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Thursday 16 Aug 2018

माक्र्स- अम्बेडकर और हमारा समय

हम आज जिस दौर में जी रहे हैं वह विचारधारा के लिहाज से निहायत भ्रम और उलझाव का समय है। एक विचारहीनता और कार्पोरेट पूँजी की विकल्पहीनता का घटाटोप हमारे सामने है। इन हालात में जनपक्षधारिता और न्याय पर आधारित मनुष्य की सम्पूर्ण मुक्ति और उसके जनतांत्रिक अधिकारों के लिए कठोर संघर्ष से हजारों-सैकड़ों वर्षों में विकसित विचारधारा जिसको बुद्ध, सुकरात से लेकर कबीर, माक्र्स और अम्बेडकर तक या उससे आगे पेरियार, रामस्वरूप वर्मा, महाराज सिंह भारती तथा विनोद मिश्र और दीपान्कर भट्टाचार्य आदि ने बढ़ाया है। इस वैचारिक विकास और उसके अंतर्विरोधों से एक नयी सार्थक समझ की उर्जा लेते हुए हमें कार्पोरेट पूँजी के आतंक और उसकी कोख से जन्मे फासीवाद औरआतंकवाद से लडऩे के लिए नये हथियार, कला और संस्कृति के नये औजार गढऩे होंगे। ऐसे विचारक जिन्होंने मनुष्य की मुक्ति और उसके अधिकारों के लिए संघर्ष में अपनी जिन्दगी आहुति कर दी हो उनकी वैचारिकी और उनके सम्पूर्ण सोच को हम उसी निष्पक्षता और ईमानदारी से समझने की कोशिश करें जिस ईमानदारी और निष्ठा से उन्होंने उसे एक बदलाव के धारदार हथियार के रूप में रचा-गढ़ा और उसी तरह से उसे वे अपनी जिन्दगी में जिये भी। कबीर भले ही अनीश्वरवादी न रहे हों पर धार्मिक कर्मकांड और पाखण्ड पर हिन्दू और मुसलमानों दोनों पर एक साथ बिना किसी लागलपेट और बेबाक ढंग से किये गये उनके हमले कबीर की प्रासंगिकता और उनकी दिलेरी को यादगार बनाती है। वे आज भी हमारे समय के नायक हैं। पर एक बात दिन के उजाले की तरह साफ है कि बगैर विचारधारा के न तो राजनीति का कोई आधार हो सकता है और न ही कोई सर्जनात्मक संस्कृति ही रची जा सकती है और बेहतर समाज का सपना देखना तो सम्भव ही नहीं है।

इस विद्रूप दुनिया को बदलने और बेहतर दुनिया रचने का सपना तमाम विचारकों ने दुनिया के अलग-अलग देशों में अलग समय पर देखा और उसके लिए संघर्ष किया तब कहीं हम आज यहाँ जनतांत्रिक युग में पहुँचे हैं और आज भी उस लड़ाई को जारी रखे हुए इंकलाबी परचम हाथों में थामे हुए हैं। तमाम विचारक 2500 वर्षों से यह सपना देख रहे थे जिसमें सभी मनुष्य सामान होंगे और उनके बीच किसी प्रकार की गैर बराबरी नहीं होगी और न ही वर्गीय लूट- खसोट और शोषण होगा।

