Monthly Magzine
Thursday 16 Aug 2018

मौसम की मदहोशी का खुमार : रानीखेत

उत्तराखण्ड की पहाडिय़ों में मसूरी, नैनीताल निश्चित रूप से बड़े ही महत्त्वपूर्ण पर्यटन केन्द्र हैं। देश-विदेश में उनकी पहचान है। मसूरी तो मैं काफी पहले ही जा चुका था। अलीगढ़ के निकट पहाड़ी सैरगाहों में नैनीताल है, लेकिन मेरी इच्छा नैनीताल जाने की अपेक्षा रानीखेत जाने की अधिक थी। असल में हमारे विश्वविद्यालय का एक पुराना गेस्ट हाउस रानीखेत में स्थित है। यह बात तो मुझे काफी पहले से ही ज्ञात थी, लेकिन कभी ध्यान नहीं दिया। इधर जबसे पर्यटन की प्रवृत्ति में तेजी आयी तो फिर रानीखेत का ध्यान आया। वहाँ विश्वविद्यालय के द्वारा नियुक्त केयटेकर अखलाक साहब का फोन नम्बर लेकर उनसे बात की। उनसे बात करने के बाद लगा कि वह बड़े ही दिलचस्प इंसान हैं। फिर तो उनसे बातचीत करने का यह सिलसिला चल निकला। वहां जाने की इच्छा और बलवती होती गयी। संपर्क का सिलसिला बने लगभग दो वर्ष हो गये लेकिन परिस्थितियाँ ऐसी नहीं बन पायीं कि हम लोग वहाँ जाएँ। हालांकि उनसे बातचीत का जो सिलसिला आरम्भ हुआ था वह जारी ही रहा। मैं उन्हें दिलासा दिलाता रहा कि बस हम लोग जल्दी ही आने वाले हैं। इस बीच हमने कई यात्राएँ कर लीं। असल में वहाँ सपरिवार यानी भाइयों और उनके बच्चों के साथ जाने की योजना ही बाधा बन रही थी। एक बार तो कार्यक्रम लगभग बन कर स्थगित हो गया। दो हजार पन्द्रह के अक्तूबर माह में कोलकाता घूमकर आये ही थे इसलिए बजट भी अभी कहीं जाने की इजाजत नहीं दे रहा था। पत्नी समीरा की तबियत भी खराब थी। उनकी शुगर भी काफी बढ़ी थी। छोटे बेटे अम्मार की परीक्षा समाप्त होने के तीन-चार ही दिन बाद बड़े अशार की भी बारहवीं कक्षा की परीक्षा समाप्त हो चुकी थी। परीक्षा के एक महीने बाद ही उनकी इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा की तारीख थी। होली की छुट्टियाँ और इतवार मिलाकर दो-तीन आकस्मिक अवकाश के साथ मुझे पाँच दिन की छुट्टियाँ मिल रही थीं। न जाने क्यों एकाएक मेरे मन में रानीखेत जाने की बात आ गयी। समीरा का बीमारी के कारण मानसिक संताप बढ़ता ही जा रहा था। कहीं-न-कहीं मेरे मन में यह भी था कि हो सकता है कि इन्हें वहाँ जाकर कुछ चैन मिले। मैंने जब यात्रा की योजना रक्खी तो दोनों बच्चे उखड़ गये। न जाने क्यों उनके प्रतिरोध के कारण मेरी इच्छा और बलवती होती जा रही थी। समीरा का कहना था कि कोई जरूरी नहीं कि दोनों बच्चे साथ ही चलें। अशार लगभग अठारह साल के होने वाले हैं, फिर भी हमारे लिए बच्चे ही हैं। लेकिन अब वह ऐसे परिन्दों के बच्चे की तरह हैं कि कब घोंसला छोड़ खुले आकाश में विचरण के लिए फुर्र हो जाएँ। मैं इन जाते हुए लम्हों को अभी कुछ दिनों और काबू में किए रहना चाहता था इसलिए एक टूक फैसला सुना दिया कि जाएँगे तो सब। समीरा भी अपने स्वास्थ्य के कारण बहुत उत्साहित नहीं दिख रहीं थीं। किसी तरह समीरा को अपने पाले में करके बच्चों से मान-मनुहार करने लगा। पहले अम्मार तैयार हुए फिर समीरा की कोशिशों से अशार भी तैयार हो गये। योजना बनी कि चौबीस मार्च यानी कि होली के दिन हम लोग सुबह निकलेंगे। लोगों ने कहा कि होली के दिन निकलना ठीक नहीं है। क्योंकि जगह-जगह सड़कों पर भी लोग पी-पाकर हंगामे करते हैं। बात सही थी। मुझे तो जैसे मौका ही मिल गया। मैंने सोचा कि बच्चे फिर न मुकर जायें इसलिए रात में योजना बनी कि कल यानी तेईस को ही निकल चलते हैं। मैंने विभाग में अवकाश की सूचना भिजवा दी। उसी समय समीरा ने तैयारी आरम्भ कर दी। उनका तैयारी का काम युद्ध स्तर पर होता है। वही हुआ। दिन में डेढ़ बजे निकलना था। रानी खेत में गेस्टहाउस शहर से दूर जंगल के बीच है। अखलाक साहब ने बता दिया था कि आप यहाँ कम-से-कम एक समय का खाना खुद बनाएँ। गैस की व्यवस्था हम कर देंगे। चावल, मसाले, चाय के सामान के साथ नीबू और खीरा, प्याज एवं नमकीन बिस्किट की खरीदारी के साथ केयर टेकर अखलाक साहब की फरमाइश पर पाँच किलो डालडा वनस्पति और सारी खरीदारी में सुबह से दोपहर हो गयी। दरअसल हम लोगों का ख्याल था कि दोपहर में निकल जाएंगे तो आठ बजे रात तक पहुँच जाएंगे और अगले सारे दिन आराम किया जायेगा। इंटरनेट महोदय के अनुसार यात्रा का समय लगभग आठ घंटे का है। होली के दिन वैसे भी निकलना ठीक नहीं रहेगा इसलिए बहुत तीव्रता से तैयारी के बावजूद हम लोग दो बजे के बाद ही निकले।

