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Tuesday 23 Oct 2018

प्रस्तावना

काग भुशुंडि गरुड़ से बोले, आओ हो लें दो-दो चोंचे।

चलो किसी मंदिर में चलकर, प्रतिमा का सिंदूर खरोंचे।।

मैंने अपने बचपन में सुनी एक बहुचर्चित कविता से उपरोक्त पंक्तियां उद्धृत की है। इनको सुनकर या पढ़कर किसी भी साहित्यप्रेमी को लग सकता है कि हो न हो यह बाबा नागार्जुन की कविता है। उनकी अनेक कविताओं के तेवर इसी ढब के हैं। मसलन, बहुत दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास या फिर शासन के सत्य कुछ और हैं, जनता के कुछ और परवर्ती काल में लिखी कविता इंदु जी, इंदु जी क्या हुआ आपको अथवा खिचड़ी विप्लव देखा हमने जैसी कविताओं में भी ऐसी ही वाक्विद्ग्धता है। इसलिए अगर कोई पाठक ऊपर उद्धृत कविता को भी नागार्जुन रचित माने तो इसमें आश्चर्य क्या? दरअसल हुआ भी ऐसा ही। अक्टूबर-नवंबर में फेसबुक पर यह कविता एकाएक प्रकट हुई; इसके लिखने का श्रेय बाबा नागार्जुन को दिया गया; और जब कहीं प्रतिवाद हुआ कि यह किसी और की रचना है तो उस बात को एक सिरे से नकार दिया गया। कुल मिलाकर एक रोचक विवाद खड़ा हो गया। रोचक इसलिए कहूंगा क्योंकि कुल मिलाकर बातों का ही जमाखर्च था। वादी-प्रतिवादी दोनों कुछ समय बाद इस प्रकरण को भूल भी गए।

मैंने जब फेसबुक पर कविता पढ़ी और नागार्जुन का नाम देखा तो विस्मयपूर्वक प्रश्न किया कि क्या यह कविता सचमुच नागार्जुन की है? मैं जानता था कि यह उनकी कविता नहीं है, लेकिन जिन्होंने कविता पोस्ट की थी उनसे टकराव मोल लेने के बजाय चाहता था कि मेरा प्रश्न पढ़कर वे स्वयं इस बारे में आश्वस्त हो लें। बहरहाल, इसके बाद मैंने अपने कई मित्रों को फोन किया, उनको कविता की आधी पंक्ति सुनाकर ही पूछा कि इसका लेखक कौन है? सारे मित्रों का उत्तर वही था जो मुझे पता था। इसके बाद भी लिखित प्रमाण की आवश्यकता थी ताकि फेसबुक पर कविता के असली लेखक का परिचय दे सकूं। इधर-उधर खोजा। अंत में सागर में प्रोफेसर कांतिकुमार को फोन किया, उन्होंने आश्वस्त किया कि ढूंढकर बताऊंगा। यहां उनकी सहधर्मिणी श्रीमती साधना जैन ने सहायता की। उन्हें कुछ याद आया, अपनी हजारों पुस्तकों वाली लाइब्रेरी से उन्होंने वह पुस्तक निकाली जिसमें यह कविता छपी थी और यह कृपा भी की कि पूरी पुस्तक ही मुझे पंजीकृत डाक से भेज दी।

आपके इतना पढऩे तक प्लॉट अगर गहरा गया हो और आप रहस्य से परदा उठाकर कवि का नाम जानने व्यग्र हों तो मैं अधिक प्रतीक्षा करवाए बिना बताऊं कि यह कविता मध्यप्रदेश के कवि जीवन लाल वर्मा विद्रोही की है। जिस काव्य संग्रह में मुझे यह प्राप्त हुई उसका शीर्षक है- जबलपुर की काव्यधारा।  पंडित कुंजीलाल दुबे स्मारक समिति जबलपुर ने 1999 में इसका प्रकाशन किया। इसमें जबलपुर से संबंध रखने वाले पचहत्तर कवियों की कविताएं, उनके जीवन परिचय के साथ प्रकाशित हैं। छह सौ पृष्ठ के इस काव्य संकलन का संपादक जबलपुर के ही प्रोफेसर हरिकृष्ण त्रिपाठी ने किया। जबलपुर की अपने समय की सुप्रसिद्ध साहित्य संस्था मिलन ने भी इसी तरह का एक संकलन नर्मदा के स्वर शीर्षक से कुछ वर्ष पूर्व प्रकाशित किया था। इतनी जानकारी यह सोचकर दी कि शायद साहित्यिक इतिहास के पाठकों को इसमें रुचि हो।

