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Monday 23 Jul 2018

कविता एक तिलस्म है जिसे भेदा नहीं जा सकता।

(सुप्रसिद्ध कहानीकार एवं कवि डॉ गंगाप्रसाद विमल से भूपेन्द्र हरदेनिया की बातचीत)

हिन्दी साहित्य में अकहानी आंदोलन के पुरोधा डॉ. गंगा प्रसाद विमल विख्यात कवि, कथाकार, उपन्यासकार, अनुवादक और समालोचक के रूप में दुनियाभर में ख्याति प्राप्त हैं। काफी लम्बे समय से अपने सृजन कर्म में रत विमल जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्तित्व और बेहद विशाल हृदय से सम्पन्न हैं। इनका रूमानी और संजीदगी से भरा चरित्र एवं व्यक्तित्व एकदम सहज और मिलनसार प्रवृत्ति का है एवं सदैव लोगों के साथ मृदुभाषी ज़ुबां होने एवं साहित्य उदात्तता की वजह से ही सम्पूर्ण भारत में ही नहीं अपितु वैश्विक फलक पर इन्हें सराहा व सम्मानित किया गया है।

डॉ. गंगाप्रसाद विमल का जन्म उत्तरकाशी, उत्तराखण्ड में सन 1939 को हुआ, इसीलिए इनके व्यक्तित्व में हिमालय की सादगी, विस्तार, निर्मलता, पावनता और विशालता को धारण करने का जज्बा दिखता है। बचपन में एक मैं एक कहावत सुनता था कि लीक छॉंडि़ तीनों चले शायर, सिंह, सपूत। अत: लीक से हटकर चलने वाले ऐसे साहित्य के सृजेता सपूत डॉ. विमल से उनके विचारों तथा शैली पर बात किए बगैर उनके व्यक्तित्व और सृजन कर्म को सुंदरता से उजागर करना निरर्थक है। आइए उनसे बात करते हैं, उनकी कविता की रचना-प्रक्रिया के बारे में-

न्दी साहित्य में अकहानी आंदोलन के पुरोधा डॉ. गंगा प्रसाद विमल विख्यात कवि, कथाकार, उपन्यासकार, अनुवादक और समालोचक के रूप में दुनियाभर में ख्याति प्राप्त हैं। काफी लम्बे समय से अपने सृजन कर्म में रत विमल जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्तित्व और बेहद विशाल हृदय से सम्पन्न हैं। इनका रूमानी और संजीदगी से भरा चरित्र एवं व्यक्तित्व एकदम सहज और मिलनसार प्रवृत्ति का है एवं सदैव लोगों के साथ मृदुभाषी ज़ुबां होने एवं साहित्य उदात्तता की वजह से ही सम्पूर्ण भारत में ही नहीं अपितु वैश्विक फलक पर इन्हें सराहा व सम्मानित किया गया है।

डॉ. गंगाप्रसाद विमल का जन्म उत्तरकाशी, उत्तराखण्ड में सन 1939 को हुआ, इसीलिए इनके व्यक्तित्व में हिमालय की सादगी, विस्तार, निर्मलता, पावनता और विशालता को धारण करने का जज्बा दिखता है। बचपन में एक मैं एक कहावत सुनता था कि लीक छॉंडि़ तीनों चले शायर, सिंह, सपूत। अत: लीक से हटकर चलने वाले ऐसे साहित्य के सृजेता सपूत डॉ. विमल से उनके विचारों तथा शैली पर बात किए बगैर उनके व्यक्तित्व और सृजन कर्म को सुंदरता से उजागर करना निरर्थक है। आइए उनसे बात करते हैं, उनकी कविता की रचना-प्रक्रिया के बारे में-

प्र. आपके विचार से कला का सम्बन्ध कलाकार के जीवन से कितना और किस प्रकार का है? क्या वही कला महत्ता प्राप्त कर सकती है, जिसका सम्बन्ध कलाकार की जीवन यात्रा से होती है?