जरा सोचिए कार्ल माक्र्स जिस सर्वहारा की मुक्ति के लिए संघर्ष करते हुए वैज्ञानिक समाजवाद और द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की विचारधारा का निर्धारण करते हैं आखिर वह सर्वहारा था कौन? यूरोप का इतिहास गवाह है कि वहां भारत की तरह किसान समाज नहीं था। वहां बड़े-बड़े जगीरदार थे जो हजारों-सैकड़ों एकड़ के मालिक होते थे और उनकी बेगार के लिए गुलाम होते थे। गुलाम भू मालिकों के लिए कृषि कर्म यानी खेती का काम करते थे और उन्हें भू-दास कहा जाता था। ये भू दास एशियाई गरीब  दलित  और पिछड़े वर्ग के गुलाम होते थे या फिर अश्वेत अफ्रीकी यानी नीग्रो काले हब्शी। इसी तरह भारत में भी दलित पिछड़ा और गरीब अल्पसंख्यक जिसकी लड़ाई अम्बेडकर लड़ रहे थे वो ही तो थे असली सर्वहारा। कार्ल माक्र्स और डा. अम्बेडकर इस मायने में अपने-अपने समय में एक जैसे मकसद ही लड़ाई लडऩे वाले नायक थे अपनी धारदार  विचारधारा से लैस। कार्ल माक्र्स के आह्वान कि 'दुनिया के मजदूरो एक हो, तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है सिर्फ गुलामी की बेडिय़ों के सिवाय जबकि पाने को पूरा संसार है, से डा. अम्बेडकर बहुत प्रभावित थे। पर भारतीय सन्दर्भ में डा. अम्बेडकर की बारीक परखी नजर वहां जाती है जहाँ तक डा. अम्बेडकर जैसा भारतीय चिन्तक ही पहुँच सकता है। उन्होंने कहा भारत के सवर्ण मजदूरों के पास खोने को जातिगत श्रेष्ठता भी है जिसे वह कभी नहीं खोना चाहेगा और भारत की मजदूर एकता कायम होने में यही सबसे बड़ा रोड़ा है। भारत के वामपन्थियों ने जाति को भारत की सामाजिक सच्चाई के रूप में स्वीकारने से लगभग इनकार किया जिसके कारण भारत का दलित पिछड़ा और गरीब अल्पसंख्यक उनसे कटता चला गया। वामपंथियों की यह अवधारणा निरर्थक साबित हुई कि आर्थिक बराबरी के आने से सामाजिक बराबरी खुदबखुद कायम हो जायेगी। आज भी भारतीय समाज में दलित वर्ग के पढ़े-लिखे और सम्पन्न व्यक्तियों को सवर्ण समाज बराबर का सम्मान देने को तैयार नहीं है। चाहे प्रतापगढ़ के दलित युवकों द्वारा सामान्य कोटे से आई आई टी प्रवेश परीक्षा पास करने पर उनके घर पत्थर फेंकने का मामला हो या फिर राजस्थान में दलित द्वारा अपनी शादी में घोड़ी पर बैठ कर बारात में जाने पर सवर्णों द्वारा अपमानित करने का मामला हो। दलित नेता जगजीवन द्वारा बनारस में सम्पूर्णा नन्द की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने पर उसके अपवित्र हो जाने के कारण उसको दूध से धुलवा कर पवित्र करने का मामला भी सच्चाई सामने रखता है। इसीलिए डा. अम्बेडकर सामाजिक और आर्थिक बराबरी को बराबर का महत्व देते हैं और कहते हैं कि एक के बगैर दूसरी अधूरी है और दोनों एक दूसरे की पूरक हैं और राजनैतिक लोकतंत्र का मजबूत आधार हैं। डा. अम्बेडकर जनतंत्र के प्रबल समर्थक एवं पक्षधर रहे हैं इसलिए सर्वहारा की तनाशाही शब्द पर उनकी गम्भीर आपत्ति है। वे लोकतंत्र में बहुमत की तानाशाही के भी खिलाफ रहे हैं। संख्या बल पर आधारित लोकतांत्रिक ढांचे में फासीवाद की तनाशाही के रूप में भारत में मोदी राज इसका ज्वलन्त उदहारण है ।

प्रसिद्ध ऐतिहासिक अंग्रेजी उपन्यासकार हावर्ड फास्ट का मानना है कि अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करना ही सबसे बड़ी आस्तिकता है। अपने उपन्यास स्पार्टकस में वे लिखते हैं कि मनुष्य अपनी आजादी और स्वाभिमान को सबसे ज्यादा प्यार करता है। जिस नीग्रो समाज की सभ्य अमेरिका में आज तूती बोलती है एक समय उन्हें कुत्ते से भी बदतर समझा जाता था। किसी भी विचारक की विचारधारा का आधार होता है उसका जीवन अनुभव और उसकी जीवन दृष्टि।अपने उपन्यास स्पार्टकस (आदिविद्रोही) में हावर्ड फास्ट ईसा के ।3 साल पहले रोम की कहानी कहते हैं जब गुलामी प्रथा अपने शिखर पर थी और उन्हीं गुलामों में से एक ने जो ग्लेडिएटर स्पार्टकस था उसी पाशविक प्रथा को चुनौती देने का विवेक और साहस अपने आप में पाया जिसके बूते उसने गुलामों को संगठित कर अपने समय की सबसे सभ्य और ताकतवर कही जाने वाली रोम सम्राज्य की सत्ता को चुनौती दी । गुलामों द्वारा अपनी आजादी के लिए विद्रोह की यह अनूठी मिसाल थी और गुलामों की मुक्ति संग्राम के इतिहास का मील का पत्थर । वे कहते हैं कि संघर्ष की असल पराजय आत्मा की पराजय है। एक बूढ़ा आदमी स्पार्टकस को अपनी छड़ी से धूल में अक्षर बना कर लिखना सिखाता है और कहता पढ़ो मेरे बच्चे। इस तरह हम जो कि गुलाम है एक हथियार लेकर चल सकते हैं। ज्ञान ही हमारा हथियार है उसके बगैर हम खेतों में काम करने वाले जानवरों की तरह हैं। इस तरह इतिहास में यह बार बार साबित होता रहा है कि ज्ञान और उस पर आधारित तर्कसंगत विचारधारा ही मनुष्य की पूर्ण मुक्ति और पूर्ण लोकतान्त्रिक समाज की संरचना का आधार हो सकती है।

