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Tuesday 25 Sep 2018

वेदना की अंतहीन यात्रा: अर्पणा की सोहनी

यह सर्वविदित है कि पाषाणकालीन गुहा मानव ने किसी भी लिपि के आविष्कार से पूर्व ही चित्रकर्म शुरु कर दिया था। बाद के समय में अजंता में बुद्ध की जीवनी व जातक कथाओं का चित्रण हुआ, अपभ्रंश में भी जैन साहित्य को ताड़पत्र, कपड़े व कागज पर चित्रित किया गया, इसी तरह भारतीय कला में विकसित अन्य चित्रशैलियों जैसे राजस्थानी,मुगल और पहाड़ी में बड़े पैमाने पर साहित्यिक कृतियों को चित्रित किया गया। समकालीन समय में भी कलाकार साहित्यिक कृतियों को अपने कलाकर्म का विषय बना रहे हैं। चित्रकार को उस साहित्यिक कृति की चित्रात्मकता प्रभावित या प्रेरित करती है। जब वह उस साहित्य को पढ़ता है तो साथ ही साथ अपने बिम्ब भी गढ़ता है और एक अलग प्रकार की बैचेनी को महसूस करता है जो उसे इस साहित्यिक कृति को अपने माध्यम में व्यक्तकरने के लिए प्रेरित करती है। कई बार ऐसा भी लगता है कि साहित्य का वह खास विषय, शायद चित्र माध्यम में और प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया जा सकता है। जो कुछ भी शब्दों की सीमा में अव्यक्त रह गया है उसे चित्र के जरिये व्यक्त किया जा सकता है। चित्रकार साहित्य की अपने नजरिये से व्याख्या करना चाहता है। सृजन के लिए मिथक, इतिहास और साहित्य से संदर्भों का चयन करने का चलन रहा है। समकालीन कलाकारों में एक विशेष स्थान रखनेवाली अर्पणा कौर की कला-साधना में ऐसे अनेक संदर्भ पाए जाते हैं। प्रस्तुत आलेख में विश्व-प्रसिद्ध प्रेमाख्यान सोहनी-महिवाल पर आधारित उनकी चित्र-शृंखला का विवेचन किया गया है।

अर्पणा कौर विषयों की ऐतिहासिकता और पौराणिकता से परे उन्हें एक तरह की समकालीनता प्रदान करती हैं। इसी तरह उन्होंने सोहनी-महिवाल विषय को भी अपने नजरिए से एक समकालीन पुट देते हुए चित्रित किया है। कलाकार का परम्परा बोध ही उसे समय की गत्यात्मकता को समझने और स्वीकार करने में सहायता करता है। वे स्वीकार करती हैं-जब मैनें सोहनी श्रृंखला पेंट करना शुरु की तो दो बातें मेरे मन में थीं। पहली यह की किसी चित्रकार ने यह विषय पेंट नहीं किया था। दूसरे सोहनी के प्रेम का आदर्श आज के युग को एक नयी ऊर्जा से सरोबार करने में सक्षम है, मानव की आध्यात्मिक दरिद्रता को केवल प्रेम ही दूर करने में सक्षम है। मानव भौतिक प्रेम द्वारा आध्यात्मिक प्रेम के आदर्श को छू सकता है। यह प्रेम व्यक्तिवाद के दायरे को तोड़कर सबको गले लगाता है। आज व्यक्तिवाद के इस दौर में मैंने सोहनी को इसलिए पेंट किया कि व्यक्ति अपने क्षुद्र व्यक्तिवाद से उठ कर इस दुनिया को सुन्दर बनाने की ओर अग्रसर हो।'' यथार्थ के कटु अनुभव व्यक्ति को आदर्श की याद दिलाते हैं और उसे प्रेरित भी करते हैं कि वह आदर्श के लक्ष्य को हासिल करे। आदर्श सभी प्रकार की संकीर्णताओं से मुक्त करता है। व्यक्ति और समूह की सीमाएँ भी आदर्श में विलीन हो जाती है-कला अँधेरे आत्म को रोशन करती है। कलाकार अपने कला में जगत से,जीवन से,और स्वयं अपने से संबोधित होता है। उसके इस संबोधन में ही उसके होने का भाव छुपा है और कदाचित्त उसकी भूमिका भी। चाहे वह किसी भी माध्यम में सृजन करता हो, अगर वह कलाकार है तो उसका होना इस बात पर निर्भर करता है कि वह अपने में कितना है। वह यदि अपने कला रूप में स्व का विलयन नहीं करता,तो वह चाहे जिस कृति का सृजन करे, उसका सृजन उत्पाद होगा। जिस कृति में आत्म का विसर्जन न हो, वह सृजन नहीं,उत्पाद ही होगी और तभी उसे कला नहीं शिल्प कहना होगा-कला और शिल्प में बुनियादी अंतर भी यही है।