उ. कलाकार सृजेता होता है। सृजन को विचार, जीवन और यहां तक कि कल्पना से भी अलग नहीं किया जा सकता। यह कहना अविश्वास के घेरे में आ जायेगा कि कल्पना भी वास्तविकताओं में रूपान्तरित होना चाहती है। यह सच है। मनुष्य ने जितनी कल्पनाएं की हैं, उन्हें वैज्ञानिक आविष्कारों से साकृति भी दिलवाई है। कलाकार का जीवन एक व्यक्ति के जीवन जैसा ही है वह सामुदायिकता से विकसित होता है परन्तु अपने उच्च स्तर पर सामुदायिकता, समाज का परित्याग करता है। तथापि स्वीकृति, परित्याग आदि सब जीवन की विभिन्न धाराओं से नि:सृत बातें हैं। स्थूल रूप से मानना होगा कि कलाकार जीवनानुभवों के बीच ही कला से सामना करता है, और जीवन से जुड़ाव के गहरे सरोकारों के रहते वह एक अनाम मुक्ति का भी सपना पाले रहता है।

प्र. क्या रचनाकार हर समय रचनात्मक रहता है, या एक विशेष कलात्मक अनुभव के क्षण के उपरान्त वह सामान्य व्यक्ति जैसा हो जाता है ?

उ. सृजन का कोई निर्धारित समय नहीं है, वह अचानक फूटता है, ऐसे में यह कहना कठिन है कि सृजेता इसके लिए तैयारी करता है, परन्तु सृजन के दबाव में पड़ा व्यक्ति हर पल उस लक्ष्य से प्रेरित रहता है जो लक्षित है। अब यह बताना लगभग नामुमकिन है कि वह लक्ष्य या दबाव क्या है? तथापि कलाओं के लिए समर्पित ज्यादा उदाहरण ऐसे लोगों के हैं जो थोड़े से विचित्र, सामाजिक अर्थों में लापरवाह, गैर जिम्मेदार, लड़ाकू या आत्मस्थ होते हैं। अपने अनुभव से बात स्पष्ट करूं तो मैं एक सफल व्यक्ति, घरेलू, जिम्मेदार आदमी के अनुभव के पीछे अभिनय पटुता के कौशल में खुद को निरर्थकता से घिरा पाता हूं कि न मैं सफल व्यक्ति हूं, न सृजेता। एक मामूली अभ्यासरत भाषा के खेल में रत अज्ञात कुलशील की तरह बाहर निकलने के मुहाने पर खड़ा हूं। अब इसी पहर बाहर निकलने से पहले कुछ हो जाय तो कह नहीं सकता।

प्र. काव्य सृजन में कल्पना के योगदान के बारे में आपके क्या विचार हैं?

उ. कल्पना के बिना जीवन भी संभव नहीं है। कभी-कभी जो हम वास्तव में नहीं कर पाते उसे कल्पना में साकार कर लेते हैं। कल्पना एक बड़ा खज़ाना है। एक ऐसा आश्रय स्थल जो हमारे लिए असंख्य विकल्प जुटाता है। कल्पना चलो झूठ है, पर एक अति-लुभावना झूठ है जो एक नीरस पल को झूठे रंगों से ही रंगीन बना डालता है। कविता के मामले में तो कल्पना एक विस्मयकारी कलात्मक विकल्प है जिसका हम बराबर उपयोग करते हैं और कभी नहीं पाते कि कल्पना का कोष खाली हो जायेगा। हम जितना-जितना कल्पना से लेते रहते हैं, उससे कहीं गुना ज्यादा तो अभी कल्पना में शेष रहता है। काव्य सृजन के लिए तो वह कई दृष्टियों से अपूर्व स्रोत है, जिसमें हम करुणा, दया, अनुकम्पा की तीव्रता पाते हैं। कल्पना एक अनिवार्य, अपरिहार्य, निर्विकल्प आधार है, जिससे भाषा, कला सृजन, कलात्मकता, आवेगात्मकता और सत्य के प्रति अनुरक्ति बढ़ती है। कल्पना कविता के आश्चर्य का जन्म स्थान है।

प्र. सृजन के क्षणों में आपके मन की क्या गति होती है? आप कैसी मन: स्थिति में कविता लिखते हैं?

