Monthly Magzine
Monday 19 Nov 2018

मात्र देह नहीं है औरत

स्वतंत्रता को समस्त भारतीय साहित्य की ऐसी विभाजक रेखा माना जा सकता है जहाँ से नवलेखन का प्रारम्भ होता है। आधुनिक भारत के इतिहास में 19 वीं सदी में अनेक सुधारवादी आन्दोलन घटित हुए, जैसे सती प्रथा व बालविवाह पर रोक, विधवा विवाह व स्त्री शिक्षा पर बल आदि। इस सामाजिक-सांस्कृतिक जागरण ने समाज में हलचल पैदा की, इस हलचल से साहित्यलेखन भी कमोबेश प्रभावित हुआ। आज स्त्रियों की स्थिति में काफी बदलाव आया है। प्रगति के हर सोपान पर स्त्रियाँ नजर आने लगी हैं। जमीन से लेकर आसमान तक स्त्रियों ने अपनी पहुँच बना ली है। घर की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए समाज और देश की जिम्मेदारियाँ भी बखूबी निभा रही हैं। परन्तु इन तमाम सच्चाइयों के बावजूद आज भी स्त्री की देह पर स्वाधिकार का प्रश्न विभिन्न मंचों पर छाया हुआ है।

अस्मितावादी विमर्शों में देह विमर्श बीसवीं सदी के सबसे चर्चित विषयों में से एक है और समकालीन लेखक-लेखिकाओं ने इसे अपने-अपने ढंग से परिभाषित किया है। स्त्री देह के सन्दर्भ में मैत्रेयी पुष्पा लिखती हैं-स्त्री देह तो इस दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है। ऐसा लगता है कि यह न हो तो कोई दिक्कत ही न हो। सारे फरमान उसकी देह को लेकर जारी किए जाते हैं। सारे नियम उसकी देह के लिए बनते हैं। सारी नैतिकताएँ, संस्कृतियाँ, सभ्यताएँ वह अपनी देह के भीतर पाल रही है। बड़े आश्चर्य की बात यह है कि जिस स्त्री की देह को लेकर इतनी साजिशें चल रही हैं, उसी देह में रहने वाले दिमाग को एकदम नकार दिया गया। उसे पनपने ही नहीं दिया गया।

 न केवल भारतीय समाज बल्कि दुनिया के हर समाज में सदियों से स्त्रियाँ अपनी देह पर अपना अधिकार पाने के लिए संघर्षरत है। परम्परागत मानसिकता स्त्री को देह में केन्द्रित करने की रही है। घृणा हो या कामना केंद्र में स्त्री देह ही रही है चाहे वो जीवन हो या फिर साहित्य। पुरुष सत्ता स्त्री के व्यक्तित्व को देह केन्द्रित मानकर मनचाहा सलूक करती रही है किन्तु जब यही बात स्त्री ने अपने अधिकार सुरक्षित रखते हुए कहना चाही, जनसंख्या नियंत्रण के उपकरणों को अपनी कामना पूर्ति के लिए उपयोग में लाना प्रारम्भ किया, स्त्रियों की इस जागृति से पितृसत्तात्मक व्यवस्था को धक्का लगा। क्या स्त्री का स्वयं की देह पर अपना अधिकार है? आज ये प्रश्न प्रत्येक स्त्री के मन-मस्तिष्क में छाया हुआ है। स्त्री चिन्तन की चुनौतियाँ की लेखिका रेखा कस्तवार लिखती है-स्त्री देह का प्रश्न, स्त्री-प्रश्नों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। देह के प्रति विचारवान होना, स्त्री का देह पर अपना अधिकार जहाँ स्त्रीत्ववाद (विशेषत: रेडिकल फेमिनिज्म) का आधार प्रश्न रहा है वहीं साहित्य में यह भी कहा जाता है कि दुनिया की शायद ही कोई ईमानदार नारी कथा हो जो अंतत: सेक्स कथा न हो। स्त्री मन, मस्तिष्क और मेधा के स्थान पर देह से परिभाषित और पहचानी जाती रही है।

