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Thursday 16 Aug 2018

न्यू इंडिया की त्रासदी

बिहार में गरीब बच्चों की जान की कीमत बीते 5 सालों में दोगुनी हो गई है। याद करें जुलाई 2013 की वह त्रासदी, जिसमें जहरीला मध्याह्नï भोजन बच्चों को परोसा गया था और 23 बच्चे तड़प-तड़प कर मर गए थे। तब भी नीतीश कुमार मुख्यमंत्री थे और भाजपा विपक्ष में थी। नीतीश कुमार ने तब मृतक बच्चों के परिवारों को 2-2 लाख रुपए मुआवजे का ऐलान किया था। विपक्षी भाजपा ने तब विरोध, प्रदर्शन, बंद सारे राजनीतिक प्रहसन किए थे। पांच साल बाद बिहार के गरीब बच्चे एक बार फिर त्रासद मौत का शिकार हुए।

मुजफ्फरपुर के मुजफ्फरपुर-सीतामढ़ी एनएच 77 के दोनों ओर बसे धर्मपुर में बीते माह स्कूल के बच्चे छुट्टी के बाद घर लौट रहे थे, तभी एक तेज रफ्तार कार ने उन्हें रौंद दिया, जिसमें 9 बच्चों की मौत हो गई। यह गाड़ी भाजपा नेता मनोज बैठा की बताई जा रही है, जो पहले फरार हुआ , बाद में उसने समर्पण कर दिया। पहले तो भाजपा यह मान ही नहीं रही थी कि ऐसा कोई व्यक्ति पार्टी में है। लेकिन फिर मनोज बैठा को पार्टी से निलंबित कर भाजपा ने खुद ही साबित कर दिया कि आरोपी उसका सदस्य था। बहरहाल, नीतीश कुमार अब भी बिहार के मुख्यमंत्री हैं और भाजपा उनके साथ सत्ता में भागीदार है, तो उसने इन बच्चों की मौत पर विरोध-प्रदर्शन नहीं किया। इस बार यह जिम्मा तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राजद ने उठा लिया। नीतीश कुमार ने इस बार मृतक बच्चों के परिजनों को 4-4 लाख के मुआवजे का ऐलान किया। यानी पांच साल में सरकार की निगाह में बच्चों की जान की कीमत दोगुनी हो गई है।

सरकार ऐसे मुआवजे देकर शायद अपना अपराधबोध थोड़ा कम कर लेती हो, या शायद सत्ताधीशों में इतनी संवेदनशीलता भी नहीं बची कि ऐसी दुर्घटनाओं पर उन्हें दर्द होता हो, वे केवल जनता को दिखाने के लिए मुआवजे का ऐलान करते हैं। उन्हें यह नजर ही नहीं आता कि एक बच्चे की मौत से पूरे परिवार के सपने कैसे टूट जाते हैं।

हमारे प्रधानमंत्री बार-बार न्यू इंडिया का जाप करते हैं। क्या वे मासूमों के जनाजे पर न्यू इंडिया की इमारत खड़ी करना चाहते हैं? धर्मपुर में जो हादसा हुआ, वह महज सड़क दुर्घटना नहींंं है, यह एक गंभीर अपराध है। इस घटना की प्रत्यक्षदर्शी एक बच्ची ने बताया कि कैसे वे सब छुट्टी के बाद सड़क के दूसरी ओर बसे अपने घरों की ओर जा रहे थे, तभी अचानक जोर से आवाज आई, उसने पलट कर देखा तो उसके कई सहपाठी खून से लथपथ सड़क पर पड़े थे। इसी तरह एक और प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि गाड़ी की टक्कर ऐसी थी कि बच्चे सड़क पर बिखर गए, कुछ उछलकर पेड़ों से जा टकराए।

धर्मपुर के कई गरीब परिवारों के बच्चे स्कूल पढऩे जाते थे, जबकि उनके मां-बाप चरवाहे, मजदूरी जैसे काम करते थे। अधिकतर मां-बाप अनपढ़ हैं, लेकिन बच्चों का भविष्य संवर जाए, इसलिए उन्हें स्कूल भेजते थे। राज मिस्त्री का काम करने वाले इंद्रदेव तो अपनी मृत बच्ची के अंतिम संस्कार में नहीं जा पाए, क्योंकि इसी दुर्घटना में उनका बेटा भी घायल हो गया और वे उसका इलाज कराने अस्पताल में थे। मौत का यह भयावह मंजर धर्मपुर के लोगों को केवल इसलिए देखना पड़ा, क्योंकि गाड़ी चलाने वाले में जरा भी इंसानियत नहीं थी।

चालक अगर शराब के नशे में नहीं था, तब भी सत्ता का नशा उस पर था, इस बात से इन्कार नहींं किया जा सकता। जिस गाड़ी से बच्चों को कुचला गया, उस पर बीजेपी महादलित प्रकोष्ठ का बोर्ड लगा था। और हम जानते हैं कि पूरे हिंदुस्तान में सत्ता की सनक दिखाने के लिए राजनीतिक दलों के नेता, कार्यकर्ता अक्सर अपनी पार्टी, प्रभार या पदनाम का बोर्ड गाडय़ों पर लगाकर शान से घूमते हैं और कोर्ई कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चुनावों से थोड़ी फुर्सत मिले, तो वह न्यू इंडिया की इस विडंबना पर भी कुछ फरमाएं।