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Sunday 19 Aug 2018

समकालीन हिन्दी गज़़लकारों पर एक अध्ययन-दृष्टि

गज़ल फ़ारसी-उर्दू में जितनी मक़बूल हुई, उतनी ही हिन्दी में भी अपनाई गई। हिन्दी में आकर इसने अपना अंदाज़ और अनुभूति, दोनों ही बदले। उर्दू में जहाँ परम्परागत शायरी की सीमाओं में ही बंधी रही, हिन्दी में इसने नए-नए तेवर अपनाए। जनवादी चेतना हिन्दी गज़़ल का अपना ही तेवर है, जिसमें शोषित, वंचित, दलित समाज के स्वर को भी उतनी ही प्रखरता से सम्मिलित किया गया, जितना सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना को। आम आदमी की आवाज़ बनकर जब गज़़ल सामने आई, तभी दुष्यंत को भी कहना पड़ा- मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ, वो गज़़ल आपको सुनाता हूँ आज गज़़ल हिन्दी की एक सर्वप्रिय और समृद्ध काव्य विधा है। इसकी अपनी काव्यभाषा विकसित हुई है। हिन्दी में गज़़ल कहने वाले आज बहुत बड़े-बड़े नाम हैं और उनका कृतित्व भी गज़़ल का एक नया शास्त्र गढ़ रहा है। इन रचनाकारों पर आलोचकों-समीक्षकों द्वारा बहुत कुछ चिंतन-मनन भी किया जा रहा है। हरेराम नेमा 'समीप' की कृति 'समकालीन हिन्दी गज़़लकार : एक अध्ययनÓ इस दिशा में एक नया प्रयास है। समीप जी स्वयं बहुत अच्छे कवि हैं। गज़़ल, दोहे, गीत, कहानी, अनुवाद, सम्पादन, साहित्य की कोई भी विधा समीप जी से दूर नहीं रह पाई है। तीन खण्डों में प्रकाशित होने वाली इस आलेखमाला के पहले खण्ड में आपने हिन्दी गज़़ल के 25 प्रतिनिधि रचनाकारों को उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के ताने-बाने में परखने की कोशिश की है। ये पच्चीस गज़़लकार पर्याप्त रूप से चर्चित भी हैं और समय-समय पर अभिनंदित भी। जहाँ एक ओर इन गज़़लकारों की अभिव्यक्तियां क्रान्तिकारी हैं, वहीं दूसरी ओर इनकी संवेदनाओं में कोमलता की अनुभूति भी है। समीप जी ने यदि किसी पक्ष पर अपनी पैनी नजर रखी है  तो वह है उस गज़़लकार की रचनाधर्मिता। कृति का आरम्भ दुष्यंतकुमार के कृतित्व पर केन्द्रित आलेख से किया गया है। जिसमें लेखक स्पष्टतया लिखता है ''दुष्यंत की गज़ल सम्प्रेषणीयता और प्रासंगिकता के नए क्षितिज लेकर उतरी है।''इसके बाद डॉ.रामदरश मिश्र, डा.हनुमंत नायडू, चंद्रसेन विराट, शलभ श्री रामसिंह, विज्ञान व्रत, रामकुमार कृषक, अदम गोंडवी जैसे विशिष्टतम गज़़लकारों पर केन्द्रित आलेख हैं। विज्ञान की गज़़लों के बारे में कितनी गहरी बात समीप जी ढूँढ कर लाये हैं ,'' विज्ञानव्रत के सम्पूर्ण गज़़ल साहित्य में एक भी ऐसा शेर नहीं है, जिसमें नारी या पुरुष का भेद किया गया हो। सम्पूर्ण गज़़ल रचनाएँ मनुष्य मात्र या व्यक्ति के भावात्मक संवाद के रूप में प्रस्तुत हुई हैं।'' रामकुमार कृषक को लेखक ने जनमुक्तिके लिए सचेत और प्रतिरोधी चेतना का ध्वजवाहक गज़़लकार दर्शाया है।