स्त्री की यौन इच्छा को सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक कारक प्रभावित करते हैं। सत्ता के केंद्र में बैठा पुरुष स्त्री की कामुकता को अपने नियंत्रण में रखना चाहता है ताकि वह सत्ता पर अपना अधिकार बनाये रख सके। हमारे भारतीय समाज में यदि कोई स्त्री अपनी यौन संतुष्टि को पूरा करने के लिए साथी की तलाश करती है तो उसे चरित्रहीन और भौंडा समझा जाता है। विश्व के लगभग सभी देशों में स्त्री की कामुकता का दमन किया जाता रहा है और यहाँ तक तर्क दिया जाता है कि स्त्री में कामेच्छा होती ही नहीं है। स्त्री की कामुकता को स्वीकार करना पितृसत्तात्मक समाज के ठेकेदारों को कभी स्वीकार्य नहीं रहा। स्त्री की कामुकता को पुरुषों ने अपने आनन्द का एक माध्यम बना लिया। पुरुष ने कभी उसकी देह को अपनी यौन संतुष्टि के लिए नोंचा तो कभी स्त्री की प्रजनन क्षमता का दोहन अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए किया। यदि कभी किसी स्त्री ने समाज की इन चिरपरिचित मान्यताओं को ठुकराकर अपनी कामुकता पर अपना अधिकार जताना चाहा तो समाज ने उसे चरित्रहीनता का तमगा पहनाकर वेश्या की श्रेणी में रख दिया।

स्त्री देह के मुद्दे को लेकर काफी साहित्य सृजन हुआ है और इसी कड़ी में छिन्नमस्ता और नर नारी उपन्यास में स्त्री के स्वयं की देह पर अधिकार का प्रश्न मुख्य रूप से उभरा है। छिन्नमस्ता उपन्यास  लेखिका प्रभा खेतान द्वारा व नर नारी उपन्यास लेखक कृष्ण बलदेव वैद द्वारा लिखा गया है। स्त्री के देह प्रश्न पुरुष सापेक्षता से मुक्त हुए बिना वास्तविकता नहीं पा सकते। प्रश्न यह है कि स्त्री की अपनी देह क्या उसकी अपनी रही है? उस पर किसका अधिकार रहा है और किसके हित साधन का माध्यम बनी है? हम ऐसे समाज में रहते हैं जिसमें राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक कारक मिल-जुलकर औरतों के स्वास्थ्य पर असर डालते हैं और उसकी प्रजनन क्षमता और बांझपन, यौनिकता, प्रजनन और लैंगिक भूमिकाओं की समझ निर्धारित करते हैं। 1970 के दशक के शुरू में स्त्रियों के स्वास्थ्य आन्दोलन का जन्म हुआ और भारत में आए गर्भ निरोधकों एवं गर्भपात के अधिकार से स्त्री के देह विषयक प्रश्नों पर नए सिरे से सोचना प्रारम्भ हुआ है। स्त्रीवादी विमर्श सदियों से स्त्री देह पर पुरुष स्वामित्व को अस्वीकार करता हुआ स्त्री देह पर स्वयं स्त्री के अधिकार की वकालत करता है।

देह के स्वाधिकार का प्रश्न प्रभा खेतान छिन्नमस्ता (1993) उपन्यास में उठाती है। देह स्वातंत्र्य की तमाम लम्बी-चौड़ी बातों के मध्य पवित्रता का आतंक स्त्री को अपनी देह पर अधिकार से रोकता है। छिन्नमस्ता की प्रिया विवाह पूर्व सम्बन्धों को लेकर यद्यपि अपराध बोध से ग्रस्त नहीं है परन्तु परम्परा से प्राप्त यौन शुचिता के आतंक से मुक्त नहीं हो पाती है। विवाह के समय यह चिंता प्रिया को परेशान करती है कि पति को वह अपना कौमार्य नहीं सौंप रही, यदि पति को पता चल गया तो क्या होगा? नरेंद्र के साथ रिश्ता होने पर प्रिया अपने सौभाग्य पर गर्व करती है, लेकिन, बस एक लाल बत्ती बार-बार जल रही थी। कहीं वह मुझसे मेरा अतीत न पूछ ले। मैं अब कुंवारी नहीं । सुहागरात के दिन उसे जरूर पता चल जाएगा । पर क्या अच्छा नहीं हो कि मैं उससे सब बातें साफ-साफ  कह दूँ? लेकिन इस बात पर वह मुझे छोड़ दे तब? मैं कहाँ जाऊँगी? कृष्ण बलदेव वैद द्वारा लिखित नर नारी (1996) उपन्यास में भी स्त्री की यौन शुद्धता पर बल दिया गया है। उपन्यास का पात्र सूअर (राजेश) भी स्त्री को लेकर इसी दकियानूसी मानसिकता से ग्रसित रहता है। वह कहता है-मैंने सीमा को कभी रोते हुए नहीं देखा। अजीब औरत है। न हंसती है न रोती है। पहली रात भी रोयी नहीं थी बस कुप्पा बन पड़ी रही थी। रोने के बावजूद पर्दा पहली रात ही फटना चाहिए। बेशक आजकल अक्सर पहले से ही फटा हुआ होता है। कहते हैं उछलकूद से भी फट जाता है साइकिल चलाने से भी।

