Monthly Magzine
Thursday 16 Aug 2018

लोक संस्कृति का मिथकीय संसार

लोक संस्कृति की मिथकीय दुनिया बहुत फैली हुई है। उसके पूरे फैलाव के भीतर ही लोक का विस्तार दिखायी देता है। कदम-कदम पर मिथ बनते भी हैं और टूटते भी है। टूटने की गति बहुत धीमी होती है जबकि बनने की गति बहुत तेज होती है। तब यह बड़ा सवाल उठता है कि आखिर मिथ का जन्म होता कैसे है? मिथ की रचना की दिशा में लोक चेतना को ले कौन जाता है? और उनका मकसद क्या होता है? क्या आदिम काल से ही मिथ की दुनिया निर्मित होती रही है? इन प्रश्नों से टकराये बिना मिथ के रचना संसार को समझना कठिन है। इसलिए हमें इतिहास के, रचित इतिहास से बहुत आगे जाना होगा और आदिमकाल के समाजशास्त्र को खंगालना होगा। आदिम काल की जीवन पद्धति से टकराना होगा। उनकी प्रकृति के साथ अनुकूलन के सूत्र को सुलझाना होगा। उनके क्रियाकलापों की नाप-जोख करनी होगी। यह भी जरूरी है कि मिथ जहां से पैदा होता है, उसकी उर्वरा भूमि की पड़ताल करनी होगी। तब ही हम मिथ की मिथकीय दुनिया को समझ पायेंगे। इसके साथ ही समाज विकास के साथ मिथ की विकासमान यात्रा के एक-एक कदम को जानने समझने में मूल सूत्र के भूमिका की पहचान करनी होगी।

मिथ का सारा खेल चेतना का खेल है। यही उसकी उर्वरा भूमि भी है। तब यह सवाल उठता है कि मनुष्य की चेतना का जन्म कब और कैसे हुआ होगा। चेतना को विकसित करने वाले तत्व कौन से है। इस पर विद्वानों के अलग-अलग विचार हमें देखने को मिलेगा। दर्शन शास्त्र की परतों को जैसे-जैसे खोलने का प्रयास करते जायेंगे वैसे ही अलग-अलग तथ्य और विचार हमारे सामने आने लगता है। एक विचार भाववादी दर्शन का है जो आदि शंकराचार्य से लेकर हीगेल तक और परवर्ती हिगेलियनों तक फैला हुआ है। दूसरा विचार चार्वाक से लेकर फायरवाख और माक्र्स, एंगेल्स तक फैला हुआ है और परवर्ती प्रगतिशील विचारकों के माध्यम से इक्कीसवीं सदी तक आता है। पहला विचार चेतना की उत्पत्ति को 'परम प्रत्यय' की कृति मानते हैं। उनका मानना है कि चेतना की उत्पत्ति पहले होती है और चेतना को उत्पन्न करने वाली शक्ति पराशक्ति होती है। भौतिक शक्ति से चेतना की उत्पत्ति उनके विचार में असंभव है। पदार्थ की उत्पत्ति बाद में होती है और पदार्थ जड़ है, गतिहीन है और क्षणवादी है। वह नष्ट होते ही रहता है और चेतना अनश्वर है, स्थिर है। दूसरे वर्ग के विचारक पदार्थ से चेतना की उत्पत्ति मानते हैं। प्रकृति की भौतिक क्रिया से पदार्थ की रचना होती है और आदिम मनुष्य अपने जीवन यापन के लिए, अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए निरंतर इन्हीं पदार्थों से टकराते हैं, द्वन्द्व करते हैं। इसी द्वन्द्व से उनकी चेतना या सोच या विचार पैदा होता है। चेतना ने ही मनुष्य के भोजन के लिए पत्थर को नुकीले हथियार में बदला। चेतना ने ही चकमक पत्थर से आग को जन्म दिया। चेतना ने ही खाद्य-अखाद्य में अंतर किया और चेतना ने ही मानव को अन्य पशुओं से अलग किया। चेतना और प्रकृति का द्वन्द्वात्मक संबंध लगातार चलते रहता है जिससे प्रकृति में बदलाव की गति दिखायी देती है और इसी के साथ चेतना भी विकास की दिशा में निरंतर गतिशील रहती है।

मेरा मकसद यहां भौतिकवादी द्वन्द्ववाद की सैद्धान्तिकी की व्याख्या करना नहीं है बल्कि उस मूल सूत्र को पकडऩे की है जिसके भीतर से मिथ की दुनिया खड़ी होती है। चेतना ने मनुष्य की आवश्यकताओं को न तो पैदा किया है औ न ही विकसित किया है। वरन् अपनी आवश्यकताओं के लिए प्रकृति पर निर्भर रहने वाले मानव की चेतना उनके क्रिया-कलापों और उत्पादन संबंधों से ही विकसित हुई है। इसी उत्पादन संबंध ने आदिम मनुष्य को एक दूसरे से जोड़ा है। उनमें समूह की चेतना पैदा की है। इन्हीं संबंधों ने उनमें सामाजिक चेतना का विकास किया है। व्यक्ति से समाज की यात्रा के मूल में मानव की जरूरत के लिए प्रकृति से टकराना और उत्पादन संबंधों का विकास ही सामाजिक विकास का मूल मंत्र है। मनुष्य के इन्हीं संबंधों ने परिवार को जन्म दिया है। आवश्यकता ने ही उनमें संसर्ग की चेतना पैदा की और इसी संसर्ग से मानव की संख्या में वृद्धि हुई। मानव की बढ़ी हुई संख्या के क्रिया कलापों ने उत्पादन के आदिम स्वरूप में श्रम विभाजन को आकार दिया। पांचों इंद्रियों के संज्ञान ने ही प्रकृति को, उसके भौतिक रूप को जानने समझने की चेतना दी। यही श्रम विभाजन भाववादी दर्शन के मूल आधार के रूप में विकसित होकर मिथ को जन्म देता है। ऐसा नहीं है कि भाववादी विचारक जिस तरह चेतना को जन्मजात मानते हैं अथवा संज्ञान को चेतना से जोड़कर देखते हैं उसी तरह संज्ञान को इंद्रियता से अलग करते हैं और चेतना को परम प्रत्यय के रूप् में विकसित करते हैं और इन्द्रियातीत रक्त मांस हीन शक्ति की कल्पना करते हैं। अर्थात् ईश्वर की कल्पना करते हैं और अपनी काल्पनिक चेतना के आधार पर ही ईश्वरवाद की विचारधारा को जन्म देकर उसे मिथ में रूपांतरित करते हैं।

