ऐसे ही कुछ गुमशुदा पृष्ठों को लेखक खोलता है जिसमें भोपाल के कुछ भवनों, सड़कों और घटनाओं की जानकारी मिलती है। संवेदनशील लेखक पुराने शहर के कई दिलचस्प किरदारों के माध्यम से तत्कालीन सामाजिक जीवन और लोगों के मिजाज का परिचय देता है जिससे इस कृति की पठनीयता में वृद्धि होती है। यह किताब ऐसी पोट्रेट गैलरी है जिसमें बड़े लोगों के अलावा, बल्कि उनसे कहीं अधिक उन आम आदमियों के जीवंत चित्र हैं जिनसे समाज में रौनक होती थी। उसमें हॉकी के फुर्तीले खिलाड़ी हैं तो दार-उल-कोहला के परम आलसी सदस्य हैं। और कमाल की  बात है कि आलसियों की इस अद्भुत संस्था के स्थापक प्रसिद्ध शायर जिगर मुरादाबादी थे जो भोपाल आते जाते रहते थे। और उस सद्दा मियां का भी जिक्र है जो जिगर साहब से यह कह सकते थे- 'यार जिगर साहब आप बहुत अच्छे शेर कहते हैं शेर पढ़ते भी खूब हो लेकिन खां तुम हो बला के हराम सूरत।‘ ये वही शख़्स हैं जिन्होंने बंबई में समुद्र देखकर टिप्पणी की थी- यह तो अपने भोपाल के बड़े तालाब से भी बड़ा है। भोपाल रियासत के धर्मशास्त्री हैं तो फेरी लगाने वाले, तेल बेचने वाले, पहलवान नज्जा दादा और दादा खैरियत जैसे लोग भी अपनी-अपनी खास अदा के साथ वहां उपस्थित हैं। श्याम मुंशी लिखते हैं- 'दादा खैरियत बड़े शहरों में पैदा नहीं होते वह तो छोटे कस्बों में पैदा होते हैं जहां मोहब्बत, खुलूस और इंसानियत होती है। दादा खैरियत आज भी हमारे जहनों में जिंदा हैं और रहेंगे।‘ लेखक के •ोहन में यह बात शायद इसलिए आई कि प्रांत की राजधानी बनकर भोपाल बड़े शहर में बदल गया जहां आधुनिक सभ्यता के सारे गुण हैं बस, मोहब्बत और इंसानियत, भले ही खत्म न हुई हो, किन्तु बेहद तरल हो गई है। भोपाल की पटिया तहज़ीब का मिटना ऐसी ही दुर्घटना है। श्याम मुंशी मानते हैं कि भोपाल में 1992 में हुए फसाद का कारण यह है कि पटिया तह•ाीब खत्म हो गई। इस बिन्दु पर लेखक से शत-प्रतिशत सहमत भले ही न हुआ जा सके पर यह एक बड़ा कारण तो था ही। दरअसल देशव्यापी साम्प्रदायिक तनाव राजनीति की देन थी। किन्तु यह सही है कि पटिया संस्कृति लोगों के आपसी सुख-दुख को  बांटने वाली दोस्ताना जीवन पद्धति थी जिसे विकास के नाम पर तोडऩा एक गुनाह जैसा ही था। इस बेहूदे विकास चिंतन पर उसका अफसोस इन शब्दों में व्यक्त होता है- लम्हों की $खता थी सदियों ने सजा पाई।