आइये इन दोनों विचारकों कार्ल माक्र्स और डा. अम्बेडकर की जिन्दगी की पृष्ठभूमि और उनके देश-काल के हालात पर नजर डालें जिनका प्रभाव उनकी वैचारिकी पर किसी न किसी रूप में पड़ता है। दोनों विचारक 19वीं सदी की पैदायिश थे पर समय में काफी अन्तर था। कार्ल माक्र्स का जन्म 5 मई 1818 को पश्चिमी जर्मनी के राइनलैंड के वेस्टफालिया इलाके के ट्रेब्स नगर में हुआ था। माक्र्स यहूदी थे और उनके दादा माक्र्स लेवी  यहूदियों के पुरोहित (रब्बी) थे। माक्र्स के पिता हर्षल माक्र्स का 1832 में निधन हो गया। उस समय माक्र्स मात्र 20 साल के थे। माक्र्स ने होश सम्भालते ही 1824 में यहूदी धर्म छोड़ दिया और ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया। कार्ल माक्र्स की माँ हेनरीटा प्रेसबुर्ग 1883 में मरी जब माक्र्स 48 वर्ष के थे और अपने क्रन्तिकारी काम में पूरी तरह जुटे हुए थे। माक्र्स का अपनी माँ से बेहद लगाव था पर अपनी जीवन शैली और व्यस्त बौद्धिक कर्म के कारण उनकी बहुत सहायता नहीं कर पाये जिसका पछतावा उनको ताजिन्दगी रहा। माक्र्स जहाँ पैदा हुए थे वहाँ औद्योगिक क्रान्ति के सारे साजो-सामान व मौजूद थे। राइनलैण्ड  का यह इलाका हथियार कारखाने और लोहे-कोयले के कारखानों का इलाका था जो फ्रांस की सीमा पर पड़ता था। माक्र्स ने इसी सामन्तवादी और पूँजीवादी दुनिया के औद्योगिक और श्रमिक आन्दोलन की उथल-पुथल के दौर में अपने बाल्य काल की आंखें खोली। वकील पिता ने माक्र्स को एक सफल वकील बनाना चाहा था और इसी को दृष्टिगत रखते हुए उनकी पढ़ाई-लिखाई की व्यवस्था की गयी थी पर वे पेशेवर वकील तो नहीं बने किन्तु दुनिया के सर्वहारा की मुक्ति के प्रखर वकील और उनके वैचारिक नायक बने। कहा जाता है कि दुनिया को जिन दो शख्सियतों ने अपने विचारों से सबसे अधिक प्रभावित किया वे थे चाल्र्स डार्विन और कार्ल माक्र्स और दोनों समकालीन थे। दोनों की चिन्ताएँ अपने-अपने क्षेत्र में एक जैसी थीं। डार्विन इस बात को लेकर परेशान थे कि यह सृष्टि कैसे बनी। जीव की उत्पत्ति और उसके विकास की पारम्परिक सोच को खारिज करते हुए जो वैज्ञानिक अवधारणा डार्विन ने पेश किया उससे तत्कालीन धार्मिक जगत हिल गया जो जीव की उत्पत्ति में ईश्वर की भूमिका को सिरे से खारिज करती थी। डार्विन को अपने समय की धार्मिक सत्ता से टकराना पड़ा। उसी तरह माक्र्स ने पारम्परिक दार्शनिक सोच से परे जा कर कहा कि आर्थिक विषमतायें ही वह मर्ज है जिसके कारण मानव समाज में दूसरी विषमतायें और असहनीय वेदनाएँ पैदा होती हैं। उन्होंने पावर्टी ऑफ फिलॉसफी जैसी पुस्तक लिख कर अपने समय के दार्शनिक जगत को हिला कर रख दिया। उनका मानना था कि पहले आर्थिक विषमता का जन्म हुआ और उसी ने सामाजिक विषमता को जन्म दिया। क्योंकि पहले परिवार और फिर निजी सम्पत्ति अस्तित्व में आये। बाद में वर्चस्ववादियों ने आर्थिक संपन्नता के आधार पर धार्मिक और सामाजिक विषमता पैदा की और उसी आधार पर जातिव्यवस्था पैदा हुई। यह एक सार्वभौमिक तथ्य है। पर हर देश में वहाँ की परिस्थितियों के सन्दर्भ और प्रसंग अलग-अलग हो सकते हैं। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और वैज्ञानिक समाजवाद के प्रवर्तक और दास कैपिटल जैसी महान वैचारिक कृति के लेखक कार्ल माक्र्स का सम्पूर्ण जीवन दुनिया के सर्वहारा को समर्पित है जो संघर्ष और कठोर कष्टों की महागाथा है। डा. अम्बेडकर जैसा शख्स जो स्वयं एक संघर्ष की उत्पत्ति हैं एक प्रखर अर्थशास्त्री और समाजविज्ञानी होने के नाते माक्र्स से प्रभावित हुए बिना कैसे रह सकते थे। डा. अम्बेडकर बुद्ध से भी प्रभावित होते हैं पर अपने तर्कसंगत विवेक से उसमें संशोधन भी करते हैं।