उ. सृजन का क्षण कुछ-कुछ गोपनीय होता है। एक तरह की लुका छिपी का खेल, आश्वस्ति पाने की एक प्रक्रिया से भी उसे जोड़ सकते हैं। अपने सृजन के बारे में तो इतना कह सकता हूं कि वह तब तक गोपनीय ही रहता है जब तक प्रकाशित नहीं होता। मैं उस बारे में बातें भी कम करता हूं। शायद यह स्वभाव से दब्बू होने के कारण हो या अन्य कोई हीन भाव मुझ पर हावी हो जाता हो, परन्तु लम्बे अर्से से यही दिखता है कि जब तक काम पूरा नहीं होता मैं बात ही नहीं करता। एक और चीज़ जो मुझे परेशान करती है, वह है एक साथ कई काम करने की जल्दी, तो उसमें बहुत से काम अधूरे दिखते हैं। तब भी जब कविताएं लिखता हूं, तब कुछ खास ही गोपनीय रहने देता हूं। परन्तु चाहे गद्य हो या पद्य मुझे सब कुछ इतना प्राइवेट लगता है कि उसकी कोई भी खबर देना मुझे जंचता ही नहीं।

प्र. सृजन के समय में चित्त की एकाग्रता या समाधि को आप कितना आवश्यक मानते हैं ?

उ. यह तो सृजन की प्राथमिक शर्त है। अब आप एकाग्रचित्त न हों तो कैसे सोच पायेंगे कि क्या लिखा जाना है? इसे आप आध्यात्म या पूर्वीयधारा से न जोड़ें और एक वृत्ति के रूप में लेखन की आधारभूत जरूरत के रूप में देखें तो बात स्पष्ट हो जायेगी।

असल में लेखन थोड़े अलग किस्म का काम है। आपको वह बाकी सभी चीज़ों से अलग कर डालता है। अर्थात वह एक ऐसी गतिविधि है जो भयंकर रूप से व्यक्तिगत है और उस व्यक्तिगत को व्यक्ति के माध्यम से जानना कठिन है। हम उसे समग्र तौर पर ही जान सकते हैं। यह एक अत्यन्त जटिल सी प्रक्रिया है, तथापि यह जटिलता बहुत एकाग्रता, बहुत एकान्त और बहुत ज्यादा आज़ादी की मांग करती है। उस एकाग्रता को आप पागलपन की कोटि की चीज़ भी कह सकते हैं। जब तक वह ज्वार रहता है आदमी सब चीज़ों से कट जाता है। यहां तक कि उसका अपनापन, अपनी निजता भी उभरकर नहीं आती।

प्र. काव्य रचना-प्रक्रिया में प्रतीक, बिम्ब, मिथक और फेंटेसी का कितना और क्या योगदान है ?

उ. सच्ची बात तो यह है कि आपके सवाल का जवाब देना संभव नहीं है। स्थूल रूप से कविता एक दीर्घ चिन्तन की फलश्रुति है। एक ही अव्यक्त खयाल को जनाश्रित भाषा में पिरोना ही पहले दुष्कर कार्य है। यह भी डर लगा रहता है कि कहीं कोई पूर्व कथित प्रभाव हमारे सोचे पर न पड़ जाय। यह बहुत महीन काम है। तो इसमें भाषा संगठित होकर आने वाले सभी पक्षों का जुड़ाव है। प्रतीक तो खैर, यदि व्यक्तिगत प्रतीकों को छोड़ दें, तो हमारे शास्त्र और हमारे पूर्व कथा काव्यों में बहुतायत से हैं, वे अपनी उपयोगिता और प्रासंगिकता के कारण आ जाते हैं किन्तु बिम्ब, खासतौर से चाक्षुष बिम्ब इधर-उधर से टकराते हैं और उसी टकराहट में नई सृष्टि हो जाती है, किन्तु मिथक और फैंटेसी सचमुच प्रतिभाओं के लिए चुनौती है। वे महत्त्वपूर्ण हैं, पर हैं तलवार की धार।

प्र. कविता लिखना क्या एक आवेगपूर्ण प्रक्रिया है?

