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Monday 23 Jul 2018

हिन्दी- फ़िल्मी गीतों का साहित्यिक सफर

मानव अपनी प्रतिभा से सृष्टि के अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ कहा जाता है। प्रतिभा दो प्रकार की होती है- भावयित्री और कारयित्री। कारयित्री प्रतिभा कल्पना से जुड़ी है, जिसकी सृष्टि है कला। कला विशेषत: ललित कला मानव-जीवन की अपूर्णता को पूर्ण बनाने का अनुष्ठान है। काव्य-कला में नाटक को सर्वोपरि माना गया है- ''काव्येषु नाटकं रम्यं...।‘’ फ़िल्म नाटक का छाया चित्रांकन है, जो वस्तुत: दिक्-काल की सीमाओं का विस्तार या अतिक्रमण है। डॉ. सुनील केशव देवधर ने सन् 1952 से 1986 तक की चुनी हुई 51 फ़िल्मो से 51 गीतों की साहित्यिक समीक्षा 'बड़े अनमोल गीतों के बोल’ शीर्षक पुस्तक में की है, जो निस्संदेह स्वागतेय है, क्योंकि सामान्यत: फ़िल्मी गीतों को लोग मनोरंजन की वस्तु मानकर उनमें निहित साहित्यिक, नैतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक एवं धार्मिक मूल्यों को  कर देते हैं। लेखक ने यही सोचकर इस पुस्तक की रचना की है : एक फिल्म मात्र मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि उसके सरोकार में समाज, परिवार, भूगोल, राजनीति, धर्म सभी कुछ हैं। इन विषयों को दिखाकर, इन  पर बात करके फ़िल्मों ने हमें दृष्टि भी दी है और सबक भी। (33) अन्यत्र भी वे लिखते हैं कि ''सिनेमा भारतीय समाज के लिए सिर्फ मनोरंजन का ही नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का भी आईना है, जिसमें हम अपने समय और समाज का वास्तविक चेहरा देख सकते हैं।‘’ (177)

फिल्मी गीतों की लोकप्रियता पर कोई संदेह नहीं है, जिनके मूल में है सहजता, सरलता, तरलता, और जिन्हें सरसता मिलती है संगीत की प्यारी धुनों से- सोने में सोहागा। डॉ. हरिवंश राय बच्चन के एक गीत की पंक्ति ''तुम गा दो मेरा गान अमर हो जाए’’ फिल्मी गीतों के दीर्घकालिक सफर में अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होती है। दरअसल, संगीत गीत के उस 'मौन’ को मुखर करता है, जिसे शब्द नहीं कह पाते। और धुन क्या है? वह है मनोदशा- रचयिता की, जो गीत की मनोदशा बन जाती है तथा जिसे राग-विशेष की विशेष शैली में अनुकूल स्वर मिल जाए, तो अमूर्तभाव मूर्त उठते हैं और सहृदय को अनुपम आह्लाद होता है। हिन्दी- फिल्मों एवं उनके गीतों ने शास्त्रीय रागों और लोकधुनों के चारू प्रयोग से जन-साधारण में संगीत-चेतना को उद्बुद्ध तो किया ही है, हिन्दी भाषा एवं साहित्य को देश-विदेश में हिन्दीतर भाषियों के दिल-ओ-दिमाग में प्रतिष्ठित करने का महत्वपूर्ण योग भी दिया है।