भाववादी विचारधारा, इतिहास, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र के वैज्ञानिक विश्लेषण को काल्पनिक विश्लेषण में बदल देती है। भौतिकवादी विचारधारा मानव के प्रकृति के साथ निरंतर द्वन्द्व के भीतर से शक्ति का विश्लेषण करती है। आदिम मानव की चेतना प्रकृति की शक्तियों को दो रूपों में देखती है। प्रकृति की एक शक्ति वह होती है जिसे मनुष्य अपने उत्पादन के साथ देखता है। अपनी चेतना का विकास करते हुए उसकी एक-एक गति को पकडऩे की कोशिश करता है। उसकी परिवर्तनशीलता के साथ मानव चेतना भी बदलती रहती है और प्रकृति की दूसरी शक्ति वह होती है जिसे वह या उनकी चेतना न तो ठीक से पहचान पाती है न ही ठीक से समझ पाती है। सर्वशक्तिमान प्रकृति के इस रूप को जब मानव की चेतना नहीं पकड़ पाती तो उनमें ऐसी शक्तियों को देखकर भय उत्पन्न होता है। क्योंकि मानव की चेतना विकास की उस मंजिल तक नहीं पहुंच पाती कि तेज आंधी के कारण को समझ सके, तेज बारिश या बादल बिजली के रहस्य को जान सके, दावानल की शक्ति को पहचान सके, पहाड़ के ढहने या भू-स्खलन की शक्ति को भेद सके। इसीलिए प्रकृति की उन तमाम गतियों से वह भयभीत होता है इसीलिए भौतिकवादियों ने आदिम मानव की चेतना को पशुवत चेतना कहा है। तब भाववादियों का यह कथन अपने आप ही खारिज हो जाता है कि चेतना जन्मजात होती है। यदि चेतना जन्मजात होती है तो तब का मानव प्रकृति की इन शक्तियों का सत्य क्यों नहीं समझ पाया? उनकी चेतना प्रकृति के यथार्थ तक क्यों नहीं पहुंच पाई? और आज का मानव उसे आसानी से कैसे समझ लेता है? इस प्रश्न के भीतर ही पशुवत चेतना का सत्य छुपा हुआ है। प्रकृति की उसी विजातीय शक्ति से उत्पन्न भय ने ही प्राकृतिक मिथ की रचना की है।

पशुवत मानव चेतना ने ही धर्म को जन्म दिया  है। इसने ही देववाद की अवधारणा पैदा की है। इससे ही बलि और पूजा-पाठ का विधान शुरू हुआ है। इसी चेतना से परम तत्व पर आस्था का संसार खड़ा हुआ  है। इससे ही अंधविश्वास की दुनिया रची गई  है और इन सबकी परंपरा विकसित हुई है। जादू-टोना, टोनही-भूतही, मंत्र-तंत्र और ओझा-बैगा को इसी परम्परा ने जन्म दिया है जिसका वर्णन अथर्ववेद में मिलता है। लोक संस्कृति के आदिम रूप में और आदिम समाजशास्त्र में इतिहास के आदिम कालीन द्वन्द्वात्मक विकास में इसे आसानी से देखा जा सकता है। इतिहास के इस यथार्थ को सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में देखा जा सकता है। मजे की बात यह है कि ऋग्वेद में भौतिकवाद और भाववाद का द्वन्द्व भी दिखाई देता है। एक ओर लोक है जिसकी संस्कृति में प्रकृति के इन्द्रिय ग्राह्य संज्ञान से अनुभूत भय उत्पन्न करने वाली शक्तियों को बलि देने अथवा उनकी पूजा पाठ करने की संस्कृति है जो परंपरा के रूप में विकसित होकर ऋग्वैदिक काल में थोड़े बहुत परिवर्तन साथ आ चुकी है तो दूसरी ओर आर्य ऋषियों की संस्कृति है जिसमें भाववाद का वर्चस्व दिखाई देता है और लोक संस्कृति की प्राकृतिक शक्ति से मिथ की परंपरा में देववाद की रचना करते हुए दिखाई देते हैं। 

उदाहरण के लिए यह देखा जा सकता है कि आदिम लोक संस्कृति में अपने जीवन दायिनी जल को प्रकृति का वरदान मानकर पूजना शुरू किया। उसे महर्षियों ने जल देवता का नाम दिया। लोक ने सूर्य की जिस रोशनी से ऊर्जा की पूजा की, आर्य ऋषियों ने उसे सूर्य देव कहा और सूर्यदेव को अनेक दैवीय मिथकों से महिमा मंडित किया। लोक ने जिन पेड़-पौधों के फल-फूल से अपनी आवश्यकता की पूर्ति की उसे प्रकृति प्रदत्त भौतिक अथवा प्रकृति का अनमोल वरदान माना उसे ऋषियों ने ईश्वर का वरदान कहकर मिथ की दुनिया रची। सामाजिक चेतना के विकास को जिस प्राकृतिक विकास ने गति दी, भौतिक वस्तुओं में परिवर्तन के साथ लोक की चेतना विकसित होती रही, उसमें देववाद का आरोपण होता रहा और समाज विकास के साथ देववाद का मिथ लोक संस्कृति की परंपरा में प्रवे्श करने की जी-जान से कोशिश करता रहा। इसे स्थूल के विरुद्ध सूक्ष्म का संघर्ष कहा जा सकता है। लोक संस्कृति का स्थूल भौतिक प्राकृतिक शक्तियां आर्य संस्कृति की सूक्ष्म भाववादी-देववादी संस्कृति का रूप लेती रही और इसी सूक्ष्म को स्थूल में स्थान दिलाकर लोक संस्कृति की परंपरा को बदलने का प्रयास किया गया। यही वजह है कि लोक संस्कृति की परंपरा में उनके भौतिक क्रियाकलापों एवं इंद्रियगत संज्ञान की एक ओर बहुत मजबूत आधार भूमि दिखाई देती है तो दूसरी ओर आर्य संस्कृति के भाववादी मिथ की भी चमक दिखाई देती है।

