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Monday 19 Nov 2018

आशा का भविष्य

पिछली शताब्दी की समाप्ति से कुछ ही पहले, सैमुएल पी. हटिंगटन की एक गंभीर पुस्तक सभ्यताओं का संघर्ष प्रकशित हुई थी। इस पुस्तक ने इस बात पर एक लम्बी बहस छेड़ दी कि पिछली शताब्दी जो छोड़े जा रही है, उस पर आने वाली शताब्दी में दुनिया का भविष्य कैसा होगा। एक नया साल, या एक नई सदी, हमेशा अच्छे इरादों के साथ शुरू होती है और उम्मीद करती है कि आगे वाले दिन बेहतर होंगे। हालांकि आशावादी संकल्प और इरादों से, मनुष्य की प्रकृति या राष्ट्र राज्य या उनके नियंत्रण वाले संस्थान या उनके भौगोलिक-राजनीतिक स्वभाव नहीं बदलते हैं।

प्रतिस्पद्र्धी हितों में लगातार संघर्ष होता रहता है, व्यावहारिक राजनीति ही चलती रहती है। कैलेंडर के पन्ने बदलने से विश्व को अतीत से छुटकारा नहीं मिल जाता है। और न ही राष्ट्रों या वैश्विक संस्थानों, या दुनिया की भू-राजनीति पर नियंत्रण करने वाले मनुष्यों के तरीके बदलते हैं। हंटिंग्टन की सोच को प्रभावित करने वाले बिंदु थे, दो विश्वयुद्ध, प्रतिस्पद्र्धात्मक विचारधाराओं का उदय, साम्यवाद बनाम पूंजीवाद, परमाणु हथियारों का जखीरा, विशाल असमानताएं, भूख, गरीबी, और विश्व को बाँटने वाली ताकतों से निपटने में राष्ट्रों की असमर्थता, जो उनके द्वारा ही खड़ी की गयीं थी। 20 वीं शताब्दी के समाप्त होने से पहले धार्मिक कट्टरवाद और आतंकवाद का उदय  हो चुका था। 21 वीं शताब्दी को तनाव और संघर्ष का एक विस्फोटक पैकेज विरासत में मिला है, और इससे निपटने के तरीके किसी को नहीं मालूम हैं ।

बी पी सिंह उन लोकसेवकों में से एक है, जो अपने महत्वपूर्ण आधिकारिक कार्यों से आगे भी सोचते हैं। उन्होंने दुनिया के भविष्य की चिंता करते हुए एक विचारोत्तेजक पुस्तक लिखी है। हटिंगटन भविष्य के लिए आशावादी नहीं थे। बी पी सिंह इन चुनौतियों को कम करके नहीं आंकते हैं; परन्तु इन सबके बावजूद, अतीत से सीख लेने के लिए तथा पिछली सदी द्वारा छोड़े गए तनाव, संघर्ष और युद्धों से निपटने के लिए, मनुष्य की क्षमता और नई शुरुआत के बारे में निराशाजनक दृष्टिकोण नहीं रखते हैं। सिंह बहुत पक्के आशावादी हैं और वर्तमान परिदृश्य के बावजूद, ये मानते हैं कि अंतत: बुराई पर अच्छाई की जीत होगी।

क्या ऐसा होगा? जबकि मानवीय प्रगति के लिए सद्भव और शांति आवश्यक हैं, फिर भी नफरत, संघर्ष और युद्ध उत्पन्न करने वाली ताकतों ने अपनी योजनाओं या विघटनकारी तरीकों को नहीं छोड़ा है। उदाहरण के लिए, दुनिया अभी तक धार्मिक कट्टरवाद और आतंकवाद से प्रभावी रूप से लडऩे के तरीकों को खोज रही है। इन का मुकाबला करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग आवश्यक है जो कि जल्द हो जाने की संभावना नहीं है क्योंकि भू-राजनीतिक कारणों के चलते राष्ट्रों के बीच आम सहमति नहीं बन पा रही है। साथ ही अंतरराष्ट्रीय समाज के कुछ तत्व ऐसे भी हैं जो एक समावेशी लोकतांत्रिक संस्कृति के साथ शांति, सद्भाव और सहिष्णुता को बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। सद्भाव और शांति के लिए ये प्रयास महाद्वीपों में फैल जरूर रहे हैं लेकिन विघटनकारी ताकतों के मुकाबले इनकी पहुँच कमजोर है। जब तक कि किसी देश के भीतर या राष्ट्रों के बीच असमानता जैसे बुनियादी कारण समाप्त नहीं हो जाते, तब तक विश्व में शांति नहीं हो सकती है। घातक हथियारों को बनाने के लिए पैसा आसानी से उपलब्ध है, जिनकी कमान सेनाओं-उद्योगों गठबंधन द्वारा पोषित शक्तिशाली लॉबी के हाथ में है। लेकिन ज्यादातर देशों में कुपोषण और भूख से लडऩे पर, या शिक्षा और रोजगार या रहवास पर पर्याप्त खर्च नहीं किया जा रहा है। संसार में अमीरों और गरीबों के बीच विभाजन तेज होता जा रहा है जो सद्भाव और शांति के माहौल को सुनिश्चित नहीं कर सकता है, जैसा बी पी सिंह चाहते हैं।

