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Saturday 15 Dec 2018

माँ नर्मदा का करूण विलाप: अमृतलाल वेगड़

चिरकुंवारी नर्मदा का सात्विक सौन्दर्य, चारित्रिक तेज और भावनात्मक उफान नर्मदा परिक्रमा के दौरान हर संवदेनशील मन महसूस करता है। कहने को वह नदी है लेकिन भक्तों के लिए साक्षात माँ हैं। पौराणिक कथा और यथार्थ के भौगोलिक सत्य का सुन्दर सम्मिलन उनकी इस भावना को बल प्रदान करता है और इसलिए वे हृदय से पुकार उठते हैं नमामि देवी नर्मदे.......।

पवित्र नदियों में शामिल नर्मदा को गंगा की तुलना में कहीं अधिक पवित्र माना जाता है। मत्स्यपुराण में बताया गया है कि कनखल क्षेत्र में गंगा पवित्र है और कुरूक्षेत्र में सरस्वती। गाँव हो चाहे वन, नर्मदा सर्वत्र पवित्र है। कल-कल ध्वनि के बीच सुनाई देता है नर्मदा का करूण विलाप जो अमृतलाल वेगड़ द्वारा लिखित यात्रावृत्तांतों में देखने को मिलता हैं। नर्मदा परिक्रमा पर लिखे यात्रावृत्तांत 'सौन्दर्य की नदी नर्मदाÓ, 'अमृतस्य नर्मदाÓ और 'तीरे-तीरे नर्मदा' नर्मदा के उद्गम, प्रकटन और जीवन की करूण गाथा से रूबरू कराते हैं। कहते हैं शोणभद्र से धोखा खाने पर आजीवन कुंवारी रहने का फैसला कर नर्मदा उलटी दिशा मेें चल पड़ी थी। नर्मदा का भौगोलिक सत्य भी यही कहता है कि सचमुच भारतीय प्रायद्वीप की प्रमुख नदियों (गंगा, गोदावरी) से विपरीत दिशा में बहती हैं माँ नर्मदा यानी पूर्व से पश्चिम की ओर। कहा जाता है कि आज भी नर्मदा परिक्रमा के दौरान यह करूण विलाप सुनाई पड़ता है। धार्मिक कारणों से बरसों से नर्मदा यात्रा की जाती रही है। वेगड़ जी ने प्रथम यात्रा 1977 में और अन्तिम 2009 में की। इस दौरान नर्मदा परिक्रमा के स्वरूप में काफी परिवर्तन आ गया हैं।

नर्मदा अपना दर्द बयाँ करती हुई कहती हैं- ''आज मेरे तटवर्ती प्रदेश काफी बदल गए हैं। मेरी वन्य एवं पर्वतीय रमणीयता बहुत कम रह गई है। मुझे दु:ख है कि मेरे घने जंगल जड़ से काट डाले गए हैं। पहले इन जंगलों में जंगली जानवरों की गरज सुनाई देती थी, अब पक्षियों का कलरव तक सुनाई नहीं देता। उन दिनों मेरे तट पर पशु-पक्षियों का राज्य था, लेकिन उसमेें आदमी के लिए भी जगह थी। अब आदमी का राज्य हो गया है, लेकिन उसमें पशु-पक्षी के लिए कोई जगह नहीं। ....... मेरा पानी भी उतना निर्मल और पारदर्शी नहीं रहा। फूलों और दुर्वादलों से सुवासित स्वच्छ हवा भी नहीं रही....''1