कृष्ण बलदेव वैद के नर नारी उपन्यास में स्त्री का देह स्वातंत्र्य प्रश्नों के घेरे में दिखाई देता है। बाँझ मांजी और सीमा दोनों ही चरित्र देह के स्वाधिकार का उपयोग करते देह के प्रति अपराध बोध से मुक्त पात्र है। बाँझ मांजी अपनी किशोरावस्था में मुस्लिम युवक माजू से प्रेम करती हैं और प्रेम में लगाव इतना है कि जीवन के अंत तक बना रहता है। नामर्द पति के राज को सार्वजनिक नहीं करती है किन्तु अपनी यौन जरूरतों को विवाहेत्तर संबंधों से पूरा करने में तनिक भी हिचकती नहीं है। जीवन के आखिरी पड़ाव में बंगाली डॉक्टर से संबंध बनाकर समाज की उस मानसिकता की धज्जियाँ उड़ाती है, जो स्त्री से यौन शुद्धता की उम्मीद रखते हैं। सीमा का विवाहेत्तर संबंधों में जाना विवाहित प्रेमी पुरुष द्वारा उपभोग में सीमित हो जाता है। विवाह संस्था के अंदर संबंधों ने पुरुष के कुछ दायित्व निश्चित किए हैं किन्तु विवाह संस्था से बाहर स्त्री के देह संबंध पुरुष के आनन्द का साधन तो बनते हैं लेकिन उसे कोई दायित्व नहीं सौंपते हैं। स्त्रियों को यह समझना होगा कि कहीं देह की स्वतन्त्रता के नाम पर वह पुरुषवादी मानसिकता का शिकार तो नहीं हो रही हैं।

नर नारी उपन्यास मूलत: देह व सम्पति पर अधिकार को केंद्र में रखकर लिखा हुआ उपन्यास प्रतीत होता है। समाज में स्त्री-पुरुष समानता के कई आयाम होते हैं, यथा सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, पारिवारिक व धार्मिक लेकिन नर नारी उपन्यास में मूलत: स्त्री-पुरुष संबंधों की समानता अर्थात् दैहिक समानता पर बल दिया गया है, जबकि नारी मुक्ति केवल दैहिक उत्तेजनाओं तक सीमित नहीं है। इसके विपरीत छिन्नमस्ता उपन्यास की लेखिका प्रभा खेतान स्थापित कहना चाहती हैं कि दमन एवं शोषण के प्रति जब नारी जागरूकता का बिगुल बजा कर खड़ी हो जाएगी, स्थितियों में परिवर्तन तभी अपेक्षित है। अर्थात् दैहिक समानता तभी स्थापित की जा सकती है जब पहले स्त्री को मानवी का दर्जा मिले और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के अवसर मिले और इस दिशा में स्त्री की जागरूकता विकसित की जाये। छिन्नमस्ता उपन्यास में नर नारी उपन्यास की तुलना में दैहिक समानता से अधिक बल आर्थिक रूप से आत्मनिर्भरता पर दिया गया है जो कि समाज में स्त्री द्वारा हर तरह की असमानता को चाहे व दैहिक हो या सामाजिक को पाटने का द्वार है।

