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Sunday 19 Aug 2018

जल-बिजली से भरा व्यक्तित्व

भीष्म साहनी की याद आते ही एक सौम्य और खिला हुआ चेहरा आंखों के सामने आ जाता है। उनके लिखने, चलने और बातचीत के अंदाज़ को यदि किसी हिन्दुस्तानी शास्त्रीय राग में बांधा जाए तो, यक़ीनन, वह राग 'भैरव' होगा - अल्लसुबह के शांत, पवित्र, मुलायम और नींद की टूटती ख़ुमारी में डूबे जादुई माहौल की तरह। राग भैरव के कोमल 'ऋषभ' और कोमल 'धैवत' का भाव भरा विन्यास ही भीष्म साहनी की शखि़्सयत और उनका अंदाज़े बयां है। यही उनके जीने का रंग और ढंग भी है। शास्त्रकारों और उस्तादों ने राग 'भैरव' को अत्यन्त कोमल किन्तु गहन-गंभीर राग माना है। जल और बिजली से भरे मेघ की तरह। भीष्म साहनी ऐसे ही बादल थे जल-बिजली से भरे हुए। कोमलता, विनम्रता और सजलता भीष्म साहनी की पहचान है। 'नाÓ कहना, किसी का भी दिल दुखाना, किसी को भी चोट पहुंचाना उन्हें कभी आया ही नहीं। अपनी इस आदत और ख़ासियत का भरपूर ख़ामियाज़ा उन्होंने भुगता है। उनकी सहधर्मिणी और उनकी हर रचना की पहली पाठक एवं आलोचक शीला साहनी ने लिखा है कि, ''भीष्म की एक बात है जो अब तक मुझे अच्छी नहीं लगती, उनकी अत्याधिक विनम्रता। विनम्रता अच्छी बात है, परन्तु अति विनम्र होना तो अच्छा नहीं। लोग नाजायज़ फ़ायदा उठाते हैं।''1 लोग जायज़-नाजायज़ फ़ायदा उठाते रहे और भीष्म साहनी अपनी ही रौ में चलते रहे, पूरे दम-ख़म और पक्के इरादों के साथ। वह आजीवन नफ़े-नुकसान से दूर चुपचाप एक नया रास्ता गढ़ते रहे। हमेशा मेहनतकश जनता के सुख और भले की सोचते रहे क्योंकि, ''भीष्म जो है, वह सामने है। जितनी आंख और सब्र आपके पास है, उतना ही सहजपन आप भीष्म के इर्द-गिर्द देख सकते हैं, पा सकते हैं। भीष्म के पास कोई हाशिया नहीं है। कोई परदा नहीं। वह सादगीपसंद, सादामिजाज़ इन्सान है।''2

            उनकी सादगी, खुशमिजाज़ी और जि़न्दादिली का तजुर्बा मुझे बिलासपुर में, दिनांक 24, 25, मई 1982, को आयोजित दो दिवसीय 'महत्व भीष्म साहनी' कार्यक्रम में हुआ। उन दिनों मध्यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ लेखकों पर केन्द्रित 'महत्व श्रृंखला' का सफल आयोजन लगातार कर रहा था। 'महत्व केदार' भोपाल और 'महत्व नागार्जुन' रायपुर में सफलतापूर्वक संपन्न हो चुका था। 'महत्व भीष्म साहनी' इसी श्रृंखला का अगला कदम था। प्रगतिशील लेखक संघ, बिलासपुर का यह एक बड़ा और महत्वाकांक्षी आयोजन था। उन दिनों बिलासपुर मध्यप्रदेश में हुआ करता था और मध्यप्रदेश की 'संस्कारधानी' कहलाता था। छत्तीसगढ़ का अस्तित्व अभी काफी दूर था। दूर दराज़ के इलाक़ों से बड़े, मंझोले, छोटे सभी रचनाकार भीष्म जी का इस्तकबाल करने पहुंचे थे। हम जैसे नये-नकोर, अपने डैनों को तौल रहे पंछियों के लिए तो जैसे साहित्य का पूरा आसमान ही धरती पर उतर आया था। हमारी खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था। प्रलेस बिलासपुर के तत्कालीन अध्यक्ष और प्रखर माक्र्सवादी चिंतक-लेखक डॉ. राजेश्वर सक्सेना की अगुवाई में हम सभी अलखनन्दन, राजकमल नायक, मिजऱ्ा मसूद, जयंत देशमुख, प्रवीण अटलूरी, रफ़ीक़ ख़ान, प्रताप ठाकुर, नथमल शर्मा, सचिन शर्मा, मधुकर गोरख, तेजिन्दर, राजीव शुक्ल, डॉ. पुन्नी सिंह, शाकिर अली, भगवान दास सफडिय़ा, रमेश अनुपम, शीतेन्द्रनाथ चौधुरी, लोकबाबू, देवीशरण ग्रामीण, तौहीद आलम, शिवनाथ पाठक, प्रितपाल सिंह, उषा वैरागकर, डॉ. मंगला देवरस, डॉ. भारती भट्टाचार्य, डॉ. स्नेह मोहनीश, दुर्गा हाकरे, बुलबुल भट्टाचार्य, बी. अम्बा, अनघा शिंदे, अपूर्व शिंदे, प्रमोद जायसवाल, ओमप्रकाश सहाय और मैं अत्यन्त उत्तेजित और रोमांचित थे। हमारे चारों ओर हिन्दी के स्टार लेखक, कवि और आलोचक जगमगा रहे थे - विनोद कुमार शुक्ल, डॉ. मलय, ललित सुरजन, प्रभाकर चौबे, डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव, डा. कमलाप्रसाद, डॉ. राजकुमार सैनी और डॉ. श्यामसुन्दर मिश्र।

