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Saturday 15 Dec 2018

राम का एकपत्नीव्रत: विभिन्न रामायणों के संदर्भ से

राम के मर्यादा पुरुषोत्तम चरित्र में उनके एकपत्नीव्रत का उल्लेख राम के चरित्र को महानता की नई ऊंचाइयों पर ले जाता है। सीता के रहते हुए तो वे केवल सीता से ही बंधे रहे, सीता के बाद भी उन्होंने दूसरा ब्याह नहीं किया, यह और बड़ी बात है। विशेषकर तब, जब राजाओं की एकाधिक पत्नियां होना आम बात थी, राम के इस गुण का महत्व और बढ़ जाता है। भोग के लिये तो राजागण अनेक पत्नियां रखते ही थे, राजनीतिक समीकरण को ध्यान में रखते हुए भी ऐसा प्राय: किया जाता था। स्वयं राजा दशरथ की वाल्मीकीय रामायण के अनुसार तीन सौ पचास पत्नियंा थीं। कुछ रामायणों में इनकी संख्या और अधिक बताई गई है।

राम का यह एकपत्नीव्रत भारतीयों के लिये गर्व का विषय रहा है। मनुष्य की प्रवृति चाहे जो हो ...ऐतिहासिक सत्य भी चाहे जो रहे हों , किंतु गृहस्थी का श्रेष्ठ मूल्य यही है कि जैसे नारी के लिये एकपतिव्रत धर्म है ,वैसे ही पुरुष के लिये एकपत्नीव्रत धर्म है। राम की एक बड़ी विशेषता इस धर्म का पालन भी है।

वाल्मीकीय रामायण में राम का सीता के प्रति अनन्य प्रेम जगह-जगह झलकता है। पंचवटी में भुवनसुंदरी का रुप धारण कर राम से प्रणयनिवेदन करने आई शूर्पणखा से राम कहते हैं कि मैं अपनी पत्नी में अनुरक्त हूं, ,तुम्हें नहीं अपना सकता। सीता भी राम के इस गुण की प्रशंसक थी। अरण्यकंाड में एक प्रसंग में वह राम से कहती हैं कि आप में धर्म का नाश करने वाली परस्त्रीगमन की अभिलाषा आपको हो ही कैसे सकती है?:कुतोऽभिलशणं स्त्रीणां परेशां धर्मनाशनम।' अपनी पत्नी में सदा अनुरक्त रहने वाले आपके मन में यह दोष तो कभी उदित नहीं हुआ है और न ही भविष्य में होगा। आपकी जितेन्द्रियता को मैं अच्छे  से जानती हूं । वे राम को स्वदारानिरत अर्थात् अपनी ही पत्नी में संतुष्ट रहने वाला कहती (अर.कां.9.5-8)। वाल्मीकीय रामायण में कैकेयी तक राम के इस गुण का बखान करती है। जब भरत पूछते हैं कि राम ने आखिर क्या अपराध किया जिसके दंडस्वरूप राजा ने उन्हें वनवास दिया , क्या उनका मन परस्त्री में अनुरक्त हुआ है? इस पर कैकेयी कहती है कि 'न राम: परदारान् स चक्षुभ्र्यामपि पश्यतिÓ अर्थात् राम किसी परस्त्री पर दृष्टि नहीं डालते हैं।(अयो.कां. 72.48)

  परवर्ती रामायणकारों ने राम के इस गुण का सुंदरता से बखान किया है।

तमिल कंब रामायण में सीता हनुमान से कहती हैं कि राम के दिव्य कानों में तुम एक रहस्य की बात कहना, 'जब आपने मेरा पाणिग्रहण किया था तब अपना यह निश्चय सुनाया था कि इस जन्म में दो स्त्रियों का मैं मन से भी स्पर्श नहीं करुंगा। यह मेरे लिये वरदान वाक्य था।'