प्रस्तुत पुस्तक में समीप जी का अध्ययन रचनाकारों के संदर्भ में जितना विस्तृत और व्यापक है, उतनी ही गहन पकड़ उनकी कृतियों पर भी समीप जी रखते हैं  ग़ज़़लकारों के व्यक्तित्व से आलेखों का आरम्भ इन अर्थों में भी महत्वपूर्ण है कि शायर पर पडऩे वाले उसके सामाजिक, सांस्कृतिक संदर्भों की भी जानकारी प्राप्त होती है। बचपन की कोमल स्मृतियां ही भावी जीवन का सफल संबोधन बनती हैं एक प्रकार से यह उस गज़़लकार के कृतित्व को मनोवैज्ञानिक रूप से जानने-समझने का भी प्रयास है। तभी डॉ  गिरिराज शरण अग्रवाल की गज़़लों पर वे लिख पाते हैं ''डॉ गिरिराजशरण अग्रवाल की गज़़लें मानव जीवन की अटूट आस्था की गज़़लें हैं। उनकी शायरी का स्वर, शिल्प और स्वभाव उनके मूल्यबोध में बसा है।'' गज़़लों की सम्वेदनाओं के ताप को हरेराम समीप ने बहुत समीप से अनुभव किया है। हस्तीमल हस्ती के बारे में ये शब्द पढ़कर आपको मेरी बात सही प्रतीत होगी ''हस्ती जी के शेर उनके जीवनानुभवों से निसृत वे सूक्तियां हैं, जो अँधेरी सड़क पर दूर जलते बल्ब की तरह हमें दिशा दिखाते हुए चमक रही हैं।'' समीप जी ने रचनाकार को जानने-समझने के जो गवाक्ष खोले हैं, उनमें से पहले स्वयं ही झांक लिया है। रचनाकार का सामाजिक बोध, उसका जनतंत्रीय मूल्यों में विश्वास, जनजीवन के प्रति समर्पण, उसकी आलोचक के रूप में आस्था, साहित्यिक मूल्यों के प्रति दृढ़ता आदि ऐसे अनेक तत्व हैं, जो पुस्तक का पाठक भलीभांति रेखांकित कर सकता है, उस विशेष रचनाकार के सम्बन्ध में। समीप जी ज्ञानप्रकाश विवेक को नीर-क्षीर  विवेकी दृष्टि से देखते हैं,''गज़़ल रचना के साथ साथ आलोचना के क्षेत्र में भी उनका अवदान महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक है, जो गज़़ल के प्रति उनकी निष्ठा और साधना का प्रमाण है।''

समकालीन सृजनकर्म पर समीप जी की पैनी नजर रही है। साहित्य के क्षेत्र में आते हुए बदलावों पर इनकी दृष्टि सजगता से अपना कार्य करती है । इस पहले खण्ड में आपने जिन गज़़लकारों को चुना है, उन सबका प्रभावी आकलन आपने गज़़लों के साथ-साथ अन्य काव्यविधाओं के क्षेत्र में भी किया है। हाँ, यह बात सत्य है कि आलेखों को मूलत: गज़़ल केन्द्रित ही रखा है। डॉ उर्मिलेश जी के सृजन के संदर्भ में कितना सटीक व मूल्यवान विवेचन समीप जी करते हैं ''पिछले कुछ सालों से यह शोर मचता रहा है कि कविता जनता से दूर हो गई है, वहीं उर्मिलेश जी कविता के प्रति अपनी अकम्प आस्था बनाकर जनता के बीच कविता का बिगुल बजाते रहे हैं।'' भूमंडलीकरण और आर्थिक उदारीकरण के कारण आज समाज में अजब सी अव्यवस्था फैल गई है। एक 'आइडियल' या 'यूटोपिया' की स्थिति उत्पन्न करने के अजीब से भ्रम में आज हम भ्रमण ही किये जा रहे हैं। समीप जी ने अपने अनेक दोहों और गज़़लों में इस बात का यथार्थ चित्रण किया है। उनकी आलोचना की कलम भी इसी बात को प्रकारांतर से सिद्ध करती है। वे सुल्तान अहमद के बारे में लिखते हैं -''सुल्तान अहमद की गज़़लों के अध्ययन से मैं तो यह निस्संदेह कह सकता हूँ कि इनमें स्वानुभूत यथार्थ को सार्थक अभिव्यक्ति मिली है। यहाँ वे हिन्दी गज़़ल ही नहीं समग्र हिन्दी कविता में कबीर की परम्परा के कवि की तरह प्रयुक्त हुए हैं।'' कबीर की कविता की ताकत वही पहचान सकता है, जिसने  'सार सार को गहि लिए' वाली बात को जीवन में उतारा हो। तभी उसे समाज और साहित्य का संघर्ष एकाकार दिखाई देता है ।