जीवनलाल वर्मा विद्रोही नागार्जुन और मुक्तिबोध के समवयस्क और समकालीन थे। उनकी एक लंबी कविता चरवाहा अपने समय में अत्यन्त लोकप्रिय हुई थी। 1915 में जबलपुर में जन्मे विद्रोही जी पत्रकार, बाद में मध्यप्रदेश जनसंपर्क में अधिकारी थे। पहले नागपुर, फिर भोपाल में उनका वास रहा। 1989 में भोपाल में ही उनका निधन हुआ। वे फक्कड़ स्वभाव और विद्रोही तेवर के कवि थे। अपना उपनाम उन्होंने सोच-समझकर ही रखा था। साहित्य जगत के बाहर भी वे अपने चुटीलेपन के लिए जाने जाते थे। मेरा अभिनंदन शीर्षक से उन्होंने कविता लिखी जिसमें वे कहते हैं:-

जिस दिन था मेरा अभिनंदन

सूरदास सिर पीट रहे थे, कालिदास करते थे क्रन्दन।

हुआ एक्स-रे था तुलसी का

मीरा थी अण्डर आपरेशन,

हिन्दी को केंसर होने का-

हुआ उसी दिन कनफरमेशन।

सीधे दिल्ली चले कबीरा लाद गधे पर नौ मन चंदन।।

 

उनकी एक और कविता दृष्टव्य है:-

सुनते हैं अजगर-युग है,

तो फिर दास मलूका हूं मैं।।

अब तक संत बन गया होता,

एक चिलम से चूका हूं मैं।।

जिस कविता से बात प्रारंभ की वह इसी अंक में अन्यत्र प्रकाशित है।

नागार्जुन बनाम विद्रोही की चर्चा को प्रस्थान बिन्दु मानकर मैं पाठकों को एक वृहत्तर प्रश्न की ओर ले जाना चाहता हूं। यह पहला अवसर नहीं है जब एक कवि की रचना दूसरे कवि की लिखी मान ली गई हो या उस तरह प्रचलित हो गई हो। और ऐसा नहीं कि सिर्फ हिन्दी में ही ऐसे प्रसंग घटित होते थे। कोई दो वर्ष पूर्व स्पैनिश भाषा के महान कवि पाब्लो नेरुदा के नाम से एक लंबी कविता सोशल मीडिया पर प्रसारित हो गई। किसी सजग पाठक का उस पर ध्यान गया। उसने खोज कर बताया कि यह किसी अन्य की रचना है जिसे नेरूदा के नाम से चलाया जा रहा है। दुनिया में और जगहों पर भी इस तरह के प्रसंग घटित होते होंगे। इतिहास में एक दौर वह भी था जब वाचिक परंपरा में किसी कवि की रचना के साथ प्रक्षिप्त अंश जुड़ जाते थे या किसी प्रसिद्ध कवि के नाम से कोई नया कवि अपनी रचना चला देता था। कबीर और मीरा के पदों में कितना उनका स्वयं का लिखा है और कितना दूसरों ने उनके नाम पर जड़ दिया है उस पर आज भी चर्चाएं जारी हैं।

हम जानते हैं कि प्रिंटिंग मशीन के आविष्कार के साथ बड़ी संख्या में किताबों का मुद्रण प्रारंभ हुआ। अब ताड़ पत्र या भोजपत्र पर लिखने की आवश्यकता नहीं थी। साहित्यिक कृति का गेय होना भी अनिवार्य नहीं था। किसी कृति का असली लेखक कौन हैं इस बारे में भ्रम फैलने की गुंजाइश भी कम हो गई। फिर भी कुछ कसर बाकी रहना ही थी। वह इसलिए कि जिस भाषा का प्रसार क्षेत्र विस्तृत हो उसमें कब, कहां, किसने क्या लिखा इसकी समूची जानकारी सामान्य पाठक के पास नहीं हो सकती थी। यदि स्पेन में एक लेखक ने कुछ लिखा और उसे स्पेन प्रवास से लौटे किसी लातिन अमेरिकी चतुर सुजान ने अपने नाम से चला दिया हो, तो ऐसा हो जाना असंभव न था। आज भी तो हम पाते हैं कि कभी किसी फिल्म की कहानी चोरी  होने का आरोप लगता है, तो कभी किसी पत्रिका में चोरी की गई कविता या कहानी छपने का विवाद उठता है। साहित्येतर विषयों में शोध कार्य में चोरी के आरोप लगते हैं और नेताओं के भाषणों में ढूंढा जाता है कि उन्होंने कहां से मसाला टीपा है।