उ. बाहर से देखने पर तो कविता एक आवेगपूर्ण प्रतिक्रिया ही जान पड़ती है। अक्सर आलोचक इसी सहारे कविता के बारे में अपना विवेचन प्रस्तुत करते हैं। आवेग की प्रतिक्रिया मात्र कविता नहीं है। आवेग एक चीज़ है जो उद्वेग से जन्मता है। आवेगात्मक भाषा तात्कालिक प्रभावों से जन्म लेती है पर जैसा अनेक सृजेता भी मानते हैं कि आवेग या उद्वेग ही मात्र लक्ष्य नहीं है। हम मौटे तौर पर देखते हैं कि सृजेता अपनी एक अलग धुन में रचनाशील होता है। वह उद्वेग का अतिक्रमण कर पहले यह सुनिश्चित कर लेता है कि उसे केवल किसी शील की प्रतिक्रिया से बचना है। यह एक तरह से हिंसक और बनैले पशुओं के आक्रमण से ज्यादा संगत रूप से समझा जा सकता है, परन्तु जैसे कि हर घटना में तात्कालिकता विवशता को जन्म देती है वैसे ही उद्वेगकारी प्रतिक्रिया भी एक ऐसा ही उत्तर है, जो हमें अभी प्रस्तुत करना है किन्तु उसका कोई दूरगामी लक्ष्य नहीं है। जबकि लिखना पहले यह सुनिश्चित करता है कि उसका लक्ष्य तात्कालिक नहीं है, और ऐसा अनुमान भी एक तरह से उस तैयारी की ओर संकेत करता है, जो आवेगात्मकता के प्रतिपक्ष में जा खड़ा होता है।

पहले कभी आवेग महत्त्वपूर्ण था। आज के सृजन की तैयारी का वह कुछ दूर तक साथी हो सकता है। अत: इस पक्ष पर फिर से विचार करना पड़ेगा। आइए यहीं पर, इसी परिस्थिति में खोज करें कि क्या सचमुच कविता आवेगपूर्णता का प्रतिफल है। आवेग के मनोविज्ञान में कुछ विशेषताएं  अन्त:निबद्ध हैं। वह है तात्कालिकता, जबकि कविता की तैयारी में अनेक प्रसिद्ध कवियों के आत्मकथन से स्पष्ट होता है कि वह एक लम्बी प्रक्रिया है। ऐसी प्रक्रिया जो काल के अनेक सोपानों का संक्रमण भी कर जाती है। अत: यह परिस्थिति परीक्षण साबित करता है कि कविता केवल आवेगात्मक कार्य नहीं है, वह आवेगपूर्ण प्रक्रिया इसी अर्थ में नहीं है। वह क्या है? इसे आगे समझेंगे।

प्र. काव्य हेतु-प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास में आप काव्य रचना-प्रक्रिया में किसे अधिक महत्व देंगे और क्यों ?