       आयोजन स्थल पर जब भीष्म साहनी आये तो करतल ध्वनियों के बीच ऐन्द्रजालिक सम्मोहन में बंधे हम लोग बस उन्हें देखते रह गये। वह हमारे इतने पास थे कि हम उन्हें छू सकते थे, उनकी देह-गंध को महसूस कर सकते थे। वह गौर वर्ण और दरमियानी क़द के थे। उनके माथे पर बालों की एक घुंघराली लट पड़ी हुई थी। उन्होंने सिर झुका कर सभी का अभिवादन किया। उनकी सौम्य और सुन्दर छवि हमारे दिलों में हमेशा के लिए नक़्श हो गई।           

       आज तैंतीस सालों के बाद भी वह छवि जऱा भी मलिन अथवा धूमिल नहीं हुई है। मुझे एक-एक बात अच्छी तरह याद है, जैसे कल की बात हो। आयोजन के पहले दिन, यानी 24 मई 1982, को एक सत्र का संचालन मैंने किया था। वह सत्र उनकी कहानी-कला पर केन्द्रित था। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. श्याम सुंदर मिश्र कर रहे थे। आयोजन देवकीनंदन दीक्षित कन्या शाला बिलासपुर में हो रहा था। स्कूल के प्रांगण में ही लेखकों के ठहरने, खाने-पीने और सोने की व्यवस्था थी। ज़मीन पर दरी और गद्दे बिछा दिये गये थे। अभी बड़े लेखकों को सितारा होटलों में रुकवाने का चलन नहीं शुरू हुआ था। स्कूल में एक किनारे ही रसोई की व्यवस्था थी। खाना बनाने वाले साथी सुबह से ही अपने काम में जुट जाते थे। स्कूल की कक्षा को ही सभाकक्ष की तरह इस्तेमाल किया गया था। यानी सब कुछ बिल्कुल देशी, सहज और समाजवादी। कोई बड़ा और छोटा नहीं। कोई ऊंचा और नीचा नहीं। सभी एक साथ बहस-मुबाहिसा और गपशप करते। हंसी-ठ_े के बीच बेहद गरमागरम बहसें। गहरी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर सार्थक और तार्किक चर्चाएं।

       एक बड़ी कक्षा को विचारमंच बनाया गया। दीवार पर लगे ब्लैकबोर्ड पर चॉक से लिखा गया था - 'महत्व भीष्म साहनी'। किनारे हिन्दी अंकों में तिरछी लिखी तारीख थी - 24.5.82। नीचे दो पंक्तियां थीं। अध्यक्षता: डॉ. श्यामसुन्दर मिश्र और संचालन: विजय गुप्त। ब्लैकबोर्ड की बायीं दीवार पर एक कलात्मक कविता-पोस्टर चस्पा था। इसमें पंजाबी के मशहूर कवि लालसिंह दिल की दिल में उतर जाने वाली पंक्तियां थीं -

              जब

              बहुत से

              सूरज

              मर जाएंगे?

              तब तुम्हारा

              युग आएगा

              है ना ?

       यह कविता पोस्टर चित्रकार जयंत देशमुख ने बनाया था। पोस्टर में लाल और पीले रंग का बहुत प्रभावी इस्तेमाल किया गया था। चित्र के एक भाग में सूर्ख़ लाल सूरज था और दूसरे भाग में सूरज की रौशनी में चमकती लालसिंह दिल की पंक्तियां थीं। विचार-विमर्श के दौरान वक्तागण अलग-अलग कोणों से भीष्म जी की कहानी कला के जादू को पकडऩे की कोशिश कर रहे थे। अपनी प्रशंसा और आलोचना से बिल्कुल बेपरवाह होकर भीष्म जी दरी पर चुपचाप बैठे हुए थे। पीठ को दीवार से सटाए हुए कभी अद्र्ध पालथी की मुद्रा में और कभी पूर्ण पालथी की मुद्रा में। कभी कभार एकदम तानपुरा वादक की मुद्रा में तो कभी दोनों पैरों को मोड़कर एडिय़ों पर संतुलन साधे वज्रासन में तो कभी मुड़े हुए पैरों को एक ओर रख गायक की तनी हुई मुद्रा में। पहलू बदलते हुए उनकी नजऱें अनायास श्रोताओं से मिल जातीं और फिर अपने में गुम हो जातीं। होठों पर जब-तब हल्की हंसी कौंध जाती और बेतरह प्रशंसा से चेहरा सुर्ख़ होकर शरमा भी जाता। सत्र के अंत में जब उनसे कुछ बोलने का आग्रह मैंने किया तो उन्होंने कहा कि, ''मेरी स्थिति उस नवब्याहता दुल्हन की तरह है जो ससुराल में लोगों से घिरी, सिर झुकाये, बैठी है। वह क्या बोले, क्या करे उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा है। सिवाय शुक्रिया, शुक्रिया कहने के।'' पूरा सभाकक्ष निर्मल हंसी और आनन्द से भर गया। कभी भीष्म साहनी ने साहित्यकार केवल गोस्वामी से बातचीत करते हुए कहा था कि, ''...धरती के साथ-साथ चलना ही बेहतर है।''3 मुक्तिबोध की 'विपात्र' कहानी का एक पात्र भी कहता है कि, ''जिस आदमी के पैर के नीचे लगभग हमेशा सड़क होती है, उस आदमी से जऱा पूछ-ताछ कीजिए और आपको सही हालात मालूम हो जाएंगे।''4 भीष्म जी की नजऱों से सड़क कभी ओझल नहीं हुई। उनकी सारी रचनाएं धरती और मनुष्य के सुख-दु:ख-स्वप्न के साथ ध्वंस और निर्माण से जुड़ी हुई हैं। भीष्म जी का व्यक्तित्व धरती की ही सहनशीलता और उसका विस्तार है। उनकी आवाज़ पूरे कक्ष में गूंज रही थी। राग भैरव का जादू धीरे-धीरे फैलने लगा था। मुझे ग़ालिब याद आ गये -