अलीगढ़ से निकलकर अनूपशहर होते हुए गंगा पार करके हम लोग शाम होते-होते मुरादाबाद पहुँच गये। सबको भूख भी लग गयी थी। फिर रामपुर होते हुए रुद्रपुर मार्ग पर एक ढाबे पर चाय पी गयी। समय की योजना बिगड़ती दिख रही थी। उत्तराखण्ड की सीमा पर पहुँचते-पहुँचते अँधेरा होने लगा था। हल्द्वानी पहुंचते-पहुंचते रात पूरी तरह से उतर आयी थी। काठगोदाम से पहाड़ की ऊंचाई आरम्भ हो गयी। ड्राइवर जब्बार की कुशलता के संबल पर हम लोग बेफिक्र थे। पर जैसे-जैसे देर हो रही थी घबराहट होने लगी थी। असल में अभी रात में पहाड़ी यात्रा का किसी को कोई अनुभव नहीं था। अखलाक साहब बराबर संपर्क में थे। उन्हीं के संपर्क के संबल पर आगे बढ़ते ही जा रहे थे। रानीखेत के लिए नैनीताल से पहले ही कोई रास्ता था। हम लोग उसे ढूँढ नहीं पाये। स्थान सुनसान था। दरअसल पहाड़ों पर रात बहुत जल्दी उतर आती है। कोई स्थानीय व्यक्ति दिख भी नहीं रहा था। अखलाक साहब ने कई बार रास्ता समझाने की कोशिश तो की, लेकिन समझ में नहीं आया तो निर्णय यह लिया गया कि नैनीताल चलते हैं। वहीं रात्रि विश्राम होगा। थकान भी प्रभावी हो रही थी। बच्चे उकता गये थे और समीरा पर उनकी बीमारी का प्रभाव दिखाई देने लगा था।

नैनीताल रात के आगोश में रोशनी से नहाया हुआ मन को मोह रहा था। कार को नैनीझील के पास पार्क करके होटल की तलाश में निकल पड़े। ठंड भी लग रही थी। होली की छुट्टियों के कारण होटल भरे थे। कई होटलों में गये तो वह अनाप-शनाप पैसे बता रहे थे। यह भी पता चला कि कल यानी होली के दिन सब कुछ बन्द रहेगा। यहाँ तक की कार भी दोपहर बाद ही मार्ग पर आ सकती है। अखलाक साहब अभी भी यही कहे जा रहे थे कि आ जाइये। बस अब दो-पौने दो घंटे का सफर और है। किसी तरह के डर की कोई बात नहीं है। सबसे ज्यादा समीरा ही थकी थीं, लेकिन जब उन्होंने भी यही तै किया कि चला जाय तो सबकी हिम्मत बढऩे लगी। जब्बार मियां तो गाड़ी का स्टेयरिंग पकड़ते ही जिन्नात हो जाते हैं। आज तक कभी नहीं कहा कि मैं थक गया। अशार जो कि जाने को तैयार नहीं थे लेकिन होटल के रेट सुनकर वह भी तैयार हो गये। हम लोगों ने हिम्मत संजो ही ली। बस भुवाली में सेनेटोरियम के गेट पर कुछ-कुछ डरे से चौकीदार से रास्ता पूछा। आगे एक बाजार में दो-एक पुलिस वाले मिले। उन लोगों ने बताया कि लगभग बीस किलोमीटर बाद एक पुल पार कर मुडऩा होगा। हम लोग आगे बढ़ते रहे। रात का सन्नाटा बहुत तेजी से बढ़ता जा रहा था। सड़क पर इक्का-दुक्का मिलने वाले घर और दुकानें मानो कब के नींद के आगोश में जा छुपे हों। रास्ते में घरों के सामने स्कूटर मोटर साइकिल और कहीं-कहीं कार यूँ बाहर खड़े दिखे। हम सभी कल्पना करने लगे कि अगर ऐसा हमारे यहाँ हो तो ऐसे-ऐसे हिम्मत वाले हैं कि कोई बड़ी गाड़ी लाकर इन सभी वाहनों को लाद ले जायेंगे। उल्लेखनीय यह है कि यह सब देखकर रास्ते का भय भी जाता रहा। सड़क बिल्कुल नयी और चौड़ी थी। जब्बार को दिन की अपेक्षा रात में गाड़ी चलाने में अधिक आसानी हो रही थी। दरअसल घुमावदार सड़क पर रोशनी के कारण दूर से ही उनके आने की आहट मिल जाती थी। बीच में एक स्थान पर एक छोटे से रेस्टोरेंट में दो लोग आइपीएल का मैच देखते मिले। उनसे रास्ता पूछा। पता चला कि हम सही मार्ग पर हैं इसलिए हम लोग थोड़े आश्वस्त होते आगे बढ़ते रहे। अन्तत: रात के सन्नाटे को चीरते अन्जान रास्ते को पार करते हुए हमारी मंजिल आ ही गयी। अखलाक साहब के निर्देश पर मोबाइल की मदद से हम लोग खुदा-खुदा करके गेस्ट हाउस पहुँच ही गये।

यूरोपीय शैली युक्त बंगलों-भवनों के साथ किसी यूरोपीय नगर जैसा अनुभव देने वाला रानीखेत 1869 में ब्रिटिश आर्मी के कैप्टन रॉबर्ट ट्रुप द्वारा आर्मी के लिए खोज कर बसाया गया। इस बेहद खूबसूरत कस्बे के इतिहास को लेकर किवंदती भी है। यह कुमाऊँ के चंद राजवंश के राजा सुखदेव (सुधरदेव) की पत्नी रानी पद्मावती से जुड़ी है। रानी पद्मावती ग्रीष्मकालीन प्रवास हेतु इसी स्थान पर (रानीखेत) हरे भरे खेतों में आकर विश्राम करती थीं। वह इस स्थान की सुन्दरता से इतना अभिभूत हो गई कि उनके कारण राजा सुधारदेव ने यहाँ पर एक महल की निर्माण करवाया। कहा जाता है कि रानी द्वारा खेतों में आकर प्रवास करने के कारण ही इस स्थान का नाम रानीखेत है।

रानीखेत वर्तमान में भी कुमाऊँ रेजीमेंट का मुख्यालय है। यह नगर कैंट क्षेत्र के प्रबंधन में आता है इसलिए वहाँ के लोगों का मानना है कि संभवत: इसलिए देश-दुनिया में जिस गति से दूसरे नगरों और कस्बों का विकास हुआ है उस गति से इसका विकास नहीं हुआ है, इसके बावजूद नगर के कैंट क्षेत्र में होने का ही लाभ यह है कि रानीखेत आज भी अपने मूल पर्वतीय नगर के स्वरूप में कमोबेश वैसे ही बचा है, जैसा वह दशकों पूर्व था। आज भी यहां प्राकृतिक सौंदर्य, जंगल बचे हुए हैं। यहां की 'फौजी' साफ-सफाई भी इसी कारण दिल में सुकून देती है। नगर के खास दर्शनीय स्थलों में मुख्य नगर से 6 किलोमीटर की दूरी पर गोल्फ प्रेमियों की पहली पसंद-गोल्फ ग्राउंड, इसके पास ही प्राचीन व प्रसिद्ध कालिका मंदिर, खूबसूरत संगमरमर से बना चिलियानौला स्थित बाबा हैड़ाखान का मंदिर, 18 किमी दूर स्थित बिन्सर महादेव मंदिर, घंटियों के लिए प्रसिद्ध झूला देवी मंदिर, कुमाऊँ रेजिमेंट का संग्रहालय, प्रसिद्ध वनस्पतिशास्त्री राम जी लाल द्वारा स्थापित वनस्पति संग्रहालय (हरबेरियम), उच्च प्रजाति के स्वादिष्ट सेबों के लिए प्रसिद्ध चौबटिया स्थित फलों के उद्यान और फल अनुसंधान केंद्र, तथा मछली पकडऩे के लिए प्रसिद्ध 1903 में ब्रितानी सरकार द्वारा निर्मित भालू बांध आदि नजदीकी दर्शनीय स्थल हैं।