सिर्फ नक्शे कदम रह गए' आद्यंत दिलचस्प और पठनीय है। मैं केवल दो उदाहरणों के माध्यम से उसकी मनोरंजकता और संवेदनशीलता को रेखांकित कर रहा हूं। नवाबों-राजाओं का अपने आसपास कुछ विचित्र चीजों को रखने और नमूने किस्म के आदमियों को पालने का शौक होता था जिससे वे आम आदमियों से भिन्न दिखे अैर चर्चा में बने रहें। शायर ढेंढस ऐसे ही शख़्श थे जिन्हें नवाब हमीदुल्लाह ने अपने किसी महकमे में मुला•ामत की सूची में नगीने की तरह जड़ा। शायर साहब का तुर्रा यह कि वे कभी दफ्तर नहीं गए लेकिन उनकी तनख्वाह बाकायदा उनके घर पहुंचाई जाती है। एक बार नये सेक्रेटरी साहब विभाग में आए तो यह देखकर, जाहिर है कि उन्हें जायज गुस्सा आया तो उन्होंने ढेंढस साहब की मुअतली का आदेश उनके घर भिजवा दिया। ढेंढस ने साहब के कारिन्दे को रोका और मुअतली के कागज के पीछे शेर लिखकर वापस दे दिया।

शाने लकब सुनते थे बरतरफी और बहाली

यह मुअतली किस भोसड़ीवाले ने निकाली

जब नाराज सेक्रेटरी ने नवाब साहब से इस हरकत की शिकायत की तो उन्होंने कहा- सेक्रेटरी साहब, ढेंढस का जवाब देखने के बाद भी आपकी समझ में नहीं आया कि उन्हें वजीफा क्यों दिया जाता है।

एक अन्य चरित्र का मार्मिक चित्रण श्याम मुंशी ने 'शंभू डांसर' शीर्षक से किया है। शमसुद्दीन बेहद गरीबी में जिन्दगी गुजारने वाले जिंदादिल इंसान थे। वे आजीविका के लिए गल्ला मंडी में हमाली करते थे। बड़ी बात यह कि वे अपने काम में मज़ा लेते थे। आश्चर्यजनक रूप से वे अखाड़े में पहलवान के रूप में कुश्ती भी लड़ते थे। जहां लेखक की एक विशेष टिप्पणी यह भी है कि भोपाल के बहुत से पहलवान रोजी-रोटी के लिए हम्माली करते थे। यह सूचना सामंती समय की चमक के मिथ को तोड़ती है। लेखक ने आश्चर्य के साथ शम्भू को अखाड़े में एक पहलवान से कुश्ती लड़ते देखा। कुश्ती बराबरी पर छूटी। किसी ने शम्भू से कहा कि आज तो तुम हारते-हारते बचे। शम्भू का उत्तर था 'मियां मैं पिट भी जाता तो मेरा क्या जाता, यह कुश्ती तो दूध, घी और बादाम से सूखी रोटी की थी। $गनीमत है कि सूखी रोटी की इज्जत बच गई।' उसी शम्भू के डांसर रूप पर श्याम मुंशी सर्वाधिक चकित हुए जब उन्होंने किसी कार्यक्रम में, बा$कायदा संगतकारों के साथ शम्भू को नृत्य करते देखा। 'शम्भू' अनोखा किरदार है जिस पर न्यौछावर हुआ जा सकता है और वक्त को कोसा जा सकता है। लिखने को बहुत कुछ लिखा जा सकता है लेकिन अंत में इस कृति भी भाषा पर दो शब्द। पुराने भोपाल की भाषा का अपना  लहज़ा  था और सामान्य जन के बोलने की एक अदा थी। अदा कैसी थी इसकी झलक श्याम मुंशी अपने चरित्र के माध्यम से दे चुके हैं। स्वयं उनकी भाषा का एक अपना भोपाली अंदाज है। जिस तरह दिल्ली, लखनऊ या हैदराबाद की अपनी भाषा थी वैसे ही नवाबी दौर की औपचारिकता से सनी हुई उर्दू मिश्रित हिन्दी श्याम मुंशी की कृति को पठनीय बनाती है। यह पारंपरिक  लहज़ा  और आम बोलचाल के मिश्रण से बना रसायन है। उनके अंदाजे बयां का एक ही उदाहरण पेश है। भोपाल के रचनाकारों के विषय में चर्चा करते हुए अंत में वे लिखते हैं- 'और आखिर में यह खाकसार श्याम मुंशी। लोगों का कहना है कि यह भी अफसाने तो लिख लेता है।'

यह किताब का अंतिम वाक्य है। वाह, क्या बात है जनाब श्याम मुंशी साहब!