बाबा साहब डा.भीमराव अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 में मध्य प्रदेश की महू छावनी में हुआ था। वे अपने माँ-बाप की 14वीं संतान थे। वे महार जाति के थे जो अछूत थी और उनके पिता फौज में नौकरी करते थे। बालक भीम ने अपने बालकाल में छुआछूत और आर्थिक बदहाली का जो दंश झेला उसका गहरा असर उनके दिलोदिमाग पर पड़ा और वहीं से सामाजिक क्रान्ति का बीज उनके अन्दर पड़ गया था जो युगान्तकारी सामाजिक क्रान्ति के नायक के रूप में हमारे सामने आया। उन्होंने मुम्बई से अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण कर उच्च शिक्षा के लिए कोलंबिया यूनिवर्सिटी(अमेरिका) में दाखिला लिया जहाँ से उन्होंने एम ए और पीएचडी किया। उनकी रिसर्च रूपये के अवमूल्यन पर थी जिसने तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत को बेनकाब किया था। इसके बाद उन्होंने इंग्लैण्ड में लन्दन के स्कूल ऑफ इकानामिक्स एन्ड पालिटिकल साइंस से अर्थशास्त्र में डी एस सी की डिग्री हासिल की और इंग्लैण्ड से ही बार एट ला और एल एल डी की डिग्री हासिल की। डा. अम्बेडकर अपने समय के 6 सर्वश्रेष्ठ विद्वानों में एक थे। उनका निजी पुस्तकालय किसी अंतरराष्ट्रीय पुस्तकालय जैसा था जिसमें हजारों किताबें थीं और लगभग हर किताब पर पेन्सिल से उनके हाथों के लिखे फुट नोट्स थे। उन्होंने भारतीय धर्मशास्त्रों का अध्ययन करने के लिए जर्मन भाषा के माध्यम से संस्कृत भाषा सीखी। उन्होंने 1926 में मनुस्मृति को मनुष्य विरोधी पुस्तक घोषित कर उसे सार्वजनिक रूप से जलाया। स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान डा.अम्बेडकर का दलित-पिछड़ों की मुक्ति सवालों के साथ भारतीय राजनीति में अवतरित होने ने काँग्रेस के सवर्ण नेतृत्व को झकझोर कर रख दिया था। उन्होंने कालाराम मन्दिर प्रवेश और महाड़ के चौबदार तालाब में अछूतों के पानी पीने के अधिकारों के लिए सत्याग्रह किये और अछूतों को संगठित कर स्वाभिमान और आत्मसम्मान के लिए लडऩा सिखाया। उनका काँग्रेस के हिन्दू नेतृत्व से सीधा सवाल था कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ लडऩे वाले यह बताएं कि हजारों साल से अछूतों को उपनिवेश बना कर रखा उसे कब मुक्त करेंगे। आजाद भारत में अछूतों की जगह कहाँ होगी? राउंड टेबुल कांफ्रेंस से लेकर पूना पैक्ट और हिन्दू कोड बिल तक उनका संघर्ष यह दिखाता है कि कार्ल माक्र्स की तरह अम्बेडकर भी भारत के उस सर्वहारा की लड़ाई लड़ रहे थे जिसकी हालत यूरोपीय सर्वहारा से बदतर थी। उनकी पुस्तक एनिहिलेशन ऑफ कास्ट  जाति उच्छेदन) माक्र्स की दास कैपिटल की तरह जाति विहीन और वर्ग विहीन समाज के निर्माण की सिद्धांतिकी रचती है। यह तय है कि यदि अम्बेडकर का भारतीय राजनीति में अवतरण न हुआ होता तो सामाजिक न्याय देश की राजनीति का मुद्दा न बन पाता और न ही दलित-पिछड़ों को राजनीति में इस तरह की हिस्सेदारी मिल पाती।