डॉ. देवधर ने चुनिंदा हिन्दी- फिल्मी गीतों की साहित्यिक पड़ताल करने के लिए गीत के उद्भव और प्रकृति से परिचय कराते हुए लिखा है कि ''कहते हैं, सायास यानी प्रयत्नपूर्वक लिखी गई छांदिक रचना कुछ और तो हो सकती है, लेकिन उसे नैसर्गिक गीत कह पाना जरा मुश्किल है, क्योंकि एक मान्यता यह भी है कि गीत लिखे या रचे नहीं जाते, बल्कि गीतकार के अंतर्मन में अवतरित होते हैं और कागज पर उतरते हैं।‘’(185) लेकिन लेखक को यह भी पता है कि सारे फ़िल्मी गीत स्तरीय नहीं है- विशेषत: आज के गीत। ''अगर आज के गीतों पर नज़र डालें, तो पाते हैं कि गीत के अंतरे की बात तो और, गीत का मुखड़ा भी याद नहीं रहता। भाव की बात तो दूर, शब्द भी ठीक से पकड़ में नहीं आते। यह दौर पिछले 10-12 वर्षों से चल रहा है।‘’ (137)

हिन्दी-फिल्मी गीतों में मानव-जीवन के विविध रंगों की सूक्ष्म पड़ताल करने के लिए लेखक ने गीत-विशेष के प्रत्येक चरण, प्रत्येक शब्द को न चुनते हुए उसके मूल भाव अथवा संदेश को रेखांकित करने का प्रयास किया है। उदाहरण के लिए 'खामोशी’ फ़िल्म का एक गीत ''हमने देखी है उन आंखों की महकती खुशबू’’ को लें, जिसे लिखा है गुलज़ार ने। लेखक ने इस प्रेम-गीत में निहित उस अनुभूति को शब्द दिया है, जिसे नि:शब्द रहकर ही जाना जा सकता है : ''प्यार को खामोशी कहा है, ऐसी खामोशी जो कहती भी है और सुनती भी है। ऐसा अद्भुत चमत्कार ईश्वरीय अनुभूति के अलावा और कहां हो सकता है?’’  'नूर की बूंद’ कहकर गीतकार ने उन सात्विक ऊंचाइयों को छुआ है, जहां सूफ़ियों का प्रेम बसता है, जहां गुरुनानक 'एक नूर ते सब जग उपज्या’ कह कर सारे भेदभाव, छोटे-बड़े के भाव को समाप्त कर देते हैं। प्रेम एक शाश्वत नदी के समान है,  जो रुकती नहीं, सूखती नहीं, और ठहरती नहीं और बुझती भी नहीं।‘’ (194)

बड़े अनमोल गीतों के बोल में गीतों का चयन- संकलन सूझबूझ से किया है, जिनमें से किसी में मां की महिमा है- ''मेरी दुनिया है मां तेरे आंचल में’’ ('तलाश’, मजरूह सुल्तानपुरी); किसी में बचपन की महक है- ''बच्चे मन के सच्चे’’ ('दो कलियां; साहिर लुधियानवी)’ तथा ''जीवन की बगिया महकेगी’’ (तेरे-मेरे सपने; नीरज); किसी में दोस्ती का महत्व है- ''दिये जलते हैं,  फूल खिलते हैं’ ('नमक हराम’, आनंद बक्शी); तो किन्हीं-किन्हीं गीतों में प्यार के विविध रंग हैं- ''जब प्यार किया तो डरना क्या’’ ('मुगल-ए-आजम’, शकील बदायूंनी); ''तू गंगा की मौज, मैं जमुना की धारा...’’ (बैजू बावरा, शकील बदायूंनी); (''वो वफा करें, मैं वफा करूं’’ ('अनपढ़’, राजा मेहदी अली खान); ''मैं निगाहें तेरे चेहरे से  हटाऊं कैसे’’ ('आपकी परछाइयां’, राजा मेहदी अली खान); ''चेहरे पे खुशी छा जाती है’’ (वक़्त, साहिर लुधियानवी); इत्यादि। ''मिलती है ज़िंदगी में मोहब्बत कभी-कभी’’ ('आंखें’, साहिर लुधियानवी)- जैसे गीत में सच्चे प्यार की विरलता का संदेश है, तो ''छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए’’ ('सरस्वतीचंद्र’, इंदीवर) में प्यार के उदात्त रूप की कल्पना है। होली का पर्व तन के साथ मन को भी रंगने का उत्सव है (''तन रंग लो जी आज मन रंग लो’’, 'कोहिनूर’, शकील बदायंूनी)।