काव्य-संवेदना समीप जी का प्रिय 'विषय' है। इस 'विषय' को उन्होंने लगभग अपने प्रत्येक आलेख में उठाया है, परन्तु आश्चर्य की बात यह है कि प्रत्येक आलेख में एक ही काव्य-संवेदना को भिन्न भिन्न आयामों में रूपायित कर दिया गया है। इस प्रकार काव्य-संवेदना के अंतर्गत राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, व्यक्तिवादी, मनोविश्लेषणवादी लगभग सभी संवेदनाएं समाहित हो गयी हैं। डॉ वशिष्ठ अनूप की गज़़लों पर इसी संदर्भ में वे लिखते हैं ''वशिष्ठ अनूप को प्रकृति से बेहद लगाव है। इसीलिये उनकी काव्य-संवेदना सिर्फ बाह्य सामाजिक व्यवहारों तक सीमित नहीं है, बल्कि वनस्पतियों और प्रकृति से बावस्ता हैं।'' समीप जी की समीक्षा शैली का विशिष्टतम गुण है- इनकी सहजता और सरलता। किसी भी बात या गज़़ल के शेर का विश्लेषण करते वक्त आपने अनावश्यक दुरूहता, काव्यशास्त्रीय उपादानों और बोझिल शब्दावली से खुद को बचाए रखा है। भाषा का सारल्य और तारल्य जितना हृदयरंजक है, भावों का प्रकटीकरण और स्पष्टीकरण उतना ही अभिधात्मक और अनुभवजन्य । प्रशंसनीय यह बात भी है कि गज़़ल कहने और गज़़ल पर कहने-लिखने की गवेषणात्मक परम्परा का भी पूरा-पूरा ध्यान समीप जी ने रखा है। विनय मिश्र की गज़़लों पर इसी मायने में वे लिखते हैं '' विशेष बात यह है कि विनय मिश्र के यहाँ गज़़ल की रिवायत और जदीदियत का वह अर्थवान सामंजस्य स्पष्ट दिखाई पड़ता है, जो हिन्दी गज़़ल परम्परा को उतरोत्तर समृद्ध कर रहा है ।''

हरेराम समीप की आलोचना-शैली नैतिकता के मूल्यों पर भी खरी उतरती है। आपकी चिंतनशैली गज़़ल के बुनियादी सत्यों का विवरण देती चलती है। भारतीय जीवन परम्परा के कुछ सांस्कृतिक मूल्य निर्धारित हैं, इनका अपना एक दर्शन है। इन्हीं पूर्व निर्धारित कसौटियों को साथ लेते हुए समीप जी व्यावहारिक धरातल पर पाठक को इन गज़लकारों की विभिन्न गज़़लों की रसानुभूति, सौन्दर्यानुभूति और सह-अनुभूति करवाते हैं। इस प्रक्रिया में वे निश्चित रूप से सक्षम हुए हैं। गज़़ल मुख्यत: वक्रोक्ति का गुण रखती है। इस गुण के अभिव्यिक्तिकरण में शायर जितना सफल होगा, गज़़ल उतनी ही दिल को छूने वाली होगी। इस प्रकार के शेरों व गज़़लों को पढऩा उन पर व्यापक मनन-चिन्तन करना और फिर उसे अपने कथ्य से जोड़कर पाठकों के समीप रखना, समीप जी की ही कलम का कमाल कहा जा सकता है। विशेषतया किसी भी वाद या सिद्धांत में न बंधते हुए समकालीन पच्चीस गज़़लकारों पर कलम चलाना और आलेखों को बहुआयामी सम्प्रेषणीयता से अभिमंत्रित कर देना हरेराम समीप जी को समीक्षा जगत में महत्वपूर्ण स्थान दिलाएगा।