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Friday 21 Sep 2018

परम्परा और प्रगतिशीलता के बीच का गज़ल-यात्री : शायर ज़फर नसीमी

मेरी तो उतनी उम्र भी नहीं है, जितने बरस से ज़फर नसीमी शायरी कर रहे हैं। हमारे देश की आज़ादी और ज़$फर साहब की शायरी की उम्र लगभग एक समान है। 87 वर्षीय ज़फर नसीमी विगत 70 साल से शऊर के साथ शेर कह रहे हैं। सहले-मुमतना (प्रसाद गुण) से सजे उनके अधिकाँश शेर मोतियों के समान चमकते हैं। लेकिन, अनायास उनसे मिल कर यह कभी नहीं लगता कि आप किसी मुमताज़ शायर से मिल रहे हैं।

अपने कॉलेज के दिनों को याद करते हुए ज़फर नसीमी साहब की बूढ़ी आँखें चमकने लगीं, बोले- उस वक़्त तक मुझे शेर कहते हुए 2-3 साल हो चुके थे। हमीदिया कॉलेज, भोपाल में मैंने बी.कॉम में दाखिला लिया था। खुशकिस्मती से वहां नामचीन शायर प्रो. जाँ निसार अख्तर उर्दू विभाग के सद्र और कॉलेज की तिमाही मैगज़ीन के एडीटर थे। जब कभी मैं कोई गज़ल या नज़्म लिखता और उनको इस्लाह (संशोधन और सलाह) के लिए पेश करता तो वह उसे बहुत हिफाज़त से अपनी जेब में रख लेते। जब मुझे वही गज़ल या नज़्म बिना किसी काट-छाँट के कॉलेज मैगज़ीन में छपी हुई मिलती तो मेरी खुशी की कोई इंतिहा न होती! .....चौथी बार फिर जब मैंने इस्लाह के लिए जाँ-निसार साहब से इसरार किया तो उन्होंने फतवा दे दिया कि आप फारिगुल-इस्लाह (इस्लाह की कोई आवश्यकता नहीं) है ! उनकी यह ज़बानी सनद आज भी मेरे लिए वाइसे-फख्र (गर्व करने योग्य) है।‘

बुजुर्ग शायर ज़फर नसीमी प्राय: छोटी बहरों में ही अपनी शायरी को मंजऱे-आम तक लाते रहे हैं। जो लोग शायरी के हुनर को समझते हैं, उन्हें पता है कि कम से कम शब्दों में गहरी से गहरी बात कहना कितना मुश्किल होता! लेकिन, शायर ज़फर नसीमी इस कला में पारंगत हैं।

मूल रूप से प्रशंसक ज़फर नसीमी साहब को रूमानी और रवायती शायरी का उस्ताद मानते हैं। लेकिन, उनके शेरों को केवल रूमान तक सीमित मान लेना एक प्रकार से उनके साथ नाइन्साफी है। क्योंकि वर्तमान समाज, समय और परिस्थितियों के परिवर्तन पर भी नसीमी साहब की गहरी नजऱ है। म.प्र. के पूर्व राज्यपाल बलराम जाखड़ तो उन्हें प्रगतिशील चेतना का शायर भी कह चुके हैं। मेरे विचार से ज़फर नसीमी परम्परा और प्रगतिशील चेतना के बीच के शायर हैं।

1992 में जब मंदिर-मस्जिद विवाद अपने चरम पर था, तब भी ज़फर मुस्लिम (या हिन्दू) की तरह नहीं, एक मनुष्य की तरह सोचते हुए यह मतला कह कर पाठकों का दिल जीत लेते हैं। शेर-

अब कहाँ मन्दिरो-मस्जिद का कबाला देखूँ,

कोई  इन्सान  ही सच बोलने वाला देखूँ!

इसी गज़ल के मकते में भी, ज़फर सत्य और मनुष्य के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं। गज़ल का मकता-

जी में आए कि ज़फर छीन के खुद पी जाऊँ,

दस्ते-सुकरात  में  जब ज़ह्र का प्याला देखूँ।

ज़फर नसीमी जि़न्दगी से जूझ कर जि़न्दगी का इत्मीनान करने वाले शायर हैं। उन्हें जि़न्दगी की महत्ता ज्ञात है। वे जि़न्दगी की चुनौतियों और कष्टों को सिक्के का दूसरा पहलू मानते हैं। तभी तो ज़फर जीवन के महत्व को प्रतिपादित करते हुए ऐसा मतला कह पाते हैं-