अर्पणा कौर बहुत ही संवेदनशील कलाकार हैं। अपनी कला-यात्रा और विश्व के साथ अपने सामंजस्य में वे संसार भर की स्त्रियों से स्वयं को जोड़कर देखती हैं। स्त्री का सुख, आनंद, उत्साह, पीड़ा, दुख, अवसाद सब कुछ उन्हें अपना सा लगता है। इस भावदशा का अपना सौन्दर्य है और यह सौन्दर्य उनकी कलाकृतियों में दिखाई देता है। उनके इस संवेदनशील भावबोध की दृष्टि से सोहनी-महिवाल चित्र शृंखला बहुत ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने इन सब घटनाओं का चित्रात्मक वृत्तांत मात्र प्रस्तुत नहीं किया है, बल्कि अपने नजरिये से उन्हें प्रस्तुत किया है। विषय चयन के लिए साहित्य से भाव-सामग्री ग्रहण करने की परिपाटी को भगवतशरण उपाध्याय इस प्रकार विवेचित करते हैं - साहित्य और कला की प्रेरणा समान है। उनके अवतरण की भूमि समान है। दोनों ने समान पृष्ठभूमि जीवन से अपना भाग पाया है, समान उपकरणों से दोनों समृद्ध हुए हैं। इसी से अनेक बार अनेकश: उनके प्रतिमान, प्रतिमाएँ, अभिप्राय समान अथवा कम से कम एक से रहे हैं- साहित्य व कला के क्षेत्र में सर्वत्र और सर्वदा समान आवाज उठती रही हैं- जितने भी कलावाद हैं वे सभी साहित्य और कला दोनों के क्षेत्रों में समान रूप से व्यवहृत हुई हैं। साहित्य में निरंतर कला के लक्षणों और उनके अनुकार्यों का उल्लेख हुआ है और कला के अनेकानेक भाव-विषय सीधे साहित्य से लेकर लिखे, खींचे या कोरे गये हैं। इसी से दोनों में असाधारण अन्योन्याश्रय व अंतरावलंबन है।''साहित्य और कला में संवेदना का समवेत स्वर सदा से उठता रहा है। एक जैसी भावनाएँ केवल माध्यम के अंतर से व्यक्त होती हैं और जीव-जगत उसका आस्वादन करता है।

अर्पणा कौर एक आत्मदीक्षित कलाकार हैं और उनके लिए साहित्य से परिचय कोई नयी बात तो नहीं है। उनका बचपन ही एक ऐसे वातावरण में गुजरा जहाँ साहित्यिक गोष्ठियाँ, वाद-विवाद, विमर्श और सृजन रोज की ही बात थी। उनकी माताजी अजीत कौर एक विख्यात और संवेदनशील साहित्यकार हैं और स्वयं अर्पणा ने भी अंग्रेजी साहित्य में मास्टर डिग्री हासिल की है। पारिवारिक वातावरण और शिक्षा के संस्कारों के कारण साहित्य का असर सहज ही उनकी भावदृष्टि को प्रभावित करता है। सोहनी महिवाल की कथा को उन्होंने बार-बार चित्रित किया है, परंतु विषय भले ही एक हो उन्होंने उस विषय के बहुमुखी छोरों को छुआ है, उसे सदा नवीनता के साथ नये संदर्भों और नये प्रतीकों का उपयोग कर चित्रित किया है। यह कलात्मक और विषयगत प्रतिबद्धता नये विमर्शों के लिए अवकाश बनाती है। अर्पणा कोर ने सोहनी-महिवाल की गाथा को- सोहनी-महिवाल, लव बियोण्ड मेजर, योगी और सोहनी इन विख्यात चित्र शृंखलाओं में उकेरा है। वे कहतीं है- पात्र के रूप मे सोहनी की अपनी गाथा, किस्सा, कहानी है लेकिन मेरे लिए प्रत्येक वह महिला या पुरुष सोहनी है, जो पानी में कूदने की हिम्मत रखता है। जो जोखिम उठाता है, वह सोहनी है। जो आसमान को छू लेना चाहता है,जो जीवन-संघर्ष करना जानता है वह सोहनी है। घड़ा हर व्यक्ति है। संसार है। दुनिया है क्योंकि वह मिट्टी है। अंतत: हमें मिट्टी में विलीन हो जाना है। जीवन की यही क्षणभंगुरता उन्हें सामाजिक सरोकारों की व्याख्या के लिए प्रेेरित करती है। अंतत: सब कुछ समाप्त हो जाता है अत: दिए गए समय को पूरी शिद्दत के साथ जीवंत बनाना चाहिए। इसमें जो थोपी गई संकीर्णताएं हैं वे मनुष्य को कैद करती हैं। यथार्थ की इन विसंगतियों से बचने के लिए और संघर्ष करने के लिए मनुष्य परम्परा, मिथकीय चेतना और साहित्य में सहारा खोजता है।