इस सादगी पर कौन न मर जाये ऐ खुदा

लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं

       तलवार की जगह भीष्म साहनी के हाथों में कलम थी। चमकदार और धारदार। वह आजीवन लड़ते रहे सांप्रदायिकता, साम्राज्यवाद, फिऱकापरस्ती और हर तरह के शोषण और ज़ुल्मो-सितम के खि़लाफ़।  उन्होंने अन्याय के सामने कभी भी हथियार नहीं डाले। उनके कलम की स्याही कभी नहीं सूखी। हमेशा सुर्ख़रू रही। अपनी जातीय जि़न्दगी में उन्होंने विभाजन का दु:ख झेला था। दंगों की आग में झुलसे थे। अपने घर और वतन से दर-बदर हुए थे। उजड़ेपन की पीड़ा का ज़हर पिया था और शरणार्थी होने का दंश झेला था। कबीर की तरह उन्होंने 'आंखिन देखी' कही थी। इसीलिए 'तमस' हमें रौशनी का वह टुकड़ा दिखाता है जो अंधेरे की कई तहों के नीचे दबा पड़ा है। 'तमस' अंधेरे का बयान करती प्रकाश की अद्भुत कथा है। काल्पनिक नहीं, बल्कि जीती-जागती, सीधी-सच्ची और ठोस। इसका अनुभव मुझे 'महत्व भीष्म साहनी' आयोजन के दिन ही रेल यात्रा के दौरान हुआ था। 'तमस' के मुतल्लिक अपना अनुभव मैं आपसे साझा करूं उसके पूर्व 'इप्टा' और भीष्म साहनी के घनिष्ठ एवं अटूट संबंधों को जान लेना ज़रूरी है।

       'इप्टा' से भीष्म साहनी का गहरा ताल्लुक रहा है। यह कहना दूर की कौड़ी नहीं होगी कि भीष्म जी के लेखक को जगाने, धारदार बनाने और जनता से जोडऩे में 'इप्टा' की बड़ी और सकारात्मक भूमिका रही है। 'इप्टा' से रागात्मक और बौद्धिक जुड़ाव का ही सुखद परिणाम है कि हिन्दी साहित्य को 'हानूश' और 'कबिरा खड़ा बाज़ार में' जैसे कालजयी नाटक मिले। अपनी सारी साहित्यिक व्यस्तताओं और सांगठनिक भागदौड़ के बीच भी वह रंगमंच, नाट्य लेखन और अभिनय के लिए समय निकाल लेते थे। वह इप्टा और रंगमंच के प्रति अपने गहरे प्रेम के ही कारण रायगढ़ आये थे। मध्यप्रदेश इप्टा का प्रथम राज्य सम्मेलन, 22 और 23 मई, 1982 को रायगढ़ में संपन्न हुआ था। इस सम्मेलन के मुख्य आकर्षण भीष्म साहनी थे। पहले दिन वह नहीं आ सके। दूसरे दिन आये और अपनी अमिट छाप हम सभी पर छोड़ गए। रायगढ़ में उन्होंने 'इप्टा' से संबंधित कुछ संस्मरण सुनाए थे। रायगढ़ से बिलासपुर जाते हुए रेल में उनसे इस संबंध में विस्तृत बातचीत हुई। मैंने उनसे इन संस्मरणों को 'साम्यÓ के लिए लिपिबद्ध करने का आग्रह किया। 'कुछ संस्मरण' शीर्षक से यह सन् 1983 में 'साम्य' के आठवें अंक में प्रकाशित हुआ। भीष्म जी के ये संस्मरण बहुत महत्वपूर्ण हैं। उनमें इस बात की झलक मिलती है कि कितने संघर्ष, त्याग और कष्टों के बाद भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) की स्थापना हुई थी। कैसे इस संस्था से संबद्ध लोगों ने जनता के बीच, जनता के लिए दिन-रात समर्पण भावना से काम किया था। आज़ादी, सांप्रदायिक एकता और जनता को राजनीतिक रूप से दीक्षित करने के लिए इप्टा सदस्यों ने अपने आप को लगभग झोंक दिया था। पूंजीवादी, सांप्रदायिक और साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध लेखकों, कलाकारों और सामान्य जनता ने लगातार और अथक संघर्ष किया था। यह लड़ाई का ज़माना था और 'इप्टा' योद्धाओं की तरह सांस्कृतिक मोर्चे पर लड़ रही थी। आज उसी 'इप्टा' के नये अवतार की ज़रूरत है जो अंग्रेज़ों और सांप्रदायिक ताक़तों को मुंहतोड़ जवाब दे रही थी। आज देश फिर से फूट फैलाने वाली, नफऱत और भेद पैदा करने वाली फ़ासिस्ट ताक़तों के कब्ज़े में है, इसलिए 'इप्टा' की ज़रूरत कहीं ज़्यादा बढ़ गई है।

       भीष्म जी ने अपने संस्मरण में लिखा है कि, ''उस ज़माने में राष्ट्रव्यापी स्तर पर अंग्रेज़ों के खि़लाफ़  जहां जद्दोजहद चल रही थी। सारा देश उठ खड़ा हुआ था। ब्रिटिश साम्राज्यवाद इस संघर्ष को खून में डुबो देना चाहता था। और इसके लिए उसने उसी हथियार का इस्तेमाल किया जिसे वह पहले भी करता आया था - भारतीयों की एकता को सांप्रदायिकता द्वारा तोडऩे का, इसी के परिणामवश देश में जगह-जगह हिन्दू-मुस्लिम दंगे होने लगे थे।''5 दंगों और बुनियादपरस्ती के दूरगामी और भयंकर असर को भीष्म साहनी अच्छी तरह से समझ चुके थे। उन्होंने यह जान लिया था कि जात-पात और धर्म के बंधन से निकले बिना आज़ादी का कोई अर्थ नहीं है। सांप्रदायिक राजनीति और दंगों को यदि रोका और समूल नष्ट नहीं किया गया तो दक्षिणपंथी फ़ासिस्ट ताक़तें भारत के भविष्य को तबाह कर देंगी। उपन्यास 'तमस' में डिप्टी कमिश्नर रिचर्ड और उसकी पत्नी लीज़ा के बीच हुई छोटी सी बातचीत सांप्रदायिक राजनीति के खेल से परदा उठा देती है। धर्म और राजनीति की मिलीभगत की पोल खोल देती है। क्या अतीत? क्या वर्तमान? क्या अंग्रेज़ हाकिम? क्या वर्तमान सरकार? क्या कल? और क्या आज? कल और आज का इतिहास भीष्म साहनी बहुत सहजता और कलात्मक संयम के साथ पाठकों के सामने रख देते हैं। बिना बड़बोलापन दिखाए भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी विडम्बना पर उंगली रख कर आपको बेचैन कर देते हैं। बातचीत का यह अंश देखिए:

       ''धर्म के नाम पर आपस में लड़ते हैं, देश के नाम पर हमारे साथ लड़ते हैं।'' रिचर्ड ने मुस्कराकर कहा।

       ''बहुत चालाक नहीं बनो, रिचर्ड। मैं सब जानती हूं। देश के नाम पर लोग तुम्हारे साथ लड़ते हैं और धर्म के नाम पर तुम इन्हें आपस में लड़ाते हो। क्यों, ठीक है ना?ÓÓ

            ''हम नहीं लड़ाते, लीज़ा, ये लोग खुद लड़ते हैं।''

            ''तुम इन्हें लडऩे से रोक भी तो सकते हो। आखिऱ हैं तो ये एक ही जाति के लोग।''

            ...

            ''डार्लिंग, हुकुमत करने वाले यह नहीं देखते कि प्रजा में कौन सी समानता पायी जाती है, उनकी दिलचस्पी तो यह देखने में होती है कि वे किन-किन बातों में एक-दूसरे से अलग हैं।''6

            यह बातचीत गुलाम भारत में हुई थी। इस बातचीत की रौशनी में आज़ाद भारत के हालात का जायज़ा लीजिये; सब कुछ समझ में आ जायेगा। आज भी भारतीयों को एक जाति (नेशन) की तरह, ऐतिहासिक दृष्टि से एक-दूसरे से जुड़ी, विभिन्न जातीयताओं के सहमेल से बनी इकाई के रूप में नहीं देखा जा रहा है, बल्कि जात-पात (कास्ट/रेस) के आधार पर उनकी जनगणना की जा रही है। स्पष्ट है कि जो रिचर्ड चाहता है, वही आज के भारतीय शासक चाहते हैं। फूट डालना और राज करना। उनकी दिलचस्पी समानता में नहीं, असमानता में है। वह एकता में नहीं, भेदपरकता में विश्वास करते हैं। समायोजन नहीं, विभाजन उनका लक्ष्य है। विभाजन केवल धरती का नहीं होता, दिलों का भी होता है। लाइन ऑफ़ कंट्रोल, सीमा रेखा केवल सीमाओं पर नहीं खींची जाती, वह दिलों पर भी खींची जाती है। कंट्रोल मुल्कों पर नहीं, इन्सानों पर भी किया जाता है। ज़मीन के ही टुकड़े नहीं होते, दिलों के भी टुकड़े होते हैं। 'तमस' धरती और मनुष्यों के टुकड़े-टुकड़े होने की कहानी है। 'तमस' पर बातचीत करते हुए भीष्म साहनी बहुत उदास हो जाते हैं। उनके चेहरे पर दु:ख की गहरी छायाएं उतर आती हैं। वह मानो अनुपस्थित से हो जाते हैं। देह सामने रहती है पर मन न जाने किन अंधी गुफाओं में खो जाता है। उस सफर में भी कुछ वक्फ़ों के लिए ऐसा ही हुआ था। मैं उनके मनोभावों, दिमाग़ में चल रही भयानक उथल-पुथल को तत्काल नहीं भांप सका। आज भी याद आने पर बहुत दु:ख होता है। दरअस्ल मैं 'तमस' के एक हादसे को अपने मन से कभी मिटा नहीं पाया। कॉलेज के दिनों में 'तमस' पढ़ते हुए भी मैं उस दु:खद हादसे से बहुत बेचैन हो गया था। वह हादसा एक दु:स्वप्न की तरह हमेशा के लिए मेरे दिल-दिमाग़ पर जैसे कुंडली मार कर बैठ गया है। आज भी मुझे दिखाई देता है कि ''सबसे पहले जसवीर कुएं में कूद गई। उसने कोई नारा नहीं लगाया, किसी को पुकारा नहीं, केवल 'वाहेगुरू' कहा और कूद गई। उसके कूदते ही कुएं की जगत पर कितनी ही स्त्रियां चढ़ गयीं। हरिसिंह की पत्नी पहले जगत के ऊपर जाकर खड़ी हुई, फिर उसने अपने चार साल के बेटे को खींचकर ऊपर चढ़ा लिया, फिर एक साथ ही, उसे हाथ से खींचती हुई नीचे कूद गई। देवसिंह की घरवाली अपने दूध पीते बच्चे को छाती से लगाये ही कूद गई। प्रेमसिंह की पत्नी खुद तो कूद गई, पर उसका बच्चा पीछे खड़ा रह गया। उसे ज्ञानसिंह की पत्नी ने मां के पास धकेल कर पहुंचा दिया। देखते-ही-देखते गांव की दसियों औरतें अपने बच्चों को लेकर कुएं में कूद गयीं।''7