ऋग्वेद में लोक संस्कृति में 'झंझा' को बलि देने का वर्णन आता है। यह तो सही है कि ऋग्वैदिक काल में  भाषा का विकास हो चुका था। भाषा का जन्म भी कोई परम तत्व द्वारा नहीं हुआ है। जैसा कि भाषावादी मानते हैं। संस्कृति भाषा को देवभाषा के मिथ में रूपांतरित कर देते हैं। जबकि भाषा का विकास मानव के क्रियाकलापों के दौरान एक दूसरे से संबंध और एक दूसरे के सहयोग की जरूरत के लिए क्रमिक रूप से हुआ है। ऋग्वैदिक काल तक समूह की चेतना समाज की चेतना में बदल चुकी थी। भले ही वह कबीलाई समाज रहा हो। यह भी सही है कि भाषा के इसी विकास के दौरान कबीलों ने प्राकृतिक शक्ति का अपने अनुसार नामकरण भी कर लिया था। भले ही वह वैदिक महर्षियों के नामकरण से अलग हो। भाषा को उत्पादन संबंधों के लिए स्तर ने जन्म दिया, वह भाषा पूरी तरह कबीलाई भाषा ही रही है। इसी भाषा ने तेज आंधी या तूफान या बवंडर के लिए 'झंझा' शब्द का अविष्कार किया। इस शब्द का आविष्कार भी चेतना नहीं करती। वरन् मानव के उत्पादक क्रियाकलापों ने ही इस शब्द को जन्म दिया। आदिम मानव समाज प्रकृति की जिस शक्ति से भयभीत होता रहा है उसके नामकरण की शब्द ध्वनि में एक अलग तरह का ओज दिखाई देता है। 'झंझा' शब्द की ध्वन्यात्मकता में इस 'ओज' को देखा जा सकता है। भय उत्पन्न करने वाली प्रकृति की इस शक्ति से बचने के लिए आदिम मानव उसे बलि देने लगे होंगे। चूंकि वह युग इतिहास में आखेट युग के नाम से जाना जाता है इसलिए उस युग में जिन पशुओं का शिकार करते थे, झंझा को शांत करने के लिए उसी की बलि भी देते रहे होंगे। धीरे-धीरे वह बलि विकास की प्रक्रिया में विशिष्ट पशुबलि में रूपांतरित हुआ होगा। इसी तरह प्रारंभिक काल में झंझा को अपनी सुविधानुसार, जहां उचित समझते रहे हों उस स्थान पर बलि देते रहे होंगे। विकास की प्रक्रिया में उसका स्थान भी विशिष्ट होता गया होगा। मानव समाज के विकास के साथ चेतना भी विकसित होती गई और इसी चेतना ने बलि के लिए स्थान सुनिश्चित किया होगा। ऋग्वैदिक काल के आते तक वह स्थान  बलि के लिए रुढ़ हो चुका था और बलि की परंपरा भी रुढ़ हो चुकी थी। और वह स्थान एक प्राकृतिक मिथ में रूपांतरित हो चुका था। आदिम मानव समाज की उस भयग्रस्त पशुवत चेतना, उस स्थान को विशिष्ट स्थान बनाने के लिए, उसकी अलग पहचान के लिए किसी पत्थर या पत्थरों के कोलाज की रचना कर दी होगी। पत्थर या पत्थर का कोलाज मिथ या मिथकीय कोलाज में बदल गया होगा। ऋग्वैदिक ऋषियों ने इस मिथकीय कोलाज को देखा होगा और उनके द्वारा दी जाने वाली बलि के मिथकीय रूप को भी देखा होगा। इसीलिए झंझा को बलि देने का वर्णन ऋग्वेद में आया। प्राकृतिक मिथ को, प्रकृति की भय उत्पन्न करने वाली शक्ति को, आदिम मानव की मिथकीय परंपरा को भाववादी ऋषियों ने और मजबूत करने के लिए धर्म से जोड़कर एक अलग मिथ में रूपांतरित कर दिया, वही भाववादी और धर्मवादी मिथ आज तक, इक्कीसवीं सदी के वैज्ञानिक युग तक चला आ रहा है। इस धर्मवादी मिथ की रचना कैसे हुई इसे भी देखा जाय तो अधिक बेहतर होगा।

वास्तव में ऋग्वैदिक काल में झंझा को भाववादी और कल्पनावादी ऋषियों ने भी देखा। स्वाभाविक है कि उनमें भी प्रकृति के इस शक्ति को देखकर भय का संचार हुआ होगा। अपने भय की अभिव्यक्ति के लिए उन्होंने लोक से अलग हटकर शब्द का चयन किया। उत्पादन संबंधों में प्रकृति मेें अपने श्रम के माध्यम से जुड़े हुए उत्पादक वर्ग की चेतना श्रम जन्य क्रियाकलाप से विकसित हो रही थी। इसीलिए उनकी भाषा प्रकृति से जुड़कर पैदा होने वाली भाषा थी। किन्तु उत्पादन संबंधों में श्रम से अलग हटकर प्रकृति को बनाने वाली कल्पनाशील वर्ग की भाषा अलग थी। यही वजह है कि लोक ने जिसे झंझा कहा, ऋषियों ने प्रकृति की उसी भय उत्पन्न करने वाली शक्ति के रौद्र रूप को देखकर 'रूद्र' कह दिया। और झंझा को दी जाने वाली बलि को रूद्र बलि कह दिया। इतना ही नहीं 'गुह्यसूत्र' की रचना कर रूद्र बलि के विधि विधान भी रच डाले। एक एक नियम को रुढ़ बनाने के लिए वे कृत संकल्प दिखाई दिए। समूचे मिथकों के माध्यम से मिथ का ऐसा अनुरूप तैयार किया गया कि उससे लोक समाज में भय की एक पुख्ता जमीन तैयार की गई। भय को और अधिक मजबूत बनाया गया। भय को आतंक के स्तर पर पहुंचाया गया। मिथ ने लोक संस्कृति में जड़ जमाकर लोक को झंझा के यथार्थ से दूर कर दिया। लोक का प्रकृति से अपने श्रम के माध्यम से टकराने का यथार्थ और मिथ का यथार्थ अलग-अलग दिखाई देने लगा। मिथ की इसी रचना प्रक्रिया से झंझा की बलि रूद्र बलि नहीं वरन् रूद्र देव में कालान्तर में रूपांतरित हो गई। 'गुह्यसूत्र' की संरचना ने रूद्र बलि का काल्पनिक लोक रच दिया। जैसे रूद्र बलि गांव की सीमा पर दी जाना चाहिए, रूद्र  बलि का प्रसाद गांव के भीतर लाने पर गांव में महामारी की विपत्ति आ सकती है। ग्राम समाज को इस विपत्ति से बचाना है तो रूद्र बलि का प्रसाद, बलि में शामिल लोग गांव के बाहर ही खाएं, न खा सके तो कहीं नाले में विसर्जित कर दिया जाए। रूद्र बलि के लिए एक विशेष प्रकार के पशु को चुना जाये जो अपने वर्ग के पशु में भी विशिष्ट पहचान वाला हो। रूद्र बलि देने वाला व्यक्ति निर्वस्त्र होकर बलि की प्रक्रिया सम्पन्न करे। बलि देते समय बलि देने वाले व्यक्ति के अलावा अन्य साथ जाने वाले व्यक्ति बलि स्थल से दूर चला जाय और बलि स्थल की ओर पीठ करके खड़े हो जाए या बैठ जाएं। यह भी आतंक पैदा किया गया कि जो व्यक्ति उस समय बलि स्थल की ओर देखेगा वह मरणान्तर विपत्ति का अनिवार्य रूप से शिकार हो जाएगा। इस तरह गुह्य सूत्रक मिथकीय संसार भय के ताने-बाने से दिनोंदिन मजबूत होता गया। भय के इस ताने-बाने से उत्पादन के क्रिया-कलापों से जुड़कर विकसित होने वाली चेतना सम्पन्न लोग उससे बाहर नहीं निकल सके। और झंझा बलि को रूद्र बलि के रूप में स्वीकार कर उसे परंपरा और प्रथा के रूप में अंगीकार कर लिए। इसी प्रथा और परंपरा के रूप में लोक संस्कृति में 'सवनाही बरोने' की परंपरा को देखा जा सकता है। गुह्य सूत्र के मिथकीय स्वरूप तथा लोक चेतना में थोड़ी बहुत टकराहट भी दिखाई देती है किन्तु उस टकराहट से रूद्र बलि के मिथ से बाहर निकलने का कोई मार्ग न तो तैयार होता है और न ही लोक चेतना मिथ के उस धर्मवादी समुच्चय को तोडऩे का प्रयास करती है।