सोहनी की गाथा ने सदियों पंजाब के चित्रकारों को आकर्षित किया है। पहाड़ी चित्रकार नैनसुख द्वारा 18 वीं सदी में बनाया गया चित्र सोहनी का प्रथम ज्ञात चित्र है। इसके बाद 19 वीं सदी के उत्तरार्ध में पाकिस्तानी चित्रकार उस्ताद अल्लाह बक्श ने भी इसे चित्रित किया जो चित्र अब लाहौर म्यूजियम की शोभा बढ़ा रहा है। भारत में 1957 में शोभा सिंह ने भी सोहनी- महिवाल को चित्रित किया जो 70 के दशक तक कई मध्यम वर्गीय घरों की दीवारों पर दिख जाती थीं जिसके प्रिंट्स आज भी चलन में है। भारतीय समकालीन चित्रकारों में श्री सतीश गुजराल और श्री मंजीत बावा ने भी अपनी अपनी विशिष्ट शैली व अपने नजरिये से सोहनी महिवाल को अपने केनवास पर जगह दी है। विश्व रोमांटिक साइकिल की प्रेमाख्यान परम्परा में सोहनी-महिवाल का खास स्थान है। पंजाब के जनजीवन और संस्कृति पर इसका बहुत प्रभाव है। इस कथानक और इसके विषय की विविधता और गहराई ने लघुचित्र शैली के पारंपरिक चित्रकारों से लेकर समकालीन भारतीय चित्रकारों तक को आकर्षित किया है। अर्पणा अपनी रचना प्रक्रिया के विषय में बताती हैं -उन्होंने उस विषय को समकालीनता प्रदान की है, ताकि आधुनिक दर्शकों को ज्यादा प्रभावी ढंग से इस कथा व इसके मर्म से अवगत कराया जा सके। सोहनी उनके चित्रों में एक महानायिका भी है साथ ही पड़ोस की लड़की का भी रूप लिए है, यह हमारे समाज में महिला की जटिल वास्तविक पहचान को दर्शाने की उनकी वैचारिक रणनीति भी है।'' रोजमर्रा के संघर्षों से जूझते हुए मनुष्य बहुत एकाकी हो जाता है। व्यक्ति के इस अकेलेपन में उदासी है तो जिजीविषा भी है। पुरुष के संघर्षों से परे स्त्री का संघर्ष एक अलग भावभूमि रखता है। आधुनिक जगत में परिवार और घर की चारदिवारी के बाहर स्त्री की एक नई दुनिया है और इस दुनिया के अपने संघर्ष भी है। अर्पणा घर और बाहर के आघातों को सहनेवाली स्त्री की संवेदना को उकेरती हैं और उसकी साधारणता में ही उसके विराट व्यक्तित्व का उद्घाटन करती है। जो सराहनीय भी है और अनुकरणीय भी।

