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Thursday 16 Aug 2018

विजयपर्व

विजयपर्व

    1

इससे बड़ी

और कौन सी जीत होती

दशानन तुम्हारी

कि वर्ष दर वर्ष

बगैर नागा

नियत समय पर

विजयपर्व के तहत

दसों दिशाओं

गली मोहल्लों

चौराहों पगडंडियों

गांव, कस्बों और शहरों में

जलाये जाने के बावजूद

उस राख के

ठंडी होने से पहले ही

तुम उठ खड़े होते हो

विजयी मुद्रा में

अगले बरस के

ठीक वैसे ही तमाशे के लिए

और अट्टाहास करते हो

अपने दसों मुखों से

किसी राम की विजय पर ।

    2

कुछ ज्यादा ही

कड़ा दंड नही था क्या

दशानन

एक अनंत अनवरत

मृत्युदंड से

वर्ष दर वर्ष

तुम्हें गुजरते देख

सोचती हूं मैं।

तुम कोई बेजुबान

दबे  कुचले

आम औसत आदमी तो नहीं थे

जिसे किसी भी आरोप मे

हिरासत में डाला जा सकता हो

बिना जुर्म साबित हुए।

या ढहाया जा सकता हो

इनकाउंटरों में।  

तुम तो लंकापति थे

सोने की नगरी के राजा।

आकाश पृथ्वी

और पाताल के विधाता भी।

तुम्हारे तो सौ खून माफ ही होने चाहिए थे

राजशाही नहीं लोकशाही में भी।

सत्ता के अहंकार

कानून की हिकारत

और लालसाओं के समवेत

उन्मत्त महापर्वों

और अनुष्ठानों के इस वक्त में

तुम्हारा किया तो

कहीं से भी

अपराध की परिभाषा तक में नहीं आता।

काश तुम

इसी युग मे होते यहां।

हमारे ही महान गणराज्य के

सांसद, विधायक, सचिव

न्यायाधीश, चयनकर्ता

या कुछ भी होते

समृद्ध, प्रभावी, शक्तिशाली।

तो तुम्हारे चेहरे पर

नहीं लगते कोई दाग

और एकाध छींटे आते भी कभीकभार

तो धो दिये जाते तत्काल

इंस्टेन्ट चमकाने वाले साबुनों से।

लेप लगा दिये जाते

महंगे प्रसाधनों के।

रोशनी और कैमरे के कोण

साध लिए जाते

चेहरे पर गरिमा और गंभीरता के

कवच पहना दिये जाते।

देवता से राक्षस

और राक्षस से देव बनाना तो

बाएं हाथ का खेल है

प्रचार माध्यमों के लिए।

संचार और प्रसार के

तमाम उपकरण

थमा दिये जाते तुम्हारे ही हाथों।

सवाल पूछे जाते

उस अपह्रत सीता से ही।

लांछन लगाए जाते

घर की देहरी के बाहर

किसी अजनबी से मिलने के

मकसद ढूँढे जाते।

तुम्हें तो बताया जाता

देशद्रोही साजिशों का शिकार।

बहुत सी कहानियाँ गढ़ी जाती

दरबारी लेखकों के द्वारा।

आर पार की इस लड़ाई में

छिप कर किए हुए घात

निर्णायक साबित हुए थे

  3

अयोध्या की

निर्वासित महारानी

नहीं होती अगर

वह तुम्हारी अपहृता

तब तो वैसे भी

नहीं उठना था

दशानन!

तुम पर कोई सवाल।

किसी अपराध के होने का

संदेह तक।

तुम्हारा वह  दंड

औरत के अपमान

अथवा अपहरण के लिए नहीं था।

दरअसल

वह तो कोई मुद्दा था ही नहीं

न उस वक्त

और न आज भी।

एक प्रतिशोध का दंड मिला था तुम्हें।

औरत की अस्मिता

उसका हक नहीं

अपनी शक्ति और सामथ्र्य की

गर्जना के लिए था।

प्रतिशोध का

कारण भी वही था

और परिणाम भी।

सच कहो दशानन

अपनी बहन नहीं होती वह अगर

दर्द और अपमान से छटपटाती हुई

तो जंगलों मे घूमती

किसी ऐरी-गैरी औरत का अपमान भी

प्रतिशोध जगाता क्या तुममें?

 

     4

विमर्शों के तमाम

शोर शराबों के बावजूद

हर सीता को ही

झेलना होता है

अंतत: एक अनिवार्य निर्वासन।

गुजरना होता है

संदेह और हिदायतों के

अनवरत दायरों से।

पूर्व इतिहास के

प्रमाणित दस्तावेजों से

रहन-सहन आचरण से

कई-कई अग्नि परीक्षाओं से

निकालना होता है बेदाग।

एक तीखी सनसनाती

चटपटी खबर हो जाने से

अपने को बचाने के लिए

जाने-अनजाने

बचाना होता है कई बार 

खूंखार दरिंदों को।

 

       5

सीता का जीना

या जगते रहना

कोई मायने नहीं रखता था

न ही शूर्पणखा का मान अपमान।

मायने रखता था, तो केवल            

उन साम्राज्यों, परिवारों, खानदानों का

बल-पराक्रम, वैभव, गौरव, मर्यादा और महत्व

जिसके लिए

युद्ध भी किया जा सकता था

 

प्रतिद्वंद्वी के साथ

और राजाज्ञा कह कर

निर्वासन का दंड भी थोपा जा सकता था

अपनों पर ।

वरना कैकेयी को भी

एक वृद्ध सम्राट की

तीसरी रानी बनाने का प्रस्ताव

खारिज किया जा सकता था

उसी सम्मान की दुहाई दे कर ।

मगर तब उसकी

कीमत चुकानी होती

संपूर्ण नगरी को।

जबकि कीमत

औरत ही चुकाए तो ठीक होता है

सम्मान या अपमान की

इच्छा और महात्वाकांक्षा की

जय और पराजय की

चरित्र और उच्छृंखलता की।

यह अतीत भी है

और वर्तमान भी।