भौतिकवादी बुद्धिजीवियों ने कृषि संस्कृति में श्रम विभाजन को विकसित रूप में देखा है। पशुपालन युग में श्रम विभाजन का मूल आधार लैंगिक रहा है। अपनी आवश्यकताओं के लिए प्रकृति के साथ संघर्ष करते हुए उत्पादन और पुनुत्र्पादन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। मानव समाज की आवश्यकताओं में वृद्धि हो रही थी। बढ़ी हुई आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मानव समाज में वृद्धि भी जरूरी हो गया था। इसके लिए सामाजिक संसर्ग की आवश्यकता हुई। इसी संसर्ग से मानव समाज की जनसंख्या बढ़ती गई और उत्पादन और पुनुत्र्पादन की प्रक्रिया विकसित होती रही। कृषि संस्कृति के आते-आते पशुपालन युग की संस्कृति के पूर्वाधार पर पितृसत्ता और मातृसत्ता का द्वन्द्व पितृसत्ता की सामाजिक व्यवस्था में रूपांतरित हो चुका था। श्रम का विभाजन हो चुका था। इस श्रम विभाजन के मूल में मानव के क्रियाकलाप के और प्रकृति के साथ संघर्ष में, उत्पादन के क्रियाकलाप में मिथ की संरचना शुरू हो चुकी थी। इसी मिथ से समाज में वर्गभेद होने लगा था। उत्पादन के क्रियाकलाप और अन्य क्रियाकलापों के श्रम में अंतर के लिए मिथ का सहारा लिया जाने लगा था। श्रम विभाजन की इसी प्रक्रिया में भू-दास और भू-स्वामी के वर्ग की मिथकीय रचना हुई। भाववादी विचारकों ने बिना श्रम के अपनी आवश्यकता को पूरा करने के लिए एक अलग विचारक वर्ग बनाया। इसी वर्ग के भीतर से भू-स्वामी वर्ग का विकास हुआ और यह सामंत अथवा राजा के रूप में सामाजिक व्यवस्था में रूपांतरित होता गया।

इसी पूर्वाधार के माध्यम से भौतिकवादी विचारकों ने भाववादी विचारकों से अलग हटकर श्रम विभाजन के तीन वर्ग बनाए। पितृसत्ता-उत्पादक वर्ग और इस्टेट (सामंत) वर्ग के विभाजन की रेखा खींची। भाववादियों के अनुसार सामंत 'परमसत्ता' का प्रतिनिधि बन गए। उनका एक समूचा वर्ग तैयार हो गया। पितृसत्ता को उत्पादक श्रम तथा अन्य वर्ग में स्थापित कर दिया और लैंगिक भेद कर मातृशक्ति को दोयम दर्जे का बना दिया। पितृसत्ता ने एकल विवाह के माध्यम से इसे और मजबूती प्रदान की। एंगेल्स ने यह स्पष्ट कर दिया कि दुनिया का पहली दास एकल विवाह से पैदा हुआ। अर्थात् पुरुष की पत्नी दासी हुई और पुरुष अपनी पत्नी का दास स्वामी बन गया। लोक संस्कृति में मातृशक्ति और पितृशक्ति की टकराहाट हर वर्ग और उत्सव की परंपरा में दिखाई देती है। मातृशक्ति पर पितृसत्ता को स्थापित करने के लिए भाववादी विचारकों ने मिथ की ऐसी रचना की कि कल्पना और यथार्थ के द्वन्द्व में कल्पना की विजय पताका फहराने में वे सफल हो गए। प्रकृति को अपने क्रियाकलापों से अपनी आवश्यकता के अनुरूप रूपांतरित करने वाले श्रमजीवी वर्ग की चेतना कल्पना के द्वारा पैदा की जाने अथवा रचना की जाने वाले मिथ के यथार्थ को समझने जानने और परखने में सक्षम नहीं हो सकी। और वह लोक समाज उन मिथकीय पितृशक्ति को अपनी संस्कृति में स्थान देने लगे। किन्तु मातृशक्ति की परंपरा को भी पूरी मजबूती के साथ अपनी संस्कृति का आधार बनाए रखने के लिए संघर्ष करते रहे। यह संघर्ष मानव संस्कृति के विकास की प्रक्रिया में हर कहीं दिखाई देती है।

आदिम मानव मातृसत्ता की पूजा करते थे। उन्हें अपनी बढ़ती हुई आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जनसंख्या में वृद्धि की जरूरत पड़ रही थी जो मातृशक्ति के बिना संभव नहीं था। इसी चेतना ने आदिम मानव समाज में योनि पूजा की परंपरा को विकसित किया। कामरूप में योनि पूजा की परंपरा आज भी चल रही है। एकल विवाह और श्रम विभाजन के विकास के दौर ने आर्यों के आगमन के साथ आदिम मानव समाज की परंपरा के समान्तर पितृसत्ता की पूजा और साथ ही साथ लिंग पूजा को विकसित किया। लिंग पूजा के मिथ को इतना अधिक प्रचारित प्रसारित किया गया कि लोक चेतना में भी लिंग पूजा को महत्वपूर्ण स्थान मिलने लगा। पितृसत्ता के समर्थक भाववादी विचारकों ने अपनी कल्पनाशीलता से पितृसत्ता के प्रतीकों की मिथकीय रचना आदिम मानव के प्रकृति की शक्तियों से भय पैदा करने वाली शक्तियों के पूजा की परंपरा में ही तलाशने की कोशिश की, जिससे पितृसत्ता सर्वमान्य हो जाए और मातृसत्ता की आदिम चेतना पर  पितृसत्ता की चेतना को लाद दिया जाय। लोक संस्कृति में जिस प्राकृतिक शक्ति, झंझा को बलि देने की परंपरा रही है, जिसके लिए आदिम मानव ने एक सुनिश्चित स्थान तय कर लिया था तथा विकास की प्रक्रिया में किसी पत्थर या पत्थर के कोलाज को झंझा का प्रतीक बनाकर बलि देने की परंपरा विकसित कर ली थी। पितृसत्ता ने झंझा बलि के उस प्रतीकात्मक पत्थर पर शिवलिंग की कल्पना कर उसे न केवल मिथ बना दिया गया वरन् उसे पितृसत्ता के मूल आधार के रूप में मिथ कथाओं की रचना भी कर डाली। इस तरह झंझा को बलि का पत्थर लोक संस्कृति में भी शिवलिंग के रूप में स्थापित हो गया और लोक संस्कृति में लिंग पूजा की मिथकीय परंपरा न केवल शुरू हुई वरन् मजबूत भी होती गई।

