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Thursday 22 Feb 2018

चलो लाइन में लगना तो आ गया

अपने अजीज मीर साहब अपना वह गुजऱा हुआ जमाना बताते हुए कहते हैं, अमां एक वह भी दिन याद आता है जब शहर के सिनेमा-हालों की टिकट-खिड़कियों पर पहले टिकट लेने के लिए वह मारा-मारी होती थी कि बस पूछो मत। एक दूसरे पर चढ़े बैठते थे। हालत यह होती थी कि कभी-कभी किसी की आस्तीन किसी के हाथ में और किसी के पैजामे का एक पैंचा दूसरे के हाथ में हुआ करता था। लेकिन ले के रहेंगे पाकिस्तान की तरह एक ही इरादा हुआ करता था कि लेके रहेंगे पहले शो का पहला टिकट। कुछ लोग बैक डोर से टिकट का जुगाड़ भी कर लिया करते थे। रामबोला भी आप-बीती सुनाते हुए कहता है कि यही हाल भाई रिजर्वेशन-काउंटर का भी हुआ करता है। एक दूसरे पर चढ़े बैठते हैं और पुलिसवाले दूर खड़े खैनी मलते हुए मजा लेते रहते हैं। सीनियर सिटीजन का तमगा लटकाये जब कोई बेचारा कलकत्ता बंबई का हवाला देते हुए लाइन में रहने की सीख देता है तो दबंग जैसे हीरो ठहाका मारते हुए उसे और धकियाने लगते हैं। लगता है जैसे पूरा देश ऑन-लाइन होने के बजाए ऑफ-लाइन हो गया है। उधर ऑन-लाइन होने का ढोल पीटा जा रहा है। अपना रमफेरवा आप-बीती सुनाते हुए कहता है कि कभी पुलिस-लाइन के रंगरूटों को लाइन बनाने के चक्कर मे हफ्तों लग जाते थे। उस्तादों की डांट पीने के बाद कहीं लाइन बनाने की कला पल्ले पड़ती थी। इसी तरह किसी 'मुख्य-शिक्षक' के आदेश 'उच्चयता अनुसारम एक स: सम्पत' के बाद भी कहीं दो-चार हफ्ते के बाद ऊंचाई के अनुसार लाइन लगाने की तमीज आती थी। मीर साहब सूखी गिलौरी पोपले मुंह में झोंकते हुए बोले कि भाई मानो चाहे न मानो जो काम वो लोग हफ्तों और महीनो मे नहीं कर सके उसे बैंक, एटीएम और डाक-खाने वालों ने एक-दो दिन में कर दिखाया। मान गए भैया कि 'सब से बड़ा रुपईय्या' आला दर्जे का ट्रेनर निकला। अपने आप लोगों को लाइन में लगना आ गया। रमफेरवा तीन कोनिया मुंह बना कर बोल पड़ा, 'मगर चच्चा, शहर के सूबेदार-मेजर से लेकर बड़े-बड़े लट्टन लोगों का लाइन मे कहीं अता-पता नहीं था'। 'अरे अकिल से पैदल रमफेरवा कहीं उन सब को भी लाइन में लगने की जरूरत पड़ती है? तुम जैसे रंगरूट किस दिन काम आएंगे ?