रानी खेत के सौन्दर्य को आँखों में बसाने के सपने को लेकर हम लोग सोने की तैयारी में लग गये। खाना साथ लाये थे। उसे गाड़ी में ही खा लिया था। अखलाक साहब ने सीमित संसाधनों के बावजूद ठीक व्यस्था की थी। असल में गेस्टहाउस के रूप में तब्दील भवन का नाम आर डी स्टेट है। सौ साल से अधिक का बना पुराना यूरोपियन तर्ज का बँगला है। वाकई में जंगल के काफी अन्दर स्थित है। ऊँचे-ऊँचे चीड़ देवदार के पेड़ों के बीच रात की नीरवता में बजाय किसी भी तरह के भय के मुझे वहाँ अजीब-सा रौनक भरा वातावरण लग रहा था। टिमटिमाते तीन-चार बल्ब आरडी स्टेट के चारों तरफ  मद्धिम-मद्धिम रोशनी बिखेरते बंगले को अपने आगोश में समेटे थे। अखलाक साहब ने हम लोगों तथाकथित रूप से वीआईपी रूम दिया था। वास्तव में यह रूम अपने समय में खास ही रह होगा। लकड़ी से निर्मित की उसकी आन्तरिक सज्जा बेजोड़ थी। बचे हुए फर्नीचर नायाब थे। चार बेड पर सफेद धुली चादर बिछी थी। हमारे कमरे के पीछे कमरे से लगा हुआ स्थान अस्थाई किचेन के रूप में तब्दील कर दिया गया था। वहाँ एक गैस सिलेन्डर और पुराने चूल्हे की भी व्यवस्था थी। हम लोग थके थे। अखलाक साहब ने चाय पिलवाई। उसके बाद हम लोग सो गये।

अगले दिन मेरी नींद जल्दी ही टूट गयी। बाहर सन्नाटा था। वातावरण बेहद शांत और खूबसूरत था। अच्छी-खासी सर्दी थी। आरडी स्टेट की समतल जमीन के नीचे चीड़ और देवदार के पेड़ों के बीच छोटी-सी लकड़ी की कॉटेज के सामने सुरक्षाकर्मी रईस सफाई में लगे थे। उनकी दो बेटियाँ और पत्नी भी वहीं थे। बेटियाँ खेल रहे थीें। पत्नी चहलकदमी कर रही थीं। अभी अखलाक साहब सो ही रहे थे। हमारी प्रतीक्षा में देर रात मेें सोये थे। उनकी पत्नी जरूर उठ चुकी थीं। धीरे-धीरे धूप पेड़ों की फुनगियों से आरडी स्टेट की टीन की ढलवाँ छतों से उतरती सामने के समतल मैदान को अपने दायरे में ले रही थीं। जब्बार भी उठ गये थे। वह किनारे छतनार दरख्त के नीचे कार की सफाई में लगे थे। मैंने आरडी स्टेट के बरामदे में पड़ी ढेरों कुर्सियों में से एक कुर्सी निकाली। धूप में बैठ गया। हमारे शहर में तो कभी-कभी मार्च के जाते-जाते लू का एहसास होने लगता है। यहाँ धूप सुकून दे रही थी। मैं अकेला बैठा सामने आरडी स्टेट के भवन को निहारने लगा।

आरडी स्टेट के बारे में मैंने इंटरनेट के जरिये जानकारी हासिल करनी चाही लेकिन मिली नहीं। बस एकाध जानकार ने बताया कि इस भवन को उन्नीस सौ अ_ावन में तत्कालीन कुलपति कर्नल बशीर हसन जैदी ने खरीदा था। मन उसी के इतिहास को जानने की जिज्ञासा में उलझा था। इसी बीच जब्बार ने भीतर जाकर चाय तैयार की। समीरा भी उठ गयी थीं। मुझे चाय के लिए बुलाया गया। हम लोग चाय पी कर बाहर आ गये। बच्चे अभी सो ही रहे थे। आज आराम का ही कार्यक्रम था। अखलाक साहब भी उठ गये थे। अलीगढ़ से कुछ लोग और आने वाले थे। वह उनकी प्रतीक्षा में काफी देर तक जगते रहे। बाद में पता चला कि उन लोगों का कार्यक्रम बदल गया। वह अपनी चाय की प्याली के साथ मेरे लिए भी चाय की प्याली लिए बाहर आ गये। अखलाक साहब दिलचस्प व्यक्तित्व के मालिक हैं। यह हमें उनसे मोबाइल पर होने वाले वार्तालाप से ही पता चल गया था। यूँ ही बाकायदा परिचय के लिए रस्मी बातें होने लगीं। पता यह चला कि वह आरडी स्टेट की देखभाल के लिए नियुक्त केयर टेकर की भूमिका से कहीं आगे जाकर अपने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रति प्रेम के आन्तिरक जज्बे के कारण आरडी स्टेट की एक बच्चे की तरह देखभाल करते हैं। उसकी तरक्की और उसके लिए संसाधन एकत्रित करने के लिए विश्वविद्यालय से बराबर लिखा-पढ़ी भी करते रहते हैं। उसी का परिणाम यह है कि अभी पिछले वर्ष कुलपति और उपकुलपति तथा विश्वविद्यालय के इंजीनियर के साथ एक टीम भी आयी। आरडी स्टेट पुनरोद्धार की योजना बन चुकी है। बस अमली जामा पहनाना बाकी है। चूँकि नगर कैंट क्षेत्र के प्रबंधन में आता है इसलिए वहाँ अनापत्ति प्रमाणपत्र मिलते ही इसके पुनराद्धार का काम आरम्भ हो जायेगा। यह आशा इसलिए और भी बलवती हो रही है कि वर्तमान में विश्वविद्यालय के कुलपति और उप कुलपति दोनों का संबंध थल सेना से ही है। उपकुलपति महोदय तो रानी खेत में रहे भी हैं। आज-कल इसी आशा के बल पर अखलाक साहब आरडी स्टेट के पुनरोद्धार होने को लेकर आश्वस्त से खुश-खुश हैं। वह अपनी तरफ से जितना संभव हो सकता है मरम्मत साफ-सफाई ओर देखभाल में लगे रहते हैं। चारों तरफ लगे फूल-पत्ते और पेड़-पौधे इस बात की ताईद कर रहे थे। उन्हीं में विचरण करता हुए एक बार मेरे मन में फिर से आरडी स्टेट के इतिहास के संदर्भ में जिज्ञासा हुई। मैंने उनसे इसका उल्लेख किया। उन्होंने वहाँ वृद्धों और दूसरे साधनों द्वारा अभी तक इकठ्ठी  की गयी बड़ी महत्त्वपूर्ण जानकारी दी।