ये जि़न्दगी जो हकीकत है ख्वाब होते हुए,

बड़ी  हसीन  है, लाखों अज़ाब होते हुए।

ज़फर नसीमी आज की युवा पीढ़ी के फेसबुक प्रेम से वाकिफ हैं। उन्हें पता है कि युवा-पीढ़ी का धीरे-धीरे अपने परिवार से संवाद कम हो रहा है। ज़हनी तौर पर आज का युवा अपने आप को बहुत अकेला और असुरक्षित महसूस करता है। समकाल में युवा जिस तेज़ी से अपनी जान देने पर आमादा दिखाई देते हैं, उसके लिए उनका यह शेर कितना कुछ कह जाता है-

जि़न्दा  रहना इस कदर दुश्वार क्यों है आजकल,

जान  देना  इस  कदर  आसान कैसे हो गया!

समय के अनुसार, आज हर आदमी अपने निष्कर्ष बदल रहा है। तभी तो ज़फर को ऐसा शेर कहने की प्रेरणा प्राप्त हुई-

वक़्त हर चीज़ की तासीर बदल देता है,

कल जो शै ज़ह्र थी, वो आज दवा ठहरी है।

आज का समय राजनीति-सापेक्ष है। चाहे आप समाज सेवा करें, गायन करें अथवा लेखन, अपना कद बड़ा होने का खामियाज़ा आपको भुगतना ही पड़ता है। ज़फर नसीमी इस राजनीति-प्रेरित पॉलिसी को जानते हैं और तदनुसार शेर कहते हैं-

चलती  आई  है  हमेशा  से  ये हिकमत-अमली,

उसका सिर काटते हैं, जिसका बड़ा कद हो जाय!

अम्न-पसंद शायर ज़फर नसीमी भारत की बहुलतावादी संस्कृति के प्रशंसक हैं। इस प्रकृति के अनेक शेर उनकी शायरी में मिलते हैं। किन्तु, पिछले कुछ दिनों से धर्म के नाम पर समता और बहुलतावाद के ताने-बाने को जिस बेरहमी से आहत किया जा रहा है, शायर उससे चिन्तित ही नहीं, विचलित भी है। फसाद की भूमिका बनने पर, वह सत्ताधीशों के ज़ुबानी जमा-खर्च से आश्वस्त नहीं होता। फसाद होने के बाद तो बिल्कुल नहीं। असुरक्षा का ज़फर नसीमी का यह अल्पसंख्यक भय उनके इस शेर में सिर चढ़ कर बोलता है-

लिख के लेना चाहिए था, फिर नहीं होगा फसाद,

सिर्फ  कह  देने  से  इत्मीनान  कैसे  हो गया!

जि़न्दगी के विभिन्न कोणों से ज़फर नसीमी शेर निकालते हैं और सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वाह करते हैं। वक़्त आने पर, शायरी का उत्तरदायित्व निभाने से भी उन्होंने अपना मुँह नहीं मोड़ा। उनकी योग्यता को ध्यान में दखते हुए, मध्य-प्रदेश उर्दू अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष बशीर बद्र और वर्तमान सचिव नुसरत मेंहदी के अनुरोध पर, लगभग 3 वर्ष तक शायर ज़फर नसीमी ने सैकड़ों नवोदित गज़लकारों को इल्मे-अरूज़ (छंद-शास्त्र) और गज़ल विधा का प्रशिक्षण दिया है। उनकी इन बेहतरीन अदबी खिदमात का उल्लेख मुझे इसलिए आवश्यक लगा, क्योंकि उनके द्वारा प्रशिक्षित कुछेक युवा गज़लगो आज अखिल भारतीय स्तर पर मकबूल हो रहे हैं!

शायर ज़फर नसीमी की गज़लें

            (एक)

 

अब कहाँ मन्दिरो-मस्जिद का कबाला1 देखूँ

कोई इन्सान ही सच बोलने वाला देखूँ!

कुछ कमो-बेश वही कर्ब2 मिलेगा सब में,

चाहे अखबार पढूँ, चाहे रिसाला3 देखूँ।

और काँटों को लहू चूसने दो चंद कदम,

गाँव का फासला या पाँव का छाला देखूँ!

उम्र की शाम है, बेटे, मेरे नज़दीक तो आ

जि़न्दगी का तेरी आँखों में उजाला देखूँ।

जी में आये कि ज़फर छीन के खुद पी जाऊँ,

दस्ते-सुकरात में जब ज़ह्र का प्याला देखूँ!

 

              (दो)

 

कैसे बरदाश्त करूँ ज़ुल्म की जब हद हो जाय,

मेरे हाथों से कोई जुर्म न सरज़द4 हो जाय!

