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Wednesday 23 May 2018

\'छोटू उस्ताद के बड़े मायने

हिन्दी कहानी संसार में अपने कहानी के लोककथात्मक स्वरूप और किस्सागो की परम्परा को जीवित रखने वाले स्वयं प्रकाश का हालिया कहानी संग्रह 'छोटू उस्तादÓ हमारे सामने है। छोटू उस्ताद में संकलित कहानियाँ आयतन में तो छोटी हैं परन्तु उनका आयाम बहुत विस्तृत है। एक विशिष्ट शैली का प्रयोग कर स्वयं प्रकाश ने हर कहानी के अन्त में एक प्रश्न पाठक के लिए छोड़ दिया है जो पाठक को कथा में व्यक्त वस्तु स्थिति पर विचार करने को विवश कर देता है।

साठ वर्ष पार कर चुके स्वयं प्रकाश की कहानियों में व्यक्तचुटीलापन जहाँ पाठकों को कहानी से जोड़ता है वहीं ये चुटीलापन कहीं भी पाठ की गरिमा को कम नहीं करता। उदाहरण के लिए 'आदरबाजी' कहानी मेें व्यक्त बुजुर्गो के प्रति आदरणीयता का पर्याय 'जी' शब्द पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं- ''मामा जी- तो लगता है कि आप किसी पारले-जी के भाई बन्द बन गये हैं।''

इस संग्रह में 'लाइलाज' एक ऐसे बुर्जुग की कहानी है जिसका पूरा परिवार अव्यवस्थित जीवन जीने को अभ्यस्त है जो कि बुजुर्ग को बुरा लगता है। परन्तु जब कभी भी बूढ़ा पूरा घर व्यवस्थित कर देता है तो कुछ ही पल बाद उसे ये कृत्रिमता काटने दौडऩे लगती है। अर्थात् कृत्रिमता आपको आकर्षित तो कर सकती है परन्तु उसमें वह सहजता नहीं जो जीवन जीने के लिए आवश्यक है।

'आदरबाजी' में कथाकार ने भारतीय समाज में बुजुुर्गों के लिये बनाये गये विभिन्न नैतिक मानदण्डों को रेखांकित किया है कि कैसे एक बुजुर्ग का जीवन दिखावेपन की सहजता लिये रहता है जैसे वो पूरा जीवन परम वैष्णव रहा है। अन्यथा उसे समाज में तिरस्कार की दृष्टि से देखा जाता है।

'बिछुडऩे से पहले' कहानी में जहाँ खेत व मेड़ की आत्मीय बातचीत में वर्तमान विकास मॉडल की सच्चाई है तो 'ऑल द बेस्ट' में लेखक ने राजनीति के अपराधीकरण व धर्म के व्यवसायीकरण पर करारा प्रहार किया है। 'सुलझा हुआ आदमी' में लेखक जैसे अपने जीवन की सच्चाई लिख रहा हो और माक्र्सवाद को व्यावहारिक धरातल पर सफल बनाने के लिए उसे समय के अनुसार बदलने की सलाह दी है- ''खुद को जमाने के हिसाब से बदलो, वरना कोई नामलेवा नहीं बचेगा।''

औरतों के ऊपर हो रहे अत्याचार को उन्होंने 'पाँच दिन और औरत' में रेखांकित किया है। जिसमें देश में औरतों की जहाँ बुरी दशा है वहीं स्त्री विमर्श व स्त्री सशक्तिकरण के नाम पर चलने वाली राजनीति का वास्तविक स्वरूप भी कुछ महिला नेत्रियों के चरित्रों को उद्घाटित कर दिखाया गया है। हालांकि लेखक ने 'जादुई यथार्थवाद' का प्रयोग कर अन्तत: पीडि़त स्त्रियों की विजय दिखला दी है। 'जातिवाद' की हास्यास्पद स्थिति का वर्णन 'बाबूलाल तेली की नाक' कहानी में वर्णित है कि कैसे एक व्यक्ति की नाक पूरे समाज की नाक बन जाती है। 'लड़कियाँ क्या बातें कर रही थी?' में सीमित स्वतंत्रता प्राप्त चार लड़कियों की मनोदशा का अनुमान लगाकर कहानी में उनके जीवन के विभिन्न अंगों जैसे- रोजगार, परिवार, विवाह आदि के बीच पनपने वाले असमंजस को दिखाया है।