अंग्रेज कैप्टन विलियम ह्यूसन ने अपनी पत्नी आरडी के लिए रानीखेत में बनने वाले यूरोपियन शैली के आरम्भिक भवनों में आरडी के नाम से एक भवन बनवाया। इसे आरडी स्टेट कहा जाने लगा। गर्मी में वह अपने अमले के साथ यहाँ आकर ठहरता था। कर्मचारियों के लिए आरडी स्टेट के चारों तरफ बने विविध आवास इस बात के सुबूत के तौर पर दखे जा सकते हैं। घोड़ों के लिए बनी घुड़साल भी इस बात की गवाही देती है। हालांकि एक बार लगी आग से वह समाप्तप्राय है। एक तरफ  चार कॉटेज और हैं लेकिन वह कब अपना अस्तित्व खो दें कहा नहीं जा सकता है। हाँ तीन बिस्तरों का एक लकड़ी का काटेज जरूर सही-सलामत है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति कर्नल बशीर हसन जैदी साहब का अपनी जवानी के दिनों में वहाँ आना-जाना था। सेना से संबंध होने के कारण विलियम ह्यूसन से उनकी जान-पहचान हुई होगी। बाद में यह पहचान दोस्ती में तब्दील हो गयी। वह बँगले पर भी जाने लगे। बंटवारे के समय विलियम ह्यूसन ने बँगले को अपने विश्वासपात्र कर्मचारी गोविन्दराम मिश्रा के हवाले किया। या फिर हो सकता है कि कस्टोडियन की हैसियत से लगभग पौने चार एकड़ की जमीन में स्थित विलियम ह्यूसन के आरडी स्टेट पर गोविन्दराम मिश्रा की कब्जेदारी हो गयी हो। आजादी मिल गयी। कर्नल बशीर हसन जैदी साहब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति बने। अपनी रानीखेत की यात्रा में वह बँगले पर गये। वहाँ गोविदराम मिश्रा से भेंट हुई। गोविन्द राम की सेहत के साथ आर्थिक स्थिति भी दयनीय थी। आय का कोई साधन नहीं था। ऊपर से व्यापार के सिलसिले में किसी परिजन के कारण उनके ऊपर कानपुर के चार्टड बैंक का लोन भी हो गया था। कुलपति महोदय ने मदद के पेशकश की। मगर कितनी कर सकते थे? हल यह निकला कि बँगला बेच दिया जाय। कर्नल बशीर हसन जैदी ने आरडी स्टेट को चौदह अप्रैल उन्नीस सौ अ_ावन में विश्वविद्यालय के नाम खरीद लिया। बाद में उनको इस खरीदारी के कारण कई तरह की पेचीदगियों का भी सामना भी करना पड़ा। लेकिन उनके सद्प्रयासों से सारी समस्याएँ हल हो गयी। आरडी स्टेट लगभग अस्सी के दशक तक बंद ही रहा, लेकिन सैयद हामिद ने कुलपति का कार्यभार सँभालने के बाद उसमें रुचि दिखाई। विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर ऑफिस साहब ने महमूद अली बेग नाम के एक कर्मचारी को वहाँ भेजा गया। उसके बाद वहाँ सुजान सिंह नाम के एक दूसरे कर्मचारी की नियुक्ति हुई। फिर यह सिलसिला चलता रहा। हालांकि बड़े पैमाने पर वहाँ कोई पुनरोद्धार का काम नहीं हुआ लेकिन आरडी स्टेट की स्थिति और वहाँ के सौन्दर्य के कारण लोग जाते रहे। बीच में वाइल्ड लाइफ विभाग के छात्रों और शोधार्थियों ने भी उसका भरपूर उपयोग किया। समय के साथ मुख्य भवन के अतिरिक्त दूसरे भवन समाप्त या समाप्त प्राय हो गये। फिर भी लोगों के आने-जाने का सिलसिला बरकरार है।

दूसरा सारा दिन आराम करने और वहीं इधर-उधर चहल कदमी करने में बीता। दोपहर में दाल चावल बना। बच्चे लैपटॉप पर फिल्म देखते रहे। मैं मौसम की मदहोशी में खोया रहा। शाम में सईद साहब ने चिकन ला दिया। अखलाक साहब के यहाँ भी चिकन गया।  हम लोग खा-पीकर सो गये। अगले दिन कौसानी जाने का कार्यक्रम था। हिन्दी के बड़े कवि सुमित्रानन्दन पंत की जन्मस्थाली होने के कारण कौसानी नाम से परिचत तो मैं अपनी शिक्षा के आरम्भिक दौर से ही था। स्वाभाविक रूप से पर्यटन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण स्थान के रूप में पत्र-पत्रिकाओं में कौसानी के संदर्भ में जब भी कोई लेख इत्यादि प्रकाशित होता तो उस पर निगाह जरूर ठहर जाती। कौसानी को भारत का स्विट्जरलैंड कहा जाता है। संभवत: काफी पहले से ही कहीं-न-कहीं मन में यह भी बैठ गया था कि कौसानी का सौन्दर्य स्विट्जरलैंड के सौन्दर्य से होड़ करता है तो कम-से-कम उसे ही देखा जाय। इधर जब से पर्यटन में रुचि जागी और इंटरनेट का जमाना आया तो बहुत सारी जानकारियाँ और भी हुईं। महात्मा गाँधी ने कौसानी की यात्रा की तो इतने प्रभावित हुए कि वह दो के बजाय वहाँ पन्द्रह दिन ठहर गये। वर्तमान में वहाँ का अनासक्ति आश्रम गाँधी जी के कौसानी सम्मोहन का परिणाम है।