 भारत के संविधान के निर्माण में उनकी अहम् भूमिका के बावजूद वे संविधान से बिल्कुल सन्तुष्ट नहीं थे। क्योंकि वे चाहते हुए भी वह सब नहीं कर पाये जो भारतीय लोकतंत्र को समता ,स्वतंत्रता और बन्धुत्व को आदर्श के रूप में रूपान्तरित कर सके । इसलिए उन्होंने संविधान जलाने की अगुवाई करने में अपने को प्रस्तुत किया था। उनके द्वारा लिखा गया महत्वपूर्ण दस्तावेज राज्य और अल्पसंख्यक में उनके समग्र क्रन्तिकारी विचारों को संग्रहित किया गया है जो उनके समूचे राजनैतिक दर्शन और व्यहार का निचोड़ है। इस दस्तावेज में हम देखते हैं कि डा. अम्बेडकर भारतीय शासन सत्ता के चरित्र को पूरी तरह बदल कर सत्ता के केंद्र में मजदूर-किसानों और दलित वंचितों को संवैधानिक माधयम से स्थापित करना चाहते थे। राज्य और अल्पसंख्यक भारतीय संविधान का वह वैकल्पिक रूप है जिसे अम्बेडकर आकार देना चाहते थे । संविधान सभा में यह दस्तावेज प्रस्ताव के रूप में अनुसूचित जाति जनजाति फेडरेशन की ओर से ज्ञापन के रूप में पेश किया गया था जिसे डा. अम्बेडकर ने तैयार किया था और वह संविधान सभा में स्वीकृत नहीं हुआ। इस दस्तावेज में अम्बेडकर का समाजवादी व्यक्तित्व उभर कर सामने आता है। वे भारत के तमाम छद्म समाजवादियों से कहीं अधिक समाजवादी थे। सच कहें तो अम्बेडकर विचारधारा का सबसे अधिक बेड़ा गर्क छद्म अम्बेडकरवादियों जैसे मायावती,उदित राज और रामविलास पासवान आदि ने किया है। उसी तरह समाजवाद का सत्यानाश मुलायम सिंह जैसे समाजवादियों ने किया है और माक्र्सवादी संसदीय गलियारे की चकाचौंध में गुम हो गये ।

 हम देखते हैं गत दो-तीन दशकों में राजनीतिक विमर्श कितने नाटकीय ढंग से बदले हैं। सोवियत संघ के विघटन को समाजवाद का अन्त और पूँजीवाद की जीत घोषित किया गया। पूँजीवाद का विकल्प नहीं, के नारे हवा में गूंजने लगे। पर 199।-1998 में दक्षिण एशियाई संकट के समय कार्ल माक्र्स की वापसी की गूंज सुनाई पडऩे लगी और  माक्र्स की पूँजी ऐतिहासिक कृति का पुनर्मुद्रण कर यूरोपीय देशों और अमेरिका में रिकार्ड बिक्री हुई।  नयी सदी के आते आते, दूसरी दुनिया सम्भव है, का आशावादी नारा गूंजने लगा। विभिन्न सामाजिक हलचलों के साथ वैचारिक राजनैतिक विमर्श में सचेतन और अचेतन पूँजीवाद के क्रन्तिकारी विकल्प के खोज मिलते हैं। दुनिया की मेहनतकश अवाम ने कम्युनिस्ट घोषणा पत्र के सफों को फिर से पलटना शुरू कर दिया है जिसमें लिखा है कि जिस अनुपात में एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति का शोषण खत्म होगा उसी अनुपात में एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का शोषण भी खत्म होगा। माक्र्सवादियों और अम्बेडकरवादियों जो एक ही सिक्के दो पहलू हैं के सामने बुनियादी चुनौती है कि संसदीय लोकतंत्र की सीमाओं से परे जा कर सर्वहारा लोकतंत्र के उस व्यापकतम स्वरूप की पड़ताल करना जहाँ विश्व पूँजीवाद की पराजय समाजवादी लोकतंत्र की जीत के रूप में स्थापित होगी।