एक तरफ  आस-पास के गंदे नाले-नाली, रासायनिक घोल नर्मदा के पानी में मिल रहे हंै तो दूसरी तरफ माँ नर्मदा को बड़े-बड़े बाँधों में बाँधा जा रहा है- ''इन दिनों मुझ पर कई बाँध बाँधे जा रहे हैं। बाँध में बँधना भला किसे अच्छा लगेगा। फिर मैं तो स्वच्छंद हरिणी-सी हूँ, मेरे लिए तो यह और भी कष्टप्रद है। इससे मेरी आदिम युग की स्वच्छंदता चली जाएगी। किन्तु अब अकालग्रस्त भूखे-प्यासे लोगों को पानी और चारे के लिए तड़पते पशुओं को और बंजर पेड़ खेतों को देखती हूँ, तो मेरा मन रो उठता है। आखिर मैं माँ हूँ, अपनी संतान को तड़पता कैसे देख सकती हूँ। इसलिए मैंने इन बांँधों को स्वीकार कर लिया है। अभी तक मैं दौड़ के आनंद के लिए दौड़ती थी। अब धरती की प्यास बुझाने के आनंद के लिए दौडूँगी भी और ठहरूँगी भी। सरोवर बनाऊँगी। नहरों के माध्यम से खेतों की प्यास बुझाऊँगी। धरती को सुजला-सुफला बनाऊँगी। कुछ लोग मुझ पर बन रहे बड़े बाँधों का विरोध कर रहे हैं, लेकिन अगर आबादी इसी तरह बढ़ती रही तो ये तो क्या, आपको इससे भी बड़े बाँध बनाने पड़ेंगे।''2

            अपनी आरंभिक यात्राओं में एक ओर वे जहाँ इतराती बलखाती वन प्रातंरों में लुकती-छिपती, चट्टानों को तराशती नर्मदा के सौन्दर्य का वर्णन करते हैं वहीं नर्मदा के बदलते भूगोल पर भी चिंता व्यक्त करते हैं- ''मेरी इस यात्रा के सौ साल तो क्या, पच्चीस साल बाद भी कोई इसकी पुनरावृत्ति न कर सकेगा। पच्चीस साल में नर्मदा पर कई बाँध बन जाएंगे और इसका सैकड़ों मील लम्बा तट जलमग्न हो जाएगा, न वे गाँव रहेंगे न पगडंडियाँ। पिछले 25000 वर्षों में नर्मदा तट का भूगोल जितना नहीं बदला है, उतना आने वाले 25 वर्षों में बदला जाएगा''3  वेगड़ जी ने नर्मदा की प्रथम यात्रा 1977 में और अन्तिम 2009 में की इस दौरान आया परिवर्तन वेगड़ जी ने स्वयं देखा ''1977 में जबलपुर से मंडला तक चला था। इस बार भी वहीं से चलता लेकिन बरगी बाँध के कारण 'अत्र लुप्ता नर्मदा' वाली स्थिति बन गई है। न वे गाँव रहे है, न वे पगडंडियाँ, न वे किनारे।''4

नर्मदा परिक्रमा के साथ-साथ कई संकट भी नर्मदा की परिक्रमा करते हैं। इनमें से कई संकट सरदार सरोवर बाँध जैसे विशालकाय हैं तो कई आँखों से नजर भी न आने वाले प्रदूषकों जितने सूक्ष्म। जबलपुर से ही माँ नर्मदा के इन संकटों से हमारा साक्षात्कार होने लगता है। अमरकंटक में महाशिवरात्रि के दिन विशाल मेेले का आयोजन किया जाता है। जब मध्यप्रदेश प्रदूषण नियन्त्रण मंडल ने छ स्थानों नर्मदा कुंड कोटी तीर्थ घाट, रामघाट, पुष्कर डेम, कपिल संगम और कपिलधारा में नर्मदा जल की जाँच की तो पता चला महाशिवरात्रि के आस-पास कॉलीफार्म बैक्टीरिया (मल-जनित जीवाणु) की मात्रा अचानक बढ़ जाती हैं। घने जंगलों मेें बसा अमरकंटक अब भीड़भाड़ वाले तीर्थस्थल में तब्दील हो गया है।

एक तरफ  जहाँ नर्मदा बेसिन में बारिश की कमी और नदी के प्रवाह के घटने के संकेत मिल रहे हैं, वहीं दूसरी और सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक जरूरतों को पूरा करने के लिए नर्मदा का दोहन बढ़ता जा रहा है। पिछले तीन दशकों से नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़ी मेघा पाटकर कहती हैं कि जिस तरह नर्मदा जल के दोहन के नए-नए रास्ते निकाले जा रहे हैं, रेत का अंधाधुंध खनन जारी है, जंगलों का विनाश हुआ है, वह नर्मदा के भविष्य के लिए दुखद संकेत हैं। आज जल बँटवारे, जंगलों के विनाश, बड़े बाँधों के निर्माण, लाखों लोगों के विस्थापन और पुनर्वास आदि समस्याओं से नर्मदा घिरी हुई है। इसमें से कई संकट गहराते जा रहे है तो कई नए खतरे भी पैदा हो गए हैं। मध्यप्रदेश की राजनीति इन दिनों नर्मदा के इर्द-गिर्द चक्कर लगा रही है। पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नर्मदा यात्रा की और अब मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह पैदल यात्रा पर निकल पड़े।