कौसानी उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के अंतर्गत पिंगनाथ नाम की चोटी पर बसा हैं। रानीखेत से कौसानी की दूरी लगभग पचपन किमी है। हमारी योजना थी कि हम लोग सुबह नाश्ता करके कौसानी के लिए निकलेंगे। सूर्यास्त दर्शन के बाद मन हुआ तो रुकेंगे वरना वापस रानीखेत अपने अड्डे आ जायेंगे। योजना के अनुसार ही हम लोग लगभग नौ बजे निकल गये। खूबसूरत पहाडिय़ों के बीच टेढ़े-मेढ़े रास्ते के बीच से यात्रा करते हुए एक पहाड़ी नदी पार करने के पश्चात अपेक्षाकृत थोड़ा सा घाटी का समतल इलाका आ गया। आगे लगभग नदी के सहारे से बढ़ती हुई सड़क के दोनों तरफ  खूबसूरत सीढ़ीदार कृषि भूमि पर बिखरी गेहूँ और सरसों की हरियाली सम्मोहित कर देने वाली थी। आगे बढऩे पर बौर से लदे-फंदे आम की बहुतायत भी आरम्भ हो गयी। इसका मतलब यह था कि यह निचला इलाका है। घना होता हुआ आबादी का क्षेत्र भी वहाँ की भूमि की कृषि उर्वरा शक्ति का प्रमाण दे रहा था। एक तरफ हरे-भरे सीढ़ीदार खेतों की हरियाली और दूसरी तरफ  नदी के बीच से गुजरती सड़क, पर हम लोग यह नहीं तै कर पा रहे थे कि हरियाली के सौन्दर्य को निहारा जाय कि नदी की शोभा को। बीच में एक स्थान पर रुककर मैं अम्मार और उनकी अम्मा नदी पर बने लोहे के पुल पर गये। नीचे बहती स्वच्छ धारा में तैरती छोटी-छोटी मछलियाँ बड़ी ही खूबसूरत लग रही थीं। पुल से गुजरने वाले एक वृद्ध के साथ हमने फोटो भी खिंचवाई। लगभग आधे घंटे का समय बिता कर हम लोग फिर अपनी मंजिल की तरफ  बढ़े। सोमेश्वर कस्बे के बाद कौसानी की चढ़ाई आरम्भ हो गयी। कौसानी में प्रवेश के बाद हम लोग सीधे अनासक्ति आश्रम के रास्ते की तलाश में लग गये। आश्रम से पहले ही लक्ष्मी संग्रहालय मिल गया। यह आश्रम सरला आश्रम के नाम से भी प्रसिद्ध है। सरलाबेन ने 1964 में इस आश्रम की स्थापना की थी। सरलाबेन का असली नाम कैथरीन हिलमेन था। वे गांधी जी की अनुयाई थीं। उसी परिसर को अनासक्ति आश्रम समझ हम लोग वहीं रुक गये। वहाँ सन्नाटा था। केयरटेकर महोदय संभवत़: दोपहर के भोजन के लिए जा रहे थे। हमें देखकर रुक गए वहीं पता चला कि अनासक्ति आश्रम निकट ही है। लगभग पचास मीटर दूर।

अनासक्ति आश्रम महात्मा गाँधी जी को समर्पित आश्रम हैं। सन 1929 में गाँधी जी जब अपने भारत दौरे निकले थे तब वह अपनी थकान मिटाने के दो दिन के लिए कौसानी भी आये थे। कौसानी घाटी से दिखने बर्फ  से ढंकी हिमालय की पर्वतमाला पर प्रात: बेला में पडऩे वाले सूर्य की स्वर्णमयी किरणों ने उनका मन मोह लिया था। गाँधी जी यहाँ पर चौदह दिन रहे और गीता पर आधारित पुस्तक 'अनासक्ति योग' को प्रस्तावित किया। गाँधी जी की कृति 'अनासक्ति योग' के आधार पर ही इस आश्रम की स्थापना हुई और इस आश्रम का नाम अनासक्ति आश्रम पड़ा। अनासक्ति आश्रम में हम लोग लगभग बारह बजे पहुँचे। समीरा अपने माता-पिता के साथ पहले भी आ चुकी थीं। हिमालय के सौन्दर्य का दर्शन भी कर चुकी थीं। भीड़ कम थी। हम लोगों ने प्रयत्न किया तो हिमालय की चोटियों की एक पतली रेखा दिख रही थी। लोगों ने बताया कि धुंध के कारण हिमालय ठीक से दिख नहीं रहा है। कोई भरोसा नहीं कि दिखे। वहाँ से नीचे आकर हम लोगों ने खाना खाया। खाना बस ठीक-ठाक ही था। दरअसल होली की छुट्टियों का प्रभाव अभी भी वहाँ था। वहाँ के सन्नाटे से सहमकर हम लोगों ने निर्णय यह लिया था कि सूर्यास्त देखकर वापास रानीखेत चले जाएंगे। खाना खाने के बाद कौसानी के आस-पास देखने की योजना बनी। असल में कौसानी के चारों तरफ प्राकृतिक सुंदरता बिखरी पड़ी हैं। पाइन वृक्षों के घने जंगल, ट्रेकिंग, शांत व स्वच्छ वातावरण, घाटी में चाय के बगान, इको पार्क। हम लोग चाय बगान देखने के लिए निकल पड़े।  कहना अनुचित न होगा कि अगर किसी ने यदि केरल में मुन्नार के चाय बागानों को देख लिया हो कम-से-कम यहाँ उसके लिए कोई आकर्षण शायद ही हो। बहरहाल! हम लोग वापस अनासक्ति आश्रम आ गये। दोपहरी पूरी तरह आश्रम में उतर आयी थी। सन्नाटा भी! वहीं एक किनारे चादर बिछा कर हमने और समीरा ने आराम किया। बच्चे खेलते रहे। दोपहरी के विश्राम के बाद कार्यालय और संग्रहालय धीरे-धीरे खुलने लगे। हम लोगों ने गाँधी साहित्य से संबन्धित कुछ पुस्तकें लीं। चाय पीने के लिए सामने चाय के ढाबे पर गये तो पता चला कि आज संध्या बेला तक हिमालय दर्शन मुश्किल है। धुंध के कारण सूर्यास्त भी संभवत: फीका ही रहेगा। तय हुआ कि दिन-दिन में हरीभरी घाटी के दर्शन करते क्यों न वापस निकल लिया जाय। वापसी से पहले मैं पंत जी के आबाई वतन को देखे बिना वापस कैसे आ सकता था? जिस घर में उन्होंने अपना बचपन बिताया था, उस घर को उनकी याद में एक संग्रहालय और पुस्तकालय में बदल दिया गया हैं जिसे सुमित्रानंदन पंत वीथिका के नाम से जाना जाता है। थोड़ी-सी चढ़ाई के बाद एक गली में उनका घर आ गया। मेरे साथ अम्मार ही थे। पंत जैसे कालजई रचनाकार की जन्मस्थली होने के कारण जो रख-रखाव होना चाहिए था, वैसा वहाँ कुछ भी नहीं दिखा। श्रद्धा के कारण मन को तसल्ली अवश्य हुई। वहाँ से वापस आकर हम लोग वापसी के लिए अपने मार्ग पर आ गये। वाकई में हरे-भरे सीढ़ीदार खेतों की हरियाली और दूसरी तरफ  नदी के बीच से गुजरती सड़क की सुषमा अप्रतिम थी। एक-दो स्थानों पर हम लोगों ने रुककर फोटोग्राफी की और दिन ढलते-ढलते अपने ठीहे आ गये।