लोक संस्कृति में धीरे-धीरे मिथ की पकड़ मजबूत होती गई। उनकी मातृशक्ति की पूजा आराधना को भी मिथ में रूपांतरित किया गया। उत्पादन के लोक के क्रियाकलापों में चेतना को दूर करने की कोशिश की गई। उत्पादन संबंधों का वह वर्ग जो भाववाद की आधार भूमि पर खड़ा होकर भौतिकवाद की आधार भूमि को कमजोर करने का लगातार प्रयास करते रहा और हथियार के रूप में मिथ का इस्तेमाल करता रहा। किन्तु लोक के श्रम की चेतना और भाववादी श्रम विरोधी चेतना के बीच द्वन्द्व होता रहा। कभी द्वन्द्व तेज होता रहा तो कभी धीमा। भाववादी दर्शन ने मानव समाज के सृजन और विकास के लिए मानवीय संसर्ग की चेतना को परम सत्ता द्वारा सृजन की चेतना में रूपांतरित करने के लिए अपनी कल्पना से अद्र्धनारीश्वर के मिथ की रचना की। मिथ के आदिदेव शिव का अद्र्धनारीश्वर रूप तैयार किया गया। तब तक झंझा रूद्र में और रूद्र शिव में बदल चुका था। जिन स्थानों पर झंझा को बलि दी जाती थी, यजुर्वेद के आते-आते उन स्थानों पर शिव कुटी की स्थापना होने लगी थी। जिस झंझा के पत्थर पर शिवलिंग के मिथ की रचना हुई थी उस पत्थर के चारों ओर एक विशेष आकृति में थोड़ा गहरा गड्ढा बनाकर लोक को मिथकीय भाववादी संस्कृति से जोडऩे के लिए, मातृसत्ता और पितृसत्ता के समन्यवादी मिथ की रचना की गई। झंझा बलि के पत्थर के स्थान पर शिवलिंग की आकृति में गोल पत्थर खड़ा कर दिया गया और इसके नीचे विशेष आकृति के गड्ढे को मातृशक्ति की योनी की आकृति का मिथ गढ़ा गया। और पितृसत्ता के लिंग पूजा और मातृसत्ता की योनि पूजा को एक साथ मिथकीय संरचना में जोड़ दिया गया। किन्तु लोक चेतना ने उस लिंग के नीचे की विशिष्ट आकृति को योनि की आकृति नहीं माना। लोक ने उसे 'जलहली' का नाम दिया। अर्थात् शिवलिंग पर डाला गया जल जिस स्थान पर गिरकर बहता है वह जलहली कहलाया और फिर दूध या जल एक छोटे से नाली के रूप में बने स्थान से बाहर निकल जाता है। लोक की प्रकृतिवादी चेतना और भाववादी दर्शन की कल्पनावादी चेतना का यह रूप स्पष्ट दिखाई देता है। पर यह तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि भाववादी दर्शन का प्रयास लोक पर अवश्य पड़ा और लोक उससे अछूता नहीं रह सका। भाववादी दर्शन का यह मिथ भले ही भाववादी सिद्धांतों के अनुरूप न सही पर प्रकृतिवादी लोक संस्कृति ने उसे अपने अनुरूप अपनी संस्कृति में स्थान तो अवश्य दिया है।

भाववादी कल्पनावादी मिथ को लोक संस्कृति में स्थान मिलने की भी एक वजह साफ-साफ दिखाई देती है। भाववादी विचारक और सत्ता एक-दूसरे के परिपूरक थे। अर्थात् सामंतवाद की अस्मिता का प्रश्न भाववाद से जुड़ा हुआ था। इसलिए सामंतवादी सत्ता का लोक पर प्रभाव डालने और भय और आतंक की सीमा तक लोक को प्रभावित करने के लिए इन सत्ता समर्थक विचारकों ने धर्मशास्त्र की रचना कर मिथकीय संसार की रचना की, जिनमें जीता-जागता भौतिक शरीर वाला सामंत  भी मिथ बना दिया गया। अर्थात् 'सामंत ईश्वर का भेजा हुआ प्रतिनिधि है' सामंत के सारे भोग विलास को भी इन विचारकों ने मिथ का रूप दे दिया। फलस्वरूप लोक चेतना में सामंत 'परम सत्ता' के रूप में स्थापित होता गया और अपने श्रम से अपनी जरूरतों के स्थान पर सामंत की जरूरतों को पूरा करना प्रधान हो गया और लोक की आवश्यकता गौण हो गई। खुद भूखे रहकर या पेज पसिया पीकर अपने श्रम से सामंत के भोग विलास की व्यवस्था करने लगे। भाववादी विचारकों ने इसी को धर्म कहा और लोक ने इसी को लोकधर्म मान लिया।