ओडिय़ा रामायण वैदेही विलास में उल्लेख है कि राम सीता के साथ प्रथम मिलन में दीपाग्नि को छूकर प्रतिज्ञा करते हैं कि जब तक शरीर में प्राण है, मैं अन्य रमणी से प्रेम नहीं करुंगा। तब सीता भी एक प्रतिज्ञा करती हैं। प्रथम मिलन था, अत: वह मुख से बोल तो नहीं पाईं किंतु उन्होंने अपने केशों से केवड़े की एक पंखुड़ी निकाली और अपनी चिबुक से कस्तूरी पोंछ कर पंखुड़ी पर लिखा , 'आज तक मेरा मन किसी परपुरुष के प्रति नहीं ललचाया है ,न ही भविष्य में कभी ललचाएगा। जन्म-जन्म में मेरा मन आपके प्रति ही आकर्षित रहेगा। आगे वे यह भी लिखती हैं ...इस जन्म में तो आप मेरे कांत हुए। अगले जन्म में यदि कोई दूसरा वर नियत हो तो उसे विवाह-मंडप से लौट जाना पड़ेगा। दूत से मैं तुम्हारी खोज करवा लूंगी। (वै.वि.15-13)

ओडिय़ा विचित्र रामायण में भी उल्लेख है कि पहली रात में ही दीपक को साक्षी मानकर राम ने सीता के सामने एकपत्नीव्रत की प्रतिज्ञा की थी। इसलिये परशुराम का धनुष ग्रहण करते देख जब सीता डर जाती हंै कि इस धनुष के कारण राम को कहीं दूसरी कन्या तो नहीं मिलेगी, तब राम कहते हैं, 'मत डरो। मैंने तुमसे जो प्रतिज्ञा की है, उसमें दृढ़ रहूंगा।' (वि.रा.छांद 60-61)              

ओडिया जगमोहन रामामायण में सीता हनुमान से बताती है कि विवाह के दिन हम दोनों ने कुलदीपक को छूकर प्रतिज्ञा की थी कि हम किसी अन्य स्त्री-पुरूष का स्पर्श नहीं करेंगे। जब मैंने पूछा कि जब मेरा यौवन और रुप ढल जायेगा , क्या तब आपका प्रेम समाप्त हो जायेगा? तब राम ने कहा था, तुम्हारा यह युवा रुप कभी समाप्त नहीं होगा। (खंड 3 पृ. 153)

यहां उल्लेखनीय है कि सीता से बिछडऩे के बाद राम द्वारा स्वर्णप्रतिमा बनवाने तथा पुनर्विवाह न कर यज्ञ आदि धार्मिक अनुष्ठानों में उसे ही अपने वामांग में स्थान देने का अनेक रामकथाकारों ने उल्लेख किया है। जनमानस में भी यह बात प्रचलित है। भारतीय इतिहास में संभवत: पहली और आखिरी घटना होगी जब किसी राजा ने पत्नी के स्थान पर उसकी प्रतिमा को वामांग में स्थान देकर यज्ञकार्य किया हो। निश्चय ही यह बात राम के सीता-त्याग के कृत्य की कठोरता को कुछ कम करती है। वाल्मीकीय रामायण में भी इसका उल्लेख है। परवर्ती अधिकांश रामकथाकारों ने राम को एक पत्नीव्रती बताया है।

हृदि कृत्वा तदा सीतामयोध्यां प्रविवेश ह। इष्टयज्ञो नरपति: पुत्रद्वयसमन्वित:।।

सीताया: परां भार्यां वव्रे स रघुनंदन: । यज्ञे यज्ञे च पत्नयर्थं जानकी कांचनाभवत।।(उ.कां.99.78)

अर्थात् यज्ञ की समाप्ति के पश्चात् सीता का मन ही मन स्मरण करते हुए राम ने अयोध्या में प्रवेश किया और अपने देानों पुत्रों के साथ रहने लगे। उन्होंने सीता के सिवा किसी अन्य स्त्री से विवाह नहीं किया। प्रत्येक यज्ञ में जब-जब धर्मपत्नी की आवश्यकता होती, कंचन की सीता उनके साथ होती।         