नर्मदा की सहायक नदियाँ ही सतपुड़ा, विन्ध्य और मैकल पर्वतों से बूँद-बूँद पानी लाकर नर्मदा को सदानीरा बनाती हैं। इनमें से कई नदियाँ सूखने के कगार पर है या फिर आसपास के नालों में तब्दील हो रही है। 'शक्करÓ का दर्द वेगड़ इस तरह बयां करते हैं- ''शक्कर सूख गई थी। नदी से पानी आलोप हो चुका था। पानी की कलकल ध्वनि की जगह सन्नाटा था। लोगों ने कहा, शक्कर को पहली बार सूखते देखा। संगम पर जो थोड़ा-सा पानी था, वह नर्मदा का घुस आया था। स्वयं नर्मदा में बहुत कम पानी था। ........उदास आँखों से नदी को नहीं नदी के कंकाल को देखता रहा। पानी के साथ ही नदी का माधुर्य भी चला गया था। पानी न होने के कारण शक्कर अपने आपको परित्यक्त और शक्तिहीन महसूस कर रही थी।''5

प्रवाह में कमी का एक और प्रमुख कारण है कि नर्मदा की प्रमुख सहायक नदियों पर बने बाँधों मेें जल का संचय हो जाने से पहले की तुलना में कम जल पहुँचता है। परन्तु उससे भी बड़ा कारण यह है कि इन नदियों के जलागम क्षेत्रों में सघन वनों के प्रतिशत में लगातार कमी आ रही है जिससे वनों के माध्यम से होने वाली अन्तारोधन क्रिया ठीक से नहीं हो पाती। यह नर्मदा पर दोहरी मार है। एक तरफ  नर्मदा की सहायक नदियाँ सूखती जा रही हैं, वहीं कुछ पर बांध बनाए जा रहे हैं।

वनों का वर्षा जल, मिट्टी और जीवन के साथ गहरा संबंध है। अमरकंटक, सतपुड़ा और विन्ध्य की पहाडिय़ों में फैले साल, सागौन, बांस और मिश्रित वन बारिश के पानी के साथ-साथ उपजाऊ मिट्टी को भी बह जाने से रोकते हैं। पेड़ों से रिसता हुआ यही पानी नदियों में पहुँचता है। बारिश का पानी तुरंत नदी-नालों मेें नहीं पहुँचने से बाढ़ का खतरा भी कम हो जाता है। लेकिन हाल के वर्षों में वनों की कटाई से हमें बाधा उत्पन्न हुई है। ''शाम को नर्मदा तट गए। पच्चीस बरस पहले भी यहाँ आया था। तब यहाँ कैसा घना जंगल था। विशाल वृक्षों से लिपटी सुदीर्घ लताएं मुझे आज भी याद थी। पर अब कुछ भी नहीं बचा था। इंसान की कुल्हाड़ी ने सर्वनाश कर डाला था।''6

नर्मदा घाटी में बॉक्साइट जैसे खनिजों की मौजूदगी भी कई संकटों का कारण बनी है। नर्मदा के उद्गम वाले क्षेत्रों में 1975 में बाक्साइट का खनन शुरू हुआ जिसके कारण वनों की अंधाधुंध कटाई हुई। हालांकि बाद में बॉक्साइट के खनन पर काफी हद तक अंकुश लगाया लेकिन तब तक पर्यावरण को काफी क्षति पहुँच गई थी। अब ऐसा ही खतरा डिंडोरी जिले में सामने आया है। गत दिसम्बर माह में वहाँ बॉक्साइट के बड़े भंडारों का पता चला है। होशंगाबाद पहुँचने पर पता चलता है कि यहाँ दिन में ही रेत निकालते टे्रक्टर ट्राली दिखाई देते है।

