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Monday 20 Aug 2018

पत्र

कुछ ही दिनों के अंतराल पर अक्षर पर्व के दो अंकों ( दिसम्बर और जनवरी ) के मिलने से दोहरी खुशी मिली !! दिसम्बर अंक की प्रस्तावना को पढऩा शुरू किया तो ताज्जुब हुआ कि गम्भीर बातें करने वाले ललित सुरजन सेल्फी - वेल्फी की बातें क्यों कर रहे हैं !! लेकिन, वाह रे वाह ! ये ललित सुरजन तो ऐतिहासिक स्थलों के दीवारों पर किसी नुकीले पत्थर से नाम लिखने वाले और दिल में धँसे तीर के साथ बाकायदा अपनी दिलरुबा का नाम उकेरने वाले मजनुओं पर तंज कस रहे हैं !! वाकई देश के कोने कोने में इन बेवकूफ मजनुओं की कोई कमी नहीं है जो भव्य इमारतों और किले- मकबरों तथा मंदिरों और खण्डहरों के पुरातात्विक महत्व को नजऱअंदाज़ करते हुए अपने प्रेम का उन्मुक्त चित्रण करते हैं। अपने प्रेम के चिन्ह गोदने वाले इन दीवानों के कारण पुरातात्विक स्थल क्षति ग्रस्त और भद्दे हो जाएँ तो हो जाएँ इनकी बला से । सही कहा है ललित जी ने कि यह दृश्य पूरे देश में कहीं भी देख सकते हैं। अपने देश में अभिव्यक्ति की आजादी इस मामले में बेहद उत्साहवद्र्धक है, क्योंकि धर्मप्रवण लोग अपने पंथ का प्रचार करने के लिए किसी भी जरूरी/गैरजरूरी इमारत या चट्टान पर अपने विचार और उपदेश लिख सकते हैं। ताज्जुब की बात है कि आज अपने देश में कोई भी कुछ भी कर / कह सकता है और ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश कर सकता है !! ताजमहल को प्राचीन मंदिर सिद्ध करने के लिए ताजमहल के भीतर भक्ति भाव से शिव चालीसा का पाठ कर सकते हैं कुछ आगरावासी हिन्दू भाई !! ताजमहल जो खूबसूरत इमारतों में शुमार है और विश्व विरासत है उसे शिवालय घोषित कर देने की हिन्दुत्वादी दुरभिसंधि हास्यास्पद है। इतिहास ने हमें जो विरासत सौंपी है उसमें ताजमहल एक नायाब तोहफा है या कलाकारों के स्थापत्य कला की सुन्दरतम् कृति है। सुशिक्षित और आधुनिक युग में हर सभ्य समाज का यह कर्तव्य है कि वह अपने ऐतिहासिक विरासतों को संरक्षित करने के प्रयास करे। अपने प्राकृतिक संसाधनों और सम्पदा को क्षतिग्रस्त न करे। प्रकृति और पर्यावरण को नुकसान पहुंचा कर हम अपना ही नुकसान कर रहे हैं और ग्लोबलवार्मिंग को आमन्त्रित करते हैं। पृथ्वी और पहाड़ों को विपन्न बनाकर मनुष्य अपने को सम्पन्न कर लेना चाहता है। नियामगिरी के पर्वत हों या झारखण्ड और छत्तीसगढ़ के जंगल, मनुष्य के लोभ ने सबको निगल लिया है। अंधाधुंध कटाई और माइनिंग के कारण जंगल, जंगली जीव - जंतु तथा आदिवसियों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। आदिवासी न सिर्फ विस्थापन का दर्द झेल रहे हैं, बल्कि शोषण और कुपोषण भी झेल रहे हैं। सही कहा है ललित जी ने कि शायद वह दिन आ जाए कि जब सिर्फ मशीनें ही बचें और उन मशीनों को चलाने वाले यंत्र मानव और प्रकृति के साथ बाकायदा यह पृथ्वी एक कारखाने में तब्दील हो जाए।  प्राकृतिक और मनुष्य निर्मित धरोहरों को सहेजने और संरक्षित करने के प्रयास से ही हम अंतत: अपनी संस्कृति, सभ्यता और जीवन को संरक्षित रख सकेंगे। प्रस्तावना काफी गम्भीर लगी।

 

नवनीत कुमार झा, हरिहरपुर, दरभंगा - 847306 ( बिहार )

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अक्षर पर्व का दिसम्बर अंक हमेशा की तरह बहुविध सामग्री से लैस है। हिंदी साहित्य में राष्ट्रीयता के सवाल आलेख में  सजग चिंतन प्रस्तुत कर सेवाकाल जी त्रिपाठी ने एक जागरूक पहल की है, वहीं सर्वमित्रा जी ने जड़वत् होती देशीय चेतना को आज के संदर्भों में बखूबी रेखांकित कर जो संदेश दिया है वह प्रभावी है। अरमान आसिफ इकबाल की कविता गंभीर सवाल लिये है। तमाम कहानियां स्त्री विमर्श की सार्थक पहल करती हैं, कब्र का अजीब, पुजापा रहीम को और सांझ की धूसरता विशेष प्रभाव छोड़ती है। कुंवर नारायण और नाटककार जगदीशचंद्र माथुर पर दी सामग्री पठनीय है साथ ही साथ  संग्रहणीय भी है।

सुसंस्कृति परिहार

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अक्षरपर्व दिसम्बर अंक बहुत बेहतर लगा। इसमें प्रकाशित ललित जी की प्रस्तावना, डा.गोपाल प्रसाद का नाटककार जगदीशचंद्र माथुर पर उनके जन्मशती वर्ष पर आलेख, जहीर कुरैशी का संस्मरण, रूचि भल्ला की डायरी, डा.शोभा निगम का शोध आलेख-क्या विभीषण भातृद्रोही थे?, प्रियंका का वेणुगोपाल की कविताओं पर आलेख और पुस्तक समीक्षाएं तथा उपसंहार अच्छे लगे।

रामनिहाल गुंजन, नया शीतल टोला, आरा- 802301