सीता राम द्वारा त्यागे जाने से अत्यंत दुखी थी। एक सहज प्रश्न यहां उठता है कि ऐसे में जब उन्हें पता चला कि राम ने उन्हें त्याग देने के बाद भी दूसरा विवाह नहीं किया, उनकी स्वर्णप्रतिमा वामांग में रखकर वे यज्ञ संपन्न करते हैं, तो उन्हें कैसे लगा होगा? कालिदास ने रघुवंश में इस बात का उल्लेख किया है। यहां कवि कहते हैं कि स्वामी के इस वृतान्त को सुनकर सीता ने अपने परित्याग किये जाने का दुख किसी प्रकार सहन किया। (रघुवंश ,14.87) आगे कालिदास राम द्वारा सीता के त्याग की इस मायने में प्रशंसा करते हैं कि किसी और से उन्होंने विवाह नहीं किया ।(वही,15.61) भवभूति ने उत्तररामचरित नाटक में भी यहां सीता के मन को बड़ी खूबसूरती से प्रस्तुत किया है। यहां उल्लेख है कि सीता की वनवास काल की सखी वनदेवी वासंती को जब पता चलता है कि राम ने सीता का त्याग कर दिया है, तो वह सीता के लिये दुखी होती हैं और इस कारण राम से रुष्ट भी होती हैं। जब उन्हें ज्ञात होता है कि राम अश्वमेधयज्ञ करने जा रहे हैं तो वे यह सोचकर और भी दु:खी हो जाती हैं कि राम ने अवश्य पुनर्विवाह कर लिया होगा किंतु जब उन्हें पता चलता है कि राम ने सीता के त्याग के बाद कोई विवाह नहीं किया, सीता की हिरण्यमयी प्रतिकृति को वामांग में रख कर यज्ञ करेंगे, तो उनका राम के प्रति रोष कम हो जाता है। जब वासंती से  सीता को यह बात पता चलती है तो कह उठती हैं ,'अहो! आर्यपुत्र ने मेरे परित्याग रुपी कील को उखाड़ दिया।' (3.45)

 बंगला कृत्तिवास रामायण में स्वर्णप्रतिमा बनाने की कथा भी है। यहंा सीता को वन में छोड़कर लौटे लक्ष्मण का राम से संवाद बड़ा भावुक है। कवि लिखते हैं , 'सीता को वन में छोड़कर लौटे लक्ष्मण को अकेले देख राम सीता के लिये दु:खी होते हैं। सीता वन में कैसे रहेगी, यह प्रश्न तो था ही उनके सामने, पर यह चिंता भी थी कि वे राजा जनक को क्या उत्तर देंगे? इस पर लक्ष्मण कहते हैं- आपने ही तो उन्हें वन में छोडऩे का आदेश दिया था। आप कहें तो मैं तुरंत जाकर रात के भीतर ही उन्हें वापस ले आऊं?  '...पर इससे तो और भी निंदा होगी, यह कहते हुए राम कातर हो रोने लगते हैं। ...मैं सीता को देखे बिना कैसे जीवन धारण कर सकता हूं ? तुम तीनों भाई किसी तरह प्रिया की प्रतिमा बनवा दो। ...तब लक्ष्मण विश्वकर्मा को बुलवाते हैं। सौ मन सोना देते हैं... और विश्वकर्मा ऐसी प्रतिमा बनाते हैं जो एकदम सीता लगती है। अंतर केवल यह था कि यह बोल नहीं पाती थी।

फिर राम सात दिन सात रात प्रतिमा के सामने निरंतर रोते बैठे रहे। सबके समझाने पर वे किसी तरह शांत हुए। यहां एक मजेदार नवीन बात है कि सबने उन्हें पुनर्विवाह के लिये जोर भी दिया। कितनी ही राजकन्याएं उनसे विवाह के लिये उत्सुक थी। पर वे मन में सोचती थी कि 'सीता हेन नारी याय ना लागिल मने। से जनार मनोनीत हइबे केमने।।' अर्थात् सीता जैसी नारी जिसके मन में नहीं आई , अन्य कन्याएं भला उनके मनोनीत कैसे हो सकती है ?(वही, स्वर्णसीता निर्माण)

यहां उल्लेखनीय है कि राम के इस एकपत्नीवत्र पालन उनके शेष तीनों भाइयों ने भी किया। तीनों भाइयों ने ही नहीं, प्रजा ने भी इस आदर्श को आत्मसात किया। मानस में सीता का त्याग नहीं है किंतु यहां उल्लेख है कि एकनारिव्रत रत सब झारी। ते मन बच क्रम पति हितकारी। (उ.कां.22.4) अर्थात् सभी पुरुष एकपत्नी व्रत का पालन करते थे तथा पत्नियां भी मन वचन और कर्म से पति का हित साधन करती थीं।