कौसानी से वापसी के बाद का दिन आराम का था। रात में अलीगढ़ से कुछ लोग आ गये थे। उनसे मुलाकात के बाद गपशप होती रही। योजना यह बनी कि आज रानीखेत का दर्शन किया जायेगा। इनमें गोल्फ मैदान चौबटिया स्थित फलों के उद्यान और भालू बाँध प्रमुख थे। फल उद्यान के संबंध में पता चला कि इधर रानीखेत में सेब की खेती पर किसी अज्ञात बीमारी का साया पड़ गया है इसलिए पहले जैसी बात रही नहीं। बाँध जाने की योजना भी मुल्तवी कर दी गयी। सईद को अपनी पाँच सवारी की क्षमता वाली कार में बैठा कर हम लोग गोल्फ मैदान दर्शन के लिए निकल पड़े। रानीखेत में शहर से 6 किलोमीटर दूर अल्मोड़ा और कौसानी जाने वाले मार्ग के त्रिकोण पर चीड़ के घने जंगल के बीच 6000 फुट की ऊंचाई पर उपत नामक स्थान पर एक विश्वप्रसिद्ध गोल्फ मैदान एशिया के सबसे ऊँचे गोल्फ कोर्स में एक है। नौ छेदों वाला यह गोल्फ कोर्स रानीखेत का प्रमुख आकर्षण और लोगों द्वारा सबसे अधिक पसंद किया जाना वाला पर्यटक स्थल है। यहाँ प्राय: फिल्मों की शूटिंग होती रहती है। कोमल हरी घास का ऐसा मैदान बहुत कम देखने को मिलता है। गोल्फ कोर्स के ठंडे वातावरण में हरी-भरी घास का बड़ा मैदान एक सम्मोहित सा कर देने वाला आभास देता है। दूर तक फैला साफ-सुथरा मैदान, बीच में इक्का-दुक्का पेड़, रंगीन झंडे, छोटे लकड़ी के पुल, बैठने के लिए शेड और मैदान के दूसरी तरफ पाइन वृक्षों के घने वन आदि कुछ यहाँ के सौन्दर्य को अप्रतिम बनाते हैं। वहाँ पहुँचते ही लगा मानो हम अलौकिक संसार में आ गये हैं। तीन समूह बन गये। समीरा और मैं, अशार-अम्मार, जब्बार और सईद। भीड़ बहुत नहीं थी। अभी साँझ ढलने में देर थी। हम लोग जितनी जल्दी हो सकता था उतनी जल्दी उस मैदान के अपने कदमों से नाप देना चाहते थे। हालांकि मेरे जैसे भारीभरकम शरीर वाले व्यक्ति के लिए यह आसान नहीं था। फौजियों का एक समूह लगातार उसी मैदान की ऊँचाई-नीचाई को अपनी दौड़ से नाप रहा था। जहाँ हम लोगों के लिए चलना ही दूभर था वहाँ हमारी सुरक्षा के लिए तैनात जवान-प्रहरी अपने पसीने से इस समय भी वहाँ की जमीन को सींचने में लगे थे। हम लोगों का अनुमान था कि यह लोग किसी विशेष दस्ते से संबंधित होंगे नहीं ंतो असमय इतना परिश्रम भला क्यों करते। हम लोग बार-बार उन लोगों को देखते घूमते रहे। गोल्फ कोर्स को एक सड़क दो हिस्सों में काटती है। दूसरी तरफ  वाला हिस्सा अपेक्षाकृत छोटा है। वहां गोल्फ क्लब का मुख्य भवन और एक रेस्टोरेंट भी है। हम लोग उधर एक छतरीनुमा टिनशेड में बैठ गये। सामने पेड़ पर एक बंदर और छिपकली के बीच के लुका-छिपी के खेल को देखते रहे। वापसी में बच्चों को खिलापिलाकर गेस्टहाउस में अखलाक साहब और सईद के परिवार के लिए खाने-पीने के सामानों के साथ वापस आये। रात में वहाँ अलीगढ़ से आये लोगों के साथ सबका एक साथ खाना बनने की योजना थी। अखलाक साहब की पत्नी बहुत अच्छा कोरमा बनाती थीं। सईद वापस आकर मटन लेने चले गये। निश्चित ही अखलाक साहब की पत्नी ने अत्यन्त स्वादिष्ट कोरमा बनाया। साथ खाने में मजा आ गया। उसके बाद आग जलाई गयी। देर रात तक गप चलती रही।

अगले दिन नैनीताल दर्शन का कार्यक्रम था। उत्तरभारत के हिमालय पर्वतमाला की सुरम्य वादियों में स्थित नैनीताल भारत के सबसे खूबसूरत और प्रसिद्ध पर्वतीय पर्यटन स्थलों में एक माना जाता है जो भारत के उत्तराखंड राज्य में कुमाऊं मंडल के दक्षिण-पूर्व दिशा में स्थित है। समुद्रतल से काफी ऊँचाई और चारों ओर हरियाली के कारण यहाँ का मौसम हमेशा सुहावना और ठंडा बना रहता है। नैनीताल क्षेत्र में तालों और झीलों की भरमार के कारण इसे झीलों की नगरी भी कहा जाता हैं। नैनीताल का मुख्य आकर्षण चारों ओर से हरे-भरे पेड़ों से लदी पहाड़ों से घिरी यहाँ की नैनी झील है। पुराणों के अनुसार नैनी झील का पानी मानसरोवर झील के पानी के समकक्ष पवित्र माना जाता है। नैनी झील के दक्षिणी हिस्से को तल्लीताल और उत्तरी हिस्से को मल्लीताल के नाम से जाना जाता है। नैनीताल का मुख्य शहर नैनी झील इर्द-गिर्द पहाड़ी पर बसा हुआ है। इन हरे-भरे पहाड़ों की परछाई हमेशा झील में पड़ती रहती हैं, जिस कारण से झील का स्वच्छ पानी हरे रंग का नजर आता है। प्रसिद्ध पर्यटक स्थल होने के कारण यहाँ पर साल भर सैलानियों का जमावड़ा लगा रहता है। इस बात का अनुमान हमें उस रात ही हो गया था जब हम लोग यहाँ आते समय कुछ देर के लिए रुके थे। गर्मियों में यहाँ का मौसम सुहावना और ठंडा होने कारण पर्यटकों की पर्याप्त हलचल होती है। हमलोग लगभग दो घंटे के सुहाने सफर के बाद नैनीताल पहुँच गए। असल में यात्रा के दौरान एक पारिवारिक समस्या में सब ऐसे उलझे कि मेरे अतिरिक्त किसी ने यात्रा का शायद लुत्फ  भी नहीं लिया। समीरा के फोन को तो एक भी मिनट की मोहलत नसीब नहीं हुई। बच्चे भी उत्तेजित थे। मेरा भी फोन रह-रह कर बज रहा था।

