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Wednesday 23 May 2018

भरोसा अभी बचा है

भरोसा अभी बचा है 

कलम

अब बस मुझे

तुम पर भरोसा है

क्योंकि,

अब बलात्कारी

बाइज्जत बरी हो रहे हैं

अब हत्यारे

जेल की चौखट भी नहीं देख रहे हैं

अब सवर्ण

देशभक्ति की कमान संभाल रहे हैं

अब चोर

कुर्सी पर ससम्मान विराज रहे हैं

अब पुलिस

मनचाहा कहलवा रही है

अब अदालतें

कुछ और ही फैसले सुनाने को मजबूर हो रही हैं

अब कानून

धाराओं में टूट कर तरल हो रहा है

अब गवाह

लचीले हो रहे हैं

अब पड़ोसी

मुझे चुप करा रहे हैं

अब मन

हार रहा है

कलम

ऐसे समय में

बस मुझे तुम पर भरोसा है

कि तुम दृढ रहोगी

धारदार रहोगी

जो तुम

ऐसी नहीं रहीं तो मैं

सारी कविताओं

को एक दिन पानी में बहा दूंगी

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पागलों के लिए कोई जगह नहीं

पागलों का कोई,

घर नहीं होता

पागलों का कोई,

गाँव नहीं होता

पागलों का कोई,

देश नहीं होता

कोई हक नहीं जमाता पागलों पर

फिर भी पागल अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं

किसी न किसी गाँव में, शहर में, देश में

पागल गाँव में होते हैं तो बच्चे,

उन्हें पत्थर मारने का मजा लेते हैं

घरों, दुकानों के सामने से वे दुत्कार दिए जाते हैं

पर, शहर बड़े सभ्य होते हैं

यहाँ के न पुरुष, न महिलाएं और न बच्चे उन्हें तंग करते हैं

यहाँ कोई पत्थर नहीं मारता उन्हें

कोई देखता तक नहीं उन्हें

वो मु_ी भर-भर गालियां फेंकें

दिन भर बड़-बड़ करते फिरें,

तब भी कोई नहीं देखता उन्हें

सब, आंखें चुराते हुए जल्दी से गुजर जाना पसंद करते हैं,

इनके पास से

कौन मुंह लगे इनके?

शहरों में पागल पुरुष तो किसी भी काम के नहीं होते

अलबत्ता औरतें, दिन में कितनी ही बदसूरत या पगली कहलाएं

पर, रात के अंधेरों में वहशी आँखों द्वारा मौका पाते ही खींच ली जाती हैं

और फिर भरी जून में कम्बल में लिपटी

बड़े-बड़े, ऊबड़-खाबड़ सख्त जूते पहने

लूले हाथ की गूंगी पगली औरत,

दिखती है मुझे, पूरे नौ महीने से

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अब और नहीं

 

6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा, नागासाकी से उठे धुंए की कालिख

अब भी मेरे फेफड़ों में जमा है

अब भी मुझे रह-रह कर उसकी खांसी उठती है

अब भी मेरी आँखों से गिरता गर्म, मृदु जल ठंडा नहीं पड़ा है

वो सुबह जो काली हो, दर्ज हो गई इतिहास में

उस सुबह का ताप, आज भी मेरा शरीर यहाँ पाता है

और तुम हो कि मूंछों पर ताव देते हुए ताल ठोक रहे हो

बटन पर अंगूठा रख कर ललकार रहे हो

आओ, हम बताएं तुम्हें

हमारे पास परमाणु हथियार हैं, हमारे पास न्यूक्लियर बम हैं

पता है, तुम्हारी ताकत

कि तुम्हारे ये हथियार

समूची पृथ्वी को 15 से 20 बार नष्ट कर सकते हैं

देश, सत्ता ऐसे ही ललकारते हैं

झंडे ऐसे ही ऊंचे होते हैं

लेकिन इस खेल में क्या तुम खुद,

अपने को बचा पाओगे?

कभी नहीं !

समूचे प्राणी जब काल के ग्रास बन जाएंगे

तब हजारों सालों के बाद,

तुम जन्म लोगे अमीबा से

मैं चुप हूँ

मुझे पढ़ो

मुझे सुनो

अब और धुंए के लिए मेरे फेफड़ों में जगह नहीं है

मुझे सृजन चाहिए

सिर्फ  सृजन

विनाश, जैसे शब्दों से अब

मेरा रक्तचाप कम होने लगता है