नर नारी उपन्यास की प्रमुख पात्र बांझ मांजी, रसीला, मीनू, सीमा आदि स्त्रियों की जिन्दगी को हम नारी मुक्ति के विमर्श का आधार नहीं कह सकते क्योंकि केवल दैहिक आधार पर समानता किसी भी मुक्ति का द्वार नहीं हो सकती। हेतु भारद्वाज लिखते हैं, कृष्ण बलदेव वैद का नर नारी नामक उपन्यास एक तो नर और नारी को उनके आदिम रूप में प्रस्तुत करता है दूसरे इस उपन्यास के मूल में यह तथ्य है कि नर-नारी के संबंधों को केवल एक ही प्रवृत्ति तय करती है और वह है काम या यौन। इस उपन्यास के जितने भी पात्र हैं उनकी दुनिया का विस्तार उनके यौन संबंधों से आगे नहीं बढ़ पाता।

साहित्य में हमेशा से बलात्कार और छेडख़ानी के वर्णनों की भरमार रही है। कभी जमींदार तो कभी साहूकार तो कभी पिता, भाई व पति सभी के निशाने पर हमेशा स्त्री की देह रही है। बलात्कार के दौरान हुए यौन सम्पर्क से स्त्री को चरम मानसिक प्रताडऩा मिलती है। क्योंकि यौन संबंध केवल शारीरिक सम्पर्क तक सीमित नहीं होता बल्कि इस दौरान दो भिन्न व्यक्तित्वों का सम्पर्क होता है। यही कारण है कि जो यौन संबंध प्रेम की स्थिति में अतिशय आनन्द की सृष्टि करता है वही बलात्कार के क्षणों में घृणा, विरक्ति का भाव उत्पन्न करता है क्योंकि ऐसी स्थिति में एक स्त्री एक अनचाहे पुरुष को अपने शरीर में प्रवेश करने देने के लिए विवश होती है। कॉलेज के लेक्चरर के साथ दैहिक संबंध होने पर प्रिया अतिशय आनन्द से विभोर होकर कहती है कि- पुरुष का स्पर्श इतना मादक होता है, इतना सुखद। वह इतना कमनीय, इतना आकर्षक हो सकता है, मुझे पहली बार पता चला। वहीं भाई द्वारा बलात्कृत होने पर प्रिया कहती है कि-दाई माँ ! एक पत्थर के ऊपर कोई जीवित आदमी अपने को घिस रहा था। बचपन में बड़े भाई द्वारा बलात्कार से आहत प्रिया की संवेदना और अनुभूतियाँ पुरुषों से घृणा में बदलती रहती हैं। कॉलेज में पढ़ते हुए भी कोई भी पुरुष उसकी आँखों में नहीं उतर पाया। इसका कारण चाहे जो भी रहा हो या तो उसे अपने औरत होने से ही चिढ़ थी या वह हर पुरुष में बड़े भैया को देखती थी। वह कहती है- मुझे प्रेम, सेक्स, विवाह ये सारे सदियों पुराने घिसे हुए शब्द लगने लगे थे। नहीं, शब्द नहीं, मांस के ताजा टुकड़े, लहू टपकाते हुए। इन शब्दों के पीछे की दीवानगी और आदिकाल से चली आ रही परम्पराओं का चेहरा सिर्फ औरत के आँसुओं से तरबतर है। लेकिन इन सबके बावजूद सेक्स की जरूरत देह की माँग है जितनी पुरुष को है, उतनी स्त्री को भी और यही प्रिया के साथ भी होता है। प्रेम, सेक्स, विवाह सबसे घृणा के बावजूद सब करती है और स्वेच्छा से।

नर नारी उपन्यास में देखने को मिलता है कि पति से बलात्कार और प्रेमी द्वारा रोज की रोटी की तरह उबाऊ रूटीन का इस्तेमाल स्त्री को विवाह और प्रेम दोनों के अस्वीकार का विवेक देता है। घर में सूअर दफ्तर में शर्मा मीनू की बरसाती में सागर अब और नहीं। स्त्री के देह पर अधिकार की आड़ में वैवाहिक बलात्कार का प्रश्न छुपा है। इस उपन्यास के पात्र सूअर का मानना है कि पत्नी के इनकार पर बच्चे के लिए पत्नी से बलात्कार अपराध तो नहीं। भारत में करीब 70.75 फीसदी शादीशुदा स्त्रियाँ अपने पति द्वारा जबरन सेक्स का शिकार होती है। अगर पति सेक्स से पहले पत्नी की सहमति और मर्जी का ख्याल नहीं रखता तो क्यों न इसे बलात्कार कहा जाए।