नैनीताल पहुँचने के बाद हम लोगों का पहला लक्ष्य पार्किंग की तलाश थी। माल रोड का पूरा चक्कर लगाते हुए अन्तत़: पार्किंग मिल ही गयी। अबतक काफी समय व्यतीत हो गया था। अभी ठीक से खाने का समय तो नहीं हुआ था लेकिन तय यह हुआ कि खाना खा लिया जाय। नैनी झील के सामने मैदान में क्रिकेट मैच चल रहा था। उसी के ऊँचाई पर होटल था। नाम शायद करीम था। हम लोग भीतर गये। होटल में भीड़ थी। चिकेन सादा मगर लजीज था। रुमाली रोटी तो गजब की थी। बच्चों और जब्बार ने मन भर खाना खाया। वहाँ से नीचे आकर झील के किनारे पर्यटकों की भीड़ में हम लोग भी सम्मिलित हो गये। कुछ देर बाद बोटिंग के लिए टिकट लेकर पंक्तिमें खड़े हो गयेे। धूप चटक थी। हल्की-हल्की गरमी का एहसास हो रहा था। बोटिंग के बाद फिर हम लोग भीड़ का हिस्सा बनकर इधर-उधर घूमते रहे। कभी मन हो रहा था कि यहीं से निकल चलें कभी कोई यह कह रहा था कि आस-पास के दर्शनीय स्थलों को देखे बिना जाने का भला क्या औचित्य है। हमारी कार थी, लेकिन रास्ते का पता नहीं था। स्थानीय कार वाले बहुत पैसा माँग रहे थे। तै यह हुआ कि जब्बार और अशार कार लेकर आयें फिर कैसे चलना देखा जायेगा। जब्बार और अशार ने आकर बताया कि पार्किंग पर एक लड़का मिला जो गाइड के तौर पर हमें तमाम स्थानों को ले जाने के लिए तैयार था। दो सौ रुपये माँग रहा था। हम लोगों ने फौरन ही कार वापस पार्किंग की तरफ  मोड़ दी। आरिफ  नामक वह बच्चा अभी भी वहीं था। डेढ़ सौ रुपये पर बात तै हो गयी। आरिफ  ने बताया कि वह आठवीं कक्षा का छात्र है। आजकल स्कूल बंद है। पार्ट टाइम में यह काम कर लेता है। हम लोग उसके नेतृत्व में संतुष्ट थे। हमारा पहला लक्ष्य हिमालय दर्शन का स्थान था।

कुछ देर आरिफ  के मार्गदर्शन में चलते हुए एक मोड़ के बाद एक ऐसा स्थान आया जहाँ पर सड़क के दोनों ओर गाडिय़ाँ खड़ी हुई थीं। पता चला कि हम लोग हिमालय दर्शन पॉइंट पहुँच गए हैं। जब्बार हमें वहीं उतार कर कार को पार्क करने की जुगत में लग गये। यह स्थान सड़क के किनारे ही था और सड़क की चौड़ाई काफी कम थी, इसके साथ ऊपर से काफी गाडिय़ों के आवागमन के कारण यहाँ जाम की सी स्थिति हो गयी थी। हालांकि वहाँ पर लोगों की भीड़ कम थी और दूर तक नजारे दिखाने के लिए कई सारे दूरबीन वाले खड़े हुए थे। एक दूरबीन वाले से काफी मोलभाव के बाद उचित पैसे देखकर हम सभी को उन तमाम स्थानों को दिखाया जो उसने कहा था। यह देखा-देखी का कार्यक्रम चल ही रहा था कि दूसरी तरफ  एक दूरबीन वाले को नीचे घाटी के जंगल में कोई जानवर दिख गया। पता चला कि हिरन की प्रजाति का कोई जानवर है और उसी की ताक में कोई तेंदुआ लगा है। लेकिन थोड़ी ही देर में शायद गायब हो गया या फिर उसने नाटक रचा था! भीड़ हो गयी। कुछ लोगों को नंगी आँखों से भी दिखा। हम लोगों को अभी हिमालय का दर्शन नहीं हुआ पता चला कि धुंध है।

हिमालय दर्शन पॉइंट नैनापीक पहाड़ के किलबरी जाने वाले मार्ग से कुछ ही दूरी पर है। इस स्थान की समुद्रतल से ऊँचाई लगभग 2300 मीटर हैं। पता चला कि इस स्थान से मीलों दूर स्थित बर्फ  से ढंकी हिमालय श्रृंखला की चोटियाँ और दूर तक फैले सुन्दर पहाड़, जंगल, हरी-भरी वादियों के नजारे देखने को मिलते हैं। आरिफ  ने बताया कि इस स्थान से हिमालय पर्वत श्रृंखला की चौखम्बा, नंदादेवी, पंचचुली आदि की चोटियां जब बादल और धुंध न हो, तब बिल्कुल साफ  दिखाई देतीं हैं। मगर आज भी हमारी किस्मत ही दगा दे गयी। हम लोग लगभग निराश होकर वापस चल पड़े।

रोड थोड़ा संकरी हैं पर बेहद ही खूबसूरत हरी-भरी पहाड़ी के बीच से होकर गुजरती है। मार्ग से गुजरते समय पहाड़ों और पेड़-पौधों के बीच से पूरे नैनीताल शहर और नैनीझील का विहंगम दृश्य दिखाई दे रहा था। कुछ देर चलने के बाद के आरिफ  ने कार को मार्ग के बीच एक जगह पर रुकवा दिया। वहाँ से नैनी झील और नैनीताल शहर का दूर तक का पूरा दृश्य नजर आ रहा था। मार्ग संकरा होने के कारण जब्बार ने टैक्सी को कुछ दूर आगे जाकर पहाड़ के किनारे खड़ा कर दिया और भी बहुत सी गाडिय़ां मार्ग के किनारे इधर-उधर खड़ी हुई थीं। पहाड़ की ऊँचाई से सड़क के किनारे के एक खाली स्थान से नैनीझील का नयनाभिराम नजारा दिखाई दे रहा था। इतनी ऊँचाई से देखने पर दूर तक फैली नयन आकार की नैनी झील का रूप आँखों में बसा जा रहा था। नैनी झील की पानी में चल रही हैं नावें ऊपर से ऐसी नजर आ रही थीं जैसे पानी पर कागज के छोटे-छोटे जहाज तैर रहे हों। नैनीझील के साथ-साथ झील के किनारे का बड़ा खाली मैदान, पार्किंग में लगी गाडिय़ां, घर, दुकानें, नैनी झील के किनारे के पहाड़ों पर बसे घर, होटल आदि बहुत छोटे पर बहुत सुन्दर नजर आ रहे थे। इस स्थान पर लोगों की काफी हलचल थी और झील के इस अनोखे रूप को लोग तरह-तरह से अपने कैमरे में कैद करने में लगे हुए थे। कुछ दूर चलने के बाद नैनीताल का सूखाताल आ गया। ऊपर से आरिफ ने उसे दिखाया। यहां अच्छी-खासी बस्ती थी, लेकिन पता चला कि साल के काफी दिनों तक यह इलाका पानी से भरा रहता है। यहाँ के लोगों को वहीं के स्कूल और दूसरे स्थानों पर अस्थाई रूप में बसा दिया जाता है। लेकिन वहाँ हो रहे कंकरीट के निर्माण कार्यों को देख कर लगा कि आने वाले कुछ वषों में यह स्थान अपनी पुरानी शोभा को खो देगा। कुछ देर रुक कर हम लोग आगे बढ़ गये।

