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Saturday 15 Dec 2018

कई पहलुओं को साथ लेकर बढ़ती है मुक्काबाज

अनुराग की फिल्म मुक्काबाज रिलीज होने के साथ यह बात तो स्पष्ट हो गयी कि खेल प्रधान फिल्मों का स्वरूप और उसके कथ्य में बदलाव आगे आने वाले वर्षों में देखने को जरूर मिलेंगे। मुक्काबाज सिर्फ स्पोट्र्स तक सीमित नहीं है, बल्कि स्पोट्र्समैन की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तीनों स्थितियों से दर्शकों को रूबरू करा पाने में सफल होती है। अनुराग के बीते दिनों के फिल्मी पैंतरों पर ध्यान दिया जाए तो एक बात तो स्पष्ट है कि फिल्मों से सिर्फ  पैसा कमाना उनका उद्देश्य कभी नहीं रहा। उनकी फिल्में एक बड़ा और सटीक मैसेज दे पाने में भी हर बार सफल हुई हैं। भले ही उनकी बीते दिनों की कुछ फ्लॉप फिल्में ही क्यों न हो।  

यदि कोई फिल्म फ्लॉप हो तो एक निर्माता और निर्देशक टूट जाता है। नयी फिल्म में उस पर कई तरह के स्वाभाविक दवाब भी आ जाते हैं, ऐसे में उसका कमबैक करना दोगुना मेहनत करने जैसा ही होता है। अनुराग का मामला बिलकुल इसी कथन पर फिट बैठ रहा है। फिल्म के लीड अभिनेता विनीत कुमार सिंह की खुद की लिखी कहानी को जब अनुराग ने पढ़ा तो इसे बनाने से पहले की शर्त पर ध्यान देना जरूरी है। अनुराग ने प्रोफेशनल मुक्काबाज बनने के लिए विनीत को कहा। विनीत ने भी लंबे समय से लीड कैरेक्टर न मिल पाने के चलते इसे मान लिया। हालांकि विनीत प्रोफेशनल मुक्काबाज बन फिल्म के लीड एक्टर तो बने पर इसका खामियाजा उन्हें खुद को चोटिल करके भी उठाना पड़ा। वैसे अनुराग की यह सलाह फिल्म को वास्तविकता के काफी करीब ले जा पाने में सफल हुई है। वास्तविकता का आलम तो यहां तक था कि विनीत फिल्म के क्लाइमेक्स सीन में भारत के पूर्व बॉक्सिंग चैंपियन रह चुके दीपक राजपूत से लड़ते हुए दिखाई पड़ते हैं। कई अन्य दृश्यों में वो नीरज गोयल जैसे नामी मुक्केबाजों के साथ भी रिंग पर देखे गए। फिल्म में इस्तेमाल ऐसे कई सीन को शूट करते हुए किसी कोरियोग्राफर की जरूरत अनुराग को महसूस नहीं हुई। यही अनुराग की अपनी पहचान है।

सुनील जोगी को जब कभी यूट्यूब में हम सभी ने उनकी हास्य कविता, मुश्किल है अपना मेल प्रिये, को मंचों से गाते हुए सुना होगा तब जो छवि हमारे मस्तिष्क में बनी होगी, उसी को सिनेमाई रूप देने की  कोशिश अनुराग ने इस कविता के इस्तेमाल के साथ फिल्म की कहानी को जोड़ते हुए किया है।  कह सकते हैं सुनील जोगी की कविता सार्थक सिद्ध हुई है। इसके अलावा फिल्म में अन्य गीत भी जरूरत के अनुरूप ही हैं। रचित अरोरा का संगीत फिल्म को अलग विमर्श के लिए ले जाने के लिए काफी है।