वैश्विक मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय विमर्श में तेजी से गिरावट आई है, साथ ही लोकतांत्रिक देशों की घरेलू राजनीति में भी, जिनमें भारत भी है। अमेरिका और उत्तरी कोरिया के बीच हालिया बयानबाजी का स्तर उनके परमाणु गतिरोध के समाधान का तरीका नहीं है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिए अलग भाषा और तौर-तरीकों की आवश्यकता होती है। विश्व भर में शांतिपसंद संयत आवाजों को मृतप्राय या कायर उदारवादी के रूप में कोसा जा रहा है। देश और विश्व में शांति की चिंता को बेवकूफ गैर सरकारी संगठनों की चिंता माना जा रहा है। यह समय अमनपसंद लोगों का नहीं है बल्कि नफरती भोंपू बजाने वालों का है। लोकतंत्र और कानून के भविष्य को, शक्तिशाली राष्ट्र-राज्यों और उनके नेताओं के नाम पर बलिदान किया जा रहा है। बी पी सिंह मानते हैं कि अभी गांधी की तरह दुनिया में ऐसा कोई नहीं है जो मानवता की सेवा के लिए अपना जीवन बलिदान करेगा। संसार को राह दिखाने वाला कोई महान व्यक्ति , इतिहास के लंबे अंतराल में एकाध ही बार होता है। लेखक इस आशा पर टिके हैं कि जो लोग बुनियादी मानव अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीबी, रोजगार और आश्रय की लड़ाई लड़ रहे हैं, अगले कुछ दशकों के दौरान वे सफल होंगे। उनका मानना है कि दुनिया अब ग्लोबल वार्मिंग के खतरों से अवगत हो रही है। हालाँकि दुनिया के विभिन्न भागों में हुए सेमिनारों और सम्मेलनों में लिए गए संकल्प, ग्लोबल वार्मिंग का अंत करेंगे, यह सोच अवास्तविक है। भारत की राजधानी में ही प्रदूषण नियंत्रण की लगातार विफलता इस तरह के निष्कर्ष को खारिज करती है।

बी पी सिंह सोचते हैं कि दुनिया इक्कीसवीं शताब्दी की चुनौतियों के प्रति जागरूक हो रही है। वे सोचते हैं कि इनमें से अधिकांश चुनौतियों से बहुवाद या बहुलतावादी दृष्टिकोण के साथ लड़ा जा सकता है, यह शब्द उन्होंने ऋग्वेद से उद्धृत किया है, जिसमें लोकतंत्र, कानून का राज, सहिष्णुता और समावेशी राजनीति सम्मिलित है। भारत समेत अधिकांश दुनिया में वर्तमान स्थिति बहुलतावाद के लिए बहुत आशाजनक नहीं है। अच्छाई को जीत के लिए बहुत समय लग रहा है।

हालांकि, आशावादी होना ऐसा कोई अपराध या पाप नहीं है, जो इस पोस्ट-ट्रुथ अथवा सत्य से परे समय ये मानता हो कि अंतत: सच्चाई और अच्छाई जीतेगी। मात्र आशावाद और अच्छे इरादे पर्याप्त नहीं हैं। हालांकि वे बेहतर भविष्य की उम्मीद देते हैं। कुछ भी हो, आशावादी होना किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता है।  (एच. के. दुआ इंडियन एक्सप्रेस के पूर्व मुख्य संपादक और राज्यसभा सदस्य हैं। वर्तमान में वे ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन  (ओआरएफ) में सलाहकार हैं।)