फिल्मी गीतों में जीवन-दर्शन की झलक दिखाने वाले ऐसे संदर्भ हैं, जो सरल और रोचक शैली में सीधे मन को छूते हैं। डॉ. देवधर ने ऐसे गीतों में ''किसी ने कहा है मेरे दोस्तों, बुरा मत सुनो...’’ ('आया सावन झूम के’, आनंद बक्शी); ''राही मनवा दुख की चिंता क्यों सताती है’’ ('दोस्ती’, मजरुह सुल्तानपुरी); ''मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया’’('हम दोनों’, साहिर लुधियानवी); ''ना मुंह छिपा के जियो’’ ('हमराज’, साहिर लुधियानवी), 'चल अकेला...’ ('संबंध’, प्रदीप); ''नदिया चले चले रे धारा’’ ('सफर’, इंदीवर), आदि को चुना है।

राष्ट्र-प्रेम ही राष्ट्रीयता, राष्ट्रीय एकता, राष्ट्र-गौरव को जगाने वाले गीतों की सृष्टि का हेतु है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का 'वंदेमातरम्’ ('आनंदमठ’), शैलेन्द्र का ''जिस देश में गंगा बहती है’’; प्रेम धन का ''छोड़ो कल की बातें’’ ('हम हिन्दुस्तानी’), इंदीवर का ''है प्रीत जहां की रीत’’ ('पूरब और पश्चिम’)। आदि गीत सदैव भारतीयों की स्मृति में बने रहेंगे। ''तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा’’ ('धूल का फूल’, साहिर) यदि इंसानियत को जाति-धर्म-मजहब से ऊपर रखने का पाव संदेश देता है, तो ''ज्योत से ज्योत जगाते चले’’ ('संत ज्ञानेश्वर’, भरत व्यास) और ''साथी हाथ बढ़ाना’’ ('नया दौर’, साहिर) मानव-समाज में सहकारिता व सहअस्तित्व का महत्व जताने वाले गीत हैं।

आध्यात्म व्यक्तिगत स्तर पर यदि आत्म का ऊध्वीकरण है, तो प्रकृति के कण-कण में परम-सत्ता को महसूस करने की दृष्टि से आत्मा का विस्तार भी है। ''ये कौन चित्रकार है’’ ('बूंद जो बन गए मोती’, भरत व्यास) और ''ओह रे ताल मिले नदी के जल में’’ ('अनोखी रात’, इंदीवर) प्रकृति के इसी रहस्य का उद्घाटन करनेवाले गीत हैं। ''लागा चुनरी में दाग’’('दिल ही तो है’, साहिर), ''तोरा मन दरपन कहलाए’’ ('काजल’, साहिर) जैसे गीतों में आध्यात्म नहीं है, तो और क्या है?

वैसे भक्ति की माप या तुलना संभव नहीं है, क्योंकि ''यथा शक्ति, तथा भक्ति’’, तथापि कवियों ने यह कर दिखाया है। ''राम तेरी गंगा मैली’’ में रवीन्द्र जैन ने राधा और मीरा के कृष्ण-प्रेम (भक्ति) की काव्यात्मक तुलना प्रस्तुत की है, जिसमें किसी को कम या अधिक सिद्ध करने का लक्ष्य कदापि नहीं है- राधा प्रेम-दीवानी थी तो मीरा दरस-दीवानी; राधा ने मधुवन में श्याम को ढूंढा, तो मीरा ने मन में, एक सूरत से लुभाती है, तो एक मूरत से..., इत्यादि।