उससे मिलना तो फकत आईना दिखला देना,

इतनी तारीफ न करना कि खुशामद हो जाय!

मेरी ख्वाहिश के मुताबिक नहीं होता कुछ भी,

फिर भी, रहती है ये उम्मीद कि शायद हो जाय।

चलती आई है हमेशा से यह हिक्मत5 अमली,

उस का सिर काटते हैं जिस का बड़ा कद हो जाय।

आदमी के लिए वो लम्हा कयामत है ज़फर,

जब दवा काम न दे और दुआ रद्द हो जाय!

              (तीन)

 

हाय क्या पुरफरेब6 साजि़श है,

शह्र का शह्र नज्रे-आतिश7 है!

आम ज़ुल्मो-सितम का चर्चा क्यों,

खास लुत्फो-करम की बारिश है।

पूछती है ज़बान खन्जर की,

क्या अभी जि़न्दगी की ख्वाहिश है?

खौफो-दहशत के सूने जंगल में,

सब्र-हिम्मत की आज़माइश है।

क्या अभी साँस ले रहे हो ज़फर?

जी हुज़ूर, आपकी नवाजि़श है!

 

            (चार)

 

बच गई जिस्म पर कबा8 कैसे,

मेहरबाँ हो गई हवा कैसे?

मैं तो तेरे करीब आया था,

बढ़ गया और फासला कैसे!

जिसने देखा वो बन गया पत्थर,

मैं उसे मुड़ के देखता कैसे?

मेरे तेरे तअल्लुकात की बात,

बन गई सब का मसअला9 कैसे!

 

              (पाँच)

 

हमदर्द है ऐसा कि फरिश्ता सा लगे है,

वह गैर है, फिर भी, मुझे अपना-सा लगे है।

मैंने उसे पाने के लिए जान भी दे दी,

फिर भी मेरा अफसाना अधूरा-सा लगे है।

इन्सानों की इस भीड़ में अपना नहीं कोई,

बाज़ार भी इस शह्र का सूना-सा लगे है।

क्या दौर था वो भी कि हर एक लब पे हँसी थी,

सोचो कभी फुरसत में तो सपना-सा लगे है।

इन्सान ही इन्सान का दुश्मन है, खुदाया,

सुनता हूँ ये बातें तो अचम्भा-सा लगे है।

बदला है ज़माना तो ज़फर तू भी बदल जा,

जो खुद को न बदले वह अजूबा-सा लगे है।

 

                  (छह)

 

कलेजे में ज़ख्मों को मेहमान रख,

मगर अपने होठों पे मुस्कान रख।

हिफाज़त अगर चाहिये जान की,

तो अपनी हथेली पे तू जान रख।

जिधर सब चलें उस तरफ तू भी चल,

मगर, भीड़ में अपनी पहचान रख।

मुहब्बत मुझे रास आई नहीं,

कहानी का कुछ और उनवान रख।

तिजारत में शिरकत की इक शर्त है,

बराबर का हिस्से में नुकसान रख।

जफर सारी अफवाहें झूठी नहीं,

ज़माने की आवाज़ पर कान रख।

 

                 (सात)

 

रोज़ बदली हुई दुनिया की िफज़ा देखते हैं,

आज किस सिम्त में चलती है हवा देखते हैं।

जो भी होता है वो होता है उम्मीदों के िखलाफ,

दिल में क्या सोचते हैं आँख से क्या देखते हैं।

पहले सुनते थे कहीं कत्ल हुआ है कोई,

अब तो ये खेल शबो-रोज़ खुला देखते हैं।

 

                   (आठ)

 

न छेड़ नामो-नस्ब और नस्लो-रंग की बात,

कि चल निकलती है अक्सर यहीं से जंग की बात।

तुम्हारे शह्र में किस-किस को आईना दिखलाएँ,

हज़ार तरह के चेहरे हज़ार रंग की बात।

हर एक बात पे ताना, हर एक बात पे तन्ज़,

कभी तो, यार, किया कर किसी से ढंग की बात!

 

               (नौ)

 

कोई वादा न कोई शर्ते-वफा ठहरी है,

सिर्फ जज़बात पे रिश्तों की बिना10 ठहरी है।

वक्त हर चीज़ की तासीर बदल देता है,

कल जो शै ज़ह्र थी, वो आज दवा ठहरी है।

एक वो दौर भी गुजऱा है तेरे शह्र में जब,

ज़ोर से सांस भी ली है तो खता ठहरी है!