नर्मदा को रेत माफिया से बचाने के लिए हाईकोर्ट और एनजीटी में कई याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं। नर्मदा समर्थ सत्याग्रह, नर्मदा बचाओ आंदोलन, नर्मदा संरक्षण पहल अनेक कार्यक्रम भी चलाए। लेकिन फिर भी एक संकट खत्म होता नहीं कि दूसरी चुनौती सामने आ जाती है। नर्मदा के धार्मिक महत्व के आसपास राजनीतिक सक्रियता कई बार देखी जा चुकी है। इसके बाद माँ नर्मदा का हाल बेहाल है। हाल ही के दशकों में नर्मदा घाटी का सामना कभी बाढ़ तो कभी सूखे से होता रहा है। कई जन्तुओं की प्रजाति खत्म हो रही है। नर्मदा में हजारों वर्ष पूर्व के जीवों के अवशेष मिलते हैं। नर्मदा में आज भी जैव-विविधता के प्रमाण मिलते हैं। इन सभी जैव विविधताओं की निर्भरता नदी के पानी की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। लगातार हो रहे बाँधों के निर्माण, बढ़ते प्रदूषण और रेत के खनन से सारे जीवाश्म खत्म हो रहे हैं।

सौन्दर्य की नदी नर्मदा नित नए संकटों से घिरने के बावजूद अपनी अविरलता, अपनी जीवन्तता छोडऩे को तैयार नहीं है। मगर विकास की आधुनिक जिद भी अड़ी हुई है। माँ नर्मदा ने हमें सब कुछ दिया लेकिन हमने उसे प्रदूषित कर विभिन्न बीमारियाँ ही दी हैं।

माँ का यह करूण विलाप परिक्रमा के दौरान हमें पग-पग सुनाई देता है। माँ नर्मदा कब तक अविरल और निर्मल रहेंगी? क्या 30 साल बाद नर्मदा का वजूद खत्म होने की वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी सही साबित होगी? ऐसे कई सवाल नर्मदा भक्तों एवं पर्यावरण प्रेमियों को परेशान करते रहते हैं। इसके लिए आवश्यक है हमारी परिक्रमा पर्यावरणोन्मुखी हो साथ ही वृक्षारोपण कर, जैविक खेती कर, स्वच्छता एवं पर्यावरण संरक्षण द्वारा हम अपने पापों का प्रायश्चित करें। नर्मदा की आत्मकथा में वेगड़ जी लिखते हैं- ''जाते-जाते एक बात कहना चाहती हूँ। याद रखो, पानी की हर बूँद एक चमत्कार है। हवा के बाद पानी ही मनुष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता है। किन्तु पानी दिन दुर्लभ होता जा रहा है। नदियाँ सूख रही हैं। उपजाऊ जमीन ढूहों में बदल रही है। आए दिन खेद अकाल पढ़ रहे हैं। मुझे खेद है, यह सब मनुष्यों के अविवेकपूर्ण व्यवहार के कारण हो रहा है। अभी भी समय है। वन-विनाश बंद करो। बादलों को बरसने दो। नदियों को स्वच्छ रहने दो। केवल मेरे प्रति नहीं, समस्त प्रकृति के प्रति प्यार और निष्ठा की भावना रखो। यह मैं तुमसे इसलिए कह रही हूँ क्योंकि मुझे तुमसे बेहद प्यार है मेरे बच्चों।''7  माँ नर्मदा आज संकट में है। नमामि देवी नर्मदे के जयघोष के साथ हमें उसके अस्तित्व को बचाने का संकल्प लेना चाहिए। हमें उसका यह करुण विलाप सुनकर अनसुना नहीं करना चाहिए क्योंक हम उसके बच्चे हैं और वो हमारी माँ।

संदर्भ सूची

1 अमृतलाल वेगड़; अमृतस्य नर्मदा, मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी भोपाल, पृ.178

2 वही

3 अमृतलाल वेगड़; सौन्दर्य की नदी नर्मदा, मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी, भोपाल, भूमिका, नर्मदा की बात

4  अमृतलाल वेगड़; तीरे-तीरे नर्मदा, मध्यप्रदेश हिंदी गं्रथ अकादमी, भोपाल, पृ. 18

5 वही, पृ. 183,184

6 अमृतलाल वेगड़, सौन्दर्य की नदी नर्मदा, मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी भोपाल, पृ. 47

7 अमृतलाल वेगड़, अमृतस्य नर्मदा, मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी भोपाल, पृ.179