 छिन्नमस्ता उपन्यास की पात्र प्रिया को नरेंद्र अपनी पत्नी या सहचरी ना मानकर अपनी वस्तु समझता है और वस्तु के रूप में उसका भोग करना चाहता है। नरेंद्र कहता है-प्रिया, नहीं तुम मेरी चीज हो। लोग इतनी अच्छी चीज को देखकर लार टपकाएँ, इसके पहले मुझे स्वाद चखने दो! प्रिया को नरेंद्र के प्यार करने में वहशी भूख नजर आती है-मैं तो सुहागरात के दिन से ही ठंडी हो गई थी। जिस्म को नोचता-खसोटता छब्बीस का युवक नरेंद्र। जिस्म का भी एक स्वाद होता है, ठीक वैसे ही जैसे झागवाला बीयर।

लेखिका प्रभा खेतान छिन्नमस्ता में यह स्थापित करती है कि भोगवादी पुरुष के लिए नारी देह से ऊपर कुछ नहीं परन्तु यह भी सच है कि अब नारी पुरुष सत्तात्मक विचारों के तले सिकुड़ी नहीं है। वह विद्रोह करना जानती है और कर रही है। यह प्रसंग अलग है कि उसे अपने माता-पिता के पुराने विचारों को कैसे बदलना है एवं अपनी स्त्री शक्ति व क्षमता से कैसे सबको अवगत कराना है। नारी को मात्र देह मानने वाले एवं एकमात्र दैहिक आवश्यकताओं के पहलू को उजागर करने वाले यह भूल जाते हैं कि नारी देह में एक मन भी रहता है। देह से अधिक मन पर अधिकार आवश्यक है। अपने निबन्ध संग्रह मात्र देह नहीं है औरत, में मृदुला सिन्हा लिखती है- औरत को मात्र देह मानना, समझना और स्वयं उसे भी यही समझना कहीं से भी उचित नहीं है। इन दिनों विज्ञापनों में भी मात्र देह का ही प्रदर्शन हो रहा है। यह सच है कि उसके शरीर में विधाता प्रदत्त कोख और छातियां हैं जो मानवता के लिए अति उपयोगी है। जन्म लेने के लिए कोख और शिशु के पालन के लिए अमृत समान दूध मिलना अति आवश्यक है। परन्तु ये अंग विशेष प्रदर्शन के लिए नहीं है। व्यापार के लिए भी नहीं है। उनका माप तोल भी नहीं किया जा सकता।

हमारे समाज में गोरापन एक सौन्दर्यशास्त्रीय समग्र विमर्श है। यह विमर्श स्त्री की दो जमातें पैदा करता है। विवाह, नौकरी, प्रेम सभी जगह गोरापन वरीयता दिलाता है और कालापन असफलता। देह छवि मनुष्य की कामुकता का एक प्रमुख घटक है। एक कामुक मनुष्य के रूप में हमारा अस्तित्व बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपने शरीर को कैसे देखते हैं और हमारे शरीर की यौन इच्छाओं और यौन संतुष्टि आदि से जुड़े अनुभव कैसे हैं। स्त्री सौन्दर्य को आधार बनाकर पर्याप्त साहित्य सृजन हुआ है। काली स्त्री को आधार बनाकर लेखिका रजनी पनिकर ने काली लड़की लिखा । असुन्दर स्त्री का अपराध बोध गीतांजलि श्री की भार कहानी में भी देखा जा सकता है। राजकिशोर द्वारा लिखित उपन्यास तुम्हारा सुख की पात्र मालविका का कालापन भी उसकी सफलता में बाधक बनता है। प्रभा खेतान द्वारा लिखित छिन्नमस्ता की प्रिया काली होने के कारण स्वयं की माँ के ताने सुनने के लिए मजबूर होती है। प्रिया के सन्दर्भ में रेखा कस्तवार लिखती हैं- पढऩे-लिखने की उसकी अभिरुचि का कोई मूल्य नहीं। विवाह के बाजार में उसकी बौद्धिक क्षमता नहीं, उसकी चमड़ी का रंग महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा। इसलिए माँ को चिंता है। इस तरह आज प्रश्न स्त्री की देह के उपयोग मात्र का नहीं रह गया है बल्कि गोरी, सुंदर देह के माध्यम से लक्ष्य प्राप्ति का भी बन गया है।