धर्मशास्त्रीय विचारकों ने  बड़ी चालाकी से लोक की प्राकृतिक शक्ति से, प्रकति के विजातीय शक्ति के  भय से उत्पन्न अनार्य देव शिव को ही तरह-तरह से मिथ में रूपांतरित कर लोक देव के रूप में स्थापित कर दिया। उनके घर के 'माई कुरिया' में 'दूल्हा देव'(बूढ़ा देव) 'प्रधान देव' अथवा 'नागदेव' के रूप में स्थापित कर लोक में मिथ की जड़ों को इतना मजबूत कर दिया कि इक्कीसवीं सदी में भी लोक अपने कुलदेव की मिथकीय दुनिया से बाहर नहीं निकल सका। इसके साथ एक बात अवश्य हुई कि लोक अपनी मातृसत्ता की परम्परा को भी उससे जोडऩे के पीछे नहीं हटा। तब तक मातृसत्ता भी मिथ में रूपांतरित हो चुकी थी। इसीलिए कुलदेव 'दुल्हादेव' के साथ 'भवानी' भी जुड़ गई और 'दुल्हादेव भवानी' के नाम से कुलदेव की पहचान बन गई। इसी तरह ग्राम देव के रूप में 'ठाकुर दइया' (सहड़ा देव) या परगन पाठ के साथ ही साथ 'आंगा देव' आदि भी ग्राम देव के रूप में अपनी मिथकीय गरिमा के साथ स्थापित हो गया। मिथ का लोक जीवन पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि लोक के घरों के कुलदेव 'दुल्हादेव भवानी' या फिर 'बूढ़ा देव' की पूजा के बिना कोई कार्य प्रारंभ नहीं होता था। चाहे वह बीज डालने का समय हो, धान बोने का समय हो, धान काटने, मिंजाई करने या 'रास' नापने का काम हो या फिर गेहंू चना के उन्हारी को प्रारंभ करने का काम हो अथवा उसकी बुवाई-कटाई-मिंजाई का काम हो या गेहूं के 'बाल बांधने' का काम  हो। बिना बाल बांधे गेहूं-चना का 'होरा' खाना घर परिवार में वर्जित रहता है। मिथ की इतनी मजबूत संरचना बन गई कि लोक का हर काम मिथकीय संरचना के भीतर ही पलता बढ़ता रहा है। वह मिथकीय संसार से भले ही बाहर नहीं निकल सका किन्तु उनकी चेतना का विकास उनके क्रिया-कलापों पर, उनके उत्पादक श्रम पर ही निर्भर रहा। प्रकृति के साथ उनके इंद्रियगत संज्ञान ही उनकी चेतना के विकास के मूल में रहा है। इतिहास की उनकी समझ को मिथ ने कुंठित कर दिया। श्रम का सम्मान ही उनकी जीवन शैली का चेतनागत अंग बना रहा। यही मिथ लोक के शोषण का एक प्रभावशाली हथियार बना रहा। ऐसे ही मिथकीय विचारकों ने वर्णवाद और जातिवाद का मिथ बनाया और इस के आधार पर श्रम विभाजन की एक अलग संरचना की। ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के वर्णवाद में श्रम विभाजन का ऐसा रूप बनाया गया कि उनके लिए, प्रथम तीन वर्ण के लिए श्रम से हटकर कार्य निर्धारित किया गया। और चौथे वर्ण को श्रम से जोड़कर शोषण का क्रम चलाया गया।

यही वजह है कि चाहे लोक संस्कृति का जन्म से लेकर मृत्यु तक का संस्कार हो, इन संस्कारों से जुड़े हुए लोक साहित्य हो अथवा लोक संस्कृति का तीज त्यौहार या पर्व हो, सब में मिथ की उपस्थिति ही प्रमुख रूप से दिखाई देती है। श्रम विभाजन में जो निजी संपत्ति की चेतना विकसित हुई, प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों पर निजता के आधार पर अधिकार जमाने की होड़ मची, उसने श्रम विभाजन के स्वरूप को एक अलग ही रूप दे दिया। इसे अलग रूप देने में भाववादी दर्शन की अहम भूमिका मानव इतिहास के दौर में पशुपालन युग से लेकर आज तक दिखाई देती है। निजी संपत्ति की चेतना ने जब संसाधनों पर अधिकार जमाया तो उसे न्याय संगत बनाने के लिए, उन्हें भाववाद का ही हथियार उठाना पड़ा। इसलिए भाववाद ने धर्मवाद, पुनर्जन्म वाद, भाग्यवाद, नियतिवाद, स्वर्ग-नर्क, जीववाद, आत्मवाद, भाषावाद आदि तरह-तरह के मिथों की रचना की। इस मिथ के मायाजाल में समाज का आम आदमी उलझता गया। लोक समाज ने उससे निकलने का या तो प्रयास ही नहीं किया और यदि किया भी तो उसे छल-बल से दबा दिया गया। अपने श्रमजन्य क्रिया-कलापों में लगे हुए मानव की चेतना उन छल-बलों को सुलझाने में सफल न हो सकी। प्रारंभिक दौर में तीव्रतम विरोध की चेतना भी दिखाई देती है। जिसे आर्य-अनार्य संघर्ष के रूप में इतिहास में देखा जा सकता है। लोक समाज में आर्यों के विरोध करने वाले अनार्यों को दैत्य-दानव, असुर राक्षस, आदि का नाम देकर समाज विरोधी सिद्ध करने के लिए आर्य मिथकीय ग्रंथों की रचना कर लोक समाज में घृणा पैदा करने और उस घृणा को उनकी चेतना का हिस्सा बनाने का कार्य भाववादी दर्शन का सहारा लेकर करते रहे। और तो और उन अनार्यों की अजेय शक्ति को, विरोध की चेतना की शक्ति को भी 'परम सत्ता' द्वारा दी गई शक्ति के रूप में निरुपित कर देववाद और ईश्वरवाद के मिथ को संसार के मानव समाज के संचालक शक्ति के रूप में निरुपित किया गया। लोक समाज को अपने वश में करने के लिए भाववादी विचारकों ने न केवल प्रकृति का भयावह रूप प्रस्तुत किया वरन् इन विरोधी शक्ति की भयावह भौतिक रूप की रचना कर लोक समाज के भय को चरम तक पहुंचाने के  लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी। यही वजह है कि दैत्य-दानव असुर-राक्षस, के बहुत विकृत और भयावह नृतत्वशास्त्रीय वर्णन चित्रण किए गए। यही मिथ लोक संस्कृति का अंग बनता गया और लोक समाज में आस्था और अनास्था की सीमा रेखा बनती गई।