            बरसों बरस बाद मेरा वह दु:स्वप्न, भीष्म जी से बातचीत के दरमियान, फिर मेरे सामने आ खड़ा हुआ। मैं उनसे पूछ बैठा। ''भीष्म जी, तमस में आपने एक हृदयविदारक घटना की जि़क्र किया है। एक गुरुद्वारे पर दंगाइयों का हमला होता है। अपनी सम्मान रक्षा के लिए औरतें कुएं में कूद कर जान दे देती हैं। कुछ तो अपने जिगर के टुकड़ों के साथ जल समाधि ले लेती हैं। क्या सचमुच ऐसा हुआ था?'' भीष्म साहनी के चेहरे पर तेजी से रंग आने-जाने लगे। पीड़ा की एक तेज़ लहर उनकी आंखों में थोड़ी देर के लिए ठहर-सी गई। उन्होंने आंखें बंद कर लीं। बहुत धीरे से बोले। ''हां, वह दिल को चूर-चूर कर देने वाली घटना थी। बेहद दर्दनाक और...।'' अचानक वह ख़ामोश हो गए। मुझे सनाका-सा मार गया। मैंने बात संभालने की कोशिश की तो उन्होंने कहा कि, ''और कुछ मत पूछिए विजय जी ! बहुत तकलीफ़ होती है। वो बड़े दु:ख और दर्द से भरे हुए दिन थे।'' वातावरण बोझिल हो चुका था। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाये? कुछ नहीं सूझा तो मैं गुलाम अली साहब की एक बेहद मकबूल गज़़ल गाने लगा। नासिर काज़मी साहब ने बहुत दिल से इस गज़़ल को लिखा है:

              दिल में इक लहर सी उठी है अभी

              कोई ताज़ा हवा चली है अभी

              शोर बरपा है ख़ाना-ए-दिल में

              कोई दीवार सी गिरी है अभी

              याद के बे-निशां जज़ीरों से

              कोई आवाज़ आ रही है अभी।

       माहौल हल्का और सुरीला हो उठा था। भीष्म जी मुस्कराने लगे थे। उन्होंने कहा कि, ''आप अच्छा गाते हैं।ÓÓ मैंने चैन की सांस ली। वह मृत्यु की धुंध भरी घाटियों से निकल आये थे। रेलगाड़ी और जीवन दोनों साथ-साथ चल रहे थे। बातचीत का नया सिलसिला शुरू हो चला था।

       'आपको हावर्ड फास्ट कैसे लगते हैं?'

            'उनका 'आदिविद्रोही' उपन्यास मुझे बहुत पसंद है।'

            'मुझे भी।' मैंने कहा।

       'अमृत राय जी ने बहुत अच्छा अनुवाद किया है।'

            'सचमुच वह कमाल के अनुवादक हैं।' सहमति में उन्होंने हल्के से सिर हिलाया।

       'आदिविद्रोही' का कोई दृश्य, जिसे आप भूल नहीं पाते हों; जो रह-रहकर आपको याद आता हो।'

       'हां, एक दृश्यबंध मेरे दिमाग़ से निकलता ही नहीं है। वह मुझे बेहद पंसद है।'

       'कौन सा?' मैंने पूछा।

       'नूबिया के जानलेवा रेगिस्तान का नरक। उससे गुजऱते, जंज़ीरों में जकड़े, कोड़े खाते, भूख, धूप और प्यास में जलते-मरते गुलामों का काफि़ला। इसमें मासूम बच्चे भी शामिल हैं। वे कैसे नूबिया की सोने की खानों तक पहुंचते हैं। सोना निकालते हैं। जानवरों की तरह बिना नहाए-धोए कैसे दड़बेनुमा बैरकों में रहते हैं और मर जाते हैं। खाना उतना ही कि सांस चल सके; और पानी, उतना    ही कि प्यास न बुझे। ऐसी भयानक परिस्थितियों में 'स्पार्टकसÓ कैसे मौत के जबड़ों में फंसे जीवन को बचाता है और अपनी ताक़त बरकऱार रखता है। यह देखने और सीखने लायक है। 'स्पार्टकस' भोजन के एक-एक दाने का रस धीरे-धीरे सोखता है और पानी की एक-एक बूंद को बड़े स्वाद और चाव के साथ अपने शरीर में जज़्ब करता है। हावर्ड फ़ास्ट ने मृत्यु के काले पन्नों पर जैसे चमकते   हुए अक्षरों में जीवन का फ़लसफ़ा लिख दिया है। अद्भुत।'

मैं भीष्म साहनी की बारीक़ निगाहों का कायल हो गया। यह चीज़ों के आर-पर उतर जाने वाली निगाह थी; बिल्कुल एक्स-किरणों की तरह जो दुनिया के हर बड़े लेखक के पास होती है। आप भी हावर्ड फास्ट और भीष्म साहनी की सूक्ष्म दृष्टि का अवलोकन कीजिए। नूबिया के तपते-जलते रेगिस्तान में हावर्ड फ़ास्ट ने 'स्पार्टकस' के बारे में लिखा है कि, ''वह अपने हिस्से को पानी को ले लेता है - इतना पानी उसने हफ़्तों से नहीं देखा है। मगर वह उसको गट-गट पी जाने की ग़लती नहीं करेगा कि वह सब पानी पेशाब बन कर निकल जाये। वह इस पानी पर पहरा देगा और घण्टों तक उसके छोटी-छोटी चुसकियां लेगा ताकि उस पानी की एक-एक बूंद उसके शरीर के तन्तुओं में भिदे। वह अपना खाना ले लेता है यानी गेहूं और सूखी टिड्डियों समेत पकाया हुआ जौ का शोरबा। ठीक तो है, सूखी हुई टिड्डियों में ताक़त होती है, जि़न्दगी होती है और गेहूं और जौ तो मेरे शरीर के अंग हैं। मैंने इससे भी बुरा खाना खाया है और हर खाने का आदर करना चाहिए। जो लोग अपने मन में भी खाने का निरादर करते हैं वे खाने के शत्रु हो जाते हैं और जल्दी ही मर जाते हैं। ... वह अपने कटोरे में से खाने का आखिऱी दाना उठाता है, बचा-खुचा पानी पी जाता है और कटोरे की भीतरी लकड़ी को चाट लेता है।''8

