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Tuesday 15 Oct 2019

प्रश्नचिन्ह

निभा रहा मौसम खेती से, सोलह आने साथ

जब चाहा तब धूप खिल गई मनचाही बरसात

 

रौनक है पूरे जवार में खेती हरी-भरी है

परी सो गई थी किस्मत की अब जाकर उतरी

भाग लिखेगी कलम जादुई जादू की दवात

 

अगर साथ दे दिया डीह ने मसला खूब सजेगा

सोने की माटी से फिर से सोना ही उपजेगा

पूरे साल मिलेगा सबको अपने घर का भात

 

सोच रहा बुधुवा उधार की खाई पट जाएगा

लेकिन फसल जवान हुई तो कीमत घट जाएगी

करजा फिर जस का तस होगा ज्यों पुरइन का पात

 

नये सिरे से नई लड़ाई फिर से सभी लड़ेंगे

कुछ तो बच जाएंगे लेकिन कुछ बेमौत मरेंगे

कौन पचा ले जाएगा शह किसे मिलेगी मात

 

बेवकूफ है खेती केवल सारा जग पंडित है

उपज बढ़ी तो दाम घटेंगे कैसा अजब गणित है

प्रश्न चिन्ह आंखों में लेकर मौन खड़ा देहात