Monthly Magzine
Thursday 18 Oct 2018

डायलर टोन

थोड़ा सा प्यार हुआ है थोड़ा है बाकी.... गीत उसके मोबाईल के डायलर टोन पर सुनने की आदत सी हो गई थी जब भी उसे फोन लगाता। ये गीत बहुत सुरीला, साथ ही प्यार की चाशनी में भी घुला हुआ था। मंै उसे कहता तुम फोन मत उठाया करो बस मुझे ये गीत सुनना है। लेकिन कभी-कभी लगातार सुनने के कारण बोरियत होने लगती। सुस्मिता, यही नाम है इस डायलर टोन वाली बंगाली लड़की का, तीखे नैन-नक्श, भरा पूरा शरीर, सलीके से कपड़े पहनने की शौकीन, लगातार साथी की खोज में व्यस्त। जो इसे पसंद करता उसे ये ना पसंद कर देती। जिसे ये पसंद करती वो इससे दूर भागता। इस संदर्भ में वो एक बंगाली कहावत कहा करती...

जाके चाई ताके पाई ना।

जाके पाई ताके चाई ना।।

वो मेरे मोबाईल के इनबाक्स में हमेशा कुछ न कुछ लिख कर भेजती। रोज सुबह उठकर इनबाक्स को चेक करना मेरी आदत में शुमार था। कभी-कभी मैं उसे कहता- तुझे और कोई काम नहीं है क्या? इतना मैसेज भेजती हो कि मेरे मोबाईल का मैसेज बाक्स पूरा भर जाता है और मुझे मैसेज मिटाने के लिए मशक्कत करनी पड़ती है। वो हंस कर कहती मिटा-लिया करो न सर, या मुझे दे दिया करो मैं मिटा दिया करूंगी।

मैं जोरों से हंसता, कहता तुम्हें मैं अपना मोबाइल क्यों दूं इसमें मेरे कुछ प्राईवेट मैसेज भी है। और वो जली-भुनी सी मुंह को टेढ़ा कर मुझे चिढ़ाती। थोड़ी देर तक गंभीर बनी रहती।

सुस्मिता सोशल एक्टीविटी में भी भाग लेती। काफी सारे लोगों से सम्पर्क है उसका। कभी-कभी घंटों उसका मोबाइल व्यस्त रहता। मैं कहता क्यों कोई मिल गया क्या? आज-कल तुम्हारा मोबाइल खूब बिजी चल रहा है। वो कहती नहीं सर देखो न एक लड़का मुझे खूब झेलाता है। मै परेशान हो गई हूं। तो मैं कहता तुम उसके साथ मीठी-मीठी बातें करोगी तो वो तुमसे बात करेगा ही।

नहीं सर ऐसी कोई बात नहीं है। मैंने  सिर्फ औपचारिक बात ही की थी, लेकिन वो तो मेरे पीछे ही पड़ गया। कभी मुझसे उसकी मुलाकात हुई थी, मुझे याद नहीं, लेकिन कहता है तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो।

कई बार वो इस तरह के काल से परेशान हो जाती तो मेरे मोबाइल नम्बर पर काल ट्रांसफर कर देती और मुझे बता देती- सर मैंने काल ट्रांसफर कर दिया है उस लड़के को अच्छा सुनाना। और मैं उनको धमकी-चमकी देता, अब ये मोबाईल मेरे पास रहेगा, तुम इसमें आईन्दा फोन मत करना। दुबारा फोन आता तो कहता-मेरे मोबाईल में तुम्हारा नम्बर आ गया है अब अगर तुम नहीं सुधरे तो मै पुलिस में तुम्हारा नम्बर दे दूंगा। कई बार ऐसा भी हुआ कि उसके किसी पुरूष रिश्तेदारों का फोन आया और मैंंंने उनको अच्छी डांट लगाई। बाद में जब सुस्मिता आती तो हंस-हंस के बताती तुमने मेरे चाचा के लड़के को इतना डांटा कि अब वो मुझसे फोन पर बात ही नहीं करता। और मामा का लड़का तो घर आकर मम्मी से पूछ रहा था सुस्मिता ने शादी कर ली मुझे बताया नहीं? बबा उसके हसबैन्ड ने मुझे खूब डांट लगाई:  तुम दुबारा मुझे फोन मत करना अब ये फोन मेरे पास रहेगा।

एक बार सुस्मिता ने कहा -सर आप कभी मेरे घर आइये आपको मां से मिलवाउंगी। सुस्मिता मेरे आफिस में निजी जीवन बीमा कम्पनी में एजेन्ट का कार्य करती थी, और लंच ब्रेक में कभी-कभी उससे मुलाकात और बातचीत भी हो जाया करती थी। उपर के माले पर अपना आफिस था तथा नीचे के माले में कैन्टीन था। पूरी बिल्डिंग में सरकारी, गैर सरकारी एवं निजी कम्पनियों के दफ्तर थे। इसलिए कैन्टीन में हमेशा गहमागहमी रहती थी।