अर्पणा ने चित्रकारी का कोई संस्थानिक प्रशिक्षण नहीं लिया। इसलिए उनके सृजनात्मकता में सहजता का पुट अधिक है। साथ ही रचनात्मक के विविध पक्ष और आयाम एक सिलसिले में उद्घाटित होते हैं। अपर्णा कोर ने सोहनी और महिवाल की कथा को बहुत अलग तरह से महसूस किया और अपने चित्रों का विषय बनाया। सोहनी के व्यक्तित्व और जीवन संघर्ष के बहुत से प्रासंगिक संदर्भ वे अपने चित्र में दिखाती हैं। इन्हीं संदर्भों में यह एक अनुपम कृति है। उन्होंने अतीत की इस कथा के द्वारा समकालीन वास्तविकता के साथ स्त्री विमर्श को बड़ी ही गंभीरता और सहजता के साथ प्रस्तुत किया है, ये चित्र शृंखलाएँ न सिर्फ विषय-वस्तु में महत्वपूर्ण हैं, अपितु चित्रात्मक सतह की बनावट, बुनावट, आकारों का स्थान, पात्रों के प्रतिपादन, रंग,रूप की दृष्टि से भारतीय समकालीन कला की महत्वपूर्ण रचना है।

सोहनी - महिवाल शृंखला के चित्रों की जीवंत रंगयोजना व संयोजन सहज ही ध्यान आकर्षित कर लेते हैं। उनके चित्रों की रंगयोजना अत्यंत भावप्रवण होती है, जो दर्शक को सहज चित्र की विषय वस्तु के साथ तारतम्य स्थापित करने को आमंत्रित करती है। अर्पणा के अन्य स्त्री चरित्रों की तरह सोहनी के चरित्र में भी कामुकता या भौतिकता का आभास नहीं है। इस कलाकृति में मध्यकाल के रोमानी वातावरण में सोहनी की छवि बहुत ही सहज दिखाई देती है। दूर एक कोने में बैठा महिवाल और उसका सफेद परिधान संबंधों की पवित्रता को व्यक्त करता है। उसकी मुद्रा में अंतहीन प्रतीक्षा दिखाई देती है। चित्र में एक विकर्ण बनाती नदी सोहनी और महिवाल के वियोग को दर्शाती है। उसकी नीली-हरी लहरें समय के सातत्य की परिचायक हैं। चित्र में कुछ घड़े बनाए गए हैं। जिसमें कुछ घड़े बह रहे हैं संभवत: घड़े उनकी मुलाकात की वजह भी बताते हैं साथ ही ये शिकायत भी करते दीखते हैं कि सोहनी ने इन घड़ों की सहायता से पहले भी महिवाल से मिलने के लिए इस नदी को पार किया है। चित्र के निचली तरफ  बाएँ कोने में सोहनी बैठी है। मिलन की आस में वह महिवाल की ओर देख रही है। पत्थर की चट्टानों पर बैठी है, जिनकी बनावट मुगल शैली के लघुचित्रों से प्रेरित है, ये क्रिस्टलनुमा पत्थर समाज की कठोरता, निर्ममता की ओर इशारा कर रहे हैं जो सोहनी को अपने बाहुपाश में लेने को जैसे आगे बढ़ते लग रहे है,जैसे समय के साथ सोहनी इनमें समा जाएगी। आम तौर पर अर्पणा के चित्रों की पृष्ठभूमि काफी सपाट रहती है जिसमें पात्र तैरते से प्रतीत होते हैं,  सपाट गहरे रंगों मे उनके चरित्र काफी चमक के साथ उपस्थित होते हैं,परंतु इस चित्र में शायद सोहनी की भावना की तीव्रता इतनी है, मन की बैचेनी इतनी है कि उसे शायद इसी तरह पथरीले, क्रिस्टलनुमा आकारों के बीच चित्रित करना ही उपयुक्त नजर आता है। ऊपर के कोने मे बैठे महिवाल का सिर थोड़ा झुका है दूसरी तरफ नीचे बैठी सोहनी का सिर थोड़ा उठा है जो दोनों के एक दूसरे से संपर्क को स्थापित करता है। चित्र में अर्पणा ने सोहनी को एक बड़े से चौकोर आकार में चित्रित किया है जो उसकी बाध्यता,या सामाजिक बंधनों को दर्शा रहा है, साथ ही उसी चौकोर मे एक छोटा आयात और है जिसमें  कुछ मटके चित्रित है जिसमें से एक टूटा हुआ है जो शायद आने वाली दुखद घटना की भविष्यवाणी कर रहा है। चित्र में एक बिजली का प्लग भी  है जो सांप की तरह लहराता हुआ चित्र के निचले छोर से होता हुआ ऊपर की तरफ  जा रहा है ऐसा प्रतीत होता है कि एक अतृप्त प्रेमी मिलन की आशा में बैचेन है जैसे ही प्लग को सॉकेट मिल जायेगा उनका मिलन पूरा हो जायेगा परंतु इस कथा में यह मिलन दोनों के जीवित रहते पूरा नहीं हो पाता है।