अमेरिका में कोई शोध प्रबंध प्रकाशित होता है और उसकी नकल मारकर भारत में पीएचडी मिल जाती है। इतनी दूर भी क्यों जाएं? भारत में ही एक विश्वविद्यालय के भीतर एक जैसी विषयवस्तु पर पीएचडी दे देते हैं। अगर कहीं पकड़े गए तो फिर जो होगा सो होगा। आज उसकी चिंता क्यों की जाए। मैंने कई हिन्दी लेखकों को दावे करते हुए सुना है कि फलानी फिल्म का प्लॉट उनकी कहानी से चोरी किया गया है। हमारे हिन्दी जगत में यह शिकायत इसलिए उठती है क्योंकि हिन्दी भाषी क्षेत्र अत्यंत वृहद है। लेखकों की संख्या भी कम नहीं है। लगभग हर कस्बे से एकाध लघु पत्रिका प्रकाशित हो रही है। रचनाएं छपती हैं। अधिकतर एक छोटे से दायरे में सीमित रह जाती हैं, लेकिन पत्रिकाओं के संपादकों और साहित्यिक संस्थाओं के बीच विनिमय में रचना एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने की संभावना बनी रहती है। इसी में यह आशंका भी निहित है कि दूरदराज की पत्रिका में छपी कोई रचना पसंद आ जाए तो उसे अपने नाम से स्थानीय पत्र या पत्रिका में छपा लो, किसको पता चलना है। वैसे भी अधिकतर लेखक अपनी रचनाओं को ही पढ़ते हैं। सरसरी निगाह से पत्रिका में अन्य लेखों को देखो तो ध्यान भी नहीं जाता कि इसमें कोई चोरी की रचना भी हो सकती है। ऐसी घटनाएं कम ही होती हैं, लेकिन होती तो हैं। सवाल उठता है कि क्या इस पर रोक लगाना संभव है, और क्या सूचना प्रौद्योगिकी का जो विकास हुआ है वह इस संबंध में हमारा मददगार हो सकता है? सवाल अटपटा लग रहा होगा, लेकिन इस पर सोचकर देखिए।

आज हम डिजिटल युग में हैं। सरकारी दफ्तरों में सौ-सौ साल पुरानी फाइलों को डिजिटल स्वरूप में संरक्षित किया जा रहा है। आक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी अब ट्विटर पर नए शब्द शामिल करने की सूचना देती है। किसी भी शब्द का अर्थ देखना हो गूगल सर्च पर चले जाइए। इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका जो कभी छत्तीस खंडों में प्रकाशित होता था वह अब डिजिटल रूप में उपलब्ध है। न्यूयार्क टाइम्स जैसे अखबारों ने अपने सौ-सवा सौ साल पुराने अंकों का डिजिटलीकरण कर दिया है। हिन्दी साहित्य में ही देखिए कि विकिपीडिया पर अनेक लेखकों के परिचय उपलब्ध हैं। हिन्दी कविता कोश इत्यादि नामों से ब्लॉग और फेसबुक पेज इत्यादि चल रहे हैं। अगर एक सुचारू योजना बने और उसे अंजाम देने के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध हो तो हिन्दी में लिखा गया विपुल साहित्य पीसी में माऊस के एक क्लिक पर या स्मार्ट फोन के एक टच पर प्राप्त हो सकता है।

मेरी समझ में देश में हिन्दी की सबसे पुरानी संस्थाओं यथा नागरी प्रचारणी सभा, हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा, दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा हैदराबाद इत्यादि को यह योजना हाथ में लेना चाहिए। देश के तमाम विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभागों को भी इस दिशा में विचार करने की आवश्यकता है। केन्द्र सरकार हिन्दी के प्रचार-प्रसार पर हर साल करोड़ों रुपए खर्च करती है। विश्व हिन्दी सम्मेलन नाम का एक स्वांग भी तीसरे-चौथे साल रचा जाता है। यदि एक समन्वित नीति बने, संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग हो तो हिन्दी की तमाम पुस्तकें तथा स्फुट रचनाएं डिजिटल प्लेटफार्म पर आसानी से लाई जा सकती हैं। अभी बहुत से लेखक अपनी रचनाएं खुद का ब्लॉग बनाकर पोस्ट करते हैं। दिक्कत होती है कि इसमें अधिकतम संख्या में लोगों को कैसे जोड़ा जाए। मेरे परिचित अनेक लेखकों के ब्लॉग होंगे, लेकिन उनको अलग-अलग खोलकर देखना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं होता। अंग्रेजी की लाखों पुस्तकें किंडल पर उपलब्ध हैं, लेकिन हिन्दी की न के बराबर। संभावनाएं बहुत हैं। उन्हें अमली जामा पहनाने के लिए क्या किया जाए यह विचारणीय है। आज की चर्चा इस दिशा में आगे बढऩे में थोड़ी सी भी सहायक हो तो यह नागार्जुन व जीवनलाल वर्मा विद्रोही दोनों को हमारी आदरांजलि होगी।