            भीष्म साहनी 'स्पार्टकस' को कभी नहीं भूल सके। माक्र्स तो 'स्पार्टकस' को अपना सबसे प्रिय नायक मानते थे। खाने के आखिऱी दाने का रस और पानी की अंतिम बूंद की प्राणशक्ति और कटोरे में बची-खुची तरलता को 'स्पार्टकस' जिस तरह अपनी देह और आत्मा का हिस्सा बना लेता है, वह भीष्म जी के मन-प्राण में हमेशा के लिए बस गया था। भीष्म साहनी जीवन का निरादर नहीं, आदर करते हैं। वह मृत्यु का चक्रव्यूह रचने वालों पर कस कर प्रहार करते हैं। उनके कई पात्र सामान्य जीवन से उठकर विशिष्ट चरित्र में बदल जाते हैं। जैसे 'झुटपुटा' कहानी का सिक्ख ड्राइवर जो दंगों के समय अपनी जान की परवाह नहीं करता है और दूध से भरी लॉरी लेकर बस्ती में पहुंच जाता है। मुस्कराकर बस्ती में रहने वालों से कहता है कि, ''बाबा, बच्चों ने दूध तो पीना है ना! मैंने कहा, चल मना, देखा जायेगा जो होगा। दूध तो पहुंचा आएं।'' संदेह और खून-खच्चर से भरी बस्ती में दूध पहुंचाना जीवन की ही तो निशानी है। इसी तरह 'मैं भी दिया जलाऊंगा, मां!' कहानी के नन्हे शाहिद का नरसी भगत और शाह आलम के मज़ार पर दिये जलाने की ख़्वाहिश रखना, और उसके लिए निकल पडऩा जि़न्दगी का ख़ैरमकदम करना ही तो है। जीवन से बड़ी कोई सिम्त नहीं थी भीष्म साहनी के लिए। राजेश्वर सक्सेना ने बिल्कुल ठीक कहा है कि, ''भीष्म साहनी ने अपने कथा-साहित्य में भारतीय समाज की जिजीविषा को स्पष्ट किया है। उन्होंने सांस्कृतिक प्रदूषण को साफ  किया है।''9 जिजीविषा और सांस्कृतिक प्रदूषण दोनों को भीष्म जी ने अपनी आंखों से देखा था। आज़ादी के पहले भी और आज़ादी के बाद भी। आज़ादी के बाद सभी वर्गों का पतन बहुत तेज़ी से हुआ। मध्यवर्ग तो जैसे गर्त में ही जा गिरा। शराफ़त, नैतिकता, सच्चाई और ऊंचे जीवन आदर्शों का कोई मोल ही न रहा। उनकी जगह टुच्चेपन, दोगलेपन और दोमुंहेपन ने ले लिया है। भीष्म साहनी मध्यवर्ग से ताल्लुक रखते हैं और उन्होंने उस वर्ग की भयानक गिरावट और नीचता का विश्वसनीय और कलात्मक चित्रण 'चीफ़ की दावत' कहानी में किया है। उन्होंने मध्यवर्ग के मुखौटे को एक झटके से खींचकर तार-तार कर दिया है, जिसे हमारी तथाकथित 'सिविलाइज़्ड सोसायटीÓ ने पहन रखा है। इसी सोसाइटी को मंटो 'नंगी सोसाइटी' कहते हैं। माक्र्सवादी आलोचक श्याम कश्यप ने नोट किया है कि भीष्म साहनी ''मध्यवर्गीय पाखण्ड, कायरता और निष्क्रिय स्वप्नशीलता की बड़ी बेरहमी के साथ अत्यंत पैनी आलोचना करते हैं।''10

            'चीफ़ की दावत' एक सीधी-सादी, गंवई विधवा बूढ़ी मां की कहानी है, जो अपने बेटे को बहुत प्यार करती है। उस पर तन-मन-धन, सब कुछ न्यौछावर कर चुकी है। मिस्टर शामनाथ अपनी तरक्की के लिए उसी मां को नौकरी की बिसात पर चीफ़  के सामने दांव पर खेल देते हैं। एक घिनौना, अमानवीय और अमर्यादित खेल। इस टुच्चे खेल का कच्चा चि_ा भीष्म साहनी खोल कर रख देते हैं। साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय 'भीष्म साहनी जन्म शतवार्षिकी समारोह' (8,-9-10, 2015) में, 9 अगस्त को 'नई कहानी आंदोलन और भीष्म साहनी' सत्र में प्रखर माक्र्सवादी आलोचक रविभूषण ने 'चीफ़ की दावत' कहानी की विस्तृत चर्चा की। उन्होंने 'मां' को, जिसे बेटे मिस्टर शामनाथ ने चीफ़  की नजऱों से छिपाया, भारतमाता का प्रतीक माना। इसी 'मां' यानी भारतमाता से स्वतंत्र भारत के शिक्षित मध्यवर्ग के एक हिस्से ने अपना नाता ही तोड़ लिया है। उन्होंने इस संदर्भ में 'गोदान' में होरी की मृत्यु पर पछाड़ खाकर गिरी 'धनिया' को भी भारतमाता के रूप में देखने को कहा। जिस स्वाधीनता आंदोलन में भारतमाता के लाड़ले सपूतों ने अपनी कुर्बानियां दीं, उसकी गत देखने-समझने के लिये उन्होंने आज के भारत में शिक्षितों की देशचिन्ता (?) की भी बात कही। भीष्म साहनी की कहानियों में निहित गहरे आशयों की पहचान पर बल देते हुए किसी भी साहित्यिक आंदोलन से उनका संबंध न मानकर उन्होंने उनके राजनीतिक और सांस्कृतिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी की ओर भी ध्यान दिलाया।''11 

            राजनीतिक और सांस्कृतिक भागीदारी ने ही भीष्म साहनी को देश और जनता से जोड़ा। जनता के बीच से ही उन्होंने अपने पात्रों को उठाया और उनके भले-बुरे को पाठकों के सामने सीधी-सच्ची और नुकीली भाषा में रखा। यह भाषा का आडम्बर नहीं था। यह भाषा का तेज था जो तीर की तरह दिल-दिमाग़ में धंस जाती है। यह भीष्म साहनी की भाषा का सामथ्र्य है कि आखिऱी के दो-तीन साधारण वाक्यों में वह मिस्टर शामनाथ का घटिया चरित्र उधेड़ कर रख देते हैं। मिस्टर शामनाथ मां से कहते हैं - ''...जो साहब खुश हो गया, तो मुझे इससे बड़ी नौकरी भी मिल सकती है, मैं बड़ा अफ़सर बन सकता हूं।'''साहब''' या 'अफ़सर', यानी बड़ा बनने की ग्रंथी ने मध्यवर्ग को धोबी का कुत्ता बना दिया है। अस्तित्वहीन, स्मृतिहीन, जड़ों से उखड़ा हुआ और संवेदनहीन। वह न इस घाट का है और न उस घाट का है। तंज़ करते हुए मजरूह सुल्तानपुरी ने भी लिखा है कि,