कई रामायणों में राम तो एक पत्नीव्रती है किंतु कुछ महिलाएं जब राम को पतिरुप में पाना चाहती हैं तो वे अपनी एकपत्नीव्रत का वास्ता देते हुए उन्हें वर देते हैं कि अगले अवतार में वे उन्हें प्राप्त करेंगी। आनंद रामायण में पिंगला नामक एक ब्राह्मणी की कथा है जो राम से प्रणय निवेदन करते हुए उनकी दासी बनना चाहती है। इस पर राम कहते हैं कि ब्राह्मणी होकर दासी क्यों बनोगी? द्वापर युग में कृष्ण बनंूगा तब सत्यभामा के रुप में मेरी पत्नी बन सेवा करना। इसी तरह यहां एक वेश्या की कथा भी है जो एक बार राम के महल में चुपचाप घुस गई थी। राम सीता के साथ सोये हुए थे तब राम के पैरों को चुपचाप पकड़ कर उन्हें जगाया और उनसे प्रणयनिवेदन करने लगी। इस पर राम ने उसे अपने एकपत्नीव्रत के विषय में कहा और उसे आश्वासन दिया कि अगले जन्म में कृष्णावतार के समय मैं तेरी यह कामना पूर्ण करुंगा तब तू कुब्जा के रुप में मेरी सेवा करोगी। (विलासकांड, सर्ग 8) वैसे यहां राम स्पष्ट कहते हैं कि अन्यत्सीतंा बिनाऽन्या स्त्री कौशल्या सदृषी मम।। अर्थात् सीता को छोड़कर अन्य सभी नारियां उनके लिये कौशल्या के समान हैं।

कुछ ऐसी भी रामकथाएं हैं जहां राम के इस श्रेष्ठ गुण को नकारते हुए उनकी दो तीन, नहीं हजारों पत्नियां होने की कथा कही गई है। प्राय: सभी जैन रामायणों में राम को बहुपत्नीगामी बताया गया है। यहां लक्ष्मण के भी हजारों विवाह का उल्लेख है। आश्चर्य यह है कि जो राम जैन धर्म के अहिंसाधर्म का पालन करते हुए स्वयं रावण का वध नहीं करते, वे ब्रह्मचर्य का पालन न कर हजारों कन्याओं से विवाह करते हैं! वैसे कुछ हिन्दू रामकथाओं में भी इसका उल्लेख है। मजेदार बात यह है कि कृष्णलीला की तर्ज पर रामलीला का उल्लेख भी कहीं-कहीं हुआ है जहां राम अनेक बनकर सीता की अनेक सखियों के साथ रास रचाते हैं। भुषुंडिसंहिता, सत्योपाख्यान, हनुमतसंहिता, बृहत्कोसलखंड आदि में राम की रासलीला अत्याधिक बढ़चढ़ कर वर्णित है। भारत में रसिक सम्प्रदाय भी रहा है जिस पर कृष्णलीला की गहरी छाप है। 

संभवत: प्राचीनकाल में बहुविवाह के आम होने से पुरुषमन स्वीकार नहीं कर सकता था कि कोई एक पत्नीव्रती हो सकता है। इसीलिये राम के बहुविवाह की कथा जोड़ी गई हो। जो हो, यह मानना होगा कि रामकथा के नायक श्रीराम अपने एकपत्नीव्रत के लिये भारतीय जनमानस में सदैव आदरणीय रहे हैं। भागवतपुराण में शुकदेव परीक्षित को रामकथा बताते हुए अंत में कहते हैं -एकपत्नीव्रतधरो राजर्षिचरित: शुचि:। स्वधर्मं गृहमेधीयं शिक्षयन् स्वयमाचरत् ।। (10.55)अर्थात्  श्रीराम ने एकपत्नीव्रत धारण कर रखा था। उनका चरित्र अत्यंत पवित्र एवं राजर्षियों के समान था। वे गृहस्थोचित स्वधर्म की शिक्षा देने के लिये स्वयं उस धर्म का आचरण करते थे।

(लेखिका सेवानिवृत्त प्राचार्य हैं। रामायण पर उन्होंने भारत सरकार के संस्कृति विभाग के सीनियर फैलोशिप के अंतर्गत शोधकार्य किया है। )