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Wednesday 23 May 2018

मुझे ईश्वर नहीं, तुम्हारा कंधा चाहिए

मुझे ईश्वर नहीं, तुम्हारा कंधा चाहिए

पता नहीं ऐसा क्यों होता है अक्सर

जब-जब मैं दुखी और उदास होता हूँ

ईश्वर से ज्यादा तुम याद आती हो

 

मैं ईश्वर को मानता तो हूँ

पर उसे जानता नहीं

और न ही चाहता हँू जानना भी

 

मुझे सिर झुकाने के लिए

ईश्वर नहीं

सिर टिकाने के लिए

कंधा चाहिए

और वो ईश्वर नहीं

तुम दे सकती हो !

 

 

जीवन की सूखी रोटी पर

चुटकी भर नमक है प्रेम

 

थककर चूर

शिथिल पड़ी काया के सिरहाने

तकिया बढ़ाते हाथ हैं प्रेम           

 

एक कंधा है

दुख के क्षणों में

लरजते हुए सिर टिकाने को

 

मेहनत और थकान से

माथे पर उभरी

पसीने की स्वेत बूंदों पर

 

शीतल अंगुलियों की छुअन है

स्याही-सोखता की तरह

पीड़ा और थकान सोखती

आँखें हैं प्रेम

 

प्रेम

रात के अंधेरे में

सूनसान सड़क पर खड़ा लेम्पपोस्ट है

 

एक छायादार पेड़ है प्रेम

दोपहर की चिलचिलाती धूप में

 

जाड़े की सर्द रातों की गर्म लिहाफ

सुबह की गुनगुनी धूप है प्रेम

 

और तो और

जिन्दगी की रूखी सुखी रोटी पर

चुटकी भर नमक है प्रेम।

 

काली लड़की

   (एक)

 

काली लड़की को बहुत छलता है

सपनों में गोरा रंग

 

नदी में स्नान करती काली लड़की

छुड़ा रही है रगड़-रगड़कर अपना कालापन

अब तो पानी पर से उठ गया है विष्वास

 

यह साबुन और छह हफ्तों में निखार देने वाला

प्रसिद्ध क्रीम भी किसी काम का नहीं

क्या कश्मीर जाने से बदल जाएगा मेरा रंग!

देर रात गये जगकर सोचती है काली लड़की

और उदास हो जाती है

अपने को काला कहे जाने पर

 

टूट जाती है काली लड़की

जब टूट जाता है कोई रिश्ता

कालेपन की वजह से

         

       (दो)           

 काली लड़की के सपनों में आता है

अक्सर एक गोरा लड़का

जिसे छूकर इन्द्रधनुषी हो जाना चाहती है वह

 

  अफसोस

गोरा लड़का नहीं मिलना चाहता

दिन के उजाले में काली लड़की से

और काली लड़की डरती है

गोरे लड़के संग रात के अंधेरे में मिलने से

 

काली लड़की नहीं जानती

उसकी दूध-सी निश्छल उजली हँसी

किस-किस गोरे लड़के के सपनों में गड़ती है

 

वह जानती है तो बस इतना

एक दिन उसके गोरेपन के सपनों को तोड़ता

सामने आयेगा कोई काला-भुच्च-आदमी ही

जो आगे बढ़कर थामेगा उसका हाथ

 

बावजूद

काली लड़की प्रेम में पड़ी देखती है सपने

गोरेपन का

और नदी में स्नान करती छुड़ाती है रगड़-रगड़कर

अपना कालापन।

 

बस का इंतजार करती लड़की

बस का इंतजार करती लड़की

बस पड़ाव पर बैठी

उलट रही है पत्रिका के पन्ने

 

उसका वक्त तो काटे नहीं कटता !

 

लड़की देख रही है बार-बार घड़ी

जो बहुत धीरे चल रही है आज

उसे याद है कल बड़ी जल्दी हो गई थी शाम

जबकि और भी लम्बा होना चाहिए था

 

कल का दिन!

यह जो उसकी पिता की उम्र का आदमी

अखबार की ओट से उसे घूर रहा है!

 

उधर खड़े चार लड़कों ने

कभी क्या लड़की देखी नहीं!

 

पान की गुमटी पर खड़ा

सिगरेट फूंकता आदमी

बेशर्मी की हद पार कर

देख रहा है लगातार ....

 

काट रहे हैं चक्कर इर्द-गिर्द

दो नौजवान लड़के

देखते तिरछी नजरों से बार-बार

बतिया रहा है न जाने क्या-क्या !

 

एक-दो पुलिस वाले होने चाहिए

इस जगह पर

नहीं.... नहीं.... पुलिस वाले भी तो ......

 

एक निरीह सोच

रोज-रोज कौंधती है दिमाग में

भीड़ भरे बस की तो बात ही अलग है!