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Sunday 19 Aug 2018

आईना और आँख

आईना और आँख 

फ्रेम चाहे लकड़ी की हो या सोने की

उसमें जड़ा आईना कभी झूठ नहीं बोलता

 

देह चाहे चीथड़ों में लिपटी हो

कि सजी हो मखमली पोशाक में

बेपर्द आँखें कभी झूठ नहीं बोलतीं

 

सच-झूठ के तराजू पर तुलती हर चीज

बनावटी या नकली हो सकती है सिवा आँखों के

 

बस आँखें ही किसी की भी अपनी और सच्ची हैं

उतनी

जितनी  उसकी अंतरात्मा

 

इसलिए लोग आँख मिलाने से बचते हैं

काश आदमी केवल आँख होता

उसमें खून नहीं प्यार का पानी होता !

 

 विदा से पहले

 

विदा का अर्थ सिर्फ चले जाने देना  नहीं

स्मृतियों में संजो लेना भी होता है

 

विदा से पहले देख लेना जी भर कर

सुलझा देना प्रिय की उलझी लटें

एक पुरसुकून नींद सो लेना उसकी गोद में

मढ़ लेना उसकी तस्वीर को आत्मा की फ्रेम में

 

सहेज लेना उस जादुई स्पर्श को बाद के दिनों की खातिर

 

ये सब बस उतना और वैसे ही

जैसे ऊँट भर लेता है अपने भीतर पानी

दादी रख देती थी आग बोरसी में छिपाकर

माँ का रख लेना कुछ पैसे पिता की नजरों से बचाकर

बचे रहें सब

विदा के पहले उतना हमेशा के लिए आँखों में

जैसे सिन्धु-घाटी सभ्यता समाप्त होने पर भी

नदी बहती रही

उसके किनारे बसती रही बस्तियाँ !

 

विद्रोहिणी

 प्रेम करते ही मैं विद्रोहिणी हो गई

प्रेम पाते ही फ्रिज में रखी सॉफ्ट ड्रिंक की बोतल

 

अब अपने गूँगेपन से घबराकर

पूरी ताकत से चीखती हूँ

तो आप कहते हैं

अच्छी कविता कही है !

 

 घर चुप है

 बंद दरवाजों के भीतर घर चुप है आजकल

उदास भी अपनी चुप्पी पर

घर की दहलीज पर बैठी प्रतीक्षा निहारती है सजल नेत्रों से

मेरे भीतर बैठे छोटे -से हठी बच्चे को

जो ना सुनते ही रूठ जाता है

जिसे अब कोई मनाने नहीं आता

 

वहीं आँगन में रहनेवाली कुर्सी

अब कमरे की धरोहर हो गयी है

अखबार जहाँ बेतरतीब पड़े रहते हैं

 

घर की बाकी चीजें

गार्डेन,टैरेस,बालकनी ,खिड़कियों के पर्दे सब यथावत हैं

सबके हिस्से की धूप हवा पानी भी

फूल अब हमेशा चुपचाप सूख जाते हैं

 

घर के भीतर दिखाई देती है एक निस्तेज देह

जो हर रात बाँट आती है अपना कोमल स्पर्श

सबको सोता हुआ जानकर

ओढ़ ली है उसने दुखों की गीली चादर

मटमैला और रंगहीन हो गया है जिसका लिबास

 

यहाँ मुस्कुराहटें सबके चेहरों से उतर ,

शब्द बन

किताबों में शरणार्थी की तरह लाचार हैं

तारीखें बदल रही हैं कैलेण्डर में में दीवारों पर

अब कोई इजाफा नहीं होगा पिता की तस्वीरों में

 

स्थाई स्मित हँसी और अपनी गहरी आँखों से झाँकते पिता

मानो अब भी कानों में फुसफुसाते हैं

डर मत  , चुनौतियाँ स्वीकार कर

मैं हूँ ना, तुम्हारे साथ , तुम्हारे ही भीतर

 

अकेलेपन के रेगिस्तान में दरख्त हैं पिता के शब्द

वो शब्द कभी आकशदीप बन राह दिखाते हैं

पड़ाव से मंजिल की तरफ खींचते हैं

मैं शिद्दत से महसूस करती हूँ कि मेरा बायाँ पाँव ही

मेरे दाएँ पाँव को आगे खींचता है

 

इस बाएँ पाँव को पिता की स्मृतियाँ ही संचालित करती है !

 

अजायबघर की औरतें

 

वे शब्दों के अलावा भी कुछ लिखना चाहती हैं

वो बातें जो अनुभव की है उन्होंने

 

जिसे शब्दों से नहीं हासिल किया गया

उन्हें बिना शब्द ही हम तक पहुँचाना चाहती हैं

कहती हैं वे कि होंगे उनके जैसे असंख्य

जिनका शब्दों ने साथ नहीं दिया होगा

जो वे लिखना चाहती होंगी , नहीं लिख पाई होंगी

 

वे उन्हीं अलिखित रचनाओं को पढ़वाना चाहती हैं

नहीं बोली गई बातों को सुनवाना चाहती हैं

निकल जाना चाहती हैं वो दूर बहुत दूर

सभ्यताओं के जंगल-जंगल

शताब्दियों के पहाड़-पहाड़

 

वे जो अजाबघर की औरतें हैं !