आगे फिर दूसरे स्थानों की खोज में हम लोग निकल गये। हमार अगला पड़ाव लवर्स प्वाइंट था। मार्ग की प्राकृतिक सुंदरता से आँखें दो-चार करते हुए, हम लोग कुछ देर में लवर्स पॉइंट नाम पहुँच गए। लवर्स पॉइंट नैनीताल के माल रोड से थोड़ा करीब है। यह स्थान सड़क से बस थोड़ा सा नीचे चलकर बड़े-बड़े पत्थरों पर एक गहरी खाई के किनारे एक छोटा सा स्थान हैं। लवर्स पॉइंट पर पत्थरों के ऊपर लोहे के ग्रिल से सुरक्षित स्थान से गहरी खाई और सामने सर उठाये ऊँचे सुन्दर पहाड़ का बड़ा ही शानदार नजारा देखने को मिलता है, साथ-साथ ही पहाड़ी शुद्ध ठंडी हवा का आनन्द भी मिलता है। लवर्स पॉइंट से ऊपर पहाड़ की ऊंचाई पर स्थित टिफिन टॉप (डोरथी सीट) पर जाने वाला पगडंडी मार्ग यहीं से होकर जाता है। इस रास्ते से पैदल या घोड़े-खच्चर से घने वन के बीच जंगली माहौल का मजा लेते हुए जाया जा सकता हैं। टिफिन टॉप के बाद पहाड़ी पर ऊपर की तरफ  चलते हुए पहाड़ की चोटी पर डोरथी सीट नाम की जगह पर पहुँच जाते हैं। यहाँ पर एक अंग्रेज महिला डोरथी की कब्र है। उसी के नाम पर इस प्वाइंट का नाम पड़ा। टिफिन टॉप तक जाने के लिए घोड़े-खच्चर लवर्स प्वाइंट से ही आसानी से उपलब्ध होते हैं। शाम ढल रही थी। घोड़े की सवारी का मेरा अनुभव अच्छा नहीं था। बच्चों ने भी कोई दिलचस्पी नही दिखाई इस लिए हम लोगो ने लवर्स पॉइंट के आस-पास  कुछ समय बिताया और वापस आकर अपनी कार में बैठ गये। थोड़ा-सा चलने के बाद रास्ते में एक बारा पत्थर नाम का स्थान आया। यहाँ बड़े-बड़े झूलते हुए पत्थरों पर प्रशिक्षार्थियों को पहाड़ चढऩे का प्रशिक्षण दिया जाता है। हम लोग वहाँ सड़क पर रुककर थोड़ी देर के लिए उस खूबसूरत नजारे को अपनी आँखों और कैमरे दोनों में बसाकर अपने गाइड आरिफ  के साथ खुरपाताल देखने के लिए निकल पड़े। आरिफ  ने पहाड़ की तरफ  सड़क किनारे एक छोटे स्थान पर गाड़ी रुकवाई। यहां से नैनीताल की खुरपाताल झील का दर्शन किया जा सकता है। खुरपाताल नैनीताल क्षेत्र में स्थित झीलों और तालों में सबसे छोटा ताल हैं। ऊपर से देखने पर इसका आकार बैल के खुर जैसा दिखता हैं, इसलिए इसे खुरपा ताल के नाम से जाना जाता हैं। नैनीताल की ऊँचाई के मुकाबले यह खुरपाताल पहाड़ की काफी गहराई में स्थित हैं और नैनीताल से इसकी दूरी लगभग 12 किमी के आसपास है। खुरपाताल के आसपास का इलाका कुछ समतल होने के कारण यहाँ पर एक छोटा पहाड़ी गांव बसा हुआ हैं। ऊपर से देखने पर गाँव के घर और खेत बड़े ही सुन्दर और मनभावन नजर आते हैं। हम लोग कार से उतर कर उस स्थान पर पहुंचे जहां से खुरपाताल नजर आता हैं। खुरपाताल को देखने के लिए काफी लोग जमा थे। वहाँ से निकलते-निकलते साँझ की बेला करीब आती दिख रही थी। हमें वापस रानीखेत भी तो जाना था। नैनीताल के ऊपर बताये और हमारे द्वारा घूमे स्थलों के अलावा नैनीताल में और भी घूमने लायक अच्छे स्थल हैं, जहाँ हम लोग अपनी इस यात्रा में समय की कमी के कारण नहीं जा सके पर उन्हें भी देखना ही चाहिए था। आरिफ ने झील के दूसरी तरफ  के रास्ते पर लाकर हमें छोड़ दिया। समीरा का कहना था कि नैनीताल कोई पाल में तो बसा नहीं है। फिर कभी आ जाएँगे। असल में बात यह है कि समीरा बहुत पहले ही अपने माता-पिता और भाई-बहन के साथ यहाँ आ चुकी थीं। उनका पड़ाव नैनीताल ही था। हमें लग रहा था जितनी जल्दी हो अपने ठीहे पहुंच जाएँ। हम भुवाली होते अपनी आज की मंजिल यानी कि रानीखेत के लिए निकल पड़े। रास्ते में चाय के लिए एक रेस्टोरेंट पर रुके। हमने चिकन मँगवा लिया था। रानीखेत में जाकर रोटी ली और समय से पहले गेस्टहाउस में हाजिर हो गये।

अगले दिन यात्रा का अन्त समय था। यानी हमें वहाँ से वापस आना था। योजना यह बनी कि वापसी में हम लोग जिमकार्बेट होते हुए राम नगर ठाकुरद्वारा और फिर मुरादाबाद के रास्ते पर पहँुचेगे। लगभग सत्तर-अस्सी किलोमीटर पहाड़ों के बीच घुमावदार अपेक्षाकृत संकरी सड़क से यात्रा के बाद हम जिम कार्बेट के निकट आ गये। असल में अलीगढ़ से आये यात्रियों को रात की अपनी यात्रा में सड़क पर ही तेंदुआ मिल गया था। हम लोग शायद इसी मोह में इधर से आये थे। लेकिन हमें कुछ नहीं मिला। हाँ! जिमकार्बेट के मनोहारी वन की शोभा के बीच से यात्रा का सुख और उसे देख लेने की संतुष्टि अवश्य हुई। मुरादाबाद शहर में प्रवेश करते ही पता चला कि कार का ब्रेक ठीक से काम नहीं कर रहा है। हम लोगों ने ऊपर वाले का शुक्र अदा किया। अगर यह समस्या पहाड़ी रास्ते पर आयी होती तो? अगर यह होता तो वह होता, अगर वह होता तो यह होता! इस अगर-मगर की फिक्र को परे धकेल हम लोग किसी मैकेनिक की तलाश में लग गये। वहाँ निकट ही गैराज मिल गया। एकाध घंटे में ही हमारी समस्या हल हो गयी। फिर हम अपने गंतव्य की तरफ चल पड़े।