       ''साला मैं तो साहब बन गया

       साहब बन के कैसा तन गया'

            'साहब' बनते भीष्म साहनी को मैंने कभी नहीं देखा। 'तन' कर रहने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। हां, उन्हें धर्मांध, संकुचित सांप्रदायिक दलों और उनकी गंदी राजनीति से गहरी नफरत थी। ऐसे मामलों के सामने आने पर वह विरोध में तन कर खड़े हो जाते थे। ऐसे लोगों को बर्दाश्त ही नहीं कर पाते थे और अपनी सख़्त नाराजग़ी प्रकट कर देते थे। वर्ष 1986 में लखनऊ में आयोजित प्रगतिशील लेखक संघ के स्वर्ण जयंती समारोह के दौरान जब कुछ विघ्नसंतोषियों ने हिन्दी-उर्दू की राजनीति शुरू की तो मंच से ही वह बिगड़ पड़े। ऐसा ही दिल्ली के एक समारोह में भी हुआ जब भाषा का कार्ड खेलने की कोशिश की गई। ऐसी ही कोशिश जयपुर में भी हुई थी। उन्होंने ऐसी हर कोशिश और चालों का मुंहतोड़ जवाब दिया और उन्हें निरस्त कर दिया। उनसे मेरी कई मुलाक़ातें हैं। रायगढ़, बिलासपुर, जबलपुर, लखनऊ, जयपुर और दिल्ली में। मैं आज भी उन मुलाक़ातों की याद करता हूं तो मुझे उनकी कोमल मुद्राएं और आंखें याद आ जाती हैं। शीशे की तरह चमकती और अथाह करुणा से भरी हुई। उनकी गहरी करुणा का रहस्य 24, 25 और 26 अक्टूबर सन् 1980 को, प्रगतिशील लेखक महासंघ के द्वितीय जबलपुर अधिवेशन के अवसर पर खुला।

       हरिशंकर परसाई और ज्ञानरंजन की साहित्यिक नगरी जबलपुर के तीन दिवसीय आयोजन में हिन्दी के महान् साहित्यकारों का मेला लगा हुआ था। त्रिलोचन, नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह, केदारनाथ अग्रवाल, शिवमंगल सिंह सुमन, भीष्म साहनी, अमृत राय, काशीनाथ सिंह, कुमार विकल, विजेन्द्र, विनोद कुमार शुक्ल, सोमदत्त, अरुण कमल, नरेन्द्र जैन, रवीन्द्र कालिया, रमेश कुंतल मेघ, नंदकिशोर नवल, खगेन्द्र ठाकुर, ए. के. हंगल, गुलाम रब्बानी ताबा, अलखनंदन, कमलाप्रसाद, ललित सुरजन, प्रभाकर चौबे और रमाकांत श्रीवास्तव। इनके अलावा जबलपुर सम्मेलन में भारत के विभिन्न प्रदेशों से कई महत्वपूर्ण साथी लेखक शामिल हुए थे। एक शाम जबलपुर के प्लाज़ा सिनेमा में एम. एस. सथ्यू के निर्देशन में बनी बलराज साहनी अभिनीत फि़ल्म 'गर्म हवा' दिखाई गई थी। विभाजन की पृष्ठभूमि पर बनी यह अब तक की बहुत अच्छी, मार्मिक और कलात्मक फि़ल्म है। यह समान विचारधारा के लोगों और इप्टा आगरा के सहयोग से बनाई गई फि़ल्म है। इस्मत चुगताई की कहानी पर बनी 'गर्म हवाÓ की पटकथा कैफ़ी आज़मी और शबा ज़ैदी ने लिखी थी। यह बलराज साहनी की आखिऱी फिल्म थी और इसमें उन्होंने कमाल का अभिनय किया था।

       1974 में बनी फि़ल्म 'गर्म हवा' को मैं 1980 में भीष्म साहनी के साथ देख रहा था। हम अगल-बगल बैठे थे और सामने परदे पर बलराज साहनी अपनी सर्वोत्तम भूमिका में थे। बलराज साहनी हिन्दी सिने जगत के न सिर्फ़  महान् अभिनेता थे, बल्कि एक सच्चे कम्युनिस्ट, एक्टिविस्ट, लेखक, शिक्षक, ब्रॉडकास्टर और अपने छोटे भाई भीष्म साहनी के आदर्श भी थे। फि़ल्म के एक दृश्य में बलराज साहनी की बेटी अमीना आत्महत्या कर लेती है। कुछ सीढिय़ां चढ़कर वह बेटी के कमरे में पहुंचते हैं। चारों तरफ़  शादी के बिखरे हुए कपड़े। सौभाग्य की चुनरी सर पर ओढ़े पलंग पर बेटी की लाश। स्तब्ध और अवाक पिता। सिर्फ़ सन्नाटा। कोई शब्द नहीं। कोई चीख़ नहीं। आंसू भी नहीं। सांसें रुकी हुई। देह ज्यों पत्थर। आंखें खलाओं से भरी। फैलती हैं और बंद हो जाती हैं। तनाव और पीड़ा का भीषण आघात। यह बहुत मुश्किल दृश्यबंध था। इसे सिर्फ़ बलराज साहनी ही कर सकते थे। दर्द को दृश्य बना देने की काव्यात्मक क्षमता केवल बलराज जी के ही पास थी। इस संबंध में एम. एस. सथ्यू ने कहा था कि, ''असल में बलराज जी की जि़न्दगी में भी ऐसा ही कुछ हुआ था। उनकी एक बेटी ने आत्महत्या कर ली थी। बलराज उस शूटिंग से लौट कर आये थे और उन्होंने कुछ इसी तरह सीढिय़ां चढ़ी थीं, जैसा फि़ल्म में था। बलराज उस समय इतने अवसन्न थे कि रो नहीं पाये। उस वक्त उनसे पारिवारिक रिश्तों के चलते मैं वहीं था। फि़ल्म बनाते समय मेरे ज़ेहन में वही घटना थी, पर मैं बलराज जी से सीधे-सीधे नहीं कह सकता था, इसलिए कहा कि आपको इस सीन में रोना नहीं है। बलराज समझ गये और उन्होंने जो किया आपके सामने है।ÓÓ12