इस्तकबाल का बॉल किस पाले में

भाई, याद आती है आज वही बात पुरानी, 'वह आए हमारे घर खुदा की कुदरत, कभी उनको कभी अपने घर को देखते हैं'। खैर घर को घरौंदा बने रहने दीजिये। बात करते हैं उस खसूसी मेहमान की जिस पर अपने रमफेरवा का दिल आ गया जो हमारी मुहब्बत में बहुत दूर से उड़ कर आया। ऐ शहरे-अदब जवाब नहीं तुम्हारा। 'मेहमां जो हमारा होता है,जान से प्यारा होता है' को हकीकत में कर दिखाया है। वाकई में किसी को मेहमान-नवाजी का सबक सीखना है तो इस शहरे-अदब से सीखे। हालांकि कभी-कभी बड़े धोखे खाये है इसने इस राह में। बहरहाल हम अपनी आदत से मजबूर हैं। रमफेरवा की सिनेमा-शौकीन माई रोटी बेलते हुए गुनगुनाने लगी, ' बाबूजी धीरे चलना जरा संभलना बड़े धोखे हैं इस राह मे'। मगर रमफेरवा निकल पड़ा 'दूल्हे' की तरह सजे-सँवरे 'मॉडल-स्टेशन' की तरफ जहां आज का बेपनाह हसीन नजारा पुरलुत्फ महसूस हो रहा था। स्टेशन-परिसर में दाखिल होते ही सबकुछ देख कर रमफेरवा के दिमागे-शरीफ का दरवाजा खुला तो खुला ही रह गया। सोचने लगा कि जिसके बारे मे रोज लोग चीखते-चिल्लाते रहे, कौन सा रेलवे वालों को अलादीन का चिराग मिल गया कि रातोंरात गरीब सुदामा की झोपड़ी द्वारिकापुरी बन गई। कितने भोले हैं इस शहर के बेजुबान लोग कि सिर्फ भाषण के राशन से डकार लेने लगते हैं। याद है कि उस दिन जब पहली बार कई साल पहले 'मॉडल' का नाम सुना था तो तभी से शहर ने रंग-बिरंगे सपने बुनने शुरू कर दिये थे। आज भी खुले मैदान में सजे शामियाने तले इस मॉडल-स्टेशन पर दिलकश कुमकुमे सजाने की बात ही बात में बात आगे बढ़ी तो लोग ऐसे खुश हुए जैसे कोई शतरंज का खिलाड़ी मात देने पर खुश होता है। रमफेरवा के मन में कई सवाल ज्वार-भाटे की तरह आते जाते रहे कि क्या कल भी ऐसी ही मुस्तैदी बरकरार रहेगी? अपने मीरसाहब ने लाख टके की बात कह दी कि भई रोम जब एक दिन में नहीं बन सका था तो अपना मॉडल-स्टेशन इतनी जल्दी कैसे बन सकेगा? दूसरी बात जब इतना होशियार रावण आसमान तक सीढ़ी लगाने में आजकल करता रहा तो अपने जुड़वा शहर के स्टेशनों पर जल्दी सीढ़ी स्थापित होने में थोड़ा शक जरूर हो रहा है। बेचारा रमफेरवा अपने सरकारी बिना छत के घर का रोना रोते हुए कहने लगा कि साहेब लोगों ने जोर का झटका धीरे से दे कर रेल ढकेलने वालों की गली में जनाब खसूसी मेहमान को जान-बूझ कर नहीं लाये। मीरसाहब सड़क किनारे पीक थूकते हुए बोले, 'अरे रमफेरवा यूं क्यों नहीं कहते कि इक शहँशाह ने दौलत का सहारा ले कर हम गरीबों का उड़ाया है मजाक'। रमफेरवा आह भरते हुए बोला, 'हाँ चच्चा ठीके कहत हो कि चिक्कन-चिक्कन सभे चाहत है। छोड़ो हमरे सब के बात। हमरे सब कहां कैसे रहित है और कैसे खून-पसीना बहाये के रेल चलाइत है, केउ देखे वाला नाही है चच्चा। उधर बेचारा रमफेरवा झण्डा-पताका देखकर मन में ओज तो भरता है लेकिन एक सवाल उसे झकझोरता है कि सलारपुर से लेके दर्शन नगर तक का पहाड़ा पठा गया लेकिन बीच में सिटी स्टेशन मोबाइलवा से डिलीट कर दिया गया। लल्लू भैया कै ई फार्मूला समझ में नाही आवत है..... ।

दस्ताने-साहित्य अपने शहर का

       कभी अपने तुलसी बाबा तुलसी-जल भक्तजनों पर छिड़कते हुए बोले थे, 'जांत-पांत पूछे नहि कोई, हरि का भजे सो हरि का होई'। उसके बाद  माक्र्स-महाशय ने अवतरित होते हुए वर्ग-संघर्ष का बिगुल बजाया। लेकिन भाई वही बात कि 'मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की'। अब जो हाल है उसे कहने की जरूरत नहीं है। मैं दुनिया के पचड़े में पडऩे वाला नहीं हूँ, क्योंकि अपने ही शहर के पचड़ों से फुर्सत नहीं है। उसमें भी जब शहर के साहित्यकारों की तरफ रुख करता हूँ तो सबसे बड़ा वर्ग-संघर्ष यहीं देख कर जी मिचलाने लगता है। धर्म,जाति संप्रदाय के बीच खींची गई पुरानी रेखाओं को किसी तरह पार करने का जतन किया तो साहित्य-सागर की उठती-गिरती लहरों में फंस गया। अदब के अहंकार ने आगोश में ऐसा दबोचा कि अल्लाह मियां द्वारा अता फरमाई गईं पसलियां चटक उठीं। खैरियत है कि इतने पर भी अपना शहर साहित्य-संगीत की साधना में तल्लीन दिखाई दे रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि कोई अपने को चौक के घंटाघर से भी ऊंचा समझ कर सड़क पर दौड़ते-भागते कलमकारों को 'लिलीपुट' समझकर न जाने कैसा मूड बना लेते हैं। अपने भाई मीरसाहब कभी-कभी बजा फरमाते हैं कि अदब में आदाब चाहिए लेकिन यहाँ तो 'अहम' के भूखे लोग दिखाई देते हैं। भाई अपने ख्याल में शहर को खुशाली की मंजिल की तरफ ले जाने के लिए 'नरेन्द्रालय' जैसी एक छत चाहिए जिसके नीचे बिना किसी भेद-भाव के साहित्यकार, रंगकर्मी, कवि और कलाकार अपनी-अपनी साधना में तल्लीन दिखें, जहां कोई बड़ा-छोटा न हो। कोई अपने को सम्मानित समझ कर किसी मीनार के कंगूरे पर बैठने का वहम न पाले।