'चौथा हादसाÓ एक ऐसे हिन्दू की कहानी है जो वेश-भूषा से मुस्लिम लगता है जिस कारण उसे कई जगह साम्प्रदायिक लोगों द्वारा अपमान झेलना पड़ता है। 'लड़ोकन' में एक ऐसे बूढ़े-बूढ़ी की कहानी है जो निरन्तर लड़ते रहते हैं परन्तु बूढ़े के मरने के बाद उसके बेटे नहीं आते और अब बुढिय़ा किसी से नहीं लड़ती- उसके स्वभाव में ये बदलाव अकेलेपन, ऊब, त्रास का परिणाम है। उसका जीवन बूढ़े के जाने के साथ ही एकाकी हो जाता है।

प्रेम की विजय और पूंजीवाद की पराजय को कथानक का अंश बनाकर बखूबी 'बाबूजी का अंतिम भाषणÓ में लेखक ने प्रस्तुत किया है। कैसे हास्य का प्रतीक बाबू जी नाम सम्मान का नाम बन जाता है- अपने काबिलियत से। कहानी में लेखक ने स्पष्ट कहा है कि आने वाली शताब्दी एशिया और अफ्रीका के नौजवानों का है। कहानी परत दर परत कई पहलुओं को अपने में समेटे है जो हर पाठ के बाद और खुलती जाती है। इसी प्रकार पंूजीवाद और बाजार के प्रभाव को हत्या कहानी में लेखक ने दिखाया कि कैसे शौर्य और साहस का प्रतीक शेर सर्कस में कठपुतली बना दिया गया। वस्तुत: शेर को नहीं इस व्यवस्था ने बहुतों के साहस का मर्दन कर पिजड़ें में बंद कर अपने इशारों का गुलाम बना दिया है। 'नसीहत' बहुत छोटी कहानी है जिसमें अकादमिक शिक्षा को अनुभव और काबिलियत के सामने बौना करार दिया गया है। मौलिकता और कला को धन और बनावटीपन से श्रेष्ठ 'अमीर नेहरू-गरीब नेहरू' के माध्यम से प्रकट किया गया है। धनाभाव के कारण प्रतिभाओं के पलायन की कहानी है- 'अकाल मृत्यु'। जिसमें इम्मी फुटबाल छोड़ ठेला लगाने को बेबस है। ये कहानी बहुत से ऐसों की अनकही दास्तां है, जो गरीबी और लाचारी के कारण 'इम्मी' बन गये है।

'विचित्र बीमारी' भ्रष्टाचार से पैदा हुई बीमारी है। जो व्यक्ति दूसरों के अंश के धन का भ्रष्टाचार से संचय करता है उसे 'सब कुछ' में एक घिनौनी गंध मिलती है। भ्रष्टाचार का एक बहुत बड़ा कारण है कि हम चाहते हंै कि हम अपने आने वाली पीढिय़ों के लिए इतना संचय कर ले कि उन्हें फिर किसी समस्या का सामना न करना पड़े और इस प्रयास में हम अनैतिक और भ्रष्ट हो जाते हंै। लगभग हर पिता यही चाहता है- ''कम से कम मेरी औलादों को मेरी तरह दर-दर ठोकरे तो नहीं खानी पड़ेगी। बाकी, पैसा है तो सब कुछ है।'' इस प्रकार भ्रष्टाचार से कमाया धन आपको 'सुविधा

तो दे सकता है परन्तु 'सुख' नहीं। भोजन तो मिलेगा परन्तु स्वाद उसमें उस घिनौने कर्म का रहेगा, जिस कर्म से आपने धन कमाया है।

'सांत्वना पुरस्कार' एक ऐसी प्रेम कहानी है जिसमें प्रतियोगिता में प्रतिद्वन्दी के रूप में रहने वालों के बीच प्रेम पैदा होता है। प्रेम के स्वीकार होने की अनुकूल परिस्थिति तो नहीं रहती परन्तु ज्योति फिर किसी प्रतियोगिता में भाग न लेकर अपने प्रतियोगी को एक खुला मैदान दे देती है। एक प्रकार से यह प्रेम का 'सांत्वना पुरस्कारÓ ही था। 'गणित का भूत' में मूल प्रश्न यह है कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था में 'कोर्स' तो है परन्तु उसे पढ़ाने के लिए शिक्षकों की व्यवस्था सही समय पर न करना छात्रों में एक 'डरÓ पैदा करता है। जिससे उनका शिक्षा से मोहभंग भी हो जाता है। इस कहानी में 'भूत' कोई और नहीं है बल्कि डर ही भूत के रूप में है जो शिक्षकों की कमी के कारण गणित ने पैदा किया है।