अब हमारे सामने यह प्रश्न उठता है कि विभिन्न लेखक व लेखिकाएं अपने साहित्येतिहास के माध्यम से स्त्री को कितनी दैहिक स्वतन्त्रता दे पाए हैं। मित्रो मरजानी उपन्यास की लेखिका कृष्णा सोबती उपन्यास की पात्र सुमित्रा के देह राग को पहचानते हुए भी अंतत: बुढ़ापे की सुरक्षा के लिए पति के पास लौटा देती हंै। देह कामना की पूर्ति के लिए मुक्त नहीं कर पातीं। छिन्नमस्ता उपन्यास की लेखिका प्रभा खेतान स्त्री को न केवल यौनिक स्वतन्त्रता प्रदान करती हैं बल्कि स्वयं के अस्तित्व निर्माण के लिए परिवार का ढांचा भी तोड़ती नजर आती हंै। इसी तरह नर नारी उपन्यास के लेखक कृष्ण बलदेव वैद भी उपन्यास की पात्र सीमा व बांझ मांजी के माध्यम से वैवाहिक संबंधों के बाहर स्त्री को यौनिक स्वतन्त्रता प्रदान करते हैं। तुम्हारा सुख उपन्यास के लेखक राजकिशोर देह के विमर्श को वैचारिक धरातल देते हैं। इस उपन्यास की पात्र मालविका अपनी देह के निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है। यह देह उसकी अपनी है जिसका उपयोग वह जैसा चाहे कर सकती है। शरीर का क्या है? नहा-धो लेने के बाद शुद्ध हो जाता है। मालविका की यह सोच स्त्री देह के प्रति चली आती मर्दों की शुचितावादी दृष्टि को अंतत: ध्वस्त कर देती है। प्रभा खेतान व कृष्ण बलदेव वैद के दृष्टिकोण को देखने के बाद लगता है कि लेखक का मुद्दा मुख्यत: दैहिक स्वतन्त्रता तक सिमट कर रह गया है और उस दैहिक स्वतन्त्रता को कैसे हासिल किया जाए यह गुत्थी भी लेखक नहीं सुझा पाए हैं, जबकि लेखिका प्रभा खेतान का मानना है कि हर स्वतन्त्रता का रास्ता आर्थिक आत्मनिर्भरता से होकर गुजरता है। लेखिका का मानना है कि स्त्री को अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए स्वयं आगे आना होगा और पुरुष समाज द्वारा स्त्री के लिए निर्धारित सभी उपमानों का परित्याग कर अपनी राह स्वयं बनानी होगी।

निष्कर्षत: कह सकते हैं कि साहित्यलेखन, साहित्य अध्ययन व विभिन्न स्त्री सुधार आन्दोलनों के माध्यम से स्त्रियों में स्वयं को एक सेक्स ऑब्जेक्ट के बदले एक संवेदनात्मक इंसान समझने की चेतना जगी है। स्त्री विमर्श एक वैश्विक विचारधारा है लेकिन विश्व भर की स्त्रियों का संघर्ष उनके अपने समाज सापेक्ष है। भारत के बहुस्तरीय सामाजिक ढांचे में स्त्री का संघर्ष मात्र देह की स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है। स्त्रियों को कई मुद्दों पर एक साथ लडऩा है लेकिन यौनिक स्वतंत्रता इस लड़ाई का अहम मुद्दा है। स्त्री देह की स्वतंत्रता उसे अपने सौन्दर्यबोध, अपनी अनुभूतयों और संवेदना के आधार पर समझने और महसूस करने में है। हिंदी का स्त्री लेखन इस स्तर तक पहुँच चुका है, जहाँ भारतीय समाज और वर्चस्वशाली संस्कृति द्वारा स्त्रियों पर थोपा गया यौन शुचिता का आवरण तार-तार होता नजर आ रहा है। इस यौनशुचिता के पीछे पितृसत्तात्मक समाज की लिंगभेद और स्त्री देह के दमन कीअवधारणा है और हिंदी के स्त्री लेखन में इस अवधारणा की पहचान की जा चुकी है। आज आवश्यकता इस बात की है कि स्त्रियाँ स्वयं को पुरुषवादी सौन्दर्यबोध की कसौटी पर ना कसकर न सिर्फ यौन मुक्ति के लिए बल्कि अपने हर अधिकार व स्वतन्त्रता की प्राप्ति के लिए आगे आएं।