उ. अभ्यास आपको सफल तुक्कड़ बना सकता है। अभ्यास की अभी कविता के सृजन में कोई भूमिका नहीं, व्युत्पत्ति भी अभ्यास की तरह बाहरी तत्त्व है। प्रतिभा अव्याख्यायित सी वस्तु है किन्तु प्रतिभा का ही कविता से सबसे ज्यादा सम्बन्ध है। हम उसे प्रतिभा ही मानते हैं। परन्तु शास्त्रीय अर्थ में प्रतिभा की व्याख्या करना कठिन है। प्रतिभा को एक गुण मानना भी कठिन है। वह सिर्फ  गुण नहीं है। प्रतिभा इस अर्थ में एक सम्पूर्ण सी चीज़ है। उसे सम्पूर्ण कहने का प्रयोजन इतना भी है कि वह कविता के हर पक्ष को छूती है, तथापि प्रतिभा के साथ दृष्टि का गहरा अन्तर्सम्बन्ध है, और वह दृष्टि ही है जो दुनिया को देखने परखने का विकल्प सुझाती है। हम अपने उन क्लासिकी कवियों की कविताओं को देखें जिन्होंने हर कविता को एक अलग प्रकार की कविता बनने की दिशा में कुछ ऐसे कीर्तिमान स्थापित किए कि आज भी आश्चर्य होता है। अब केवल भाषा का ही पक्ष लें। भाषा की दृष्टि से नये कवियों ने एक नयी भाषा सृजित की थी जो छायावाद से अलग थी। एकदम अलग।

प्र. कविता के सृजन के दौरान अपकी भाषा किस प्रकार के रचनात्मक तनाव से गुजरती है?

उ. असल में कविता भाषा के जरिए उतरती ही नहीं, यह एक तिलिस्म है जिसे भेदा नहीं जा सकता, कविता जैसे आप पर उतरती है-वह देखे दृश्यों, सुने किस्सों, बुने झरोखे और टूटे गलिस्तानों की स्मृतियों की तरह अचानक झरते हुए अपनी गिरफ्त में ले लेती हे और हम फिर उसकी शाब्दिक तस्वीरों के निर्माण में व्यस्त हो जाते हैं। हम अपनी भाषा में उतारने का काम अनुवादकों की तरह से करते हैं। अर्थात एक प्रभाव को भाषातीत अभिव्यक्ति से उठाकर भाषा की पोशाक में उसे अनूदित करते हैं, परन्तु यह काम सिर्फ  समतुल्यता के आधार पर नहीं होता। समतुल्यता एक प्रकार की समाजरूपी वृत्ति है जो अनुवादन मेें तो महत्त्वपूर्ण है, सृजन में नहीं। सृजन एक पूर्णरूपेण दिक है। उसकी रचना या पुनर्रचना पुन: उसी स्वतन्त्रता की दुहाई देती है, और अपेक्षा रखती है कि एक ऐसी स्वतन्त्रता झलके जो अराजकता को भी पराजित कर दे। यह बेशक परिकल्पना है, परन्तु सत्य को प्रतिभाषित करती है।

प्र. काव्य रचना-प्रक्रिया में कवि व्यक्तित्व का कितना महत्त्व है ?

उ. सृजन एक तरह से मुक्ति का आस्वाद कराने वाली प्रक्रिया है। तब किसी प्रकार के अहंकार की उपस्थिति बनावटी लगती है। मैं लिखता हूं यह अहंकार यदि है तो वह लेखन कविता नहीं है। प्राचीनकाल में अहं विसर्जन सृजेता का प्रथम कर्म होता था। सब कुछ जो रचा जाता था, परमशक्ति को अर्पित कर यही माना जाता था कि हमारा अपना कुछ नहीं है, और इसका प्रतिभासित रूप सृजेताओं ने सुरक्षित रखा। सब अपने-अपने ढंग से यह कहने के लिए अभिशप्त हैं कि उन्होंने जो भी लिखा है वह इस या उसकी प्रेरणा से, कुछ आगे बढ़कर यह कहने वाले लोग वैज्ञानिक सोच के कहे जाने लगे कि हमारा समूचा लिखा हमारे समाज का है या हमारे समाज के दबावों का है। और विचार जगत में अनेक धाराएं प्रवाहित होने लगीं। यहीं से हम पाते हैं कि एक कवि व्यक्तित्व का आभास मिलने लगता है। कवि परिभू स्वयंभू जैसी कीर्ति का नायक कहा जाने लगा। गौर करें तो हमें अहसास होगा किकवि सामाजिक अपेक्षाओं में कुछेक दायित्वों का निर्वहन करने वाला या दायित्वों का अनुकर्ता समझा जाने लगा। प्राचीन काल से ही कवियों की उक्तियों का खुलकर प्रयोग कवि के महत्तम व्यक्तित्व का ही प्रतिफल माने जाने लगा। आज हम कवि की चाहे वैसी प्रतिष्ठा या कविता का ही वैसा रूप चाहे न पाएं पर कवि का व्यक्तित्व कवि से ज्यादा अस्तित्वमय लगता है।

प्र. पद्य और गद्य की रचना-प्रक्रिया में आप क्या अन्तर करना चाहेंगे?