जहां भय होता है वहीं परम सत्ता की कल्पना की जाती है। जिसका भौतिक रूप एन्द्रिक संज्ञान की पकड़ से बाहर होती है वहीं भय उत्पन्न होता है और वहीं उससे रक्षा के लिए पूजा-पाठ का विधि-विधान शुरू होता है। लोक संस्कृति के संस्कारों और पर्वों में इस रूप को देखा जा सकता है। ऋतुओं के विशिष्ट भौतिक रूपों से पर्वों का बहुत गहरा संबंध होता है। प्रकृति की भौतिकवादी और भाववादी व्याख्या लगभग वैदिक काल से शुरू हो चुकी थी। भाववाद लोक पर्वों और भौतिकवादी रूप को मिथकीय रूप देकर रहस्यमय बनाता रहा। और बलि या पूजा के क्रिया-कलाप को धर्म से जोड़कर मिथकीय विधि विधान में बांधने का कार्य करता रहा। लोक संस्कृति में सावन के महीने में सम्पन्न होने वाले पर्वों में भौतिकवाद और भाववाद, इतिहास और मिथ, समाजशास्त्र और कल्पनाशास्त्र के विभिन्न रूपों को आसानी से देखा जा सकता है। झंझा बलि की परंपरा को रूद्रबलि के मिथ में बदलने की चर्चा पहले ही की जा चुकी है। सावन के प्रारंभ में 'सवनाही बरोने' के लोक पर्व में रूद्र बलि के मिथ और झंझा बलि के प्रकृतिवाद के द्वन्द्व को स्पष्ट देखा जा सकता है। छत्तीसगढ़ के लगभग सभी गांवों में सावन की वर्षा जन्य आपदाओं और बीमारियों से बचने के लिए सवनाही बरोने की प्रकृति पूजा आदिम काल से चली आ रही है। भाववादियों ने इसे रूद्र बलि का नाम दिया। किन्तु लोक समाज ने इसे रूद्र बलि के मिथ के साथ कभी स्वीकार ही नहीं किया। वह प्रकृति की विजातीय शक्तियों को शांत कर लोक समाज की रक्षा के लिए प्रकृति को दी जाने वाली बलि के रूप में ही सवनाही बरोने का कार्यक्रम करता रहा। और यह परंपरा लोक संस्कृति का अभिन्न अंग बन गयी। गुह्य सूत्र के मिथकीय विधान में रूद्र को बलि देने का समय रात में निर्धारित किया गया किन्तु लोक संस्कृति ने अपनी परंपरा में आधीरात को सवनाही बरोने का समय नियत कर लिया। गुह्य सूत्र के धर्मवादी और भाववादी मिथ में गांव के बाहर बलि देने की बात कही गई। लोक संस्कृति के गांव की सीमा 'मेड़ो' (जहां गांव की भूमि दूसरे गांव की भूमि के साथ मिलती है) को मानकर उसी स्थान पर बलि देने की परंपरा को स्वीकार किया। गुह्य सूत्र के मिथ में केवल बलि देने की बात कही गई है किन्तु सवनाही बरोने में काफी लंबे समय तक 'उल्टा पांख के कुकरी' (मुर्गी) को और उसके बाद 'कुकरीगार' (मुर्गी का अण्डा) को और अब नारियल की बलि दी जाती है। गुह्य सूत्र में केवल बलि शब्द है जिसका अर्थ बलि देने वाले प्राणी के गले को काटना होता है। किन्तु लोक संस्कृति में बलि का अर्थ गुह्य सूत्र से एकदम भिन्न  है। 'सवनाही बरोने' में जिस प्राणी का उपयोग होता है उसे मेड़ों में गड्ढा खोदकर गड़ा दिया जाता है और उसे ही प्रकृति की विजातीय शक्ति को बलि देना मान लिया जाता है।

इतना ही नहीं, कई गांवों में बलि देने वाली मुर्गी के माथे पर लाली बंतन 'बुककर' छोड़ देने की भी परंपरा है। यह लोक का अपना मिथ है जो मानव की उत्पादन क्रिया के विकास के साथ पैदा हुआ है। इतिहास और भौतिक विज्ञान की द्वन्द्वात्मकता में यह भी दिखाई देता है कि आदिम मानव समाज मातृसत्तात्मक रहा है। कालान्तर में उत्पादन संबंध और उत्पादन क्रिया के विकास के साथ मातृसत्ता की मुखिया माता मिथ में रुपांतरित हो गई। इसे मिथ में रूपांतरित भाववादी दर्शन या भाववादी संवेदन ने नहीं किया वरन् आदिम मानव समाज की अविकसित चेतना ने कबीले की रक्षा में उनकी शक्ति के भौतिक संज्ञान के आधार पर उसे देवी मान लिया और उसकी पूजा पाठ शुरू कर दी होगी। यह भी संभव है कि आदिम सामाजिक व्यवस्थाओं की मातृशक्ति ने अपने पूर्वज मातृशक्ति के विभिन्न रूपों का मिथ रचा होगा। और कई प्रकार की देवियों के मिथ की रचना हुई होगी। देवी की मिथ का पूर्वाधार इस तरह लौकिक और भौतिक ही रहा है। भाववादी संवेदन ने बाद में उत्पादन संबंधों में पितृसत्ता के आगमन के बाद उन दैवीय मिथ को अलौकिक और सूक्ष्म प्रत्यय के रूप में स्थापित किया होगा और उसमें अपने परजीवी समाज की मातृशक्ति को भी देवी बनाने उस समूह में शामिल कर दिया होगा।

परजीवी भाववादी समाज को अपने ऐशो आराम की जिंदगी के सामान जुटाने के लिए लोक के श्रमजीवी समाज पर निर्भर होना पड़ता था इलिए यह वर्ग श्रमजीवी के प्राकृतिक या भौतिक मिथ के साथ अपने पितृसत्ता के देववादी मिथ को जोड़कर समन्वय स्थापित करने का प्रयास करता होगा। यही वजह है कि लोक संस्कृति के सभी पर्व त्यौहार में मातृशक्ति और पितृशक्ति का यह समन्वय दिखाई देता है। लोक संस्कृति के पर्वों की परंपरा के उद्गम के छोर पहुंचा जाए तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि पितृशक्ति के प्रारंभिक मिथों के पूजा पाठ में लोक समाज में मातृशक्ति के मिथ को जोड़ दिया है। गुह्य सूत्र में केवल रूद्र बलि का विधि-विधान का वर्णन मिला है। वहां किसी मातृशक्ति के मिथ का कोई उल्लेख नहीं मिलता। न ही वहां दोनों शक्तियों का कोई समन्वय दिखाई देता है।