मां से मिलवाने वाले प्रश्न के जवाब में मैने सुस्मिता से पूछा -क्यों तुम्हारी अम्मा ने मुझे चाय पे बुलाया है क्या? वो शरमा गई। नहीं सर आइये तो सही। कहते हुए अपना सिर झुका लिया। बस यहीं से मेरा उसके घर आने जाने का सिलसिला चालू हो गया। उसका घर सुस्मिता के कैरेक्टर से बिल्कुल भिन्न था। उसके दो छोटे भाई है एक की शादी हो चुकी है तथा रेलवे में अच्छे पद पर कार्यरत है। भाभी झगड़ालू एवं सास ननद से उसकी बनती न थी। कभी-कभी मां भी भाभी की तरफदारी करती और घर में घंटों तू-तू मै-मैं चलती। उससे छोटा भाई जो तीस के आस-पास का होगा पूरा निकम्मा, काम का ना काज का दुश्मन अनाज का, ऊपर से पैसे चुराकर जुआ खेलना उसकी आदत हो गई थी। घर की ज्यादातर चीजें सम्भालकर या ताले में रखी जाती क्योंकि छोटा भाई कभी भी हाथ साफ कर सकता था। मां को सुस्मिता का घर से बाहर घूमना पसंद नही था। एक बार मैंने सुस्मिता को समझाया-सुस्मिता जब तुम्हारी मम्मी को तुम्हारा घर से बाहर जाना पसंद नही है तो तुम क्यों इतना बाहर घूमती रहती हो? सुस्मिता ने गंभीर होकर जवाब दिया -क्या करूं सर घर मुझे काटने को दौड़ता, कहते किसी को निशाना किसी पे रहता है, एक दूसरे को जलील करने का मानो काम्पटीशन होता है हमारे घर में। घर से बाहर निकलती हूं। मेहनत से चार पैसे कमाती हूं और कुछ पल सुकून से निकल जाते है। वो एक गहरी सांस लेकर रूक गई। मैंने कुछ कहने की कोशिश की- तो कब तक चलेगा ऐसा?

क्या करूं......... इसलिए तो कहती हूं कोई लड़का तैयार हो जाय बस मै शादी कर लूं और कभी पलट कर इस घर में ना आऊं। उसने एक सांस में अपनी बात रख दी। मैंने पूछा -तो प्राब्लम क्या है तुमसे तो कोई भी लड़का शादी कर लेगा। अच्छी भली हो अब तक। मैंने गंभीर वातावरण को सरल बनाने के उद्देश्य से मजाक के लहजे में ये बात कही।

नहीं सर ऐसा नहीं है कोई लड़का मुझसे शादी नहीं करेगा। सब टाईमपास करना चाहते हैं या अपनी गर्लफ्रेण्ड की संख्या में इजाफा करना चाहते हैं। घर बसाना इन लड़कों की फितरत में नहीं है। अब मैं भी गंभीर हो चला था - नहीं सुस्मिता ऐसा नहीं है, कई अच्छे लड़के हैं जो तुम जैसी लड़की से विवाह करना पसंद करेंगे -मैंने कहा। सुस्मिता अपने आंखो में आये हल्के आंसू की धारा को दुपट्टे से पोंछते हुए कहने लगी-नहीं सर मुझे कई नहीं, एक लड़का चाहिए।

ठीक है मिल जायेगा।

कब मिल जायेगा?

जब तुम कहो- मैंने  तुरंत कहा।

अभी? ... क्या आप मुझसे शादी करोगे। उसने कहा।

मैं अचानक खड़े हए इस प्रश्न से भौंचक्का रह गया। लेकिन अपने आपको सहज बनाने की कोशिश में लग गया।

मैंैने तो ऐसा सोचा भी नहीं-  मैंने  कहा।

मैंने कहा था न सर कोई भी तैयार नहीं होगा। ठीक है मै अब चलती हूं कल बात करेंगे। कह कर वो चली गई। मंै सोचता रहा। आधी रात तक मुझे नींद नहीं आई। उसके ही ख्यालों में डूबा रहा। वो मुझे अच्छी लगती है इतना तो तय है लेकिन शादी या प्यार के लिए मैं अपने आपको तैयार नहीं कर पा रहा था। बहुत ध्यान से सोचने पर भी इसका कारण मुझे समझ नहीं आ रहा था। शायद मेरी कल्पना जैसी लडकी वो नहीं थी। या उसका ज्यादा घूमना फिरना, बात-बात पर झूठ बोल जाना मुझे नापसंद था। जो भी हो मैं अपने आपको इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं कर पा रहा था।

