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Monday 18 Jun 2018

वे अनैतिक को खुद ही वरते हैं

अपनी प्रजा को मार, मरते हैं

लोग लेने को सुविधा नाजायज़

भ्रष्ट होते हैं, भ्रष्ट करते हैं।

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पद की ताकत भी है सियासत में

रुतबा, इज्जत भी है सियासत में

आप गर भ्रष्ट हैं तो दौलत भी

खूब शोहरत भी है सियासत में

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करता हथियार, अमन की बातें

करता पतझर ही चमन की बातें

पग के नीचे न धरा है जिनके

कर रहे हैं वे गगन की बातें

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दुख का इतिहास नहीं हो जाए

सुख है कल त्रास नहीं हो जाए

डर है सत्ता के नशे में आकर

आम यह खास नहीं हो जाए

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नव्य का अधिग्रहण जरूरी है

सोच का संस्करण जरूरी है

विज्ञ नेतृत्व के लिए-वाणी

शुद्धतम आचरण जरूरी है

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सच की सत्ता कभी न क्षय होती

शक्ति सब झूठ की ही व्यय होती

देर लग जाती युद्ध में लेकिन

अंतत: सत्य की विजय होती

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खुद से भी बदगुमान करता है

बेरहम, बेईमान करता है

मद ही सत्ता का सत्ताधीशों को

बेअदब बदजुबान करता है।

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कोई रिश्ता न ठान लेता है

दोस्त, दुश्मन न मान लेता है

वो है हथियार, आंख से वंचित

जिसपे चल जाए, जान लेता है

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कम से कम एक विवर होगा ही

हो बड़ा छोटा मगर होगा ही

ढूंढ निश्चित ही मिलेगा तुझको

है जो दीवार तो दर होगा ही

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गर सियासत में ही पडऩा है यहां

तो सगों से भी झगडऩा है यहां

युद्ध कुरुक्षेत्र, सियासत जिसमें

तुझको अपनों से भी लडऩा है यहां

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जिस्म में गर्म खून रहने दे

और दिल में सुकून रहने दे

जिन्दगी जी तो साथ जज़्बे के

जोश भी रख, जुनून रहने दे

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वक्त ने चांटे वे जड़े हैं हमें

शूल से आंख में गड़े हैं हमें

दृश्य जो देखते नहीं बनते

दृश्य वो देखना पड़े हैं हमें

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दर्प-भंजन ही नहीं कर पाता

मान-मर्दन ही नहीं कर पाता

सोचता हूं अहम का कर दूं, पर

मैं विसर्जन ही नहीं कर पाता।

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बात अचरज की ये बड़ी देखी

आंख धरती में ही गड़ी देखी

जो पिन्हाता था खुद ही हथकडिय़ां

उसके हाथों में हथकड़ी देखी

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जाल कुछ ऐसा पसारा जाए

बिन फंसे वह न दुबारा जाए

जिन्न दहशत का जो बाहर है उसे

उसकी बोतल में उतारा जाए।

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भाग्य का हमको कभी बल न मिला

हमको ही प्राप्ति का कौशल न मिला

सोना मिट्टी से मिला लोगों को

हमको पंकज से भी परिमल न मिला।

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पिछले अनुभव से खौफ खाती है

कल्पना मात्र ही डराती है

फिर महायुद्ध की हो आहट तो

नस्ल मानव की कांप जाती है

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रोशनी हर दिशा से लपकेगी

तेज इतनी कि आंख झपकेगी

जब अंगारे निचोड़े जाएंगे

बांधकर धार आग टपकेगी

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प्यार भरपूर यहां पाएं हम

सुख से दो रोटी कमा-खाएं हम

आ गया रास हमें तो यारो।

ये शहर छोड़ कहां जाएं हम।

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दिल, जिगर, सर की न बुझने पाये

वह सुखनवर की न बुझने पाये

याद रखना कि किसी हालत में

आग भीतर की न बुझने पाये।

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कोई निश्चित उपाय करता है

जिसका उसको प्रदाय करता है

देर हो सकती है कभी लेकिन

अंतत: वक्त न्याय करता है।

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वह घटाता तो बढ़ा भी देता

वह गिराता तो चढ़ा भी देता

 

न्याय करता है समय, वह सबको

पाठ सुख-दुख के पढ़ा भी देता।

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लोग वर को भी शाप करते हैं

वे हंसी हित विलाप करते हैं

कितना विपरीत आचरण उनका

पुण्य करने को पाप करते हैं।

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जो भी बिक जाए, उसकी किस्मत है

उच्च कीमत से उसकी इज्जत है

सब बिकाऊ यहां है मेले में

हर खिलौने की अपनी कीमत है

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आप तो व्यर्थ क्रोध करते हैं

बच निकलने का शोध करते हैं

जब उतरना नहीं है रण में तो

क्यों नपुंसक विरोध करते हैं।

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पाता क्या है वो बताता क्या है

करता क्या है वो जताता क्या है

आदमी करता दिखावा खुद को

होता क्या है वो दिखाता क्या है।

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सोचता कब? मनन नहीं करता

नव्य का उत्खनन नहीं करता

मूल वह सूझ संगणक में कहां

यंत्र मौलिक सृजन नहीं करता।

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सत्य ही खोट नहीं हो जाए

ब्रम्ह पर चोट नहीं हो जाए

इंसा रोबोट को रचते-रचते

खुद ही रोबोट नहीं हो जाए।

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प्रेम अनबन न कहीं हो जाए

मन ये उन्मन न कहीं हो जाए

शुभ है दुश्मन भी बने दोस्त मगर

दोस्त, दुश्मन न कहीं हो जाए।