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Monday 15 Oct 2018

कालिदास के सात हज़ार

कवि आलोचक काशी राम जी का नाम साहित्य में हुआ तो उन्होंने सोचा अब साहित्य बाबा बनने का समय आ गया है। उन्होंने अपने को बाबा काशीराम कहलाना शुरू कर दिया। जब साहित्य के बाबा बन गए तो सोचा साहित्य का बाबा साहित्य दे, ऐसा कैसे हो सकता है। साहित्य के बाबा का साहित्य देना, मतलब साहित्य रचना, साहित्य के बाबत्व का अपमान है। साहित्य का बाबा साहित्य पर प्रवचन दे सकता है। साहित्य बाबा साहित्य में जो बोल दे वह साहित्य हो जाता है। जैसे अगर किसी कार्यक्रम में साहित्य बाबा ऐसा बोलें कि आज साहित्य में ठंडापन है तो यह साहित्य हो गया। उनके शिष्य कहेंगे आज साहित्य बाबा ने कितनी गहरी बात कही। साहित्यकार, गैर साहित्यकार, साहित्यिक कमेटियां, विश्वविद्यालय साहित्य बाबा को प्रवचन के लिये बुलाने लगे। ऐसा प्रवचनकार साहित्य जगत में दुर्लभ है। वे जो बोलते हैं वह आप्त वचन हैं। उनके बोलने से बाहर अमृत वचन है ही नहीं। साहित्य बाबा आप्त वचन के मूर्तरूप है। साहित्य बाबा की ख्याति बढऩे लगी। देश के कोने-कोने में बैठे उनके भक्त उन्हें प्रवचन के लिये बुलाने लगे।

एक दिन साहित्य बाबा किसी प्रवचन की तैयारी कर रहे थे। ध्यान मग्न थे। अचानक उनके मुॅंह से ओफ  निकला। उनके पास बैठे एक भक्त ने तुरन्त कहा- साहित्य बाबा अभी आपने 'फोफ' शब्द का उच्चारण किया साहित्य संसार में यह शब्द अमर हो गया। साहित्य बाबा ने कहा तुमने नोट किया। ठीक किया अब मुझे चिन्तन करने दो।  साहित्य बाबा आंखें बंद कर  चिन्तन में लीन हो गए। अंदर से आवाज आई मैंने आज तक अपना काफी - आर्थिक नुकसान किया है प्रवचन के लिये मुद्रा मिलती है। आने-जाने का किराया भी मिलता है लेकिन मैं जो अतिरिक्त उद्घोषणा करता हूॅं उसका कुछ नहीं मिलता। मुफ्त में उद्घोषणा करा लेते हैं लेखक। जैसे किसी कार्यक्रम में मैं साहित्य पर बोलूं और साथ में किसी कवि को निराला बता दूं तो इस निराला बताने का पैसा अलग से मिलना चाहिये। यह साहित्य है वस्तु विनिमय नहीं। न यह किसी उपभोग्य वस्तु की बिक्री है कि एक खरीदो, एक मुफ्त ले जाओ की नीति पर चला जाए। यह साहित्य है कोई कमीज की बिक्री नहीं। अंदर से आवाज आई बच्चा साहित्य में मंदीकाल नहीं आता कि माल सस्ते दर पर बेचा जाय या साहित्य का महासेल लगाया जाता। साहित्य बाबा के अंतरात्मा से जबरदस्त विचार श्रंृखला चलने लगी। हर वस्तु का भौतिक मूल्य होता है। वसूलना आना चाहिये। कला और साहित्य का भी भौतिक मूल्य है। मेरे आप्त वचनों का भी भौतिक मूल्य है। मेरी उद्घोषणा का भी भौतिक मूल्य है। मैं किसी को निराला सिद्ध करूॅं वो इसका भी भौतिक मूल्य मुझे बदलना चाहिये। आज साहित्य बाबा की अंतरात्मा मूड में थी। बोली जिस तरह नवरात्र में देव स्थानों में दीपक बारने के लिए अलग-अलग राशि तय रहती है। जैसे शुद्ध घी का दिया रखना हो तो ज्यादा राशि, तेल के दीये की कम राशि , संख्या पर दर तय है- पच्चीस दिये रखने की दर इंकावन दिये रखने से कम रखी जाती है। इसी तरह साहित्य में किसी को निराला के समकक्ष रखने की दर ज्यादा और किसी क्षेत्रीय कवि के समकक्ष बताने की दर कम। किसी को मुक्तिबोध के समकक्ष कहना हो तो ज्यादा कीमत लगेगी। किसी को रविन्द्रनाथ कहना है तो बहुत ज्यादा शुल्क लगेगा। किसी को कालीदास कहा तो ज्यादा पैसे लगेंगे। उनकी अंतरात्मा ने कहा बच्चा साहित्य सेवा का मतलब साहित्य से सेवा लो।