दूसरे दिन उसी कैन्टीन में हमारी मुलाकात हुई। मैं गंभीर था। वो नहीं। मैंने चाय की चुस्की ली और कहा-मैं कल वाली बात पर तुमसे कुछ डिस्कस करना चाहता हूं।

मैंने चाय की एक चुस्की और ली, बात को आगे बढ़ाया-मैं तुम्हें उस नजरिये से नहीं देखता हूं। तुम्हारे बारे में आधी रात तक सोचता रहा लेकिन फिर भी अपने आपको हां के लिए तैयार नहीं कर पाया हूं। तुम एक बहुत अच्छी लड़की हो समझदार और मेहनती हो, हां थोड़ा घूमती हो, थोड़ा झूठ भी बोलती हो लेकिन अच्छी हो। हो सके तो मुझे माफ कर देना।

सुस्मिता ने मेरा हाथ पकड़ लिया - माफी किस बात के लिए सर। माफी तो मुझे मांगना चाहिए, आपको आधी रात तक जागने के लिए मजबूर किया।

मैंने अपनी बात को खत्म करने की कोशिश में पूरी चाय एक साथ ही पी डाली और गंभीर हो कर कहने लगा-हां तो हमारी ये आखिरी मीटिंग है अब हम भविष्य में नहीं मिलेंगे।

ऐसा क्यूं.... ऐसा क्यूं....वो लगातार मुझसे प्रश्न पूछे जा रही थी।

सुस्मिता की तड़प उसके चेहरे पर साफ नजर आ रही थी।

हम एक अच्छे दोस्त बन कर तो रह ही सकते हैं। आपको अगर मेरा प्यार कबूल नहीं न सही.. उसने कहा।

दरअसल एकतरफा प्यार का परिणाम मैं पत्र-पत्रिकाओं में देख चुका था। और भविष्य में आने वाली कठिनाइयों से वाकिफ था। इसलिए दोस्ती के रूप में भी इस सम्बन्ध को कन्टिन्यू नहीं करना चाहता था। सुस्मिता लगातार फोन करती रहती। मैं कभी बात करता कभी फोन कट कर देता कभी इग्नोर करता। बाद में सुस्मिता के नम्बर को साइलेन्ट मोड में डाल दिया। रोज सुबह 20-25 मिस्ड काल मेरे मोबाइल में पड़े रहते। कभी मैं फोन करके पूछता क्यों तुम्हें नींद नहीं आती। तो कहती क्या करूं सर नींद नहीं आ रही थी इसलिए तो फोन किया था। लेकिन अब आप तो फोन उठाते ही नहीं पता नहीं क्या गलती हो गई मुझसे।

अब मैं कभी-कभी उससे फोन पर बात कर लिया करता। सुस्मिता मुझे रोज दो चार एसएमएस भी किया करती। अब मुझे आदत सी हो गई। मिस्ड काल की संख्या देखने की या एसएमएस पढऩे की। कभी जब मिस्ड काल नहीं रहता तो मुझे चिन्ता हो जाती। ये आदत भी बड़ी बुरी बला है चाहे अच्छी हो या बुरी, आदत तो आदत है। भले मेरे मन में उसके प्रति कोई प्रेम का अंकुरण नहीं फूटा किन्तु एक अनजाना सा रिश्ता जरूर बन गया था। बहरहाल मिस्ड काल नहीं होने पर मेरी बेचैनी उसे फोन करने की हद तक बढ़ जाती तो ज्ञात होता कि घर में मेहमान आये हैं, या कोई लड़का उसे देखने आया है। या उसका मोबाइल खराब है। इस बीच उसने अपने मोबाइल का डायलर टोन डलवा लिया एक खूबसूरत सा फिल्मी गीत- थोड़ा सा प्यार हुआ है थोड़ा है बाकी। हम तो दिल दे ही चुके। बस तेरी हां है बाकी...ये गीत बहुत प्यारा लगता था लेकिन अब इस गीत को सुनते-सुनते बोर हो चुका था। इस बीच सुस्मिता की शादी की बात कहीं चल रही थी। उसका फोन बिजी भी रहता था। मुझे खुशी थी कि वो अब कहीं सेटल होने जा रही है। इसके बावजूद उसका मिस्डकाल एवं एसएमएस मेरे मोबाइल में पड़े रहते।

