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Thursday 17 Oct 2019

ये मुख़्तसर से लम्हे

कभी छिड़ता है कोई किस्सा 

होती शुरू कहानी

कभी सुस्त रौ में बहती

मेरी सोच की रवानी

कभी एक चेहरा खुलता

परदे से मुंह निकाले

नकारों पे बात रखता

देखे न मुंह जबानी

आदत सी हो गई है

सुनता नहीं मैं खुद को

और खुद से बात करना

आदत मेरी पुरानी

बढ़ता न हाथ कोई

रुकती न कोई आहट

आहट का हाथ थामे

जाती है जिंदगानी

वो आए थे जो घर में,

थे मुख्तसर से लम्हे

बातें बता सके ना

बातें थी जो बतानी।