अर्पणा कौर ने इस प्रेम गाथा के पात्रों की विरह वेदना को अत्यंत ही मार्मिक तरीके से केनवास पर संजोया है जो रसिक को सहज ही सोहनी-महिवाल के दुख से एकाकार करता है। मिथक, इतिहास और साहित्य से आधार सामग्री का चयन कर उसे कलाकृति में परिणत करने का कार्य अनेक स्तरों से गुजरता है। इस रचना-प्रक्रिया के अपने तनाव हैं और अभिव्यक्ति का सुख भी है। अभय सरदेसाई ने लिखा है-  यह एक बहुत चुनौती भरा काम है कि एक कलाकार किस तरह एक पौराणिक कथा के अन्वेक्षण में अपना योगदान देता है। और वे क्या चित्रात्मक तरीके, ढंग होंगे जिनसे वह इस बात को प्रभावी ढंग से अपने चित्रात्मक अवकाश पर रख पाए। जहां वह मात्र सपाट व शाब्दिक दृष्टान्त को चित्रित से अपने आप को बचाये रखे। भावबोध की एक स्वतंत्र सत्ता है, माध्यम केवल शिल्प का अंतर पैदा करता है, फिर भी कलाकार की अपनी पहचान उसके माध्यम से व्यक्त होती है। अर्पणा ने यह चुनौती भी स्वीकार की है और साफ-साफ देखा जा सके वह अंतर भी पैदा किया है।

अर्पणा के इस चित्र श्रृंखला के कुछ चित्रों में विशेषकर लव बियोण्ड मेजर में सोहनी को तैरते दिखाया है परंतु साथ में गणीतीय उपकरण जैसे स्केल,डी, त्रिभुज, प्रकार आदि चित्रित हैं जो सोहनी के शरीर को क्षत विक्षित कर रहे हैं यह दर्शाता है कि सोहनी का प्रेम उसकी आत्मा किसी भी नाप, मानकीकरण से परे है, दूसरा यह कि समाज जो सदियों से प्रेम को अमीर-गरीब, ऊँच- नीच, जात-पात मर तौलता नापता आया है। कथा को समकालीनता प्रदान करते हुए अर्पणा ने इसी तरह सोहनी के साथ ऊंची-ऊंची बिल्डिंगों को भी बनाया है जो यह दिखाता है कि सोहनी आज के आधुनिक युग में भी संघर्ष कर रही है भले ही उसके सन्दर्भ बदल गये हों, परंतु स्त्री का संघर्ष अलग अलग रूपों में अनवरत चल रहा है और यही अर्पणा के चित्रों की खूबी है कि वे मात्र कथा का चित्रित रूपांतर नहीं प्रस्तुत करती है उसे समकालीनता प्रदान करते हुए आज के सन्दर्भ में उस कथा को सार्थक रूप में हमारे सम्मुख प्रस्तुत करतीं है। वे अतीत के द्वारा वर्तमान को समझने,समझाने के लिए सोहनी-महिवाल कथा को सन्दर्भ बिंदु के रूप में प्रयुक्त करती हंै। कला अपने माध्यम के चुनाव के प्रति निरपेक्ष होती है। उसका अवचेतन के आशयों को व्यक्त करना ही प्रधान उद्देश्य होता है। इसीलिए, कला सामूहिक चेतना का प्रतिनिधित्व करती है और लोकमानस के सापेक्ष और माध्यम के निरपेक्ष व्यवहार करती है।

अर्पणा कौर के कलाकर्म में साहित्य व चित्रकला में अंतर्विरोध नहीं है अपितु विभिन्नताओं का समन्वय और सहअस्तित्व है। इसी समन्वय और सहअस्तित्व के कारण उनके यहाँ कला कर्म सृजन की साधना है। जहाँ अतीत से वर्तमान और वर्तमान से अतीत में आवाजाही चलती रहती है। जीवन के यथार्थ को स्वीकार करती हुईं वे अतीत और वर्तमान के किसी भी बिंदु से भविष्य का सुनहरा स्वप्न देखती है। इसी स्वप्न में संकीर्णताओं को समाप्त करने का विश्वास निहित है।