खुल के रो भी नहीं सकता के ज़फर मेरे लिये,

मुस्कुराते हुए जीने की सज़ा ठहरी है।

 

                  (दस)

 

बरपा कदम-कदम पे कयामत कभी न थी,

दुनिया बुरी तो थी, मगर, इतनी बुरी न थी!

नाहक सफेद पोशी पे अपनी किया गुरूर,

सच्चाई तो किसी की नजऱ से छुपी न थी।

जज़बात सर्द-सर्द थे, दिल था बुझा-बुझा,

घर में चिराग होते हुए रोशनी न थी।

मैं हाथ की लकीरें दिखाने में लुट गया,

मुट्ठी  थी मेरी लाखों की, जब तक खुली न थी!

मैंने दिया जला के सरे-राह रख दिया,

उस रात शम्अ-दैरो-हरम11 में जली न थी।

             

              (ग्यारह)

 ये जि़न्दगी जो हकीकत है ख्वाब होते हुए,

बड़ी हसीन है लाखों अज़ाब12 होते हुए।

खिले हैं फूल, मगर, अपनी-अपनी िकस्मत है,

भरा है काँटों से दामन गुलाब होते हुए।

कभी वो दौर भी गुजऱा है तिश्नाकामी13 का,

पिये हैं खून के आँसू शराब होते हुए।

वो मुझसे पूछ रहा था सबब उदासी का,

मगर, मैं चुप रहा इसका जवाब होते हुए।

चिराग ले के उसे ढूँढने कहाँ जायें,

जिसे न देख सके आफताब होते हुए!

 

           (बारह)

 

अजनबी था मुस्तिकल मेहमान कैसे हो गया,

फिर वो मेरा जिस्म, मेरी जान कैसे हो गया।

कच्ची कलियाँ तोड़ लेने की इजाज़त दी तो फिर,

कल न कहना गुलिस्ताँ वीरान कैसे हो गया।

लिख के लेना चाहिये था अब नहीं होगा फसाद,

सिर्फ कह देने से इत्मीनान कैसे हो गया।

जि़न्दा रहना इस कदर दुश्वार क्यों है आजकल,

जान देना इस कदर आसान कैसे हो गया!

कर लिये थे दोस्तों के मशवरे मैंने कुबूल,

अब समझ में आ गया, नुकसान कैसे हो गया।

 

                        (तेरह)

 

एक दो पल का नहीं पहली नजऱ का रिश्ता,

जि़न्दगी भर के लिए है ये सफर का रिश्ता।

हादसे होते ही रहते हैं उन्हें याद न रख,

आज की बात से क्या कल की खबर का रिश्ता?

वक्त की खासियतें आठों पहर की हैं, मगर,

शाम की धुँध से मत जोड़ सहर का रिश्ता।

 

               (चौदह)

 

अजीब लुत्फ मुहब्बत की दास्तान में है,

वफा का तज़किरा14 दुनिया की हर ज़बान में है।

न वो ज़मीं पे कहीं है न आसमान में है,

परिन्दा इसलिये महफूज़ है, उड़ान में है।

नसीब देखिये मालिक तो हो गया बेघर,

किरायेदार अभी तक उसी मकान में है!

फलां की बात, फलां ने सुनी, फलां से कही,

बस, इतनी बात पे हंगामा खानदान में है।

 

                     (पन्द्रह)

 

धरती पे जब पड़े न थे पहली किरन के पाँव,

गरदिश में हैं तभी से गरीब-उल-वतन15 के पाँव।

हम रहगुजऱ सँवारते आये कदम-कदम,

मिट्टी को गूँधते रहे मिट्टी में सन के पाँव।

धन किस के पास आये कहाँ जाये क्या खबर,

होती हैं धन की आँखें न होते हैं धन के पाँव।

कल तक उठा रहे थे सफर की मुसीबतें,

अब रह गये स$फर के निशानात बन के पाँव।

 

 शब्दार्थ

1. कबाला- ज़मीन की रजिस्ट्री 2. कर्ब- दर्द 3. रिसाला - पत्रिका 4. सरज़द -क्रियान्वयन

5. हिकमत- पॉलिसी 6. पुरफरेब - धोखे से भरी हुई 7. नज़्रे-आतिश - आग के सुपुर्द

8. कबा - पोशाक 9. मसअला - समस्या 10. बिना - आधार 11. दैरो-हरम - मंदिर-मस्जिद

12. अज़ाब - कष्ट 13. तिश्नाकामी - प्यास 14. तज़किरा - वर्णन

15. गरीब-उल-वतन - वतन से दूर मुसािफर