मुक्काबाज की कहानी उत्तर प्रदेश की अपनी ही एक कहानी की ओर इंगित करती है। बरेली का श्रवण सिंह (विनीत कुमार सिंह) सवर्ण है और उसका सपना मुक्काबाज बनने का है, पर उसके शहर के खेल फेडरेशन में प्रभावशाली और दबंग भगवानदास मिश्रा (जिम्मी शेरगिल) उसके साथ बुरे बर्ताव करता है। भगवान दास मिश्रा बरेली के ब्राह्मणों का प्रतिनिधित्व करते हुए दिखता है। वह अपनी धौंस , अपने संवाद हम आदेश देते हैं, से यह साबित कर देना चाहता है कि वह सर्वोच्च है। उसके इस बर्ताव का शिकार श्रवण ही नहीं बल्कि उसके बड़े भाई, भाभी, उसकी भतीजी सुनैना और तमाम अन्य लोग हैं जो उसके दबाव में उसकी गुलामी में जीवन यापन कर रहे हैं। गौरतलब है कि श्रवण का सपना मुक्काबाज बनने का है। गिरते पड़ते, गिड़गिड़ाते वह किसी तरह मुक्केबाजी के रिंग तक तो पहुँच जाता है पर भगवानदास के प्रभाव के चलते उसे फिल्म के अंत तक में अपने सपने से दूरी बनानी पड़ती है। कह सकते हैं सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दबाव में श्रवण जैसे मुक्केबाज कई बार रिंग तक पहुँचने से पहले ही आउट हो चुके होते हें। भला हो इस फिल्म का जिसका नायक कोई दलित नहीं बल्कि सवर्ण था, नहीं तो उसकी हालत श्रवण के कोच संजय कुमार (रवि किशन) जैसी हो जाती। संजय कुमार दलित है और उसका भी सपना फुटबॉलर बनने का था पर परिस्थितियों ने उसे मुक्काबाज बना दिया। यह वही कोच है जिसने फिल्म के नायक श्रवण को मुक्काबाज से मुक्केबाज बनाने में अहम भूमिका निभाई है। श्रवण की प्रतिभा को पहचानने और उससे उसकी पहचान बताने में इस पात्र का अहम योगदान है। हालांकि कई अन्य मुद्दों की तरफ  ध्यान घसीटने के चक्कर में अनुराग ने कोच के पात्र के साथ न्याय नहीं किया। उसे आखिरी समय  एकदम गायब सा कर दिया। कम से कम उस कोच के त्याग और परिश्रम को सीधी भाषा में दर्शकों तक पहुंचाना जरूरी था जितना फिल्म में पुलिस इंस्पेक्टर के पात्र द्वारा किया गया। बहरहाल फिल्म ने समाज में बढ़ रहे द्वेष को लेकर एक सीन से काफी बड़ी बहस को जन्म दिया है। आम तौर पर निर्देशक इससे बचते हुए दिखते हैं, श्रवण जिस ऑफिस में काम करता है उसके अधिकारी एक यादव जी हैं। यादव जी को यह बात याद है कि उनके पिता कभी भूमिहारों के यहां नौकरी किया करते थे। बस इसी को दिमाग में बसाये हुए यादव जी ने श्रवण को परेशान करना शुरू किया जिससे तंग आकर यूपी के माइक टाइसन कहलाने वाले श्रवण ने एक ही बार में उनकी पैंट गीली कर दी।  हालांकि नायक सवर्ण है इसीलिए यह सीन तैयार कर पाना आसान हुआ नहीं तो अन्य दूसरे सीन में एक कोच होने के बावजूद दलित संजय कुमार कभी भगवान दास से सीधे मुकाबला कर पाने में सक्षम नहीं हुआ।

बोली भाषा को लेकर फिल्म थोड़ी अलग बहस की पात्र है। अगर कहानी बरेली की है तो पूर्वाञ्चल का लहजा इस्तेमाल करना कहीं से भी सही फैसला साबित नहीं होता। हालांकि अनुराग ने फिल्म की शुरुआत में इसे भोजपुरी में बनाने का फैसला लिया था, पर न जाने क्या मजबूरी हुई कि उसे हिन्दी में बनाने का फैसला लिया। फिल्म की लोकेशन और कैमरा एंगल कमाल के हैं। एडिटिंग कई बार नए कथ्य रचते हुए दिखती है। जब जब श्रवण प्रैक्टिस के लिए तैयार हो रहा होता है उन दृश्यों पर ध्यान देंगे तो एक अलग अनुभूति होगी।