'क्या तुलसीदास झूठ बोल रहे थे?' कहानी एक ऐसे वृद्ध की कहानी है जो आँख से न दिखाई देने के बावजूद आग लगने पर बहुत दूर भाग जाता है। वस्तुत: यह कहानी तुलसीदास जी की पंक्ति ''मूक होइ वाचाल, पंगु लंघति गिरिवर गहन?'' के औचित्य को सिद्ध करने के लिए लिखा गया है। बात तो सत्य है और व्यावहारिक भी। क्योंकि विपरीत परिस्थितियों में व्यक्ति अपने क्षमता से अधिक कर्म कर लेता है। आखिर 'मरता क्या नहीं करता'।

''आखिर चुक्कू कहाँ गया? एक ऐसे कुत्ते की कहानी है जो राधेश्याम के साथ बड़े आत्मीयता के साथ रहता है। परन्तु अचानक चुक्कू गायब हो जाता है। चुक्कू अब टामी नाम से एक बूढ़े दम्पत्ति के फलों की दुकान की रक्षा करता है। चुक्कू को खोना राधेश्याम के लिए असह्य हो गया। मानवता के लगातार क्षय होने के समय में भी पशुओं से मनुष्यों के प्रेम और लगाव की कहानियाँ हमें मानवीय संस्कृति को जिन्दा रखने के लिए जरूरी घटक सी लगती है।

'धनुर्विद्याÓ एक राजकुमार की कहानी है जो अपनी शर्तो पर धनुर्विद्या सीखना चाहता है परन्तु अन्तत: वह सीख नहीं पाता। वह चाहता है कि पेड़ के पत्ते हिले न, चिडिय़ा उड़े न। इस प्रकार वह पूरी स्थिति को रोककर मनमुताबिक शिकार करना चाहता है। वस्तुत: ये राजकुमार उस व्यवस्था का प्रतीक है जो शोषण के प्रति प्रतिरोध नहीं चाहता। जो चाहता है कि शिकार परम आज्ञाकारिता पूर्वक उसके सामने आत्म समर्पण की स्थिति में हो और वह उसका अपने जरूरत के हिसाब से उपयोग करे।

इस प्रकार आज के भागदौड़ भरे वातावरण में जब पाठकों के पास समय और धैर्य दोनों की कमी है तो उनके लिए लम्बी कहानी और कथाएँ भले ऊब पैदा करेंं परन्तु 'छोटू उस्ताद' उन्हें एक नया दिशा दे रहा है। ऐसा लगता है कि स्वयं के जीवन के विविध् प्रसंगों को स्वयं प्रकाश ने कथा रूप देकर छोटी-छोटी कहानियों में गढ़ दिया हो और इन छोटी-छोटी घटना प्रधान कहानियों के माध्यम से स्वयं प्रकाश समाज को एक नयी दिशा देने को प्रतिबद्ध हो। उन्होंने 'सुलझा हुआ आदमी' में स्पष्ट लिखा भी है- ''मैंने तय कर लिया है कि लेखन के माध्यम से लोगों के विचारों को बदलने की कोशिश करूँगा। हजारों बरसों से दिमाग में जमा कूड़ा-कचरा तो निकलना ही चाहिए। बीमार व्यक्तियों से स्वस्थ समाज कैसे बन सकता है। राजनीतिक क्रांति से पहले सामाजिक क्रांति तो होनी ही चाहिए। मंजिल साफ होगी और चलना शुरू करूँगा तो हमसफर भी मिल ही जायेंगे और कारवाँ भी बन ही जायेगा। इंसान चाहे तो क्या नहीं कर सकता? दिल में हो हौसला और बाजुओं में ताकत तो राह की कौन-सी ऐसी मुश्किल है जिससे निपटा नहीं जा सकता?

तो क्या हम सब इस कारवाँ का हिस्सा बनने को तैयार हैं?

छोटू उस्ताद - स्वयं प्रकाश

किताबघर प्रकाशन, दरियागंज, दिल्ली