अब कभी उससे बात होती तो मैं उसे उस लड़के के नाम पर छेडऩे लगता। क्यों सुस्मिता कब जा रही हो बनारस अब वहां रस्सोगुल्ला नहीं बनारस का पान खाना। वो चिढ़ जाती आप कैसी बात कर रहे हैं? मैं नहीं जाने की बनारस-वनारस मेरा मन नहीं लगता। जिसके लिए प्यार नहीं बन पाये उससे शादी कैसी? बस शरीर का मिलन। नहीं सर नहीं मैं उससे शादी नहीं करूंगी

नहीं सुस्मिता ऐसा नहीं कहते। शुरू में थोड़ी एडजेस्टमेंट प्राब्लम तो आती ही है, बाद में सब ठीक हो जाता है। ऐसे मना नहीं करते। मैं उसे नसीहत देने की कोशिश करता।

जब मैं उसे बातों-बातों में बनारस के नाम पर छेडऩे लगता, तो मुझसे लडऩे लगती कहती एक दिन मैं मर जाऊंगी न तब आप को पता चलेगा। मैं हंसने लगता कहता क्या पता चलेगा अरे तब भी तो तू बनारस ही जाओगी। और वो रोने लगती।

एक बार सुस्मिता ने मुझे बताया कि मां के साथ वो अपने किसी दोस्त की शादी में जा रही है, देर रात तक लौटेगी। लेकिन तीन दिन तक उसका न तो मिस्ड काल आया न ही कोई एसएमएस। मैंने कई बार उसके मोबाइल पर काल किया लेकिन स्विच आफ का संदेश मिला। मै परेशान हो गया। कई जगह उसके दूसरे कान्टेक्ट में बात की कोई कुछ कहता कोई कुछ। उसके घर गया तो देखा उसकी मां घर पर है। पूछने पर बताया सुस्मिता चाचा के यहां गई है। सब की अलग-अलग बात सुनकर मुझे सुस्मिता पर बड़ा ही क्रोध आ रहा था।

चौथे दिन शाम को उसका फोन आया। मैने फोन तुरंत रिसीव किया क्या। सुस्मिता तुम कहां थी- मैंने पूछा।

मंै तो घर में ही थी- उसने कहा। उसके सफेद झूठ पर मुझे और क्रोध आने लगा।

मैंने कहा -मैं तो तुम्हारे घर से ही आ रहा हूं। तुम तो वहां नहीं थी।

चोरी पकड़ी जाते ही उसने कहा- मैं दोस्त के यहां शादी में गई थी उन लोगों ने मुझे रोक लिया और मोबाइल भी बंद कर दिया तो मैं क्या करती।

तो तुम्हारे घर में कोई प्राब्लम नहीं थी?

मां को मैंने कहा मैं चाचा के घर सिलीगुड़ी जा रही हूं। उसने कहा।

मुझे पता नहीं क्यूं खूब गुस्सा आ रहा था। मैंने उसे न जाने क्या-क्या उल्टा सीधा कहा। लेकिन वो रोती रही। उसने कहा मुझे क्षमा कर दो मेरे से गलती हो गई। मैंने  फोन काट दिया। अब लगातार उसका काल आने लगा, एसएमएस भी। लेकिन मैंने फोन नहीं उठाया। शायद मन का चोर चाह रहा हो कि अब तुम भी परेशान हो, जैसा मैं हुआ हूं। 15-20 बार काल आने के बाद मैंने फोन उठाया और कहा देखो सुस्मिता तुम अब मुझे डिस्टर्ब नहीं करना मैं तुमसे बात नहीं करना चाहता।  उसने कहा -सर आप बात नहीं करोगे तो मैं अभी नदी में कूद कर अपनी जान दे दूंगी। मंैने कहा -तीन दिन गायब रही तब याद नहीं आई। उसने कहा -लोगों ने मुझे आपके विरूद्ध भड़का दिया था इसलिए मैंने फोन नहीं किया।

ठीक है अब तुम्हें मुझसे बात करने की जरूरत नहींहै- कहकर मैंने फोन काट कर साइलेन्ट मोड में कर दिया और सोने की कोशिश करने लगा। देर रात मेरी आंख लग गई।

सुबह आदतन मैं अपने मोबाइल पर सुस्मिता के मिस काल की संख्या देख रहा था। केवल पांच काल लेकिन एसएमएस एक भी न था।

थोड़ी देर में सुस्मिता के एक दोस्त ने मुझे फोन किया। सर आप कहां हो जल्दी आ जाओ, सुस्मिता की लाश नदी के किनारे पड़ी है। मुझे यकीन नहीं हो रहा था, लग रहा था, किसी ने मजाक किया है। मैं लगातार सुस्मिता को फोन कर रहा था। वहां से आवाज आ रही थी.....।

थोड़ा सा प्यार हुआ है थोड़ा है बाकी

हम तो दिल दे ही चुके है बस तेरी हां है बाकी

कौन सा मोड़ आया जिन्दगी के सफर में....