उ. पद्य और गद्य दो अनुशासन अवश्य है। लेखन के स्थूल से दीखने वाले दो रूप हैं। एक में माधुर्य और चातुर्य के लिए मितव्ययता दरकार है, दूसरे में विस्तार की गुंजायश फैलाव की परिसीमा में मान ली जाती है। तथापि पद्य में भी कथा काव्य विस्तार के रूप विकसित कर लेता है तथा गद्य में भी संक्षिप्तता का कौशल उजागर होता रहता है। इसके अतिरिक्त कोई अन्य अन्तर रचनात्मक स्तर पर गंभीर किस्म का नहीं कहा जा सकता। मैं सोचता हूं जिन चीजों को व्यक्त करने के लिए आप कविता की ओर मुड़ते हैं तो वह एक किस्म की सर्जनात्मक जरूरत है किन्तु इसे कोई शर्त मान लेना उचित न होगा। मुझे गद्य और पद्य, दोनों में महत्त्व की रेखा सिर्फ यही दिखाई देती है कि जो कहा जा रहा है वह अपने कलात्मक वैभव का संरक्षण कर पा रहा है या नहीं। आज जब लेखन का कार्यव्यापार हाशिए की ओर स्थित होते देखा जा रहा है तब पुनर्विचार अवश्य होना चाहिए कि कहीं अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति के खतरे उठाने का भाव मन्द तो नहीं पड़ रहा है, और इसे सृजन की पीठिका में ही मापा जा सकता है। मैं तो यह मानता हूं कि गद्य और पद्य दो रूपाकार हैं। उनमें आप अपने समय के सभी विषयों को संरक्षित कर सकते हैं। गद्य में सुविधा यह रहती है कि आप एक तार्किक ढंग से अपनी बातें कह सकते हैं। पद्य में कम स्पेस में ज्यादा अंकित करने की कला आनी चाहिए।

प्र. काव्य रचना-प्रक्रिया की परिभाषा क्या होनी चाहिए?

उ. जो हम सबने पुस्तकों में, सैद्धांतिकों की स्थापनाओं के रूप में, रचना-प्रक्रिया सम्बन्धी सामग्री देखी है वह रचना और उसकी प्रक्रिया से बहुत दूर है। परिभाषा में एक सृजेता की रुचि नहीं होती, इसलिए उसका सम्बन्ध सृजन से नहीं होता। सृजन एक अव्यक्त किन्तु नैसर्गिक क्रिया है। क्रिया की प्रक्रिया में सातत्य का गहरा जुड़ाव होता है, शायद इसी में वे तत्त्व हों?

प्र. आपकी रचना-प्रक्रिया क्या है? उसे आप कितने स्तरों में बांटते हैं?

उ. इस सम्बन्ध में ठीक से कह पाना कठिन है। काव्य रचना-प्रक्रिया कोई अलग चीज़ नहीं है। वह दबाव जो लिखने के लिए उकसाता है, भीतर से ही आता है। बाहर के प्रभाव या दबाव या आग्रह या अनुरोध बाहरी चीज़ें हैं। उनसे क्षण भर के लिए आक्रामक उत्तेजना जरूर पैदा होती है, परन्तु वह अव्याख्यायित ही रह जाती है। जिसे मैं भीतर का उकसाया कहता हूं, वह भी अवश्य रहता है। कभी मौका पाकर वह क्षण जब दबोचता है, तब सब कुछ से क्षमा मांगते हुए, मनोवैज्ञानिक कारणों से एकदम ऐसी परिस्थिति आ बनती है कि कुछ न कुछ अभिव्यक्ति के रूप में आ जाता है। असल में कविता की रचना का अवसर बुलाकर नहीं आता। वह मौका सृजेता पर सवार हो जाता है। मैं जानता ही नहीं हूं कि जो लिख रहा हूं-वह क्या रूप लेने वाला है?