सवनाही बरोने में लोक का क्रियाकलाप जन्यअनुभव ही चेतना गुह्य सूत्र से हटकर एक अलग परपंरा बनाता है। जिसमें मातृशक्ति और पितृशक्ति का द्वन्द्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। सवनाही बरोने के स्थान पर मेड़ों में छोटी-छोटी झंडियां गाड़ी जाती है। ये झंडियां विशिष्ट रंगों की आवृत्तियों में होती है। अर्थात् 'लाल' 'काली' और 'सफेद' रंग की झंडी इन्हीं रंगों के क्रम में सात आवृत्तियों में 21 झंडी गड़ाई जाती है। ये झंडियां अपने आप में एक विशिष्ट अर्थ वाली मिथ है। इतिहास के विकास के दौर में काफी  बाद में झंडियां मिथ के रूप में विकसित हुई होगी। और उनका अलग-अलग रंग अलग-अलग मातृशक्ति की अर्थ व्यंजना के मिथ में रूपांतरित हुआ होगा। जैसे लाल रंग की झंडी दुर्गा के प्रतीक मिथ, काले रंग की झंडी काली के प्रतीक मिथ और सफेद रंग की झंडी सती के प्रतीक मिथ के रूप में । लोक संस्कृति में स्थापित हो जाने के बाद ही सवनाही में इसका उपयोग शुरू हुआ होगा। इस तरह सवनाही बरोने की अद्र्धरात्रि में 'मेड़ों' पर मिथ का एक समुच्चय दिखाई देता है। भौतिक शरीर धारी मुर्गी को लाली बंदन 'बुक' कर मिथ में रूपांतरित कर दिया जाता है। उन्हें गड़ाये जाने वाले गड्ढे में लाली बंदन डालकर उसे  भी मिथ बना दिया जाता है। 21 नारियल का ढेर अपने आप में रात के अंधेरे में मिथ बन जाता है। सवनाही बरोने वाला बैगा भी निर्वस्त्र होकर मिथ बन जाता है। झंडियों की सात आवृत्तियां सतबहिनिया के मिथ का रूप ले लेती है। लोक संस्कृति में लोक विश्वास होता है कि टोना-जादू सीखने वाली महिलाएं सतबहिनियों की ही साधना करती है। इस तरह से गांव को टोनही भूतही चुड़ैल, साथे योगनी आदि से बचाने के लिए ही मेड़ों में सवनाही बरोया जाता है। यहां रूद्र बलि का मिथ गौण हो जाता है  और सतबहिनिया की बलि प्रमुख हो जाती है। शास्त्र और लोक का द्वन्द्व यहां गायब हो जाता है और लोक की परंपरा ही लोक का शास्त्र बन जाती है। लोक की चेतना अप्रत्याशित रूप से घटने वाली प्राकृतिक और भौतिक घटनाओं को टोना-जादू, तंत्र-मंत्र, से जोड़कर देखती है। अैार उसके सम्मान के लिए ही सवनाही बरोने जैसे पर्व का लोक आयोजन करता है। सवनाही संज्ञान से बनाए गए काल्पनिक मिथ और उत्पादन के क्रियाकलापों से विकसित चेतना के लोकवादी मिथ में टकराव दिखाई देता है और उस टकराव में लोक चेतना का मिथ अधिक प्रखर दिखाई देता है। लोक संस्कृति में प्राकृतिक शक्तियों की पूजा आराधना के अनेकानेक रूप दिखाई देते हैं। आदिम मानव को भयभीत करने वाली शक्तियां और आदिम मानव की आवश्यकता को पूरा करने वाली शक्तियां भी। आंवला नवमीं, वट सावित्री, आम इमली के विवाह का विधान, तेंदू चार की पूजा, महुआ की पूजा, पसहर चावल, नवान्न की नवाखाई आदि-आदि। ये सारी चीजें प्राकृतिक शक्ति के भौतिक रूप मिथ में बदल जाते हैं। न तो लोक प्रकृति की इन शक्तियों की पूजा में शास्त्र के विधि-विधान को जानता है, न ही शास्त्र के नियमों से बंधा होता है। बल्कि यों कहें कि भाववादी कल्पना लोक अथवा भाववादी विधि विधान का शास्त्र लोक संस्कृति के विधि विधान के बीच से ही पैदा हुआ है। यह अलग बात है कि भाववादी कल्पना में लोक ने विधि विधान को बदलने की कोशिश अवश्य की है और अपना एक अलग अस्तित्व कायम कर लोक को प्रभावित करने का प्रयास भी किया है। 'सवनाही बरोने' में लोक के भौतिक रूप को गुह्य सूत्र में धार्मिक विधि विधान में बदलने का  प्रयास किया। कालान्तर में लोक ने उसे धार्मिक मान भी लिया परन्तु अपने विधि विधान में कोई परिवर्तन किया  ही नहीं न  ही उसे रूद्र बलि के रूप में स्वीकार किया। टोना-जादू, सिद्ध, टटोनही भूतही और तंत्र-मंत्र को बरोने का पर्व आज भी  बचा हुआ है। उसके साथ कई मिथकीय अंधविश्वास जुड़ता रहा जैसे सावन में, रविवार के दिन किसी दूसरे गांव की यात्रा को लोक समाज ने यथासंभव वर्जित माना। क्योंकि आषाढ़ के अंतिम सप्ताह का रविवार और सावन के रविवार को सवनाही बरोने का दिन माना जाता है। शनिवार और रविवार की दरमियानी रात्रि को। इसके साथ यह मिथ जुड़ा हुआ है कि जो व्यक्ति सवनाही के लाली बंदन वाली मुर्गी को देख लेगा उसकी मौत सुनिश्चित है। इसलिए रविवार के दिन यात्रा को लोक समाज अशुभ मानकर वर्जित मानता है। कई गांवों में आज भी यह परंपरा बनी हुई है। पर अब अधिकांश गांवों में इस परंपरा को कोई नहीं मानता। इसे शास्त्र का बदलाव न मानकर समय के अनुसार चेतना के विकास के कारण होने वाले सामाजिक बदलाव के रूप में देखा जा सकता है। लोक संस्कृति समूची प्रकृति को मिथ के रूप में देखती है।उनकी चेतना आवश्यकता से जन्म लेकर आवश्यकता के साथ विकसित होती है। आवश्यकता उत्पादन के क्रिया-कलापों का मूल आधार है। और इससे ही उत्पादन संबंध विकसित हुए  हैं। इससे ही समाज और सामाजिक संबंधों का विकास हुआ है। लोक संस्कृति में आने वाले मिथ और उसकी मिथकीय पूजा इनके भीतर उत्पादन और पुनुत्र्पादन की नई शक्ति पैदा करती है। और समाज विकास के पूर्वाधार को मजबूत करती है। यही वजह है कि हरेली में नांगर मिथ बन जाता है तो पोला में बैल। हरेली की रात टोनही देखने के लिए रात रात भर जागा जाता है तो सुबह पशुधन को लोंदी खिलाने की तैयारी भी होती है। नवरात में जंवारा, सात प्रकार के अन्नों का अंकुरित रूप देवी बन जाता है तो जंवारा की जोत देवी के साक्षात शक्ति स्वरूप के मिथ में बदल जाती है। हर पर्व और हर त्यौहार का, यहां तक कि सामाजिक संस्कार के एक-एक नेग में मिथ का अलग-अलग स्वरूप दिखाई देता है। लोक संस्कृति को उसके अपने मिथकीय संसार से अलग करके नहीं देखा जा सकता। यदि लोक संस्कृति से उनके मिथ को अलग कर दिया गया तो संस्कृति निष्प्राण होकर नष्ट हो जाएगी।