फिल्म हो और समकालीन समाज की यथातथ्य झांकी न हो, ऐसा कैसे हो सकता है? इस संदर्भ में डॉ. देवधर की टिप्पणी दृष्टव्य है : ''इसमें संदेह नहीं, फ़िल्मों ने दृक-श्रव्य माध्यम के रूप में समाज-मन के मर्म, संवेदना, और भीतरी हलचल को काफी नजदीक से छूने का प्रयास किया है, लेकिन इस प्रयास में व्यावसायिक लाभ के लक्ष्य के चलते यह अनुभव होता है कि कोई फ़िल्म या दृश्य समाज के स्त्री-मन से सिर्फ खेलता है, उसे पूरी तरह खोल नहीं पाता।‘’ (178) इसके अलावा, स्त्री-विमर्श पर अपने विचार प्रकट करते हुए वे समीक्षात्मक ढंग से कहते हैं कि ''एक विषय जो हमारे विमर्श के घेरे में है, वह है भारतीय स्त्री। स्त्री-शुचिता, शील, मर्यादा, प्रतिष्ठा को लेकर जितनी हायतौबा मचाई जाती है, उसके दायरे में मात्र स्त्री-देह ही है, लेकिन क्या स्त्री-देह के भीतर के सारे भावनात्मक आवेग नहीं हैं, जो दैहिक आवश्यकताओं की मांग करते हैं?’’ (177) डॉ. देवधर इस समस्या का समाधान  प्रस्तुत करते हैं कि ''सिनेमा स्त्री-पुरुष के काम-जीवन को बेहतर ढंग से चित्रित कर सकता है। इसे समझा सकता है, इस विषय पर हिन्दी-सिनेमा ने 'होमवर्क’ भी किया है, लेकिन अभी भी उसकी नायिका-परंपरा, बाजार, सामंतशाही, स्त्री-अस्मिता जैसे किसी एक को वरण करने के लिए बाध्य है।‘’ (178)

बड़े अनमोल गीतों के बोल के माध्यम से डॉ. देवधर ने हिन्दी-फिल्मों की साहित्यिक यात्रा को चिन्हित करने की सफल चेष्टा की है- सरल-रोचक प्रस्तुतिकरण के रिए। एक तटस्थ समीक्षक की तरह गीत-विशेष के भाव को विभिन्न साहित्यकारों की उक्तियों से संकलित किया है, जिसे सामान्यत: नजरअंदाज  कर दिया जाता है। संकलित गीतों की पड़ताल में लेखक ने इतिहास तथा धर्मग्रंथों को संदर्भित करके भी फ़िल्मी गीतों का यथोचित मूल्यांकन प्रस्तुत किया है।

सार यह है कि हिन्दी- फ़िल्मों ने एक लम्बा साहित्यिक सफर तय किया है और आगे भी यह सफर चलता रहेगा- नए-नए तथ्यों को नए-नए तरीकों-तकनीकों से उजागर करते हुए। नए युग में कदम रखने के साथ ही नए मूल्यों की तलाश में कितनी सफलता मिलेगी, कहना कठिन है। लेखक के मंतव्य से सब सहमत होंगे कि ''भारतीय सिनेमा ने समाज को दिशा दी या दिशाहीन किया, एक बड़ा और मतभिन्नता वाला प्रश्न हो सकता है। लेकिन इस बात पर कोई विवाद नहीं हो सकता कि समाज में जो कुछ होता और दिखता है, उसे अपने माध्यम से अभिव्यक्त करता है यह सिनेमा। फ़िल्म की कहानी, उसके फ़िल्मांकन, अतिरंजकता आदि पर तो सहमति-असहमति हो सकती है, लेकिन फ़िल्मों के गीतों पर असहमति उनके कथ्य के स्तर पर शायद असंभव है, क्योंकि गीतों में जीवन है, प्रेम है, भक्ति है, सांत्वना और शक्ति है।‘’ (221) ऐसा ही गीत है-

''इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो ना’’

हम चलें नेक रस्ते पर हमसे, भूलकर भी कोई भूल हो ना’’

('अंकुश’, अभिलाष)