प्र. काव्य रचना में प्रेरणा का क्या योगदान है?

उ. इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि कोई क्षण, कोई अवसर भीतर से आदमी को धकेलता है। वह प्रेरणा कोई कथन, कोई श्रुति, कोई स्मृति या कोई कल्पना या कोई वास्तविक जगत से जुड़ी वास्तविकता हो सकती है किन्तु अक्सर कवियों द्वारा जो आत्मस्वीकृति की जाती है कि उन्हें अमुक व्यक्ति ने, अमुक घटना ने प्रेरित किया है-वे एक नितान्त गोपनीय को सार्वजनिक बनाने की दिशा में काम करते हैं। बहुतेरे सृजेता जो राजनीति में निष्णात हैं वे ऐसी भ्रांतियां फैलाकर अपने निष्कर्षों को सही ठहराने का आपराधिक काम करते हैं। अत: कविता के पीछे चार पुरुषार्थों की वकालत पर भी विचार करना पड़ेगा। चाहे ये पुरुषार्थ सीधे-सीधे उत्तरदायी न हों किन्तु वे एक दबाव के रूप में काम जरूर करते हैं, और अगर इसी बात को हम शास्त्रीय शब्दावली में प्रेरणा के बिन्दु, प्रेरणा के दबाव का ही वैयाकरणिक रूपान्तरण मान लें तो इसमें किसी तरह की छिपाव की वृत्ति न होगी, अपितु यही स्पष्ट होगा कि वो सृजन के लिए बाहरी दबाव की उपस्थिति है। हमारी इस बहस में दो स्थितियां तो उभर आई ही हैं कि लिखने के लिए कोई न कोई बहाना तो खोजना पड़ेगा ही। अब आज हम एक ऐसी स्थिति की कल्पना करें कि कोई आदमी महीनों से अकेला पड़ा हो। उस अकेलेपन से ऊबकर वह अपना प्रतिरोध भी तो लिखने में व्यक्त कर सकता है। इसे भी एक आधार के तौर पर स्वीकार करना पड़ेगा।

प्र. गद्य और पद्य दोनों पर ही आपकी सिद्धहस्तता रही है, क्या आप वर्तमान में लिखी जा रही कविता और कहानी में कुछ अन्तर मानते हैं।

उ. विधाओं के रूप में गद्य-पद्य का अन्तर तो निर्धारित ही है पर काव्यात्मक कहानी और गद्यात्मक कविता की सृष्टि भी की गई है। यही नहीं बहुत पुराने समय से हम ललित गद्य को कविता की कोटि का सम्मान देते रहे हैं। विधाएं एक-दूसरे के भीतर प्रवेश कर रही हैं, हो सकता है कल कोई ऐसा परिमापक हाथ लग जाय जो नई विधा की शुरूआत की घोषणा करे, तथापि कथा की भाषा और काव्यभाषा की ऊष्मा अपना अलग स्वरूप हमेशा बनाए रखेंगीं।

प्र. अकहानी और अकविता में क्या अंतर है?

उ. कविता और कहानी में जो अन्तर है-उसी से इस उत्तर को समझा जा सकता है। दोनों नाम सृजनात्मक विधाओं के आन्दोलनों की भूमिका भी स्पष्ट करते हैं। आज आवश्यकता है कि 1960 की चुनौतियों पर एक बार फिर से विचार किया जाय। यह समय विश्व भर के युवा आन्दोलनों का है, इसलिए इसे कुछ साहित्यिक फतवों से निपटाना सही नहीं है। यह प्रश्न गंभीर विवेचना की अपेक्षा रखता है।