फिल्म की अभिनेत्री जोया हुसैन ने भले ही एक भी संवाद अपनी पहली ही फिल्म में नहीं बोला हो पर अपनी एक्टिंग के दम पर उन्होंने नयी संभावनाओं की ओर इशारा किया है। उनका सुनैना वाला किरदार एक अलग विमर्श का मुद्दा भी है। जिमी शेरगिल अपने विलेन किरदारों के लिए याद किए जाते हैं। अब उन्हें कुछ नया करने की जरूरत है। रवि किशन का किरदार भले ही छोटा है, पर वह लॉजीकली बहुत ही पावरफुल पात्र है। उसे नेग्लेक्ट किए जाने की लेखक की क्या मजबूरी थी उस पर भी सोचने की जरूरत है। यहाँ कोच की सामाजिक स्थिति को दर्शाया गया तो उसके योगदान को दर्शकों तक पुख्ता तरीके से पेश नहीं किया गया। सुनैना की मां बनी नदिया के पार वाली साधना सिंह की एक्टिंग की तारीफ  की जानी चाहिए। कुल मिलाकर अपनी फिल्मों से एक नए दर्शक वर्ग तैयार करने वाले अनुराग कश्यप ने इस फिल्म के सहारे खुद में एक प्रयोग किया है। डार्क शेड वाली फिल्मों से इतर यहां हाई लाइट में चल रही लवस्टोरी का खूबसूरत चित्रण किया है। सामाजिक स्थिति को उकेरने में जहां अनुराग गोली बारूद और गालियों का प्रयोग अपनी पूर्व की फिल्मों में किया करते थे, यहाँ ये तीनों नदारद हैं। पर ठसक फिल्म के पात्रों में उतनी ही बरकरार है। नवाजुद्दीन सिद्दिकी का फिल्म में कुछ समय के लिए आना अनुराग का अपने सहयोगी कलाकारों के साथ लगातार समन्वय बना कर चलने की पुष्टि भी करता है। फिल्म में पत्रकार वाला दृश्य स्ट्रिंगर और उस एरिया की वास्तविक स्थिति को बयान करने के लिए काफी है। यहाँ उससे यह तो जरूर समझा जा सकेगा कि आज भी स्ट्रिंगर की हालत वैसी ही है, उसके पास न ही फोटो कैमरा है न ही अन्य तकनीकी साधन,  लेकिन कहने को वो पत्रकार है। 

मुक्काबाज थोड़ी लंबी जरूर है, लेकिन संवादों से उसके प्रभाव को कम करने की कोशिश की गयी है। फिल्म के आर्थिक पक्ष पर अनुराग का खासा ध्यान नहीं रहता क्योंकि ज्यादा से ज्यादा निर्माता होने के चलते यहां किसी एक पर कोई दवाब नहीं पड़ता है। कई खामियों के बावजूद मुक्काबाज स्पोट्र्स पर बनी फिल्मों की सूची में बेहतर स्थान ग्रहण कर पाने में सफल होती है। क्योंकि वह वास्तविकता के काफी करीब है। पात्रों के चयन, स्क्रिप्ट, लोकेशन के जरिये वास्तविकता को बरकरार रखा जा पाया है। खेलों के साथ उसके विज्ञापन से जुड़े तथ्यों की ओर अब धीरे-धीरे बहस होने लगी है। फिल्म दंगल की गीता-बबीता को सपोर्ट करने वाले मीट व्यवसायी तो आपको याद ही  होंगे।  लेकिन ग्रामीण और कस्बाई स्तर पर खेलों में विज्ञापन का हाल मुक्काबाज के बेदाग डिटर्जेंट के मालिक जैसा ही है जिससे भगवान दास अपनी भतीजी का सौदा तक कर लेता हैं। ऐसा करते हुए भगवान दास जैसे लोगों का  ब्राह्मणत्व तब कहाँ चला जाता है? यह भी रूढि़वादी, ब्राह्मणवादी लोगों को फिल्म देखते हुए खोज लेना चाहिए। भगवान दास जैसे लोग ही समाज, संस्कृति, खेलों की दशा के लिए जिम्मेदार हैं इसी का पर्दाफाश मुक्काबाज अपने पंच से करती है ।