            इस मृत्यु दृश्य को देखते हुए भीष्म साहनी बहुत असहज और बेचैन हो गये थे। वेदना उनकी आंखों में उतर आई थी। वह अचानक चुप और उदास हो गये थे। फिल्म के बाद शांत होने पर उन्होंने बताया कि ''वास्तविक जीवन में भी बलराज जी की एक बेटी शबनम ने खुदकुशी कर ली थी। परदे पर जो आपने देखा वह बलराज साहनी के जीवन की सच्चाई थी। उन्होंने परदे पर, उस सीन में, अपना दुखता हुआ अतीत फिर से जिया था। एक असहनीय दर्द दोबारा झेला था।'' वह फिर ख़ामोश हो गए। मैंने देखा उनकी आंखों में करुणा हमेशा के लिए थिर हो गयी थी; वह उनकी आंखों का स्थायी भाव बन चुकी थी। करुणा के स्थायी होने के पीछे रावलपिण्डी और भिवंडी के दंगों का भी हाथ है। एक आज़ादी के पहले और एक आज़ादी के बाद। भीष्म जी उन दर्द भरे हादसों से कभी बाहर नहीं निकल सके। वे दिल में कटार की तरह पैबस्त रहीं। उनका बयान है कि, ''शरणार्थी शिविर आंखों के सामने आ गया। वहां मुझे आंकड़े इक_े करने का काम दिया था। गांवों से भाग-भटक कर आये शरणार्थी यहां पड़े थे। यहां पर मुझे सफेदरीश सरदार ने अपनी कहानी सुनाई थी जो अपनी अधेड़ उम्र पत्नी के साथ अपना गांव छोड़कर भागा था।''13 उजड़े और उखड़े हुए लोगों की जाने कितनी कहानियां उनके मन की पर्तों में दबी पड़ी थीं। इन कहानियों ने उनकी आंखों को कभी निर्जल नहीं होने दिया। मैंने उनसे पूछा कि इतने प्राणघातक सदमों के बाद भी बलराज साहनी बहादुरों की तरह जिए और अपनी अंतिम सांस तक काम किया। क्या यह कोई संकेत है कि फि़ल्म के आखिऱी दृश्य में वह लाल झंडे वाले जुलूस में चुपचाप शामिल हो जाते हैं, जिसमें उनका बेटा नारे लगा रहा है, इन्कलाब जि़न्दाबाद! जि़न्दाबाद! उनका जवाब था, ''वह सच्चे कम्युनिस्ट थे।''

दूर कहीं राग भैरव की तानें द्रुत लय में तार सप्तक को छू रही थीं।

 

संदर्भ-

1. भीष्म: मेरे पति और लेखक, भीष्म साहनी: व्यक्ति और रचना, संपादन - राजेश्वर सक्सेना: प्रताप ठाकुर, प्रथम संस्करण 1982, वाणी प्रकाशन दिल्ली, पृष्ठ 66।

2. कृष्णा सोबती, हशमत, वही पृष्ठ 60-61।

3. बातचीत -3, केवल गोस्वामी, वही, पृष्ठ 39।

4. विपात्र, मुक्तिबोध, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, चतुर्थ संस्करण 1979, पृष्ठ 74।

5. कुछ संस्मरण, भीष्म साहनी, साम्य - 8, वर्ष 1983, प्रकाशक: प्रगतिशील लेखक संघ अम्बिकापुर, पृष्ठ 84।

6. तमस, भीष्म साहनी, प्रथम छात्र संस्करण, 1977, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. नयी दिल्ली, पृष्ठ 49।

7. तमस, भीष्म साहनी, उपर्युक्त, पृष्ठ 239।

8. आदिविद्रोही, हावर्ड फ़ास्ट, अनुवादक: अमृत राय, हंस प्रकाशन इलाहाबाद, नवीन संस्करण 1977, पृष्ठ 78-79।

9. भीष्म: सृजनशील यथार्थ, राजेश्वर सक्सेना, भीष्म साहनी: व्यक्ति और रचना, संपादन - राजेश्वर सक्सेना: प्रताप ठाकुर, प्रथम संस्करण 1982, वाणी प्रकाशन दिल्ली, पृष्ठ 90।

10 सामाजिक संबंधों और संरचनागत परिवर्तनों का सूक्ष्म चित्रांकन: श्याम कश्यप:  भीष्म साहनी: व्यक्ति और रचना, संपादन - राजेश्वर सक्सेना: प्रताप ठाकुर, प्रथम संस्करण 1982, वाणी प्रकाशन दिल्ली, पृष्ठ 140।

11. साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय 'भीष्म साहनी जन्म शतवार्षिकी समारोह' में दिए गये रविभूषण के व्याख्यान से।

12. एम. एस. सथ्यू से पवन मेराज़ की बातचीत, चूंनचण्इसवहेचवजण्पद।

13. तमस की कहानी भीष्म जी की जुबानी, भीष्म साहनी, 'अक्षर पर्व' रचना वार्षिकी, जून 2015, देशबंधु कार्यालय पत्रकार प्रकाशन प्रा. लि. रायपुर, पृष्ठ 119।

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