साहित्य में नाम कमाया है तो अब साहित्य से कमाई करो। देश में ऐसे कई कई साहित्यकार हैं जो कालीदास सुनने बेताब रहते है। किसी में निराला सुनने की तीव्र इच्छा कुलबुलाती रहती है। किसी में प्रसाद सुनने की ललक है। किसी को पंत सुनने का मोह है। निराला, प्रसाद, पंत, कालीदास सुनने वालों की मनोकामना पूर्ण करते हो और बदले में पाते क्या हो? इनकी इच्छा पूर्ति का भी भौतिक मूल्य है। इसके बाद साहित्य बाबा ने तय किया कि अब किसी की पुस्तक का विमोचन करेगे तो कृतिकार से पूछ लेंगे कि बता बच्चा आज तेरी कृति को क्या दर्जा देना है और तुझे किस साहित्यकार का पामपद प्राप्त करना है। साहित्य बाबा ने रेट भी तय कर लिया - निराला कहलाना है तो पांच हजार लगेंगे। किसी क्षेत्रीय साहित्यकार के समक्ष सिद्ध करना है तो दो हजार लगेेंगे।

एक बार साहित्य बाबा एक कवि की पुस्तक का विमोचन करने पहुंचे। विमोचन किया और कृति पर कुछ नहीं बोले। एकदम कृतिकार को कालीदास बता दिया। कार्यक्रम समाप्त हुआ। कृतिकार ने साहित्य बाबा की सेवा में पॉंच हजार रखे।

साहित्य बाबा नाराज हो गए बोले - पांच नहीं सात हजार दीजिये सात हजार।

कृतिकार ने कहा - पांच हजार में सौदा तय हुआ था।

साहित्य बाबा बोले - ठीक कहा तुमने। तुम्हें निराला के समकक्ष रखने का भौतिक मूल्य पांच हजार होता है। मैंने तुम्हें कालीदास के समकक्ष रखा। इसका भौतिक मूल्य ज्यादा है।

कृतिकार ने कहा - क्यों

साहित्य बाबा ने कहा - बच्चा समझो। कालीदास के समकक्ष तुम्हें रखने मुझे कितनी तकलीफों का सामना करना पड़ा। कालीदास को लाने आदिकाल तक जाना पड़ा। उतने युग-दूर के आने जाने का किराया लगा कि नहीं। भागदौड़ करनी पड़ी कालीदास को पकडऩा पड़ा। निराला आधुनिक युग के हैं यूं गए यूं ले आए। कम किराये में। कालीदास के लिये कितने युग पार करना पड़ा। इसे समझो और सीधे से सात हजार का लिफाफा हाथ पर रख दो। अगर ऐसा नहीं किया तो अगली सभा में तुम्हें स्थानीय कवि का दर्जा दे दूंगा।

कृतिकार डर गया। उसने यह भी सोचा कि वह निराला के समकक्ष पद चाहता था,  बिना मांगे कालीदास का पद मिल गया। वह भी सात हजार मात्र में, निराला से दो हजार ज्यादा। इसलिये कृतिकार ने साहित्य बाबा के हाथ पर सात हजार का लिफाफा रख दिया। आजकल साहित्य बाबा की साधना खूब चल निकली है। किसी को कालीदास, किसी को निराला की पदवी अपनी संगोष्ठी से निकाल कर अमूर्त की तरह कृतिकार के माथे पर रगड़ रहे हैं। साहित्य बाबा ने साहित्य के भौतिक मूल्य को पहचान कर खूब सुख पाना सीख लिया है।